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मेरी पहली जेल-यात्रा-3

यहाँ से आगे...

पिछले दो दिनों के अनुभवों के बाद आज जागना कुछ अलग-सा था। दिमाग़ का एक हिस्सा काफ़ी ठोस महसूस हो रहा था, तो दूसरा कुछ पिघलता हुआ जान पड़ता था। सोचा, घर पर सबको बताकर जाऊँ कि क्या कर रही हूँ और क्या नहीं। फिर लगा कि इन सब बातों को समझना और समझाना, दोनों ही काफ़ी पेचीदा हैं। जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है, जो आपको अपनी ही समझ की सीढ़ियों से धक्का देकर कहीं और पहुँचा देता है। आप गिरते हैं और फिर वहीं से कहीं निकलने की कोशिश करते हैं। मेरा अनुभव है कि आपको कहीं पहुँचने के लिए ही नहीं चलना होता, बल्कि अपने साथ बने रहने के लिए भी चलना होता है। आप लोगों को, आस-पास की दुनिया को, समाज को कभी लतियाते हैं; सामने आई हर शय को दुश्मन या दीवार मानकर उसे तोड़ने और गिरा देने पर उतारू हो जाते हैं। इसी तरह असंख्य बार टूटने-बिखरने के बाद ही आप समझ पाते हैं कि हर शय ने इसी तरह टूट-बिखरकर और फिर सिमटकर अपनी एक शक्ल अख़्तियार की है। उसे इसी तरह रहने में प्रेम है।

आज वहाँ क्या करना है, क्या हो सकता है और कितना कुछ होने की संभावना है—मन इन्हीं सवालों की गहमागहमी में बार-बार उलझ रहा था। हम लोग बच्चों के कारावास पहुँचे। जेल जैसी जगह अब परिचित हो चुकी थी, लेकिन क़ैदी होना, निर्दोष होकर भी उनके जैसा जीवन जीना, अपराध कर देना और अपराधी हो जाना—ये सब जीवन में किस तरह घटित होता है, यह एक अलग ही प्रक्रिया है।

आज हम थोड़ा जल्दी पहुँच गए थे। लेकिन जैसे ही मैदान में पहुँचे, सब तैयारी के साथ बैठे मिले। कुछ फ़ॉर्म भरे गए। जेलर साहब और बॉस के बीच बातचीत हुई। काफ़ी लंबा वक़्त काग़ज़ी कार्रवाई में ही निकल गया।

मैदान में सिपाहियों और क़ैदियों के बीच चुहलबाज़ी चल रही थी। कच्छाधारी गिरोह का एक लड़का किसी काम से खड़ा हुआ, तो मैंने सिपाही से पूछा, “ये लोग इसी तरह सिर्फ़ कच्छे-बनियान में ही रहते हैं क्या?”

उनमें से ही एक लड़के ने जवाब दिया, “नहीं मैडम, सर्दी पड़ती है तो घरवाले गरम कपड़े भेजते हैं, तब गरम कपड़े भी पहन लेते हैं। अभी तो ऐसे ही अच्छा लगता है।”

मैंने फिर पूछा, “घरवाले क्या करते हैं?”

उनमें से एक ने कहा, “नक़ली शहद बनाते हैं और असली की तरह शहरों में बेचते हैं। कभी लोहे के बर्तन का काम करते हैं, कभी मौक़ा मिला तो पटरी बाज़ार में खाने का ठिया लगा लेते हैं और कई तो ख़ानदानी लूटपाट का बिज़नस ही करते हैं।”

यह सुनकर सब ठहाका लगाकर हँस दिए। सारे बच्चे आपस में खुसर-पुसर करने लगे। तभी बॉस ने पूछा, “तो क्या-क्या करना ठीक होगा, जिससे आप लोगों को मज़ा आए?”

अलग-अलग आवाज़ें ज़ोर-ज़ोर से उठने लगीं—“फिलम दिखाओ कोई!”, “नाटक कराओ!”, “डांस भी सीख सकते हैं?” फिर फिलम-फिलम-फिलम, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’, ‘शोले’, जादू, डांस, पेंटिंग—तरह-तरह की माँगें आने लगीं। मैंने पहली पंक्ति की ओर देखा। वहाँ बैठे बच्चे हमेशा की तरह एकदम चुप थे।

इसी बीच मैंने पूछा, “राजू, तुमने क्या किया था? यहाँ कैसे आए?”

वह चुप ही रहा। बीच से किसी ने कहा, “मैडम, ये गंदा काम करके आए हैं।”

मैं अभी इस बात के ताने-बाने में उलझी ही थी कि शोर के कारण जेलर साहब उठ खड़े हुए और कमान अपने हाथ में लेते हुए बोले, “सब चुप हो जाओ। सरकार की ओर से ये लोग आए हैं। अगर परेशान करोगे, तो कुछ नहीं होगा। ढंग की बातें होंगी, जिनसे आप लोगों को कुछ सीखने को मिले। शामलाल, इन सबको अभी काम पर भेजो। हम लोग खाना-वाना खाकर आते हैं। फिर बात करते हैं।”

जेलर साहब किसी से मिलने की बात कहकर वहाँ से चले गए। मैंने सिपाही से मुख़ातिब होते हुए पूछा, “क्या किसी को कोई ख़ास बात करनी है?”

मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि सबसे आगे बैठा चौदह-पंद्रह साल का एक लड़का बोल पड़ा, “मैडम, मेरा एक काम कर दो, प्लीज़!”

मैंने पूछा, “क्या काम?”

“एक दवा ला दो, प्लीज़...”

“कैसी दवा? क्या हुआ है?”

फिर वह एक साँस में बोल गया, “मैडम, माई थी बस मेरी। भीख माँगती थी, मुझे स्कूल भेजती थी। मैं स्कूल जाता, लेकिन सामने ही माल बेचा करता था—कभी चने, कभी टॉफ़ी। वो मुझे बहुत प्यार करती थी। बस, कभी-कभी कहती थी कि उसका एक सपना है—मरने से पहले एक बार एच.एम.टी. की घड़ी पहनना। कहती थी कि जब मैं बड़ा होकर कमाने लगूँगा, तब उससे घड़ी लेगी। मेरी खोपड़ी में बस घड़ी ही घूमती रहती थी—घड़ी, घड़ी, घड़ी...

मेरे दोस्त का बाप घड़ी के शोरूम में झाड़ा-पोंछी करता था। एक दिन मैं उसके साथ शोरूम चला गया। एक घड़ी देखी। दोपहर तक उसे देखता रहा। फिर दोपहर में सफ़ाई के बहाने उठाकर जेब में रख ली। ख़ुद को सबसे क़िस्मतवाला मानते हुए बाहर निकल ही रहा था कि मैनेजर ने रोक लिया। पूछा—‘घड़ी चुराई है?’ मैंने सीना चौड़ा करके उसकी आँख से आँख मिलाते हुए कहा—‘नहीं!’

साला एकदम साँड़ जैसा था। मेरे मुँह पर ऐसा थप्पड़ मारा कि नाक से ख़ून निकल आया। मैंने कहा—‘मादर..., मेरी माई ने कभी मुझे हाथ नहीं लगाया, तूने कैसे मार दिया!’ थोड़ी देर में मेरी माई आई। ख़ूब गिड़गिड़ाई, लेकिन उस हरामी मैनेजर ने पुलिस बुला ली। पुलिस ने न जाने क्या-क्या लिखाया और चौकी में जमकर मेरी पिटाई की। डकैती का केस लगा दिया।

कुछ समय बाद सदमे से माई मर गई। एक दुख मुझे बहुत खाता है कि माँ बिना घड़ी पहने ही मर गई! बाहर अब कोई अपना नहीं है। सच तो यह भी है कि यहाँ भी कोई अपना नहीं लगता। साले सब मुझसे बस काम कराते हैं और मारते हैं। मरने का मन करता है, लेकिन मरने से बहुत डर भी लगता है। रोज़ सपने में अपने आपको मरा हुआ देखता हूँ। कभी माई की गर्दन पर घड़ी बँधी है और वह दम घुटने से तड़प रही है, मर नहीं रही है। बस, मेरी नींद खुल जाती है।

मैं एक पूरी रात कभी नहीं सो पाया। ये सब लोग कहते हैं कि मुझे जागने की बीमारी है। नींद आने की दवा होती है। मैडम, मुझे एक पूरी रात जमकर सोना है। क्या तुम मेरे लिए वो दवा ला सकती हो? प्लीज़ मैडम, ला देना एक बार वो दवा!”

इतने में सिपाही ने आवाज़ लगाई कि जेलर साहब बुला रहे हैं। हमें अपनी सारी बातें छोड़कर वहाँ जाना पड़ा।

हम जेलर साहब के कमरे में बैठे। आज एक और सीनियर ऑफ़िसर आए हुए थे। वह भी क़ैदियों के मानसिक विकास के लिए काम कर रहे थे। चाय आई। इधर-उधर की कुछ बातें होती रहीं। मैंने जेलर साहब से पूछा, “पहली पंक्ति में बैठे जो बच्चे हैं, वे किस अपराध में यहाँ बंद हैं?”

उन्होंने कहा, “मैडम, वे सारे बलात्कार की सज़ा में यहाँ बंद हैं।”

यह बात समझने में मुझे कुछ मिनट लगे। ‘गंदा काम’, ‘बलात्कार’, राजू और उसके पीछे बैठे दोनों लड़कों के हाव-भाव, उनका नज़रें नीचे झुकाए बैठे रहना—सब कुछ एक साथ मेरे सामने घूमने लगा।

मैंने फिर पूछा, “बलात्कार ही कहा आपने? लेकिन उनकी उम्र तो नौ-दस साल ही होगी।”

दूसरे ऑफ़िसर ने कहा, “ग्यारह से तेरह साल के बीच के ही हैं वे तीनों क़ैदी, लेकिन ग़रीबी और खानपान के चलते अपनी असली उम्र से कम ही लगते हैं।”

मैंने पूछा, “कब से बंद हैं यहाँ? वह राजू कब से बंद है?”

“दो साल हो गए।”

“अभी ग्यारह-बारह साल का है, तो जब आया था तब नौ-दस का रहा होगा। बलात्कार किसका किया था उसने? कहाँ हुआ था यह? यह संभव कैसे हो सकता है?”

जेलर साहब ने कहा, “आप पहले पानी पी लीजिए, फिर चाय लीजिए। सब समझाते हैं।”

सभी लोग आपस में बातें करते रहे। चाय आई, लेकिन मेरे मन में वही सवाल घूम रहा था। मैंने फिर पूछा, “राजू के साथ क्या हुआ था?”

जेलर साहब ने बताया, “राजू और पप्पू के माँ-बाप ग़रीब हैं। कोई भीख माँगता है, कोई मज़दूरी करता है। टेंट या खुले में ये लोग सेक्स होते देखते हैं। इन्हें कौन बताए कि सही क्या है और ग़लत क्या? आपने पूछा था न कि राजू कहाँ का है और पकड़ा कहाँ गया? यह बल्लभगढ़ स्टेशन के पास ही कहीं रहता था। रेलवे पुल के नीचे एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना में यह भी शामिल था। नाबालिग़ था। जब यहाँ आया, तब भी हमने इससे पूछा था कि ऐसा क्यों और कैसे किया। इसने बताया था कि जो सब कर रहे थे, मैं भी वही करने की कोशिश कर रहा था।”

“उस लड़की का क्या हुआ?” मैंने पूछा।

इतने में एक सिपाही भीतर आया और खाने के बारे में पूछने लगा। जेलर साहब ने मुझसे पूछा, तो मैंने कहा कि भूख नहीं है। बॉस ने भी मना कर दिया। मैंने फिर सवाल किया, “बाक़ी दो? वे भी बलात्कार के आरोप में ही बंद हैं?”

“जी, मैडम जी। पप्पू जूनियर और गुल्लू भी इसी अपराध में यहाँ बंद हैं। तीनों सामूहिक बलात्कार की घटना में संलिप्त थे। पप्पू एक बच्ची के सामूहिक बलात्कार में भी शामिल था। यहाँ पर इन लोगों को बाक़ियों से अलग रखा जाता है। गंदा काम करके आए हैं, इसलिए यहाँ उनसे गंदे काम करवाए जाते हैं—शौचालय, नाली या साफ़-सफ़ाई का काम।”

इतने में बाहर से आए सीनियर ऑफ़िसर और जेलर साहब के बीच बातचीत होने लगी। उनकी बातों से अंदाज़ा हो रहा था कि यह प्रोजेक्ट किसी दूसरी सरकारी संस्था को ही दिया जाएगा। वहाँ व्यवस्था को बेहतर बनाने की काफ़ी गुंजाइश दिख रही थी। ऊपर से लेकर बीच तक, हर स्तर पर लोग व्यवस्था में फँसे और उलझे हुए थे। प्रोजेक्ट का मक़सद समझ में आ रहा था—सिस्टम के भीतर काम करना और उससे काम करवाना।

ख़ैर, काफ़ी सवालों और मन की खलबलियों के साथ जेल का वह आख़िरी दिन बीता। कोई एक सपना, एक चेहरा, एक घटना या सिर्फ़ एक एहसास आपके जीवन के साथ-साथ आगे बढ़ता रहता है। जेल में बिताए उन तीन दिनों और बच्चों की बातों ने, उनके जीवन में घटी दुर्घटनाओं ने मेरी सोच और समझ को कहीं विस्तृत किया, तो कहीं झाड़कर सिकोड़ भी दिया। राजू, सरजू, पप्पू और बाक़ी चेहरे उदास से उदासतर होते हुए ज़ेहन के तहख़ानों में बहते रहते हैं।

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समाप्त

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