इनसोम्निया : मुझे सोने दो!
श्वेता त्रिपाठी
10 मार्च 2026
अल पचीनो को मैंने पहली बार ‘गॉडफ़ादर’ में देखा था—माइकल कारलिओने। फिर मैंने यह फ़िल्म कई बार देखी, अल पचीनो की वजह से ही। बहरहाल, एक दूसरी फ़िल्म देखी गई, लेकिन अल पचीनो की वज़ह से नहीं। यह बात और है कि पहली ही फ़िल्म में उनकी आँखें इतनी बोलती हुई-सी लगीं थीं कि कोई और फ़िल्म उनकी वजह से देखी जा सकती थी। उनकी उदास, स्थिर आँखों के संजीदा अभिनय की वजह से देखी जा सकती थी। लेकिन, यह फ़िल्म चुनी गई रॉबिन विलियम्स के कारण। ओ कैप्टन माई कैप्टन के कारण। ‘गॉडफ़ादर’ के कारण नहीं, ‘डेड पोयट्स सोसाइटी’ की वजह से।
अज़ीब बात यह है कि मैंने रॉबिन विलियम्स की जो पहली फ़िल्म देखी थी, वह ‘डेड पोयट्स सोसाइटी’ ही थी। जिसे देखते हुए नील पेरी के किरदार की मौत के बाद तक़रीबन 45 मिनट आँसू नहीं रुके थे। कई बार सोचती हूँ कि कहानीकार अपने सबसे मासूम किरदारों की जान क्यूँ ले लेता है? ‘गुनाहों का देवता’ में सुधा को समाप्त कर दिया धर्मवीर भारती ने। ‘डेड पोयट्स सोसाइटी’ में नील पेरी ने आत्महत्या कर ली और ‘अटोनमेंट’ में सिसिलिया और रॉबी का जाना तो अब भी रह-रहकर टीसता है कहीं। ‘गोदान’ का ज़िक्र नहीं करूँगी। मैं उसके अंत से डरकर भागना चाहती हूँ।
कहानीकार को ज्ञात हो कि पढ़ने वाले कई बार अपने हालातों से उबर जाते हैं लेकिन इन कहानियों का दुःख नहीं जाता। जैसे वह अपना झेला हुआ अतीत हो। कई बार कुछ पढ़ने के क्रम में हम भी एक किरदार चुन लेते हैं। उसका अच्छा-बुरा हमारा भी होता है। उसके सुख-दु:ख हमारे होते हैं। फिर वही किरदार न रहे तो अपना एक हिस्सा खो देने जैसा लगता है, एक संबंध खो देने जैसा लगता है। मुझे सुधा का दुःख है, नील पेरी का दुःख है, सिसिलिया और रॉबी का दुःख है और अपना तो ख़ैर, है ही।
फ़िल्म पर लौटती हूँ। फ़िल्म देखे जाने का सबब रॉबिन विलियम्स ही नहीं थे। क्रिस्टोफर नोलन भी इसके ज़िम्मेदार कहे जाएँगे। यह फ़िल्म उनकी निर्देशित थी। फ़िल्म का नाम था—इनसोम्निया। दरअस्ल, अब तक इसे देखने के जो कारण मैं सोच पाईं हूँ, उनमें सबसे बड़ा कारण था इसका नाम—इनसोम्निया। नींद न आने की बीमारी। यह अपना झेला हुआ अतीत है, वर्तमान भी। यानी कई रातों से न सोये हुए, रौशनी से लड़ते हुए, आँखों के पीछे एक अजीब-सी सिकुड़न और फैलाव को महसूस करते हुए, कनपटी से कान के पीछे होते हुए सिर के पिछले हिस्से तक जाने वाली किसी नस में अचानक एक अकड़न का-सा दर्द झेलते हुए नायक का संघर्ष, मेरा भी है।
फ़िल्म शुरू हुई। विल डार्मर (अल पचीनो) अमेरिकन पुलिस के एक प्रतिष्ठित डिटेक्टिव हैं। वह एक लड़की की हत्या की छानबीन करने अलास्का के एक शहर पहुँचते हैं। इसी छानबीन के क्रम में एक गहरी धुँध वाली जगह पर विल की बंदूक़ की गोली से उन्हीं के साथी की मौत हो जाती है। विल इससे स्तब्ध हो जाते हैं। वह किसी को यह नहीं बता पाते कि उनके साथी की मौत विल की गोली से ही हुई और वह नक़ली सबूत प्लांट करने लगते हैं। इस घटना के बाद विल को नींद आना बंद हो जाती है। वह इन्सोम्निया के शिकार हो जाते हैं और उन्हें हैलुशिनेशंस होने लगते हैं। विल के साथी की मौत का साक्षी, लड़की का हत्यारा वाल्टर फ़िंच (रॉबिन विलियम्स) है, जो विल की इस हालत से परिचित है और उन्हें एक समझौते का ऑफ़र देता है—जिसके तहत दोनों एक-दूसरे के बारे में पुलिस को ख़बर नहीं करेंगे। विल एक विचित्र परिस्थिति में हैं, जहाँ वह स्वयं हत्यारा होना स्वीकार नहीं कर पा रहा और एक दूसरा मर्डरर उसकी परिस्थिति का फ़ायदा उठाकर बच जाना चाहता है। यहाँ नायक नैतिकता का पुतला नहीं है। वह आख़िर तक यह नहीं तय कर पाता कि उसने अपने साथी की हत्या जानबूझकर की या यह एक दुर्घटना थी। वह बस अपने सच से एस्केप कर जाना चाहता है।
विल का इन्सोम्निया ग्रीफ़ से आता है और उसे स्वीकार न कर पाने से भी। कैसे उन्होंने अपने ही साथी को मार दिया? साइकोलॉजी में दुःख [ग्रीफ़] के सात स्टेजेज़ बताए गए हैं—डिनायल, गिल्ट, एंगर, बार्गेनिंग, डिप्रेशन, टेस्टिंग और एक्सेप्टेंस। यह कोई रेखीय प्रक्रिया नहीं है। एक के ठीक बाद दूसरा आता है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। लेकिन एक्सेप्टेंस के क्रम में आते सब हैं। विल का इन्सोम्निया पहले डिनायल और गिल्ट का है। क्या सच में उन्होंने अपने साथी को मार दिया? उनसे ऐसा कैसे हो गया? उन्होंने झूठ कहा कि उन्होंने नदी की ओर से गोली चलने की आवाज़ सुनी थी। विलियमसन से नेगोशिएट करते हुए जब भी उनके साथी का ज़िक्र आता है तो विल एंगर वाले चरण में होते हैं। वे उस घटना और अपने अपराधबोध से इस क़दर ट्रामाटाइज़्ड हैं कि उसके बारे में एक शब्द भी बर्दाश्त नहीं कर पाते।
इस फ़िल्म में जब आप विल को इन्सोम्निया से लड़ते हुए देखेंगे तो एक अजीब-सी एंग्जायटी महसूस करेंगे। आप समझ सकेंगे कि नींद न आना कितनी बड़ी त्रासदी है। पर्दों को टेप से चिपकाते हैं, कमरे को बहुत अँधेरा बनाने की कोशिश करते हैं, बिस्तर पर इधर-उधर करवटें लेते हैं, कभी अपना चेहरा तकिये में छुपा लेते हैं, कभी छत को ताकते रहते हैं निर्निमेष। घड़ी की टिक-टिक से खीझ कर उसे दराज़ में बंद कर देते हैं। घड़ी में हमेशा आधी रात होती है। अलास्का में रात सूरज ढलने से नहीं होती। चौबीस घंटे दिन होता है। इन्सोम्निया भी अलास्का है। यहाँ रात सो जाने के लिए नहीं होती। यहाँ रात पूरी-पूरी खुली आँखों से नींद आने के इंतज़ार में जागने का नाम है। कहानीकार ने इस फ़िल्म के लिए अलास्का को चुना, इसकी वजह वहाँ कभी न आने वाली रात और किरदार की कभी न आने वाली नींद रही होगी। अलास्का की लगातार दुपहर, बहुत तेज़ रौशनी, छाया के लगभग नगण्य दृश्य चुभते हुए से लगते हैं। कैमरा चेहरे के बहुत पास आ जाता है। इतने पास की आप नायक का चेहरा पढ़ सकते हैं। आप नायक से पूछ सकते हैं कि वह कितनी रातों से नहीं सोया और अगर आपके बस में होता तो आप उसे सुलाने की हर संभव कोशिश करना चाहते। धुंध वाले दृश्य में गोली चलने का क्षण पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता, जैसे सत्य भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। फ़िल्म की गति भी किसी थ्रिलर की तरह भागती नहीं, थकी हुई चाल से चलती है। लंबे शॉट्स, ख़ामोशियाँ, अधूरी बातें, सब मिलकर दर्शक को उसी अनिद्रा में धकेल देते हैं जिसमें विल फंसा हुआ है।
इस फ़िल्म को देखते हुए एक दूसरी फ़िल्म याद आई, इरफ़ान की। फ़िल्म थी ‘रोग’। इसमें इरफ़ान एक पुलिसवाले की भूमिका में हैं जो एक सेलिब्रिटी के मर्डर का केस देख रहा है। फ़िल्म की शुरुआत में ही इरफ़ान का किरदार बताता है कि पिछले गुरुवार उसने आत्महत्या की कोशिश की। कोई ख़ास वजह नहीं है। बस मन ऊब गया है। उसके जीवन में घर, थाना, लाशों और अपराधियों के सिवा कुछ नहीं है। उसे नींद नहीं आती। यह फ़िल्म का पहला ही सीन है और इसी सीन के बाद नीलेश मिसरा का लिखा और केके का गाया एक बहुत सुंदर गीत है, ‘मैंने दिल से कहा, ढूँढ़ लाना ख़ुशी"। इसमें इरफ़ान को देखते हुए सच में लगता है कि उन्हें बहुत दिनों से नींद नहीं आई है। कुछ मिनट के लिए भी नहीं। उनकी आँखों में त्रासदी है। यही त्रासदी ‘इन्सोम्निया’ में अल पचीनो की आँखों में भी है। लेकिन इरफ़ान का इन्सोम्निया गिल्ट का नहीं है, जीवन की एकरसता से ऊबने का है। उदासी का है और नाउम्मीदी का भी।
नाट्यशास्त्र में भरतमुनि ने अभिनय के चार प्रकार बताए हैं—आंगिक अभिनय, वाचिक अभिनय, आहार्य अभिनय और सात्विक अभिनय। अंगों के मूवमेंट के माध्यम से अभिनय को आंगिक अभिनय की कोटि में रखा गया है और डायलॉग्स को वाचिक अभिनय की कोटि में। ‘इन्सोम्निया’ और ‘रोग’ को देखते हुए कहा जा सकता है कि इन दोनों एक्टर्स की आँखें डायलॉग डिलीवरी में भी पारंगत हैं। इनकी आँखें केवल आंगिक ही नहीं बल्कि वाचिक अभिनय भी करती हैं। इरफ़ान की आँखों के लिए हमेशा ही ‘बोलती हुई’ विशेषण इस्तेमाल किया जाता रहा है और अल पचीनो की आँखें तो हैं ही सुंदर। लेकिन एक फ़िल्म जिसका कोर थीम ही ‘न सो पाने की व्यथा’ है, उसमें आँखों का अभिनय बहुत ज़रूरी हो जाता है और ऐसे किरदारों के लिए इन दोनों एक्टर्स से बेहतर कौन ही हो सकता था! अगर आपने एक रात भी ऐसे नींद न आने पर रात से लड़ते हुए काटी है, तो आपकी हालत इस फ़िल्म के नायक की हालत है। अगर आप कभी अपने किसी गिल्ट से इस क़दर परेशान रहे हैं तो आपकी बेबसी, नायक की भी है और इन सब से ऊपर दुनिया की सबसे अधिक साझा चीज़ है—दु:ख।
ग़ालिब कहते हैं—
कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यूँ रात भर नहीं आती
और अकबर इलाहाबादी ने कहा—
आयी होगी किसी को हिज़्र में मौत
हमको तो नींद भी नहीं आती
‘इन्सोम्निया’ केवल एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है। यह अपराध से अधिक नैतिक थकान की फ़िल्म है। विल और हत्यारे के बीच फ़र्क़ उतना स्पष्ट नहीं जितना कानून की किताबें चाहती हैं। एक ने गोली चलाई, दूसरे ने हत्या की, पर दोनों सच से बचना चाहते हैं। लगातार उजाले में घटती यह कथा बताती है कि अँधेरा हमेशा रात से नहीं आता; कई बार वह मन के भीतर बसता है। शायद इसी वजह से फ़िल्म का असली सस्पेंस यह नहीं कि हत्यारा कौन है, बल्कि यह कि सच का सामना कौन कर पाता है।
फ़िल्म देखिए ‘इन्सोम्निया’ और ‘रोग’ का गीत सुनिए, निलेश मिसरा का लिखा हुआ—के.के. की आवाज़ में।
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बेला पॉपुलर
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