फूलचंद : जो लौटकर कभी नहीं आया
अर्चना लार्क
03 जुलाई 2026
वह हमारी उम्र का था, मगर हट्टा-कट्टा बालक था। मुझे आज भी याद है—उसका बोलना, उसकी चमक से भरी आँखें! जो अनायास अपनी तरफ़ खींच लेती थीं। बिना कहे सुने उसे देखा जा सकता था। न जाने क्या था उसमें! आज सोचती हूँ कि बचपन के संघर्ष से भरी हुई आँखें कैसे मज़बूत हो जाती हैं, बचपन में ही...।
उसकी निगाहें स्थिर थीं। अपनी माँ की एक उंगली पकड़े मेरी चौखट पर पहुँचा था वह। बचपन की तस्वीर का उतना महत्त्व नहीं होता, जितनी कि स्मृतियों के बचे रह जाने का। स्मृतियाँ ही हैं जो आज चंचल की तरफ़ बार-बार मुझे मोड़ रहीं। चंचल नाम से मैंने पुकारना शुरू कर दिया था, फूलचंद को। हमारी पढ़ाई की उम्र में वह बच्चा कहीं दूर गाँव से आया था, उसकी माँ ने कहा ये अढ़वा काम करेगा... उसकी माँ की बेबसी, माँ का कलेजा दोनों मुँह को आ गया था, देखने वाले देख सकते थे उस समय।
सोचती हूँ अमीरी-ग़रीबी की यह खाईं एक बच्चे को उसके बचपने से दूर कर देना चाहती है, बचपन में ही एहसान का बोझ लिए जीना सबसे कष्टप्रद होता है। चंचल तो चंचल था, बेहद मासूम बचपने से भरा हुआ। माँ के जाने को बड़ी देर तक निहारता रहा, रोया नहीं। फिर थोड़ी देर में हम बच्चों के साथ खेलता रहा...
अइया दिनभर बाहर गोरू की सानी-पानी में बेहाल हुई रहती थीं। कोई अढ़वा काम के लिए आ गया है, उनकी आँखों में चमक आ गई। मेरी माँ जो कि ख़ूब पढ़ी-लिखी होते हुए भी विवाह के बाद ससुराल में पति की गिरफ्त में ऐसी हुईं कि अपने लिए बोलना भूल गईं। उस ज़माने में कोई ग्रेजुएशन कर लेता था, तो प्राइमरी की नौकरी चलकर घर आती थी—ऐसा उस समय के लिए बोलते हुए आज भी सुनती हूँ।
माँ के लिए भी एक रजिस्ट्री आई, जिसमें वह प्राइमरी की टीचर नियुक्त हुई थीं। पर न जाने कितनी अच्छी बहू, अच्छी पत्नी बनने की प्रक्रिया में उन्होंने नौकरी नहीं की। हालाँकि बाबा चाहते थे कि उनकी बहू नौकरी करे। पर माँ टस से मस न हुईं उस समय। बाबा, जिनके ऊपर बचपन से ही घर गृहस्थी सिर पर आ गई थी, जिनके पैदा होते ही उनके माँ-बाप का साया उनसे छिन चुका था, वह पढ़ने में बहुत अच्छे होते हुए भी आगे पढ़ न सके। उन्हें पढ़ाई की क़ीमत मालूम थी, वह बार-बार कोशिश करते रहे, पर माँ ने नौकरी नहीं की।
पिता को यह बात पसंद नहीं थी कि माँ गाँव में मर्दों के साथ नौकरी करें। माँ अच्छी पत्नी बनकर दिल-दिमाग़ सब सौंपकर जीनेवाली, एकदम चुप रहने लगीं। उन्हें कभी नहीं पता चला कि वह कितनी भारी क़ैद में थीं। कहते हैं जो पढ़ा-लिखा होता है—उनके चेहरे पर, उनकी भाषा में एक स्निग्धता बची रह जाती है। जो मेरी माँ के हाव-भाव में बची रही।
हाँ चंचल के घर आने के बाद, माँ ने सबसे पहले उसे पुचकारा—आओ भीतर, सकुचाओ नहीं, खेलो-कूदो-पढ़ो, बीच-बीच में अढ़वा काम कर लो। माँ न जाने क्यों उससे भरपूर ममत्व रख रही थीं। समय पर खाना-पीना और बीच-बीच में कुछ पढ़ाती भी थीं। मेरी ज़्यादा बढ़ रही दोस्ती को कभी-किसी ने टोका नहीं। सब अच्छे से चल रहा था। कभी-किसी के घर खेलती हुई मैं शाम धर-पकड़ी जाती और चंचल से कहलवा भेजा जाता चूल्हा पोंछना है। चंचल बोलता चलो-चलो पोंछना लगाना है और मुझे उसके बोलने से आनंद आ जाता।
मेरा काम था, धुँधलके में चूल्हा पोंछना। कुछ राख चूल्हे के बग़ल में क़रीने से सजा देना, पिड़ोर (मिट्टी) से चूल्हा महक उठता। फिर लालटेन साफ़ करना, तेल डालना और ओसारे में नियम से रखना। वह मेरे इस काम को तल्लीनता से देखता, अपने रिश्तेदारों की कहानी सुनाता और मैं उसके बोलने के तरीक़े पर खिलखिला उठती। उसके सोने के बारे में भी बात हुई थी घर पर। अन्य लोगों की तरह सहजता से सबके साथ उसकी चारपाई लगे ऐसा अइया नहीं चाहती थीं, उन्होंने जो देखा था बस वही करती थीं—अपना सोचा हुआ कुछ नहीं रहता था उनके पास।
माँ ने हमेशा की तरह धीरे से कहा बच्चा है डर लगेगा। हम बच्चे ज़िद पर अड़ गए कि हम सबके साथ चंचल का बिस्तर लगेगा। अइया ने ढेर आपत्ति नहीं दर्ज की, काम करने चली गईं। घर में इतना काम रहता था कि बाहर के कामों से अइया की हालत ख़राब और अंदर के कामों से माँ निढाल। फिर भी काम कभी ख़त्म नहीं होता था। और अब ध्यान से देखूँ तो दो औरतों ने ही सब सँभाल रखा था।
बाबा समय से पहले ही बूढ़े हो चले थे, कहते हैं वह बचपन से लेकर बुढ़ापे तक सिर्फ़ खेतों में काम करते रहे... पैसा बचाकर अपने बेटे को पढ़ाया, बेटा डॉक्टर बना और उनका बुढ़ापा तसल्ली से बीतने लगा। चंचल को हमारे साथ ख़ूब मज़ा आने लगा था, चंचल की माँ हर हफ़्ते मिलने आती थीं। एक बार दो हफ़्ते में आईं और चंचल को बड़ी देर तक गले लगाए हुए बोलीं, “का पगला अब तैं घरे न अउबे”। चंचल हँसकर गले से अलग हो जाता। अपने बच्चे को खाता-पीता, मुदित देखना माँ के लिए सबकुछ होता है। उसकी माँ की आँखों ने मेरी माँ की आँखों को टटोल लिया था—जब जातीं तो आश्वस्त होकर जातीं।
हम सभी बच्चे खाने पर बैठते और धीरे-धीरे समझना शुरू किया कि चंचल की थाली हमसे अलग रहती थी। एक दिन मैंने उसे अपने कप में चाय पकड़ा दिया। बाबा ने माँ से कहा, “ऊ तो बच्ची अहे तोहे तो समझी के चाही”। माँ ने मुझे कभी टोका नहीं, बस मुस्कराईं। पापा डॉक्टर थे तो हर सप्ताह घर आते थे। मैंने पापा से कहा कि हम सबका ख़ून एक है तो चंचल, अकरम, सोफ़िया के खाने का बर्तन अलग क्यों हो जाता है हर बार। पापा ने कहा बात तो सही कह रही लेकिन फिर भी कोई बदलाव नहीं हुआ। मेरी दोस्ती में दो दोस्त और जुड़े थे जिसमें अकरम और सोफ़िया भी थी। ये बिना मुझे बुलाए स्कूल नहीं जाते थे।
सोफ़िया अक्सर स्कूल नहीं जाती थी, फिर हम सब बच्चे मिलकर शाम उसकी ख़बर लेने उसके घर पहुँच जाते तो अक्सर पाते उसके घर का सामान इधर-उधर बिखरा हुआ रहता, उसका छोटा भाई रोता हुआ, सोफ़िया दो-दो भाइयों को पकड़े हुए लगभग दुबकी हुई मिलती अपने ही घर में। उसके अब्बा, उसकी अम्मी से अक्सर लड़ते थे, उस समय उसका घर एक डिब्बा दिखता—जगह-जगह से दरका हुआ। लेकिन कभी-कभी उसके घर में शांति भी रहती जब वे सब मिलकर नमाज़ पढ़ते। अक्सर उस समय मैं सोफ़िया को निहारती रहती, बड़ा सुकून उस समय उसके चेहरे पर होता था, वे सब जैसे एक थकाऊ जीवन से दूर निकल आए हों कुछ वक़्त के लिए।
मुझे बाहर खड़ी पाकर अक्सर नमाज़ के बाद सोफ़िया मेरे चेहरे पर भी हाथ फेरती और मुझे बहुत अच्छा लगता। थोड़ी देर पहले जो घर, घर नहीं लगता था—वह साफ़-सुथरे लिबास में आ जाता था। अच्छा हुआ तब मेरे पास हर बात में अपना चवन्नी का ज्ञान नहीं हुआ करता था। हाँ यह धार्मिक उन्माद कब से फैलना शुरू हुआ यह ज़रूर दिमाग़ में जब-तब आ जाता है और बेचैन कर जाता है। शायद सोफ़िया भी बचपन को याद करती होगी...!
सर्दी का समय था। उस समय मेरे मामा अमेरिका से भारत आते थे और उपहार में बहुत कुछ लाते। इस बार ढेर सारी पेंसिल आई थी रंग-बिरंगी। मैं पेंसिल लेकर ऐसे बैठी थी, जैसे कोई दानदाता—पहले अकरम को, फिर सोफिया को पेंसिल दी। चंचल को दूर से न जाने क्यों बुरा लग रहा था, बोला क्या मैं कुछ भी नहीं—मुझे क्यों नहीं दिया?
“तुम पढ़ते ही नहीं”
“मैं पढ़ूँगा, मुझे भी पेंसिल दो”
और उस रोज़ चंचल ने अपनी कॉपी में न जाने कितने पर्वत, पहाड़, फूल-पत्ती बना डाले। वह पढ़ता रहा... पढ़ता रहा उस दिन, किसी की नहीं सुना। माँ ने कह दिया कि उसकी तबियत ठीक नहीं है, आज कोई चंचल को न बुलाए। फिर एक रोज़ मेरे भाई का घर आगमन हुआ। वह बड़े व्यवहारिक और अहिंसक माने जाते थे। हॉस्टल से बड़े दिन बाद आए थे, काफ़ी तनाव से भरे हुए। बचपन से गाने-पढ़ने-लिखने के शौक़ीन, सभी में अव्वल आने वाले इस बार फ़ेल हो गए थे।
इस बार वह लौटे तो अलग हाव-भाव से भरे हुए। उन्होंने चंचल को नौकर की तरह बुलाना शुरू कर दिया कि जाओ ये कर दो, वो कर दो। चंचल ने मना कर दिया। भाई के अंदर उस दिन एक अलग सामंती व्यक्ति दिखा, उन्होंने चंचल को एक थप्पड़ जड़ दिया। हम सभी एकसाथ डर गए।
चंचल ने भी एक हाथ दे मारा। अब भाई फुफकारने लगे, जैसे उनके वर्चस्व को किसी ने ललकार दिया हो। वह लगे चंचल को पीटने, जितना वह चंचल को मारते उतना चंचल उन्हें मारता, भाई का क्रोध बढ़ता जा रहा था; उनके अंदर उस रोज़ एक अलग तरह की हिंसा को सबने देखा जिसमें जाति उसका दंभ सर्वोच्च था।
चंचल ने उस रोज़ खाना नहीं खाया। माँ ने ज़बरदस्ती हल्दी दूध पिला दिया और बड़ी देर तक रोती रहीं। हम बच्चों को उस महाभारत को देखने के बाद काटो तो ख़ून नहीं। भाई को भी ख़ूब पिटाई की चोट लगी थी, पर हममें से किसी की हिम्मत नहीं थी, उनके पास जाने की।
अगली सुबह तूफ़ान भरी बारिश हुई—जहाँ-तहाँ कीचड़ भरा हुआ था, पेड़ का असमय गिरना, अफ़रा-तफ़री का माहौल। चंचल की एक चप्पल दुआर की एक तरफ़ लगी हुई थी, दूसरी ढूँढ़ने पर भी नहीं मिली। उसकी चारपाई वैसे ही पड़ी थी। कथरी मुड़ी हुई थी। पर चंचल का कहीं पता नहीं था। चंचल सुबह होते ही घर से भाग गया था—साथ में कुछ भी नहीं ले गया। पेंसिल और कॉपी एक तरफ़ बिखरे पड़े हुए थे, मैं ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।
मेरी माँ ने कहा कि वह चला गया और सुबकती हुई भीतर चली गईं...
माँ ने पता लगाया, वह अपने घर गया था। पर एक सप्ताह बीत जाने पर भी चंचल वापस नहीं आया। मैं और मेरी बहन पूछते-पूछते पैदल चलते हुए उसके घर की तरफ़ लगभग सात कोस दूर पहुँचे। उसकी माँ ने हमारी ख़ूब फटकार लगाई, “हम मुसहर जाति ज़रूर हैं, पर अपना करते हैं, खाते हैं।”
हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैंने रोते हुए कहा, “मैंने कुछ नहीं किया...!” उस दिन जैसे लगा किसी ने मेरे सीने पर चट्टान गिरा दी हो, बहुत भारी बोझ था वह चंचल का देखते-देखते ओझल हो जाना। चंचल वापस नहीं आया। हम रेंगते-रेंगते बड़ी देर में उस दिन घर पहुँचे। उस दिन मेरे बिना ही किसी ने लालटेन जला दिया था, पर शीशा साफ़ नहीं था। लालटेन की रोशनी में धुँधलापन था। दूर से कुत्तों के रोने की आवाज़ आ रही थी, बच्चे खेलकर अपने-अपने घर पहुँच गए थे। कहीं दूर किसी बच्चे के पढ़ने की आवाज़ आ रही थी। मैं आते ही चंचल की कॉपी और पेंसिल लेकर बड़ी देर तक उसके लिखे पर रेखा खींचती रही।
धीरे-धीरे मैं बीमार पड़ती गई, मेरी आँखों में चश्मा चढ़ गया। मैं गाँव से शहर आ गई, आज भी चंचल कहीं दूर से चुहल करता मेरे पास आ बैठता है। मेरी पेंसिल निहारा करता है, मेरे साथ घूमने जाता है, हम साथ खाते-खाते गुनगुनाते हैं। यह एक ऐसी दोस्ती है जो सीने में दफ़न हो गई है। यह अक्सर स्मृतियों के झोंके से आती है और बेचैन कर जाती है।
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