Font by Mehr Nastaliq Web

पत्थरदिल

दिल्ली की चूना भट्टी की दुपहरी में मेरा दिन अक्सर कहीं और बीतता था। कभी शाहदरा, कभी नारायणा, कभी राजौरी गार्डन और कभी दिल्ली के किसी दूसरे इलाक़े में—दिन भर काम की तलाश में भटकता रहता और शाम होते-होते चूना भट्टी लौट आता। चूना भट्टी की गलियाँ सचमुच किसी भट्टी की तरह जलती थीं। गर्मी, धूल, पसीना और छोटी-छोटी झोपड़ियाँ—सब कुछ ऐसा लगता था, जैसे शहर के भीतर भी कोई दूसरा, तपता हुआ शहर बसा हो। उसी भट्टी में एक छोटा-सा मकान था। वैसे तो वहाँ लगभग सारे मकान छोटे ही थे, लेकिन उस मकान से छोटा मकान मैंने शायद ही कभी देखा हो। मुश्किल से एक मीटर का वह कमरा रहा होगा। रात में मैं वहाँ इसलिए नहीं सोता था कि उसमें हवा का नामोनिशान नहीं था। दरवाज़ा बंद होते ही वह कमरा सील-पैक डिब्बे में बदल जाता था। इसलिए रात को मैं दूसरे भैया के पास चला जाता, ताकि खुले आसमान के नीचे थोड़ी स्वच्छ हवा मिल सके।

भैया के कमरे में भी मैं भीतर नहीं सोता था। कमरे के बाहर बनी कोई एक फ़ुट चौड़ी बालकनी थी; मैं उसी के किनारे सो जाता। जगह इतनी छोटी थी कि रात में नींद में ज़रा-सी भी करवट ग़लत पड़ जाए, तो नीचे गिरने का डर बना रहता। मगर तब भी मुझे लगता था कि दिल्ली में इससे ज़्यादा सुकून देने वाली जगह शायद कोई दूसरी नहीं हो सकती। ऊपर खुला आसमान होता, कभी-कभी हवा का हल्का झोंका चेहरे को छू जाता और मैं उसी में जाने कब सो जाता। सुबह तब तक सोया रहता, जब तक मकान-मालकिन आकर डाँट नहीं देतीं, “अरे, उठ! सुबह हो गई है।” उनकी आवाज़ सुनते ही मेरी नींद उड़ जाती। आँखें खुलतीं तो सामने एक और सुबह खड़ी होती, लेकिन वह सुबह भी किसी उम्मीद की नहीं, रोज़मर्रा की मजबूरी की सुबह होती। मैं बस मकान-मालकिन की बिटिया को देखकर ख़ुश हो जाता। वह खिलते हुए गुलाब जैसी थी, जिसके ऊपर भँवरे की तरह मंडराने का ख़्वाब मैं देखा करता। उसके शरीर पर हल्के-हल्के भूरे बाल थे। जब मैं नीचे उतर रहा होता, वह अक्सर स्कूल की ड्रेस में तैयार मिलती। मैं सोचता, “काश, मैं इसे प्रेम कर पाता।” इसके आगे सोचने से डर लगने लगता। लेकिन रात में जब सोता, तो मेरे हाथ उसे टटोल रहे होते। मैं बस इतना ही कर पाता था; इससे ज़्यादा की मेरी औक़ात नहीं थी।

एक दिन मैंने देखा कि फूलचंद भैया चाय नहीं पी रहे थे। उनके हाथ में क़रीब चालीस रुपये वाला शराब का पाउच था। उन्होंने उसे गिलास में उड़ेला और पीने लगे। वही उनका नाश्ता था। मैं उन्हें देखकर भी ऐसा जताता रहा, जैसे मैंने कुछ देखा ही न हो। चुपचाप सीढ़ियों से नीचे उतर आया। इसके बाद मैं क्या करता था, यह बताते हुए आज भी मेरे भीतर एक अजीब-सी झिझक पैदा होती है। नलकूप पर पानी भरने वालों की लंबी क़तार लगी रहती थी। लोग अपने-अपने डिब्बे लगाकर खड़े रहते और अपनी बारी का इंतिज़ार करते। यह देखकर ही मुझे चक्कर आने लगता कि आख़िर मेरा नंबर कब आएगा और मैं पानी कब भर पाऊँगा। मैं किसी से झगड़ा भी नहीं कर पाता था। दिल्ली वालों की भाषा मुझे तब बिल्कुल अलग लगती थी। वे बड़ी-बड़ी कोठियों में रहते हों या चूना भट्टी जैसी झोपड़पट्टियों में, उनकी बोली और व्यवहार मुझे अपने गाँव की दुनिया से बिल्कुल अलग लगते। मैं वापस भैया के पास चला जाता। वह मुझे डाँटते, “इतना बड़ा हो गया है और पानी तक नहीं भर पाता!” मैं सिर झुका लेता और उनकी बातें सुनता रहता। उस समय मेरे पास न प्रतिवाद करने की ताक़त थी, न अपनी मजबूरी समझाने की भाषा।

सुबह दस बजे के बाद जब मैं साइट यानी काम करने की जगह के लिए निकलता, तो मुझे लगता, जैसे दुनिया की सबसे सुंदर जगह की ओर जा रहा हूँ। काम की जगह चूना भट्टी से बहुत दूर नहीं थी। दिल्ली के कीर्ति नगर में एक इमारत की चौथी मंज़िल पर मुझे काम करना होता था। जैसे ही वहाँ पहुँचता, उस मंज़िल की हवा मेरे भीतर उतर जाती। वह हवा कैसी थी, उसे शब्दों में बताना आज भी मुश्किल है। उस सुंदर हवा को उसके बाद शायद कभी महसूस नहीं किया। उस ऊँचाई से दिखाई देता दिल्ली का शहर मुझे अद्भुत लगता था। मैं काम करते हुए भी टुकुर-टुकुर पूरे शहर को निहारा करता—कभी खिड़की से, कभी बालकनी से। मुझे लगता, बस यहीं रह जाऊँ, वापस उस एक मीटर के कमरे में न लौटूँ। लेकिन जीवन अपनी इच्छा से कहाँ चलता है? शाम होते ही मुझे फिर चूना भट्टी की उसी तंग दुनिया में लौटना पड़ता। खाना खाता और फिर दूसरे भैया के यहाँ सोने चला जाता।

उनके घर में मेरे कमरे के ठीक सामने एक नवविवाहिता का कमरा पड़ता था। वह भी कोई बहुत बड़ा कमरा नहीं था, शायद मेरे कमरे से थोड़ा ही बड़ा। वह रात में बालकनी के पास खड़ी अपने पति का इंतिज़ार करती रहती और मैं भी अनायास उसकी ओर देखता रहता। वह तब तक वहीं खड़ी रहती, जब तक उसका पति लौटकर नहीं आ जाता। उसके इंतिज़ार में एक बेचैनी थी और मेरे देखने में शायद अपनी ही अकेली ज़िंदगी का कोई प्रतिबिंब। मैं देर तक उसका चेहरा देखता रहता। कई बार देखते-देखते मेरी आँखें थक जातीं और उनमें नींद उतर आती। फिर मैं उसी एक फ़ुट की बालकनी पर जाकर सो जाता। सुबह उठता तो वही दृश्य सामने होता—भैया फिर अपने चालीस रुपये वाले शराब के पाउच को गिलास में उड़ेल रहे होते। मैं उनसे कुछ नहीं कहता और सीढ़ियों से उतरकर नीचे चला जाता।

नीचे वाले भैया छोटे भैया थे। वह बड़े भैया जितनी शराब नहीं पीते थे। उनके बीच में एक और भैया थे—मछली भैया। वह चूना भट्टी में थोड़ी दूर रहते थे। कभी-कभी रास्ते में मिल जाते, तो बहुत प्यार करते। कुछ-न-कुछ खाने के लिए ज़रूर दिलाते और पूछते, “और सब बढ़िया है ना?” मैं हँसकर कहता, “हाँ भैया, सब ठीक है।” तब शायद मैं भी यही समझता था कि सब ठीक है। धीरे-धीरे समय बदला। मैं वापस घर आ गया। कुछ वर्षों बाद बालकनी के पास रहने वाले वही भैया भी गाँव लौट आए। तब उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती थी। धीरे-धीरे पता चला कि उनका लीवर काम करना बंद कर चुका है। उनके घरवालों के पास इतने पैसे नहीं थे कि उनका ठीक से इलाज करा सकें। उनकी हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती गई। धीरे-धीरे वह अपने पैरों पर चलने में असमर्थ हो गए। फिर किसी के सहारे भी उनका चलना-फिरना बंद हो गया। आख़िरकार वह टीन की छत के नीचे पड़े रहते। करवट तक नहीं बदल पाते थे। लोग कहने लगे कि उनके शरीर में सड़न होने लगी है और उनके पास जाने पर बदबू आती है।

मैं समझ नहीं पाता था कि क्या करूँ। मैं बहुत छोटा भी नहीं था; इंटर में पढ़ रहा था। इतना ज़रूर समझता था कि भैया को कोई भयानक बीमारी हो गई है और शायद घरवालों के पास उनके इलाज की कोई संभावना नहीं है। धीरे-धीरे हमारे भीतर एक ऐसी निर्दय प्रतीक्षा जन्म लेने लगी, जिसे स्वीकार करते हुए आज भी मुझे शर्म आती है... हम इंतिज़ार करने लगे थे कि वह कब मरेंगे और कब उनकी इस पीड़ा का अंत होगा। छह-सात महीने तक वह लगभग उसी जगह, उसी करवट पड़े रहे। फिर एक रात उनका कराहना बंद हो गया। सुबह मुंशी जी के घर से एक रजिस्टर आया। लोग उसमें दस-बीस-पचास रुपये देने लगे। रजिस्टर लिए बैठा आदमी सबके नाम लिखता और सामने यह भी दर्ज करता कि किसने कितने रुपये दिए। वे रुपये भैया के अंतिम संस्कार के लिए जमा किए जा रहे थे। हम ट्रॉली से सरयू मैया के घाट की ओर निकले। सरयू हमारे घर से क़रीब पंद्रह किलोमीटर दूर थी। वहाँ पहुँचने में लगभग एक घंटा लगा।

हम एक नाव में भैया को लेकर सरयू के बीच में गए। उनकी ससुराल नदी के बिल्कुल किनारे थी। भाभी बस टुकुर-टुकुर देख रही थीं। वह कुछ बोल नहीं पा रही थीं। बोलतीं भी कैसे? उन्हें भैया से मिले शायद दस साल हो चुके थे। हम भैया को नदी के बिल्कुल बीचोबीच ले गए। उनके दोनों ओर बालू की बोरियाँ बाँध दी गई थीं। फिर एक झटके में उन्हें सरयू मैया में छोड़ दिया। नाव वापस लौट आई। घाट पर पहुँचकर हम सब नहाए और घर लौट आए। घर में जो होना था, हुआ। किसी तरह क्रिया-कर्म पूरा हो गया। लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई कि मुझसे कहे, “गोविंद, अपना मुंडन करा लो।” ऐसा कहना शायद किसी ग़ुस्सैल साँड़ को छेड़ने जैसा होता। ऐसा नहीं था कि मैं उस समय बहुत प्रगतिशील था या कर्मकांड में विश्वास नहीं करता था। बात सिर्फ़ इतनी थी कि मुझे लगता था, ये बाल ही मेरे दिमाग़ में हैं। जिस दिन ये बाल मेरे सिर पर नहीं होंगे, मेरा दिमाग़ काम करना बंद कर देगा। इसकी एक दूसरी, शायद अधिक मासूम वजह भी थी... मैं नहीं चाहता था कि मेरी प्रेमिका मुझे बिना बालों के देखे। इसलिए सबने अपना-अपना मुंडन कराया, लेकिन किसी ने मुझसे कुछ नहीं कहा। एक दिन पंडित लोग आए, घर पर खाना खाया और इसी तरह भैया की कहानी समाप्त हो गई।

समय बीतता रहा। अभी बहुत अधिक समय भी नहीं बीता था कि मछली भैया भी लगभग उसी रास्ते पर चल पड़े, जिस रास्ते पर बड़े भैया जा चुके थे। उनका लीवर भी जवाब देने लगा था। वह भी धीरे-धीरे अपने पैरों पर चलने-फिरने में असमर्थ हो गए। उठना-बैठना बंद हो गया। हम उन्हें किसी बड़े अस्पताल में नहीं ले जा सकते थे। आज़मगढ़ के ज़िला चिकित्सालय में कुछ सप्ताह उनका इलाज और देखभाल हुई, लेकिन एक दिन उनकी साँस रुक गई। उस दिन मैं उनके पास ही था। अजीब बात थी कि मुझे कुछ महसूस नहीं हो रहा था। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि भैया इस दुनिया से चले गए हैं। डॉक्टर ने कहा, “इन्हें आप घर ले जाइए।” हमने घर फ़ोन करके बता दिया कि हम भैया की लाश लेकर वापस आ रहे हैं। जब हम शव लेकर घर पहुँचे, तो वहाँ पूरा मजमा लग चुका था। वही रजिस्टर फिर आ गया था। एक आदमी बैठकर लिख रहा था कि किसने अंतिम संस्कार के लिए कितने रुपये दिए हैं। भैया का शरीर अकड़ चुका था। हमने उन्हें कपड़ों में लपेटा और घर ले आए। इस बार हम उन्हें सरयू के बीच में नहीं ले गए। उन्हें लकड़ियों के बीच रखकर जला दिया गया।

मैं सोचता था कि शायद अब हमारी त्रासदी ख़त्म हो जाएगी। लेकिन त्रासदियाँ ख़त्म होने के लिए हमारे इंतिज़ार की मोहताज नहीं होतीं। मेरा भतीजा, जो उन्हीं भैया का बेटा था और उम्र में मुझसे बड़ा था, बचपन से ही एक ऐसी बीमारी से जूझ रहा था जिसने उसके मानसिक विकास को प्रभावित कर दिया था। उसका नाम प्रमोद था, लेकिन लोग उसे प्रमोद न कहकर ‘पगला’ कहते थे। धीरे-धीरे वह भी उसी दिशा में जाने लगा, जिधर मौत का रास्ता जाता है। एक समय आया, जब उसने भी उठना-बैठना छोड़ दिया। एक शाम मैं बाज़ार से लौट रहा था, तो घर की ओर से महिलाओं के रोने की आवाज़ सुनाई दी। घर पहुँचा तो देखा कि भतीजे को खाट से नीचे उतारकर ज़मीन पर लिटाया गया था। उसके बगल में गोइठों की सुलगती आग थी। मुझे समझ में आ गया कि वह भी इस दुनिया को छोड़ चुका है। पता नहीं क्यों, मुझे कुछ महसूस ही नहीं हुआ। क्या मैं सचमुच पत्थरदिल हो गया था? शायद मेरी आँखों के सामने यह तीसरा आदमी था, जो चला गया था और मेरे भीतर रोने के लिए कुछ बचा ही नहीं था।

इस बार हम उसे सरयू मैया के पास नहीं ले गए। हम उसे सरयू की एक सहायक नदी, छोटी सरयू मैया, के किनारे ले गए। वह हमारे घर से लगभग पाँच-छह किलोमीटर दूर बहती है। उसके किनारे भैरव बाबा का एक बहुत बड़ा मंदिर है। इतना विशाल शिखर वाला मंदिर मैंने पिछले साल पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भी देखा था। आज भी वहाँ हर मंगलवार को बड़ा मेला लगता है और दशहरे का मेला तो बहुत प्रसिद्ध है। नवविवाहित दंपती वहाँ अपनी मनोकामना लेकर जाते हैं, करही चढ़ाते हैं और वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। मैं बचपन से जवानी तक कई बार उस मेले में गया था, लेकिन कभी इस श्रद्धा से नहीं कि भैरव बाबा से कुछ माँगना है। उस दिन मगर मैं अपने भतीजे को गोद में उठाए उसी नदी के किनारे खड़ा था। मेरे साथ मेरा दोस्त और घर के दो-चार लोग थे। हम उसे नदी के बीच ले गए। उसके पैरों और कमर के पास पत्थर बाँध दिए गए, ताकि उसका शरीर पानी के ऊपर न आए। जैसे ही हमने उसे छोड़ा, वह नीचे चला गया और फिर कभी ऊपर नहीं आया। हम घर लौट आए। घर में सब कुछ वैसा ही था, जैसा किसी के चले जाने के बाद होता है। इस बार भी मैंने अपना मुंडन नहीं कराया। पता नहीं क्यों, मुझे हमेशा लगता रहा कि किसी के मर जाने के बाद अपने बाल कटवा देना उस मृत्यु को स्वीकार कर लेना है, जबकि मैं भीतर से शायद किसी मृत्यु को स्वीकार करना ही नहीं चाहता था।

अभी इन घटनाओं की धूल बैठी भी नहीं थी कि मेरे सबसे प्यारे भैया बीमार पड़ गए। वह मुझे सबसे अधिक प्रिय थे। हमारे घर में सबसे ज़्यादा पढ़े-लिखे लोगों में थे—एम.ए. तक पढ़े हुए। अगर मैं कहूँ कि पूरे केवटहिया में वह सबसे अधिक पढ़े-लिखे आदमी थे, तो शायद ग़लत नहीं होगा। लेकिन उन्हें भी वही आदत लग गई थी, जिसने पहले मेरे बड़े भैया को हमसे छीन लिया था। वह बहुत पीने लगे थे। मुझे उनके पीने का पता भी नहीं चलता था। वह अक्सर घर पर ही रहते और बीच-बीच में चंडीगढ़ चले जाते, जहाँ सबसे बड़े भैया रहते थे। वह केवटहिया के परास्नातक करने वाले पहले छात्र थे। उनकी किताबों और लिखावट के हम दीवाने थे। पीजी तक पढ़ लेने के बाद भी उन्हें कोई सरकारी नौकरी नहीं मिली, तो वह चंडीगढ़ में पीओपी का काम करने लगे। लेकिन पढ़ाई के बाद शारीरिक श्रम कहाँ हो पाता! धीरे-धीरे वह ठेकेदारी करने लगे। मगर जब काम करने का ढंग ही पता न हो, तो ठेकेदारी भी कहाँ चलती है। ज़िंदगी एक जाल जैसी हो गई और वह उसमें बिंधते चले गए। एक दिन ख़बर मिली कि उनका पेट बहुत फूल गया है। वह चंडीगढ़ के पीजीआई में भर्ती हुए। कुछ दिनों बाद उन्हें थोड़ी राहत मिली और वह वापस गाँव आ गए। लेकिन एक रात उनकी हालत अचानक बहुत ख़राब हो गई। भाभी और घर के लोग उन्हें ज़िला अस्पताल ले गए, जहाँ से उन्हें लखनऊ रेफ़र कर दिया गया। उनका पेट कम होने का नाम नहीं ले रहा था। वह कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहे। बड़े भैया बार-बार कहते रहे कि सुंदर भैया को चंडीगढ़ ले आओ, लेकिन उन्होंने जाने से मना कर दिया।

एक दिन ख़बर आई कि मेरे प्यारे सुंदर भैया भी इस दुनिया में नहीं रहे। मैं सचमुच पत्थर हो चुका था। मुझे रोना नहीं आया। मैं बस इंतिज़ार करता रहा कि वह कब आएँगे और कब हम उनकी लाश लेकर सरयू मैया के किनारे जाएँगे। लेकिन वह दिन मुझे देखना नसीब नहीं हुआ। तब तक मैं इलाहाबाद आ चुका था और बी.ए. द्वितीय वर्ष का छात्र था। माँ ने फ़ोन करके पूछा, “घर आओगे?” मैंने कहा, “हाँ, आना तो चाहता हूँ, लेकिन रात में कैसे आऊँ?” माँ को भी मेरी रात की यात्रा को लेकर डर लगता था। उन्होंने कहा, “रहने दो, भैया को जाना था, वह चले गए। तुम आराम से आना।” मैं फ़ोन रखकर बैठा रह गया। भैया का चेहरा मेरी आँखों के सामने घूमता रहा। अगले दिन लोग उन्हें सरयू मैया के किनारे ले गए और वह राख का ढेर बन गए। मुझे नहीं पता था कि यह सिलसिला कब रुकेगा।

मैं बी.ए. पास करके एम.ए. प्रथम वर्ष में इतिहास विभाग में पढ़ रहा था। एक शाम इलाहाबाद विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी के पास दोस्तों के साथ बैठा था कि अचानक फ़ोन की घंटी बजी। फ़ोन मेरे छोटे भाई का था। उसने कहा, “सिंघाड़े भैया नहीं रहे।” मैं इतना पत्थर हो चुका था कि मुझे यह तक महसूस नहीं हुआ कि मेरा छोटा भाई क्या कह रहा है। मैंने उससे यह भी नहीं पूछा कि आख़िर हुआ क्या था। उसने फ़ोन रख दिया। रात में जब मैं हॉलैंड हॉल हॉस्टल के अपने कमरे में पहुँचा, तो घर फ़ोन किया। माँ से पूछा, “भैया घर आ रहे हैं?” माँ ने कहा, “नहीं, उन्हें चंडीगढ़ में ही जला दिया जाएगा। घर आने की ज़रूरत नहीं है।” मैं घर नहीं गया। मेरे आँसू नहीं आए। पता नहीं वे आँसू कहाँ सूखकर मर गए थे। एक-एक करके चार लोग मेरी आँखों के सामने से चले गए थे और मैं कुछ नहीं कर पाया था। घरवाले भी कुछ नहीं कर पाए थे। जब घरवाले कुछ नहीं कर सके, तो मैं क्या कर सकता था?

लेकिन मुझे नहीं पता था कि इससे भी बड़ी त्रासदी मेरे सामने खड़ी है। एक दिन मैं अपने कमरे में बैठा खाना खा रहा था कि फ़ोन की घंटी बजी। उधर से छोटे भाई ने कहा, “छोटकी बहिनी नहीं रही।” मैं सन्न रह गया। मुझे समझ में नहीं आया कि ऐसा कैसे हो सकता है। उसने तो कभी शराब नहीं पी थी। उसने कभी गाँजा नहीं किया था। उसे ऐसा क्या हो गया कि वह इस दुनिया से चली गई? वही तो थी, जो मेरे घर आने पर ख़ुशी से चिल्लाकर कहती थी, “चाचा! चाचा आ गए!” और मैं खिलखिलाकर कहता था, “हाँ, आ गया।” वह भी चली गई। मुझे छोड़कर क्यों चली गई? उसने इस दुनिया का क्या बिगाड़ा था? फिर जो बात मुझे पता चली, उसने मुझे भीतर तक हिला दिया। आज भी उसे लिखते हुए डर लगता है। उसके साथ जो हुआ, उसे बयान करने की हिम्मत आज भी मेरे भीतर नहीं है। पता नहीं, वह हिम्मत मुझे कभी मिलेगी भी या नहीं कि दुनिया को बता सकूँ कि मेरी सबसे प्यारी भतीजी इस दुनिया से क्यों चली गई। आज भी उसका ज़िक्र होते ही सबकी भौंहें तन जाती हैं, “अरे उ मरखोइयवा क करमवा वैसे रहै। ओकर बात न कर।” सब उसे ऐसे भूल गए, जैसे वह कभी थी ही नहीं।

मैंने घरवालों से कहा, “मैं घर आ रहा हूँ।” घरवालों ने साफ़ मना कर दिया, “घर मत आना, यहाँ ख़तरा है।” मुझे समझ में नहीं आया कि वे किस ख़तरे की ओर इशारा कर रहे हैं। मुझे तो लगता था कि मुझे कोई ख़तरा नहीं है। बाद में समझ आया कि घरवालों को डर था कि घर में कोई पुरुष मिला, तो पुलिस उसे पकड़कर ले जा सकती है। उनकी बात मानकर मैं गाँव नहीं गया। लेकिन उस दिन पहली बार मेरे भीतर कुछ टूटने के बाद पिघलने लगा। मैं अपने कमरे में रोने लगा। मेरा पत्थरदिल जैसे हिमालय की किसी बर्फ़ की चट्टान की तरह था, जिस पर अचानक तेज़ धूप पड़ गई हो और वह ख़ुद को पिघलने से रोक न पा रही हो। मैं अपने कमरे 51-बी में अक्सर बैठकर रोता रहता। मेरे दोस्तों को कभी पता नहीं चला कि मैं रोता क्यों हूँ, क्योंकि उन्होंने मुझे कभी रोते हुए देखा ही नहीं था। उनके सामने मैं ऐसे रहता, जैसे मेरे पास सब कुछ है, जैसे मुझे कुछ हुआ ही नहीं। लेकिन मेरे भीतर धीरे-धीरे सब ख़ाली होता जा रहा था।

और जब भीतर बहुत ज़्यादा ख़ालीपन हो, तो आदमी कभी-कभी उसी चीज़ की ओर बढ़ने लगता है, जिससे उसे सबसे अधिक बचना चाहिए। मैं भी धीरे-धीरे भरी हुई बोतलों की ओर जाने लगा। वे बोतलें जैसे अनायास मेरे पास चली आतीं, कभी दोस्तों के ज़रिये, कभी किसी सीनियर के ज़रिये। मैं उन्हें अपने गिलास में उड़ेलता और अपने पेट में भर लेता। मुझे मालूम था कि मेरे तीन भैया इसी बोतल और इसी गिलास के कारण सरयू मैया की गोद में समा चुके हैं, फिर भी मैं ख़ुद को रोक नहीं पाता था। आख़िर मैं कहाँ जाता? किससे कहता कि मेरे भीतर क्या चल रहा है? किसके पास इतना समय था कि वह मेरे भीतर का दुख सुनता? और शायद मेरे पास भी इतना साहस नहीं था कि किसी के सामने बैठकर अपने भीतर का अँधेरा खोल देता। इसलिए मैं हँसता, खेलता और अपने दिन जैसे-तैसे काटता रहा। बाहर से मैं वही था, लेकिन भीतर से लगातार टूट रहा था।

कुछ समय बाद मुझे लगा कि मुझे घर वापस जाना चाहिए। मैं घर लौट आया। मेरी एक भतीजी अभी-अभी अठारह साल की हुई थी। घरवालों ने उसकी शादी कर दी थी। मैं विरोध करना भी चाहता, तो किससे करता? मेरी बात सुनता ही कौन था? उसका अपने पति से झगड़ा चल रहा था। एक दिन दुपहर में वह खेत से लौटकर खाट पर लेटी थी। तभी भाभी दौड़ती हुई मेरे पास आईं और बोलीं, “बाबू, बाबू, चलिए। उसने अपने आपको कमरे के अंदर बंद कर लिया है और दरवाज़ा भी नहीं खोल रही।” मेरी हिम्मत जवाब दे गई। मैं सन्न रह गया। मेरे पैर उठ नहीं रहे थे। मैंने छोटे भतीजे से कहा, “तुम चले जाओ, मेरी हिम्मत नहीं हो रही।” उसने कहा, “ठीक है, आप यहीं रहिए, मैं जाकर देखता हूँ।”

कुछ देर बाद वह दौड़ता हुआ वापस आया। उसकी आँखों में भय था। उसने कहा, “चाचा, दीदी नहीं रही।” मैंने पूछा, “क्या हुआ?” उसने बताया कि वह कमरे के भीतर फंदे से लटकी हुई थी। उसने कहा, “आप चलिए, उसके गले से फंदा काटना है।” उसका डरा हुआ चेहरा देखकर मेरी हिम्मत नहीं हुई कि उस कमरे की ओर एक क़दम भी बढ़ाऊँ। मैंने कहा, “किसी और को बुला लो, मैं नहीं जाऊँगा।” देखते-देखते यह बात बिजली की तरह पूरे घर में फैल गई। घर में कोहराम मच गया। उसकी ससुराल वाले भी आ गए। पूरा घर लोगों से भर गया। उसकी ससुराल वाले उसे अपने घर ले जाना चाहते थे। उनका कहना था कि वह अब उनके परिवार की थी और उसका अंतिम संस्कार उनके घर से होना चाहिए। मैं भीतर से चीख़ उठा—एक महीना पहले ही तो उसका विवाह हुआ था, फिर एक महीने में वह हमारे परिवार से बाहर कैसे हो गई? क्या बेटी का अपने मायके पर अंतिम समय में भी कोई अधिकार नहीं होता? क्या बेटियाँ सचमुच इतनी पराई होती हैं कि मृत्यु के बाद भी उनका घर बदल जाता है?

उस दिन मुझे पहली बार उस कहावत की भयावहता समझ में आई कि बेटी पराई होती है। शायद समाज सचमुच बेटियों को ऐसा बना देता है कि उनका नैहर जीवन भर उनका होते हुए भी उनका नहीं रह जाता। सब लोग डरे हुए थे कि कहीं पुलिस का मामला न बन जाए, कोई फँस न जाए, ससुराल वाले हमारे घर पर कोई आरोप न लगा दें। लेकिन उसके ससुराल वाले अच्छे लोग थे। उन्होंने किसी पर कोई आरोप नहीं लगाया। वे उसकी देह को गाड़ी में लेकर चले गए। मैं उस गाड़ी को दूर से देखता रहा। भीतर ही भीतर रोता रहा कि मैं उसके लिए कुछ क्यों नहीं कर पाया। मेरी आँखों के सामने से अभी कितने लोग जाने वाले थे? भगवान मुझे यह क्यों नहीं बता देता कि अगला नंबर किसका है... मेरा या किसी और का?

उसके बाद मेरे भीतर एक और डर ने जन्म लिया। मुझे लगने लगा कि अगला नंबर मेरा है। दिन-रात सोचता कि जैसे कोई फाँसी का फंदा धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ रहा हो। रात में सोते हुए अचानक डरकर उठ जाता। लगता, अब मेरी बारी है। धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि मैं मरने वाला हूँ। गाँव में लोग तरह-तरह की बातें करते थे। कोई कहता कि केवटहिया के देवी-देवता अपने स्थान से उजाड़ दिए गए हैं और अब वे एक-एक करके सबको मार रहे हैं। मेरे पिता चार भाइयों में से एक थे। उन चार भाइयों में से दो भाइयों के बेटों को मैं सरयू नदी के बीच जाते देख चुका था। दो भतीजियों को अपनी आँखों के सामने मौत की ओर जाते देख चुका था। अब मुझे लगता था कि अगला नंबर मेरे पिता की किसी संतान का होगा। और पता नहीं क्यों, मैं चाहता था कि वह नंबर मेरा हो।

शायद इसकी एक वजह यह भी थी कि मैं अपने आपको पत्थरदिल समझने लगा था। मुझे लगता था कि जिसे रोना नहीं आता, उसे इस संसार में रहने का क्या अधिकार है? आख़िर वह किस काम का है? चाहे पुरुष हो या स्त्री, इंसान को रोना तो आना चाहिए। लेकिन मैं किसे बताता कि मैं अंदर ही अंदर रोता रहता हूँ? कमरे में अकेला होता, तो रोता था; मगर लोगों के सामने आँसू नहीं निकलते थे। मुझे समझ में नहीं आता था कि सबके सामने रोने की यह सरल-सी कला मुझसे क्यों नहीं आती। मैं अपनी माँ, भाभी और बहनों की तरह दहाड़ मारकर रोना चाहता, लेकिन लाख कोशिश करने के बाद भी ऐसा नहीं कर पाता। बाहर से चुप रहता और भीतर से टूटता रहता।

अब मेरे सपनों में भी मृत्यु आने लगी थी। मुझे बार-बार लगता कि मैं मरने वाला हूँ। कब मरूँगा, यह नहीं पता था, लेकिन यक़ीन होता जा रहा था कि मेरी बारी भी आएगी। मैं उस दिन की कल्पना करने लगा था, जब मेरी लाश मेरे बिस्तर पर पड़ी होगी और केवटहिया के वही देवी-देवता मुझ पर फूल बरसा रहे होंगे। मुझे लगता था कि शायद उस दिन मेरे भीतर का सारा शोर ख़त्म हो जाएगा, शायद तब मैं रो पाऊँगा, शायद तब मेरी आँखों में वह पानी लौट आएगा, जो इतने वर्षों से भीतर कहीं दबा पड़ा है।

लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है कि शायद मैं मरना नहीं चाहता था। मैं सिर्फ़ उस पीड़ा से छुटकारा चाहता था, जो लगातार एक-एक करके मेरे अपने लोगों को मुझसे छीनती चली गई थी। मैं उस भय से मुक्त होना चाहता था, जिसमें हर मृत्यु के बाद अगली मृत्यु का इंतिज़ार शामिल था। मैं उस अपराधबोध से मुक्त होना चाहता था कि मैं किसी को बचा नहीं पाया। मैं उस ख़ालीपन से निकलना चाहता था, जिसमें रोना भी संभव नहीं रह गया था। मुझे लगता था कि मेरे भीतर कुछ मर चुका है, इसलिए शायद मेरा मर जाना ही ठीक होगा। लेकिन शायद इंसान के भीतर सबसे कठिन समय में भी कोई बहुत छोटी-सी जगह ऐसी बची रहती है, जहाँ जीवन चुपचाप बैठा रहता है। वह बोलता नहीं, बस इंतिज़ार करता है कि कोई उसे पहचान ले।

मेरे भीतर भी शायद वही छोटी-सी जगह बची हुई थी। वह जगह आज भी मेरे उन सभी भैयाओं, उस भतीजे, उन भतीजियों और उन तमाम चेहरों को अपने भीतर सँजोए बैठी है, जो मेरी आँखों के सामने से चले गए। सरयू की धारा उन्हें अपने साथ बहा ले गई, आग ने उनकी देह को राख में बदल दिया, समय ने उनके नामों के आस-पास धूल जमा दी; लेकिन मेरी स्मृति में वे आज भी वैसे ही मौजूद हैं—कोई चालीस रुपये का शराब का पाउच गिलास में उड़ेल रहा है, कोई बालकनी में बैठा हवा खा रहा है, कोई मुझे प्यार से पूछ रहा है, “और सब बढ़िया है ना?” कोई अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा है, कोई मुझे देखकर “चाचा आ गए” कह रहा है। वे सब चले गए, लेकिन मेरे भीतर उनकी आवाज़ें अब भी जीवित हैं।

शायद मेरी सबसे बड़ी त्रासदी यही नहीं थी कि मैंने इतने लोगों को खो दिया। मेरी सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उनकी मौतों के साथ-साथ मैं अपने भीतर का बहुत-सा जीवन भी खोता चला गया। मैंने दुख को अपने भीतर बंद कर लिया, उसे किसी से कहा नहीं, रोकर बाहर नहीं निकाला। वह दुख भीतर जमा होता गया और धीरे-धीरे पत्थर बनता गया। फिर उसी पत्थर को मैंने अपना स्वभाव समझ लिया। मुझे लगा कि मैं पत्थरदिल हूँ। लेकिन पत्थरदिल आदमी अपने भीतर इतनी आवाज़ें नहीं सुनता। पत्थरदिल आदमी रातों में जागकर उन लोगों के चेहरे नहीं देखता, जिन्हें वह खो चुका है। पत्थरदिल आदमी यह नहीं पूछता कि उसने आख़िर किसी का क्या बिगाड़ा था।

आज भी मेरे भीतर बहुत-से सवाल हैं, जिनके जवाब शायद कभी नहीं मिलेंगे। मैं नहीं जानता कि हमारे परिवार पर मौतों की यह छाया क्यों आई। मैं नहीं जानता कि ग़रीबी, बीमारी, शराब, सामाजिक भय और हमारी मजबूरियाँ मिलकर कितनी ज़िंदगियाँ निगल सकती हैं। मैं यह भी नहीं जानता कि किसी आदमी को कब तक मज़बूत बने रहना चाहिए और कब उसे टूटकर रो लेना चाहिए। लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि किसी इंसान का रो न पाना इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसके भीतर दुख नहीं है। कई बार आँसू आँखों से नहीं निकलते; वे भीतर कहीं जमा होकर आदमी की पूरी ज़िंदगी का रंग बदल देते हैं।

और इसलिए अब जब मैं उस पुराने वाक्य को याद करता हूँ—“वह दिन जल्द आए”—तो उसके भीतर मुझे मृत्यु की इच्छा से अधिक एक थके हुए आदमी की पुकार सुनाई देती है। वह पुकार कहती है कि कोई उसे देखे, कोई उसकी बात सुने, कोई उसके भीतर जमा हुए वर्षों के दुख को समझे। शायद उसे मरना नहीं था; शायद उसे सिर्फ़ इतना चाहिए था कि कोई उसके पास बैठकर कह देता—“तुम्हें रोने का अधिकार है। तुम थक सकते हो। तुम्हें हर मौत का बोझ अकेले उठाने की ज़रूरत नहीं है।” शायद वह आवाज़ समय पर मिल जाती, तो बहुत कुछ बदल सकता था। शायद मेरी कहानी का अंत उस बिस्तर पर पड़े हुए मेरे शरीर के साथ नहीं, बल्कि उसी बिस्तर पर बैठे हुए एक आदमी के साथ होता, जो पहली बार खुलकर रो रहा होता—अपने लिए, अपने भैया के लिए, अपने भतीजे के लिए, अपनी भतीजियों के लिए और उन सबके लिए, जिन्हें वह बचा नहीं सका।

सरयू आज भी बहती है। छोटी सरयू भी बहती है। चूना भट्टी की गलियाँ शायद बदल गई होंगी। कीर्ति नगर की वह चौथी मंज़िल भी शायद वैसी न रही हो, लेकिन मेरी स्मृति में वे सारी जगहें अब भी ज़िंदा हैं। एक तरफ़ वह एक मीटर का कमरा है, जहाँ हवा तक बंद हो जाती थी; दूसरी तरफ़ चौथी मंज़िल की वह खिड़की है, जहाँ से पूरी दिल्ली मुझे दुनिया की सबसे सुंदर जगह दिखाई देती थी। शायद जीवन भी कुछ ऐसा ही है—एक तरफ़ दम घोंटता हुआ छोटा-सा कमरा और दूसरी तरफ़ खुला आसमान। हम कई बार यह भूल जाते हैं कि कमरे का दरवाज़ा हमेशा बंद नहीं रहता। किसी-न-किसी तरफ़ कोई खिड़की ज़रूर होती है। बस, उस खिड़की तक पहुँचने के लिए कभी-कभी बहुत लंबी यात्रा करनी पड़ती है।

मैंने बहुत लोगों को जाते देखा है। इतना कि कई बार मुझे लगा कि अब मेरे जाने की बारी है। लेकिन शायद मेरी कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई है। शायद उन सबकी स्मृतियों को शब्द देना ही मेरी ज़िम्मेदारी है। शायद उनके लिए रो पाना ही मेरे पत्थर होते दिल को फिर से मनुष्य बनाने का एक रास्ता है। और शायद यही कारण है कि मैं आज भी उन दिनों को याद कर रहा हूँ—चूना भट्टी की जलती हुई गलियों से लेकर सरयू के ठंडे पानी तक, एक मीटर के कमरे से लेकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कमरे 51-बी तक, शराब के उस गिलास से लेकर उन असंख्य आँसुओं तक, जो आँखों से कभी बाहर नहीं आए।

वे लोग चले गए, लेकिन उनकी कहानियाँ अभी बाकी हैं... और शायद जब तक मैं उन्हें लिखता रहूँगा, वे पूरी तरह मरेंगे नहीं। वे मेरी स्मृति में, मेरे शब्दों में और मेरी आवाज़ में जीवित रहेंगे। यही शायद उस लंबे अँधेरे से बाहर निकलने की पहली सीढ़ी है—यह स्वीकार करना कि मैं पत्थर नहीं हूँ। मैं भी दुखी हो सकता हूँ। मैं भी रो सकता हूँ... और मुझे भी जीने का उतना ही अधिकार है; जितना उन सबको था, जिन्हें मैंने अपनी आँखों के सामने खो दिया।

•••

गोविंद निषाद को और पढ़िए : शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी और ‘फ़ानी बाक़ी’ | एक रात जो अब भी मेरे भीतर उजाला करती है | ‘हासिल’ से आगे का इलाहाबाद

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट