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न्यूयॉर्क : जहाँ पूरी दुनिया एक शहर में सिमट आई है

कुछ शहर देखे नहीं जाते, जिए जाते हैं। कुछ शहर ऐसे होते हैं जिन्हें देखने के बाद भी आप उन्हें पूरी तरह देख नहीं पाते, क्योंकि वे अपने दृश्य से कहीं अधिक अपने स्वभाव में बसे होते हैं। न्यूयॉर्क मेरे लिए ऐसा ही शहर था। दुनिया के सबसे चर्चित शहरों में से एक होने के बावजूद, उसने मुझे अपनी ऊँची इमारतों, नियॉन रोशनियों और ब्रॉडवे के वैभव से कम, अपने नागरिक व्यवहार, अपनी सामाजिक संस्कृति और मनुष्य के प्रति अपने सम्मान से अधिक प्रभावित किया।

हम अक्सर न्यूयॉर्क को फ़िल्मों के माध्यम से जानते हैं। मैनहैटन की स्काईलाइन, टाइम्स स्क्वेयर की चकाचौंध, सेंट्रल पार्क, ब्रुकलिन ब्रिज, पीली टैक्सियाँ। लेकिन इन सबके पीछे एक और शहर साँस लेता है, जो कैमरे में कम और अनुभव में अधिक दिखाई देता है। वही शहर मेरे भीतर बस गया।

हडसन के किनारे बसा हुआ एक स्वप्न

शाम उतर रही थी। सामने हडसन नदी थी। पानी में हल्की-हल्की लहरें थीं और दूसरी ओर मैनहैटन की ऊँची इमारतें अपने प्रतिबिंब के साथ खड़ी थीं। हवा में अनूठी शांति थी। हालाँकि इतने विशाल महानगर के बीच यह शांति असंभव-सी प्रतीत हो रही थी। जैसे जागते में कोई सपना देख रही हूँ।

हडसन के किनारे बैठकर पहली बार लगा कि किसी शहर की गति और उसकी आत्मा दो अलग-अलग बातें होती हैं। न्यूयॉर्क जितना तेज़ है, उतना ही धैर्यवान भी है। लोग भाग रहे हैं, लेकिन भागमभाग का तनाव उनके चेहरों पर नहीं है। कोई ऊँची आवाज़ में नहीं बोल रहा, कोई किसी को धक्का देकर आगे नहीं निकल रहा, कोई हॉर्न बजाकर अपनी अधीरता का प्रदर्शन नहीं कर रहा।

वहाँ बैठकर बार-बार यही महसूस हुआ कि सभ्यता केवल ऊँची इमारतों का नाम नहीं है, सभ्यता उस क्षण पैदा होती है, जब लाखों लोग एक-दूसरे के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप किए बिना साथ रहना सीख लेते हैं। देखा जाए तो बिना एक-दूसरे के जीवन में दख़ल दिए साथ रह लेना, मनुष्य की सबसे विलक्षण और सबसे सुंदर उपलब्धियों में से एक है।

साथ रहना आसान है, बिना दख़ल दिए साथ रहना सभ्यता है।

टाइम्स स्क्वेयर सिर्फ़ रोशनी नहीं, धड़कन भी है

टाइम्स स्क्वेयर को अक्सर दुनिया का सबसे चमकदार चौराहा कहा जाता है। सच भी है। चारों ओर विशाल डिजिटल स्क्रीनें, असंख्य विज्ञापन, रोशनी का अथाह समुद्र और निरंतर बहती हुई भीड़।

मैं वहाँ ऐसे समय पहुँची जब फ़ीफ़ा विश्वकप का उत्सव पूरे शहर पर छाया हुआ था। तब टाइम्स स्क्वेयर केवल एक पर्यटन स्थल नहीं रह गया था, वह दुनिया का साझा ड्राइंग रूम बन गया था।

विशाल स्क्रीन पर मैच चल रहे थे। हज़ारों लोग अलग-अलग देशों की जर्सियाँ पहने खड़े थे। कहीं अर्जेंटीना के झंडे लहरा रहे थे, कहीं ब्राज़ील, कहीं स्पेन, कहीं फ़्रांस, कहीं इक्वाडोर, कहीं मोरक्को, कहीं इंग्लैंड। ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दुनिया अपने-अपने झंडे और अपनी-अपनी उम्मीदें लेकर टाइम्स स्क्वेयर में उतर आई हो।

कोई किसी को जानता नहीं था, फिर भी गोल होने पर अजनबी एक-दूसरे के गले लग जाते थे। किसी बच्चे की ख़ुशी पर कोई बड़ा मुस्कुरा रहा था। किसी टीम की हार पर दूसरी टीम के समर्थक भी संवेदना प्रकट कर रहे थे।

ऐसा अद्भुत दृश्य मैंने अपने जीवन में पहली बार देखा। वहाँ हज़ारों लोग थे, लेकिन कोई किसी का शत्रु नहीं था। वे अलग-अलग टीमों का समर्थन कर रहे थे, पर एक-दूसरे के विरोधी नहीं थे। किसी की टीम जीतती, तो उसके आस-पास ख़ुशी की लहर दौड़ जाती। किसी की टीम हारती, तो उसके चेहरे पर मायूसी साफ़ दिखाई देती, लेकिन उस मायूसी में कटुता नहीं थी। न गाली-गलौज, न आक्रामकता, न दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश।

बसे दिलचस्प बात यह लगी कि हार का दुःख भी वहाँ स्थायी नहीं था। कुछ ही देर बाद वही लोग फिर किसी दूसरे समूह के साथ हँसते दिखाई देते, संगीत की धुन पर झूमते, तस्वीरें खिंचवाते या किसी अनजान व्यक्ति से हाथ मिलाते। जैसे खेल जीत-हार से बड़ा हो, और उत्सव किसी एक टीम का नहीं, पूरी दुनिया का हो।

उस शाम मुझे शिद्दत से महसूस हुआ कि खेल लोगों को बाँटने के लिए नहीं, जोड़ने के लिए ही होते हैं—बशर्ते हम अपनी मानसिकता सही रखें। टाइम्स स्क्वेयर उन दिनों एक चौराहा नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा उत्सव-स्थल लग रहा था।

टाइम्स स्क्वेयर की सबसे बड़ी विशेषता शायद उसकी रोशनी नहीं, उसका स्वीकार है। वहाँ कोई यह नहीं पूछ रहा कि तुम किस देश से आए हो, किस भाषा में बोलते हो, तुम्हारा धर्म क्या है या तुम्हारा रंग कैसा है। उस समय सब केवल दर्शक थे। एक साझा अनुभव के सहभागी।

वॉच पार्टियाँ : उत्सव का लोकतंत्र

विश्वकप के दिनों में न्यूयॉर्क के अलग-अलग हिस्सों में सार्वजनिक वॉच पार्टियाँ आयोजित की गई थीं। बड़ी स्क्रीनें, खुली जगहें, बैठने की व्यवस्था और हज़ारों लोग।

भारत में सार्वजनिक भीड़ का अर्थ अक्सर धक्का-मुक्की, शोर और अव्यवस्था मान लिया जाता है। यहाँ भीड़ थी, पर अनुशासन भी था। उत्साह था, पर उन्माद नहीं। किसी को देखने के लिए किसी के कंधे पर चढ़ने की ज़रूरत नहीं थी। हर व्यक्ति जानता था कि सार्वजनिक स्थान सबका है। यह लोकतंत्र केवल संविधान में नहीं था, यह रोज़मर्रा के व्यवहार में था।

अभिव्यक्ति की आज़ादी : सिर्फ़ नाम की नहीं

एक बात और थी, जिसने मुझे सचमुच चौंकाया और मुस्कुराने पर मजबूर भी किया। न्यूयॉर्क की सड़कों और स्मारिका की दुकानों में मैंने अनगिनत टी-शर्टें, कैरिकेचर, पोस्टर, मग और दूसरी चीज़ें देखीं, जिन पर व्यंग्य, कटाक्ष और हास्य के ज़रिए अमेरिका के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व पर टिप्पणियाँ की गई थीं। कहीं हल्का मज़ाक़ था, कहीं तीखा व्यंग्य, तो कहीं खुला राजनीतिक कटाक्ष।

लेकिन उससे भी अधिक दिलचस्प बात यह थी कि लोग इन्हें बिल्कुल सहज भाव से देख रहे थे। कोई उत्तेजना नहीं, कोई हंगामा नहीं। जो उस नेता के घोर समर्थक होंगे, वे भी इन्हें देखकर सामान्य थे। ये वस्तुएँ खुलेआम दुकानों में बिक रही थीं और पर्यटक उन्हें हँसते-मुस्कुराते ख़रीद भी रहे थे।

उसे देखकर मुझे लोकतंत्र का एक अलग ही चेहरा दिखाई दिया। ऐसा लोकतंत्र, जहाँ सत्ता पर व्यंग्य करना भी सार्वजनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है।

अनायास ही मन अपने देश की ओर चला गया, जहाँ किसी राजनीतिक असहमति या व्यंग्य को व्यक्ति की देशभक्ति से जोड़कर देखा जाने लगा है। दोनों अनुभवों के बीच का यह अंतर बहुत बड़ा था।

यूनियन स्क्वेयर : जहाँ शहर अपन ही लय में साँस लेता है

अगर टाइम्स स्क्वेयर न्यूयॉर्क का चमकता हुआ चेहरा है तो यूनियन स्क्वेयर उसका सहज, मानवीय चेहरा है।

वहाँ बैठकर लोगों को देखना अपने आप में एक अनुभव है। कोई किताब पढ़ रहा है। कोई अपने कुत्ते के साथ टहल रहा है। कोई सड़क के किनारे बैठकर गिटार बजा रहा है। कोई चॉक से फ़ुटपाथ पर चित्र बना रहा है। कोई बच्चों के लिए जादू दिखा रहा है।

सब अपने-अपने संसार में हैं, लेकिन किसी का संसार दूसरे के लिए बाधा नहीं बनता।

मुझे सबसे अधिक प्रभावित इस बात ने किया कि सड़क पर कला का प्रदर्शन करने वाले कलाकारों को लोग दया या हिक़ारत की दृष्टि से नहीं देखते। वे उनके सामने रुकते हैं, प्रदर्शन देखते हैं, ताली बजाते हैं, पैसे देते हैं, उनके साथ तस्वीर खिंचवाते हैं। वहाँ सड़क पर कला दिखाना ग़रीबी का प्रतीक नहीं, प्रतिभा का उत्सव है।

एक बार मन फिर इस बात पर अटक गया कि भारत में जहाँ अक्सर सड़क के कलाकारों को हाशिये पर धकेल दिया जाता है। न्यूयॉर्क में वे शहर की सांस्कृतिक धड़कन का हिस्सा हैं।

ज़मीन के नीचे धड़कता न्यूयॉर्क

न्यूयॉर्क की सबवे (metro) अपने आप में एक अलग दुनिया है। कहा जाता है कि यह दुनिया की सबसे पुरानी भूमिगत रेल प्रणालियों में से एक है, और वहाँ उतरते ही इसका एहसास भी होने लगता है। ऊपर शहर लगातार अपने को नया करता हुआ दिखाई देता है, लेकिन ज़मीन के नीचे इतिहास अब भी साँस लेता है।

दिलचस्प बात यह लगी कि जहाँ पोर्ट अथॉरिटी जैसे विशाल बस टर्मिनल आधुनिक सुविधाओं, वातानुकूलित हॉल और चमचमाती व्यवस्था से लैस हैं, वहीं सबवे का बड़ा हिस्सा अब भी अपने पुराने स्वरूप को सँभाले हुए है। कई स्टेशन बहुत पुराने हैं, प्लेटफ़ॉर्म पर गर्मी महसूस होती है, लंबी-लंबी सुरंगों और गलियारों से होकर एक लाइन से दूसरी लाइन तक जाना पड़ता है। कई बार तो एक ही स्टेशन के भीतर इतनी दूर पैदल चलना पड़ता है कि लगता है, जैसे किसी भूमिगत शहर में घूम रहे हों।

उसकी ट्रेनें अपेक्षाकृत अधिक शोर करती हैं। स्टील के पहियों और पटरियों का घर्षण, पुराने ट्रैक, सुरंगों की बनावट और कई जगहों के तीखे मोड़ मिलकर एक ऐसी ध्वनि रचते हैं, जो शुरू में कानों को चौंकाती है, लेकिन धीरे-धीरे उसी शहर की पहचान बन जाती है। आधुनिक मेट्रो प्रणालियों की चिकनी, लगभग निःशब्द यात्रा के मुकाबले न्यूयॉर्क की सबवे कहीं अधिक खुरदरी और जीवंत लगती है मानो उसके भीतर आज भी सौ साल पुराने शहर की धड़कनें गूँज रही हों।

दीवारों पर जगह-जगह बने ख़ूबसूरत म्यूरल्स, लोहे और कंक्रीट की पुरानी बनावट, ट्रेनों की आवाज़ें और उन लंबी सुरंगों में गूँजते क़दम। सब मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं, जैसे शहर का एक दूसरा चेहरा ज़मीन के नीचे बसा हो। उसमें आधुनिकता की चमक कम है, लेकिन इतिहास की गंध ज़्यादा है। एक ऐसी गंध, जो उसे रहस्यमय भी बनाती है और दिलचस्प भी। हाँ, ट्रेनें स्वयं पूरी तरह वातानुकूलित और आरामदायक हैं।

स्टेशनों के गलियारों में, प्लेटफ़ॉर्म पर और कभी-कभी चलती ट्रेन के भीतर भी कोई सैक्सोफ़ोन बजाता मिल जाता, कोई गिटार, कोई नाचते हुए अपनी कला दिखा रहा होता, तो कोई गीत गा रहा होता। सबसे सुंदर बात यह थी कि लोग उन्हें भी किसी नीची नज़र से नहीं देखते। वे दो पल रुकते, मुस्कुराते, ताली बजाते, कई लोग कुछ डॉलर उनके खुले केस में डालते और फिर अपनी राह चल पड़ते।

मुझे लगा, इस शहर ने कला को किसी मंच तक सीमित नहीं रखा। उसने उसे अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बना लिया है। यहाँ कलाकार थिएटर में भी है, संग्रहालय में भी, और सबवे के प्लेटफ़ॉर्म पर भी। और हर जगह उसे सम्मान की वही दृष्टि मिलती है।

यह शहर दुनिया का संक्षिप्त रूप है

न्यूयॉर्क की सबसे बड़ी विशेषता उसकी इमारतें नहीं, उसके लोग हैं।

किसी भी सड़क पर चलिए। कुछ ही मिनटों में आपको दर्जनों भाषाएँ सुनाई देंगी। अलग-अलग त्वचा के रंग, अलग-अलग चेहरे, अलग-अलग पहनावे, अलग-अलग भोजन, अलग-अलग धार्मिक प्रतीक।

यहाँ एशिया है। अफ़्रीका है। यूरोप है। लैटिन अमेरिका है। मध्य-पूर्व है। कैरेबियन है। दुनिया जैसे एक शहर में सिमट आई हो। लेकिन आश्चर्य केवल विविधता का नहीं है। आश्चर्य इस बात का है कि इतनी विविधता के बावजूद शहर चलता रहता है। कोई एक संस्कृति दूसरी पर हावी होने की कोशिश नहीं करती। हर समुदाय अपनी पहचान के साथ उपस्थित है और फिर भी शहर एक साझा नागरिक संस्कृति में बँधा हुआ है।

यही किसी महानगर की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है, वह विविधताओं को मिटाता नहीं, उन्हें साथ रहने की जगह देता है।

यहाँ किसी को छोटा नहीं बनाया जाता

भारत जैसे समाज से आने वाले व्यक्ति के लिए यह अनुभव विशेष रूप से ध्यान खींचता है।

हमारे यहाँ अक्सर व्यक्ति का मूल्यांकन उसके कपड़ों, पेशे, गाड़ी, आर्थिक स्थिति या सामाजिक हैसियत से शुरू हो जाता है। यहाँ ऐसा कम दिखाई दिया।

रेस्तराँ में काम करने वाला व्यक्ति भी उतने ही आत्मविश्वास से बात करता है जितना किसी बड़े होटल का प्रबंधक। टैक्सी चालक भी मुस्कुराकर धन्यवाद कहता है। दुकान का कर्मचारी भी पूरी आत्मीयता से सहायता करता है।

सबसे बड़ी बात यह कि सेवा देने वाला व्यक्ति स्वयं को किसी से कमतर नहीं समझता और ग्राहक भी उसे कमतर नहीं मानता।

ब्लू कॉलर और व्हाइट कॉलर के बीच पेशागत अंतर अवश्य है, लेकिन सामाजिक अपमान का भाव नहीं दिखता। श्रम यहाँ शर्म का विषय नहीं है।

यह अंतर केवल क़ानून नहीं ला सकता। इसके पीछे पीढ़ियों से विकसित सामाजिक सोच काम करती है।

महँगा शहर, लेकिन जीवन से भरा हुआ

यह सच है कि न्यूयॉर्क दुनिया के सबसे महँगे शहरों में गिना जाता है। हर चीज़ की क़ीमत है। रहना, खाना, यात्रा करना, कुछ भी आसान नहीं।

लेकिन उतना ही सच यह भी है कि लोग जीवन जीना जानते हैं। पार्क भरे हुए हैं। कैफ़े भरे हुए हैं। पुस्तकालय भरे हुए हैं। नदी किनारे लोग बैठे हैं। परिवार साथ घूम रहे हैं। कलाकार प्रदर्शन कर रहे हैं। बच्चे खेल रहे हैं।

ऐसा नहीं लगता कि लोग केवल कमाने के लिए जी रहे हैं। काम और जीवन के बीच संतुलन की यह इच्छा शहर के वातावरण में साफ़ दिखाई देती है।

सुलभता : सभ्यता की सबसे बड़ी परीक्षा

न्यूयॉर्क ने मुझे सबसे अधिक जिस बात से प्रभावित किया, वह थी उसकी एक्सेसिबिलिटी।

हम अक्सर विकास को फ्लाईओवर, गगनचुंबी इमारतों और मेट्रो लाइनों से मापते हैं। लेकिन किसी शहर का वास्तविक विकास इस बात से मापा जाना चाहिए कि वह अपने शारीरिक चुनौती से जूझते नागरिकों के लिए कितना सुगम है।

यहाँ व्हीलचेयर उपयोग करने वाला व्यक्ति लगभग हर सार्वजनिक स्थान पर बिना सहायता पहुँच सकता है।

बसें, ट्रेनें, फ़ुटपाथ, सार्वजनिक शौचालय, संग्रहालय, पार्क, पर्यटक स्थल, हर जगह इस बात का ध्यान रखा गया है कि किसी शारीरिक चुनौती वाले व्यक्ति को अलग महसूस न करना पड़े।

यहाँ तक कि सड़क पार करने के लिए बने क्रॉसवॉक भी केवल रंग भरकर नहीं छोड़े गए। पीली उभरी हुई टैक्टाइल पट्टियाँ इस तरह बनाई गई हैं कि दृष्टिबाधित व्यक्ति उन्हें छड़ी से पहचान सके और व्हीलचेयर सुरक्षित ढंग से गुज़र सके। रैंप का ढलान, किनारों की बनावट, फिसलन से बचाव, सब कुछ अत्यंत सूक्ष्म योजना का परिणाम है।

यह केवल इंजीनियरिंग नहीं, संवेदनशीलता का उत्कर्ष है।

जब कोई समाज अपने हर नागरिक को ध्यान में रखकर शहर बनाता है, तब वह वास्तव में आधुनिक कहलाने का अधिकार अर्जित करता है।

फ़ायर एस्केप : अनुभव से सीखी गई समझ

न्यूयॉर्क की पुरानी इमारतों पर नज़र डालते ही एक चीज़ बार-बार ध्यान खींचती है। बाहर लगी हुई बाहरी लोहे की सीढ़ियाँ जो विशेष रूप से आपातकालीन निकासी के लिए बनाई जाती थीं और आज भी न्यूयॉर्क के अनेक पुराने इलाक़ों विशेषकर मैनहैटन, ब्रुकलिन और लोअर ईस्ट साइड की पहचान मानी जाती हैं।

पुरानी बहुमंज़िला इमारतों में बाहरी फ़ायर एस्केप अनिवार्य हैं। आग लगने जैसी स्थिति में लोग केवल भीतर की सीढ़ियों या लिफ़्ट पर निर्भर नहीं रहते। उनके पास बाहर निकलने का वैकल्पिक रास्ता भी होता है।

जब इसे भारतीय संदर्भ में देखती हूँ, तो अनायास तुलना सामने आती है। हमारे यहाँ अक्सर दुर्घटना के बाद नियम बनते हैं। वहाँ अनेक नियम दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए पहले से मौजूद दिखाई देते हैं। और यहाँ तो नियम होते हुए भी उनका पालन नहीं होता जबकि वहाँ बिना किसी ज़बरदस्ती के सब एक अनुशासन में हैं।

सभ्यता केवल संकट आने पर सहायता पहुँचाने में नहीं, बल्कि संकट की संभावना कम करने में भी होती है।

शहर केवल ब्रांडों का नहीं होता

न्यूयॉर्क में विश्व के सबसे बड़े ब्रांड हैं। फ़ाइव एवेन्यू की चमक, लक्ज़री स्टोर, फ़ैशन, कॉर्पोरेट इमारतें। सब कुछ है, लेकिन शहर केवल उन्हीं का नहीं है।

उसी सड़क पर कोई पेंटिंग्स बना रहा है। कोई जादू दिखा रहा है। कोई जीवित मूर्ति बनकर खड़ा है। कोई छोटे-से स्टॉल पर अपने हाथ की बनी चीज़ें बेच रहा है और सबसे सुंदर बात यह है कि शहर उन्हें अपने वैभव पर धब्बा नहीं मानता। वे भी इस शहर की कहानी के पात्र हैं।

यही लोकतांत्रिक संस्कृति है। जहाँ कला केवल संग्रहालयों में नहीं रहती, सड़कों पर भी साँस लेती है।

सार्वजनिक जीवन का अनुशासन

न्यूयॉर्क में ग़ज़ब की भीड़ है। लाखों लोग रोज़ यात्रा करते हैं। लेकिन भीड़ और अव्यवस्था समानार्थी नहीं हैं।

सड़क पार करने के नियमों का पालन, क़तारों का सम्मान, पैदल यात्रियों को प्राथमिकता, सार्वजनिक परिवहन में अनुशासन, ये सब किसी अदृश्य सामाजिक अनुबंध का हिस्सा प्रतीत होते हैं।

सबसे अधिक जो बात ध्यान में रही, वह थी अनावश्यक हॉर्न का लगभग न होना। यह छोटी बात लग सकती है, पर शहर की मानसिक स्थिति पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। शोर केवल कानों को नहीं थकाता, वह समाज की अधीरता का भी परिचायक होता है।

नागरिक और राष्ट्र

अमेरिका की वैश्विक राजनीति, सैन्य हस्तक्षेपों और विदेश नीति पर दुनिया में लगातार बहस होती रही है। लेकिन एक यात्री के रूप में मैंने यह भी देखा कि अपने नागरिकों के जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए यहाँ अत्यंत गंभीर योजना और निवेश किया गया है।

यह विरोधाभास अपनी जगह मौजूद है।

एक राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय मंच पर कैसा व्यवहार करता है, पर उससे अलग उसके शहर अपने नागरिकों के लिए कैसी व्यवस्था निर्मित करते हैं, इन दोनों बातों में अलग-अलग दृष्टि देखना भी दिलचस्प था और शायद थोड़ा मायूस करता हुआ भी कि काश ये लोग विश्व नीति में भी ऐसा ही सौहार्दपूर्ण रवैया अपनाते।

एक शहर जिसने मुझे सिखाया

न्यूयॉर्क ने मुझे यह नहीं सिखाया कि विकास का अर्थ केवल आर्थिक सम्पन्नता है। उसने सिखाया कि विकास तब पूरा होता है जब किसी कलाकार को सड़क पर प्रदर्शन करते हुए सम्मान मिले।

जब व्हीलचेयर पर बैठा व्यक्ति बिना सहायता के संग्रहालय देख सके। जब दुनिया के सौ देशों से आए लोग एक ही चौक पर खड़े होकर फ़ुटबॉल का मैच देख सकें। जब किसी का पेशा उसकी गरिमा तय न करे। जब सार्वजनिक स्थान सचमुच सार्वजनिक हों। जब भीड़ में भी मनुष्य दिखाई देता रहे।

जहाँ स्त्री होने का डर नहीं था

और सबसे बड़ी बात, जिसने मुझे भीतर तक छुआ, वह यह थी कि वहाँ मुझे स्त्री होने का भय छू तक नहीं गया। भीड़ थी, लेकिन भीड़ से डर नहीं था। किसी गंदे स्पर्श का भय नहीं, किसी की फब्तियों का डर नहीं, कपड़ों के आर-पार उतरती गंदी निगाहें नहीं। देर तक सड़कों पर चलना हो, सबवे में सफ़र करना हो, टाइम्स स्क्वेयर जैसी हज़ारों लोगों की भीड़ में खड़ा होना हो या हडसन के किनारे अकेले बैठ जाना। हर जगह एक भरोसा साथ चलता रहा कि कोई अनचाहा हाथ मेरी ओर नहीं बढ़ेगा, कोई मेरी देह को अपनी सुविधा की चीज़ नहीं समझेगा।

एक भारतीय स्त्री होने के नाते इस एहसास की क़ीमत शायद वही समझ सकती है, जिसने बचपन से ही आजीवन हर जगह अपने दुपट्टे, अपने कपड़ों, अपने रास्ते और अपने समय तक का हिसाब रखना सीखा हो।

न्यूयॉर्क ने मुझे यही विश्वास दिया। और सच कहूँ तो, उस एक अनुभव ने मेरे भीतर इस शहर के लिए एक गहरा सम्मान पैदा कर दिया। उसके बाद उसकी कई कमियाँ भी उतनी तीखी नहीं लगीं, क्योंकि उसने मुझे सबसे पहले एक निडर नागरिक होने का अनुभव दिया था।

हर यात्रा कुछ स्मृतियाँ देती है और कुछ प्रश्न। न्यूयॉर्क से लौटते हुए मेरे पास दोनों थे।

मेरी स्मृतियों में हडसन की हवा थी, टाइम्स स्क्वेयर की जगमगाहट थी, विश्वकप के नारों से गूँजती वॉच पार्टियाँ थीं, यूनियन स्क्वेयर की सहजता थी, सड़क पर संगीत बजाते कलाकार थे, बाहर निकली हुई लोहे की फायर एस्केप सीढ़ियाँ थीं, पीली टैक्टाइल पट्टियों से बने क्रॉसवॉक थे और वे असंख्य चेहरे थे जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आकर इस शहर का हिस्सा बन चुके थे।

पर लगातार मेरे मन में मेरे देश भारत से जुड़े कुछ प्रश्न चोट करते रहे। क्या हम भी ऐसे शहर बना सकते हैं जहाँ विकास केवल कंक्रीट का नहीं, नागरिक संस्कृति का भी हो? जहाँ किसी की गरिमा उसके बैंक खाते से नहीं, उसके मनुष्य होने से तय हो? जहाँ सार्वजनिक स्थानों पर व्यवस्था पुलिस के भय से नहीं, सामाजिक संस्कार से बनी रहे? जहाँ विविधता को ख़तरे की तरह नहीं, शक्ति की तरह देखा जाए?

न्यूयॉर्क इन प्रश्नों का अंतिम उत्तर नहीं है। उसमें भी असमानताएँ हैं, संघर्ष हैं, महँगाई है, बेघर लोग हैं, नस्लीय तनाव के इतिहास हैं और आधुनिक महानगरों की अपनी जटिलताएँ हैं। कोई भी शहर पूर्ण नहीं होता।

फिर भी, उसने यह विश्वास जगाया कि एक महानगर केवल अपनी ऊँची इमारतों से महान् नहीं बनता। वह महान् तब बनता है, जब उसमें रहने वाला मनुष्य अपने पड़ोसी के लिए जगह छोड़ना सीख लेता है।

शायद इसी कारण न्यूयॉर्क मुझे केवल अमेरिका का एक शहर नहीं लगा। वह मुझे पूरी दुनिया का एक साझा पता लगा, जहाँ हर भाषा की आवाज़ सुनाई देती है, हर रंग का चेहरा दिखाई देता है, हर संस्कृति को साँस लेने की जगह मिलती है, और जहाँ सारी चमक-दमक के बीच भी, मनुष्य अब भी सबसे महत्त्वपूर्ण है।

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