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नामवर सिंह की आलोचना-यात्रा : वैचारिक विकास और सैद्धांतिक हस्तक्षेप

हिंदी आलोचना के वृहत् परिदृश्य में नामवर सिंह की उपस्थिति एक ऐसे मील के पत्थर की तरह है, जिनका व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों ही गहन बौद्धिक ऊर्जा और उतने ही गहरे विवादों से निर्मित और विकसित हुए। वह केवल एक अकादमिक आलोचक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक परिघटना थे। एक लेख में इमरान अंसारी कहते हैं—नामवर जी का लिखना, न लिखना, बोलना और यहाँ तक कि मौन भी साहित्यिक जगत में अनवरत बहस का केंद्र बना रहता था। जिससे हमको पता चलता है कि उनका लेखन कम होते हुए भी हिंदी आलोचना की दिशा को बदलने वाला सिद्ध हुआ, क्योंकि उन्होंने अपनी आलोचना को महज़ मूल्यांकन की निष्क्रिय अकादमिकता से निकालकर एक सक्रिय बौद्धिक हस्तक्षेप के रूप में स्थापित किया।

यहाँ ‘हस्तक्षेप’ से मेरा अभिप्राय यह है कि उनकी आलोचना को एक ऐसे सशक्त उपकरण के रूप में प्रयोग करना, जो साहित्यिक विमर्श को केवल व्याख्यायित न करे, बल्कि उसकी दिशा बदले, नए प्रतिमान गढ़े और स्थापित साहित्यिक-राजनीतिक प्रतिष्ठानों को चुनौती दे। यह आलेख नामवर सिंह की लगभग छह दशकों की आलोचना-यात्रा के वैचारिक सोपानों और सैद्धांतिक मोड़ों का एक आलोचनात्मक भूगोल प्रस्तुत करता है।

भाषा का विद्यार्थी होना और नामवर नाम से परिचित न होना, ऐसा हो ही नहीं सकता। स्वतंत्रता-प्राप्ति के उपरांत जब हिंदी साहित्यिक परिदृश्य में आलोचना के मानदंड स्थापित हो रहे थे, नामवर सिंह की पहली महत्त्वपूर्ण कृति ‘छायावाद’ एक रणनीतिक हस्तक्षेप के रूप में अवतरित हुई। यह पुस्तक केवल एक अकादमिक अध्ययन नहीं, बल्कि छायावादी काव्य-धारा को एक नई वैचारिक ज़मीन प्रदान करने का सुविचारित प्रयास थी, जिसने आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी की परंपरा में एक गंभीर युवा आलोचक के रूप में उनकी दावेदारी प्रस्तुत की।

‘छायावाद’ में नामवर सिंह ने छायावादी कविता की प्रचलित पलायनवादी या वैयक्तिक कुंठा की अभिव्यक्ति जैसी व्याख्याओं को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि छायावाद का व्यक्तिवाद महज़ आत्म-केंद्रित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम के वृहत्तर सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में विकसित हुई एक प्रगतिशील चेतना का प्रतीक है। उन्होंने इसे व्यक्ति-स्वातंत्र्य की कविता के रूप में पुनर्परिभाषित किया, जिसमें उस व्यक्ति की मुक्ति का काव्य है, जो सामंती बंधनों और औपनिवेशिक दासता के दोहरे दबाव से मुक्त होना चाहता है। इस प्रकार उन्होंने छायावाद को एक ऐतिहासिक आवश्यकता के रूप में स्थापित किया।

नामवर सिंह ने बाद के वर्षों में एक साक्षात्कार में यह स्वीकार किया कि ‘छायावाद’ पुस्तक क्रिस्टोफ़र कॉडवेल के प्रभाव में लिखी गई थी, जो उनके आरंभिक आलोचना-कर्म को एक विशिष्ट मार्क्सवादी साहित्यिक परंपरा के भीतर स्थापित करता है। किंतु यह प्रभाव अनुकरण मात्र नहीं था। जहाँ कॉडवेल ने अँग्रेज़ी के रोमांटिक कवियों की नकारात्मक आलोचना प्रस्तुत की, वहीं नामवर सिंह ने मार्क्सवादी सिद्धांतों को भारतीय संदर्भ में रचनात्मक रूप से लागू करते हुए छायावादी कवियों की सकारात्मक और प्रगतिशील भूमिका को उजागर किया। यह विचलन मार्क्सवादी सिद्धांत को एक विशिष्ट भारतीय साहित्यिक आंदोलन पर लागू करने की उनकी रणनीतिक चेतना को दर्शाता है, जिसने उनकी आलोचना के लिए एक ऐसी ज़मीन तैयार की, जहाँ से वे समकालीन साहित्यिक बहसों में हस्तक्षेप करने के लिए अग्रसर हुए।

उनकी पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ के संदर्भ में नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि केवल अकादमिक विश्लेषण तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने समकालीन साहित्यिक बहसों में एक सक्रिय हस्तक्षेपकर्ता की भूमिका निभाई। साठ के दशक में, जब नई कहानी और नई कविता के आंदोलन हिंदी साहित्य की मुख्यधारा बन रहे थे, तब यह उनके आलोचनात्मक हस्तक्षेपों का सबसे उर्वर समय था। उनका उद्देश्य केवल इन आंदोलनों का मूल्यांकन करना नहीं, बल्कि इनके भीतर सार्थक प्रवृत्तियों को उभारना और दिशाहीनता पर प्रहार करना था। जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा, आलोचना मैंने हिंदी में हस्तक्षेप के रूप में की है। जहाँ ज़रूरी लगा, साहित्य में जो चल रहा है, उसमें मैं हस्तक्षेप करूँ, बदलूँ।

नई कहानी के संदर्भ में उनका हस्तक्षेप उनकी पुस्तक ‘कहानी और नई कहानी’ के माध्यम से प्रकट हुआ। इस कृति ने हिंदी में कहानी की आलोचना को एक नई सैद्धांतिक गंभीरता और आधुनिक दृष्टि प्रदान की। मैनेजर पाण्डेय के शब्दों में, इस पुस्तक ने कहानी की शास्त्रीय और प्राध्यापकीय आलोचना को तोड़कर पहली बार हिंदी में कहानी की गम्भीर आलोचना की शुरुआत की है। इससे पूर्व कहानी को प्रायः एक गौण विधा माना जाता था, किंतु नामवर सिंह ने निर्मल वर्मा, मोहन राकेश और कमलेश्वर जैसे कहानीकारों की कृतियों का गहन विश्लेषण कर उसे आलोचना के केंद्र में स्थापित किया।

यदि ‘कहानी और नई कहानी’ एक रचनात्मक हस्तक्षेप था, तो ‘कविता के नए प्रतिमान’ एक विस्फोटक और युगांतरकारी हस्तक्षेप सिद्ध हुआ। यह पुस्तक केवल एक अकादमिक असहमति नहीं, बल्कि हिंदी कविता में आधुनिकता को परिभाषित करने और उसके मूल्यांकन के अधिकार को लेकर एक सत्ता-संघर्ष थी। मैनेजर पाण्डेय के अनुसार, इस पुस्तक ने दो बड़े विवाद खड़े किए—पहला, डॉ. नगेन्द्र की रसवादी आलोचना के विरुद्ध नामवर सिंह ने डॉ. नगेन्द्र द्वारा संपादित ‘रस-सिद्धांत’ की आलोचना करते हुए तर्क दिया कि पुराने काव्यशास्त्रीय मानदंड नई कविता के मूल्यांकन के लिए अपर्याप्त हैं। यह केवल एक पद्धति का विरोध नहीं, बल्कि उस अकादमिक सत्ता को चुनौती थी, जो नए साहित्य को पुराने चश्मे से देख रही थी। दूसरा, अज्ञेय की व्यक्तिवादी कविता के विरुद्ध तीखा विवाद। अज्ञेय की काव्य-धारा के साथ उनका वैचारिक मतभेद था। नामवर सिंह ने मुक्तिबोध की कविता को केंद्र में रखकर एक ऐसी ‘प्रति-परंपरा’ स्थापित करने का प्रयास किया, जो अज्ञेय के व्यक्तिवाद के बरक्स एक अधिक सामाजिक और यथार्थवादी विकल्प प्रस्तुत करती हो।

नामवर सिंह की बौद्धिक ईमानदारी का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उन्होंने बाद के वर्षों में इस पुस्तक को, इसके इतिहास और आलोचना के साथ, स्वयं ही डिसओन (disown) कर दिया। मैनेजर पाण्डेय इस साहसिक आत्म-मूल्यांकन की तुलना महान् मार्क्सवादी चिंतक जॉर्ज लुकाच से करते हैं, जिन्होंने अपने जीवनकाल में अपनी कई कृतियों को अस्वीकार कर दिया था। यह वैचारिक जड़ता का नहीं, बल्कि निरंतर विकास का संकेत था। ‘कविता के नए प्रतिमान’ जैसी ध्रुवीकरण करने वाली बहसों ने शायद उन्हें मौजूदा वैचारिक ढाँचों की सीमाओं का अहसास कराया, जिसने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उनके अधिक गहरे सैद्धांतिक अन्वेषणों के लिए बौद्धिक आवश्यकता उत्पन्न की।

सन् 1974 में नामवर सिंह का जेएनयू आगमन उनके वैचारिक जीवन का एक निर्णायक मोड़ था, जहाँ से उनके चिंतन में एक ज्ञानमीमांसीय विच्छेद घटित हुआ। जेएनयू का अकादमिक और बौद्धिक वातावरण, जिसे पुरुषोत्तम अग्रवाल ‘काउंटर-कल्चर, व्यवस्था और विरासत—दोनों के बेहतर बोध में बदलने वाली संस्था’ के रूप में वर्णित करते हैं, जिसके सहारे उनके चिंतन को एक नई दिशा प्रदान की। इस माहौल ने उन्हें स्थापित मार्क्सवादी ढाँचों से आगे बढ़कर भारतीय परंपराओं की बहुलता और उनके अंतर्विरोधों पर गहराई से सोचने के लिए प्रेरित किया। जेएनयू का यह दौर उनके आलोचनात्मक जीवन का सबसे उर्वर और सैद्धांतिक रूप से परिपक्व चरण रहा, जिसका सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतिफलन उनकी युगांतरकारी कृति ‘दूसरी परंपरा की खोज’ में हुआ।

यह पुस्तक नामवर सिंह के वैचारिक विकास में एक निर्णायक पैराडाइम शिफ़्ट का प्रतीक है। इसमें वह परंपरा के एकनिष्ठ दृष्टिकोण को त्यागकर एक वैकल्पिक, प्रतिरोधी और लोक-आधारित परंपरा की तलाश करते हैं। यह दूसरी परंपरा वह है, जो प्रभुत्वशाली परंपरा को चुनौती देती हो। यह उनके पूर्ववर्ती मार्क्सवादी चिंतन का त्याग नहीं, बल्कि उसका एक परिष्कृत और भारतीयकरण था। उन्होंने महसूस किया कि वर्ग-संघर्ष का यूरोपीय मॉडल भारतीय समाज के जाति, धर्म और लोक-परंपराओं पर आधारित जटिल अंतर्विरोधों को समझने के लिए अपर्याप्त था।

इस दूसरी परंपरा के प्रतिनिधि के रूप में वह अपने गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को स्थापित करते हैं। द्विवेदी जी, नामवर सिंह की दृष्टि में, उस परंपरा के वाहक हैं, जो कबीर से होते हुए लोक-चेतना तक जाती है। यह वह परंपरा है, जो तुलसीदास द्वारा स्थापित शास्त्रीय और मर्यादावादी परंपरा का प्रतिपक्ष रचती है। द्विवेदी जी के माध्यम से नामवर सिंह ने यह प्रतिपादित किया कि भारतीय चिंतन में हमेशा एक ऐसी वर्चस्व-विरोधी धारा मौजूद रही है, जो पितृसत्ता और शास्त्र को चुनौती देती है और अपनी ऊर्जा ‘लोकजीवन’ से ग्रहण करती है। उन्होंने स्पष्ट किया—मुझे ऐसा लगा कि साहित्य के क्षेत्र में हम लोग, ख़ासतौर से मार्क्सवादी आलोचक, परंपरा का एकवचन में प्रयोग लगातार करते जा रहे हैं... हम प्रभुत्वशाली परंपरा को ही अपनी परंपरा कहते हैं... इस स्थिति में मुझे लगा कि दूसरी परंपरा का सवाल उठाना बहुत ज़रूरी है।

इस प्रकार ‘दूसरी परंपरा की खोज’ केवल हजारी प्रसाद द्विवेदी पर लिखी गई पुस्तक नहीं, बल्कि हिंदी आलोचना में एक नए वैचारिक उपकरण का घोषणापत्र है। यह कृति उनके आलोचनात्मक विवेक के उत्कर्ष का प्रतीक है, जहाँ वह हस्तक्षेपकर्ता की भूमिका से आगे बढ़कर एक मौलिक सिद्धांतकार के रूप में स्थापित होते हैं, जो भारतीय समाज के विश्लेषण के लिए एक ग़ैर-यूरोपीय और स्वदेशी सैद्धांतिक ढाँचा विकसित कर रहे थे।

नामवर सिंह का व्यक्तित्व एक ऐसे सार्वजनिक बुद्धिजीवी का था, जो हेगेल के ‘वाद-विवाद-संवाद’ के समान ऊर्जा पाता था। इसलिए ही उनकी आलोचना केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि गोष्ठियों, व्याख्यानों और बहसों में आज भी जीवंत दिखाई पड़ती है। अंततः देखा जाए, तो उनके आलोचनात्मक उद्यम के तीन प्रकरण उनके समग्र आलोचना-कर्म की उस पद्धति को उजागर करते हैं, जो संवाद को केंद्र में रखती थी— पहला, साहित्यिक विश्लेषण को; दूसरा, राजनीतिक आलोचना को हथियार बनाते हुए; उसी आलोचना को इतिहास के औपनिवेशिक आख्यानों के विखंडन तक ले जाती थी।

हिंदी के एक और दिग्गज मार्क्सवादी आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा के साथ उनका संबंध सम्मान और असहमतियों के द्वंद्व से बना था। नामवर सिंह ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘वाद-विवाद-संवाद’ डॉ. शर्मा को समर्पित करते हुए उन्हें इस क्षेत्र में अपना गुरु स्वीकार किया। किंतु यह सम्मान बौद्धिक स्वतंत्रता की क़ीमत पर नहीं था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ की व्याख्या को लेकर है। जब डॉ. शर्मा ने आरंभ में ‘गोदान’ की मुख्य समस्या को ‘ऋण की समस्या’ बताया, तो नामवर सिंह ने इसका खंडन करते हुए तर्क दिया कि यह ‘गोदान’ के राजनीतिक महत्त्व को कम करने वाला विश्लेषण है। उनकी यह आलोचना इतनी सटीक थी कि बाद में स्वयं डॉ. शर्मा ने अपनी उस स्थापना को एक भूल के रूप में स्वीकार किया। यह प्रसंग दर्शाता है कि उनकी आलोचना-पद्धति संवाद और बौद्धिक ईमानदारी पर आधारित थी, जहाँ गुरु के प्रति सम्मान भी आलोचनात्मक विवेक से ऊपर नहीं था।

नामवर सिंह प्रेमचंद के सबसे प्रबल व्याख्याकारों में से एक रहे हैं और उनके लिए प्रेमचंद का विश्लेषण केवल साहित्यिक मूल्यांकन नहीं, बल्कि एक गहरा राजनीतिक कर्म रहा। ‘गोदान’ की उनकी व्याख्या इस पद्धति का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने तर्क दिया कि ‘गोदान’ केवल एक किसान की त्रासदी नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के वर्ग-चरित्र पर एक टिप्पणी और एक पॉलिटिकल क्रिटीक (Political Critique) है। उन्होंने दिखाया कि कैसे प्रेमचंद ने ‘गोदान’ के माध्यम से यह उजागर किया कि कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहा स्वतंत्रता आंदोलन अंततः अपने वर्ग-हितों का ही प्रतिनिधित्व कर रहा था। प्रेमचंद को ‘बीसवीं सदी का व्यास’ कहकर, जिनका साहित्य ‘भारत के किसानों का महाभारत’ है, उन्होंने उनके साहित्यिक क़द को भारतीय महाकाव्य-परंपरा में स्थापित किया और साहित्य को सामाजिक-राजनीतिक आलोचना के एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया।

इससे साफ़ पता चलता है कि उनकी आलोचना-पद्धति साहित्यिक कृतियों से आगे बढ़कर उन ऐतिहासिक और औपनिवेशिक आख्यानों का विखंडन करती रही है, जिन्होंने भारतीय आत्म-बोध को गढ़ा था। साथ ही, अपने एक व्याख्यान में उन्होंने तर्क दिया कि उन्नीसवीं सदी का भारतीय पुनर्जागरण एक मिथक है, जिसे ओरिएंटलिज़्म और ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने अपने शासन को वैचारिक वैधता प्रदान करने के लिए गढ़ा था। इसी प्रकार उन्होंने भारतीय इतिहास को ‘हिन्दू भारत’ और ‘मुस्लिम भारत’ जैसे बंद डिब्बों में बाँटने की औपनिवेशिक रणनीति की तीखी आलोचना की, जिसे वह ‘बाँटो और राज करो’ की नीति का एक बौद्धिक उपकरण मानते थे। तभी उनका आलोचना-कर्म साहित्य, राजनीति और इतिहास के अंतर्संबंधों को उजागर करने वाला एक समग्र दस्तावेज़ है।

उनकी विरासत पर विचार करते हुए कुछ प्रश्न स्वाभाविक रूप से मन में उठते हैं— क्या ‘दूसरी परंपरा’ का ढाँचा आज के दमित और स्त्रीवादी विमर्शों की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है? क्या हस्तक्षेपकर्ता आलोचक का उनका मॉडल आज के डिजिटल और विकेंद्रीकृत साहित्यिक परिदृश्य में प्रासंगिक है अथवा लोग उसे अपना पाएँगे? इन प्रश्नों के बावजूद, अपनी प्रखर मेधा, अद्भुत वाग्मिता, तीखे व्यंग्य और विवादों को आमंत्रित करने की प्रवृत्ति के साथ नामवर सिंह आधी सदी से भी अधिक समय तक हिंदी बौद्धिक जगत के केंद्र में बने रहे। वह एक ऐसे आलोचक थे, जिन्हें आप अनदेखा नहीं कर सकते। आप या तो उनके पक्ष में होते, या विपक्ष में; लेकिन उनकी उपस्थिति को स्वीकार करना अनिवार्य था। उनकी विरासत हिंदी आलोचना को महज़ मूल्यांकन से हस्तक्षेप तक ले जाने की इस यात्रा में निहित है, जिसने हमारी पीढ़ियों के लिए चिंतन के नए द्वार खोले हैं।

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हिमांशु विश्वकर्मा को और पढ़िए : कहानी : बावर की वनकन्या

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