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किराए का कमरा : विद्यार्थी बनाम मकान मालिक

किसी यूनिवर्सिटी या कॉलेज में प्रवेश के लिए एंट्रेंस एग्ज़ाम पास करने के बाद दाख़िला लेने में उतनी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता, जितनी हॉस्टल न मिलने पर किराए का कमरा खोजने में करना पड़ता है। असली रिसर्च तो विद्यार्थी यहीं सीखता है। गली-गली खुजियाए कुत्ते की तरह भटकने के बाद उसे उस ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिसे साहित्यिक भाषा में ‘सामाजिक यथार्थ’ कहते हैं।

कई बार तो कुछ बिगड़ैल क़िस्म के मकान मालिक दूर से ही मुँह बनाकर चिल्लाने लग जाते हैं, “हम विद्यार्थियों को कमरा नहीं देते। हमारे यहाँ जॉब वाले ही रहते हैं।” जैसे जॉब वाले सीधे आसमान से टपकते हों! मानो समाज केवल नौकरीपेशा लोगों से ही बनता हो। विद्यार्थियों से किसी समाज का निर्माण नहीं होता; वे तो सभ्य समाज में अवांछनीय हस्तक्षेप हैं, जैसे पनीर के बीच में आलू आ पड़ा हो।

कई बार तो कुछ लोग कॉलोनी के एंट्रेंस गेट पर ही विद्यार्थियों को रोककर बाहर का रास्ता दिखाने लगते हैं, जैसे वहाँ आवारा जानवरों को खदेड़ने के लिए बैठे हों। बड़ी-बड़ी नौकरियों में होने का उनका घमंड किसी गटर की तरह दूर से ही बदबू मारता महसूस होता है। मानो नौकरी मिल जाने के बाद उन्होंने अपने आस-पास के लोगों से श्रेष्ठ होने का प्रमाणपत्र भी हासिल कर लिया हो। उनके लिए केवल सरकारी नौकरीपेशा लोग ही मनुष्य हैं। किराए का कमरा खोजते विद्यार्थियों से वे इस क़दर नफ़रत करते हैं कि उनके पूछने भर से तिलमिला उठते हैं और गाली देने की मुद्रा में आकर कहने लग जाते हैं, “यह कॉलोनी नौकरीपेशा लोगों की है। यहाँ कोई पढ़ने-लिखने वालों को किराए पर कमरा नहीं देता। आगे मत जाओ, निकलो यहाँ से!”

फिर यही लोग बड़े-बड़े मंचों पर जाकर शिक्षा के दीयों में तेल डालने का ढोंग करते हैं और पूरा दीया ही गटक जाते हैं।

कई मकानों के बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है—Only for Girls। यहाँ तक भी ठीक है—लिखकर साफ़ कर दिया कि केवल लड़कियों को किराए पर कमरा मिलेगा। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि कहीं लिखा नहीं होता और कोई लड़का गेट खटखटा दे, तो जले टमाटर जैसी शक्ल बनाकर अधेड़ उम्र से थोड़ा ऊपर, तोंद खुजलाता हुआ हाड़-मांस का एक ढेर निकलता है और बिल्कुल खा जाने की मुद्रा बनाकर भौंकने के मुद्रा में कहता है, “हम लड़कों को कमरा नहीं देते। फ़ालतू परेशान मत किया करो। दिनभर तुम लोग हल्ला मचाए रहते हो!” और वह जितनी धीरे-धीरे अजगर की तरह सरकता हुआ बाहर आया था, उसके ठीक उलट लोमड़ी की तरह गेट बंद करके अपनी माँद में घुस जाता है।

ऐसा नहीं है कि इनमें पढ़े-लिखे लोग नहीं होते। इनमें से अधिकतर किसी न किसी नौकरी से रिटायर्ड लोग ही होते हैं। कम पढ़े-लिखे लोग तो इस पूरी कहानी में कहीं-कहीं ही आते हैं। वे या तो सीधे हाँ बोलते हैं या ना। उनके पास गालीनुमा शब्द नहीं होते। उनका व्यवहार अलग तरह का होता है। ख़ैर, इनसे ज़्यादा अलग तो वे भी नहीं होते।

यदि ग़लती से किसी मकान मालिक ने कमरा दिखा भी दिया और आपको पसंद नहीं आया, तो वह गरियाने जैसी शक्ल बनाकर शुरू हो जाता है, “जब लेना नहीं है, तो क्यों आते हो समय ख़राब करने?”

इस क्षेत्र में कमरा देखने की भी कोई गुंजाइश नहीं है। मकान मालिक इतनी जल्दी बुरा मान जाते हैं, जैसे शादियों में अक्सर फूफा मुँह फुला लेते हैं।

एक-दो दिन की कड़ी रिसर्च के बाद ही कहीं कोई कमरा देखने को मिल पाता है। उस पर भी मकान मालिक ऐसी पूछताछ करेगा, जैसे किराएदार नहीं अपनी बेटी के लिए दामाद खोज रहा हो। बस जैसे ही कोई सुयोग्य लड़का मिल जाएगा, अपनी कन्या का हाथ उसके हाथ में धर देगा।

बीड़ी सुरुट्टते हुए पूछेगा, “बीड़ी-सिगरेट तो नहीं पीते? शराब-मांस नहीं चलता हमारे घर में। नेपाली-चाइनीज़ तो नहीं हो?”

आगे कहेगा, “हम लड़कों को रूम देते नहीं हैं। वो तो तुम ठीक-ठाक से लग रहे हो, इसलिए दे देंगे। कमरे में कोई दोस्त-मोस्त नहीं आने चाहिए। लड़की तो बिल्कुल नहीं आनी चाहिए। किराया एक महीने का एडवांस देना होगा। बिजली का बिल दस रुपये प्रति यूनिट लगेगा। पानी के सौ रुपये महीने अलग से लगेंगे।” इनका बस चले, तो कमरे में साँस लेने तक का किराया वसूल लें।

“गेट रात में 9 बजे बंद हो जाता है”—मज़ेदार बात यह है कि इनकी अपनी औलादें रात-रात भर बाहर घूमती रहती हैं। लेकिन दूसरों के बच्चों पर नियम-क़ानून लागू करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। किसी प्रोफ़ेशनल सौदेबाज़ की तरह सौदा तय करने के बाद पूछेंगे, “वैसे आपका नाम क्या है?” नाम बताया, तो फिर पूछेंगे, “अच्छा, आपका सरनेम क्या है?” बातों-बातों में कुल-गोत्र तक की जानकारी निकलवाने की पूरी मशक्कत की जाती है। 

यहाँ आकर एक शोधार्थी को उत्तर-आधुनिकता की सटीक व्याख्या समझ में आ जाती है, जिसे समझने के लिए खोपड़ी को कई किताबों की ख़ुराक देनी पड़ती है। लेकिन यहाँ मकान मालिक चंद मिनटों में ही उसका व्यावहारिक ज्ञान करा देता है।

मकान मालकिन आंटियाँ तो बिना रिश्ते की सास बनने को तैयार बैठी रहती हैं। सुबह-शाम धर्मोपदेशक की भूमिका भी पूरी ज़िम्मेदारी से निभाती हैं। किराएदार कब आएगा, कब जाएगा, किससे मिलेगा, क्या खाएगा, किससे बात करेगा—सब पर उनकी नज़र रहती है। मानो कमरा किराए पर नहीं दिया हो, किसी की पूरी ज़िंदगी का ठेका ले लिया हो।

मुक्तिबोध ने संभवतः ऐसे ही लोगों को लक्ष्य करके लिखा होगा—“भ्रष्टाचार और अवसरवादिता के जो दृश्य दिखाई दिए उनमें बुज़ुर्गों का बहुत बड़ा हाथ है। अगर हमारे बुज़ुर्गों पर नए तरुणों की श्रद्धा नहीं रही तो इसका कारण यह नहीं है कि वे अनास्थावादी हैं वरन् यह कि हमारे बुज़ुर्ग श्रद्धास्पद नहीं रहे। और अगर हमारे युवक अनास्थावादी हैं तो भी कोई बुराई नहीं है।”

इसी समाज के एक बुज़ुर्ग वेलेंटाइन डे पर युवक-युवतियों को मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाने का आह्वान करते नहीं थकते थे। वही बुज़ुर्ग एक नाबालिग लड़की का यौन शोषण करते पाए जाते हैं।

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दुर्गेश कुमार सजल को और पढ़िए : दो ग्रह, दो भाषाएँ : पृथ्वी और मंगल के साहित्य का अनुवाद-विमर्श | दो फ़ुटिया जीभ का चरित्र

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