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कवि-छवि से कपि-छवि तक की यात्रा

प्यारेलाल जी पधारे। प्रसन्नता नहीं हुई, कोफ़्त हुई। तंगदिल नहीं हूँ, संगदिल भी नहीं। आगंतुक को समय-कुसमय का ख़याल रखना चाहिए। उनके जैसा कुँवारा तो नहीं हूँ; बाल-बच्चेदार हूँ, नागरिक ज़िम्मेदार हूँ। समझना चाहिए कि शादीशुदा आदमी आख़िरी दिन तक व्यस्त रहता है। कवि होने के बावजूद उसे कविता से अधिक वनिता का ख़याल रखना पड़ता है।

प्यारेलाल जी अपने जीवन के मध्याह्न काल तक अविवाहित हैं। इसका मतलब यह तो नहीं कि सारी दुनिया उनकी तरह ही उजाड़ है। इस देश में सदा-सुहागन बहुमत में हैं। प्यारे की बात अलग है। उनकी तो एक ही प्रेयसी है और वह उसे हरदम कलेजे से चिपकाए पूरे शहर में घूमते रहते हैं। परिवर्तन के आग्रही नहीं हैं। कविता से बेपनाह मुहब्बत करते हैं। कहते हैं कि ताजमहल की तरह वह ‘कविता महल’ बनवाएँगे, जिसके दर-ओ-दीवार पर कविताओं को स्वर्णाक्षरों में लिखवाएँगे। इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए सरकार से बात करने के लिए उद्यत दिखाई पड़ते हैं। यह भी कहते हैं कि उनके पास ‘थ्री-पी मोड’ भी एक विकल्प है, अर्थात् पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप। वह जनता और सरकार दोनों के सहयोग से अपनी कविता-यात्रा को अविस्मरणीय बनाकर ही छोड़ेंगे। उद्दाम कविता के लिए इस उद्यम में जनभागीदारी समय की माँग है।

जो भी हो, प्यारे भाई मौक़े की तलाश में रहते हैं। जैसे ही अवसर मिलता है, एक कविता प्रसारित कर देते हैं। उनका वश चले तो विदेश यात्रा पर जाने के लिए एयरपोर्ट पर वीज़ा दिखाने के बदले कविताओं की अपनी पोथी ही प्रदर्शित कर इमिग्रेशन अधिकारी को हर्षित कर दें। उन्हें अपनी कविताओं पर इतना नाज़ है कि वह समझते हैं कि इस नाव पर बैठकर वह समंदर पार कर सकते हैं। मुझे उन्हें देखकर बिल्कुल हैरानी नहीं होती। वह ऐसे मास्टर कवि हैं कि सूखी नदी में भी नौका उतार देते हैं। मैं उन्हें कवि की भाषा में समझाता हूँ कि नदी सूख गई है, अब नाव को किनारे पर लगाकर विश्राम कीजिए या गाड़ी पर लादकर किसी दूसरी नदी में उतारने का प्रयास कीजिए। वह बिल्कुल हतोत्साहित नहीं होते; वह रेत पर बैठकर सावन का इंतज़ार करते रहते हैं। बात सही है, सच्चे कवि में अद्भुत धैर्य होता है। वह आख़िरी समय तक आख़िरी श्रोता की प्रतीक्षा करेगा। बिहारी की तरह कँटीली डालियों से निराश होने के बजाय वसंत के गुलाब की कल्पना में पूरे बारह महीने ख़र्च कर देगा।

राज की बात बतलाऊँ—पहले का कवि फक्कड़ हुआ करता था, लेकिन आज का कवि प्रखर है। उसने समय के हिसाब से स्वयं को अपग्रेड किया है—नए ज़माने का स्मार्ट कवि, इन्स्टैंट कवि! टच करो कि कविता प्रकट हो जाती है। कवि के साथ प्यारी वार्ता में लगभग पैंतालीस मिनट बीत जाने के बाद जब मेज़ पर चाय संग बिस्किट नहीं आई, तो मैं समझ गया कि श्रीमती जी कुपित होकर सेज पर चली गई हैं। वैसे नाराज़ ही रहती हैं। किसी ने एक विदेशी विद्वान की उक्ति उन्हें सुना दी कि कवि की पत्नी होना दुर्भाग्य है। अब वह तोते की तरह इसे दोहराती रहती हैं। मैं भी कम थोड़े ही हूँ, कहता हूँ कि पत्नी नहीं सही, प्रेमिका ही बन जाओ। वैसे भी यह समय प्रेमिकाओं का ही है। पति-पत्नी दोनों इस बात को देर से ही सही लेकिन समझने लगे हैं।

अकारण नहीं है कि सोसाइटी में रिश्ते का एक से बढ़कर एक सुपर एंड्रॉयड वर्ज़न लॉन्च हो रहा है। अक्सर लोग यह कहते हुए सुने जा रहे हैं कि देख रहे हो न विनोद! समीकरण तेज़ी से बदल रहा है। ख़ैर, मैंने आरामगाह में जाकर बेगम से इसरार किया—“मुख पर केश डारकर सोने का समय अभी नहीं हुआ है। मैं, ख़ुसरो अभी अपने देश जाना नहीं चाहता हूँ। वैसे भी आज की शाम प्यारेलाल जी अपनी कविताओं से गुलज़ार करने वाले हैं। मौसम के मिज़ाज से हमारे प्रिय मेहमान के लिए कुछ ठंडे-गरम से स्वागत-सत्कार करने के प्रस्ताव पर त्वरित विचार करने का अनुग्रह करें।” ख़ैर, पत्नी ही हैं जो पति की इज़्ज़त सँभालती हैं। तड़ित् गति से उठीं और चंद्रमुख पर घटा की तरह छाए अलकों को इस तरह झटका कि लगा संपूर्ण कायनात हिल गई। मैं गिरते-सँभलते हुए प्यारेलाल जी के निकटस्थ हुआ और उन्होंने मुझे अपनी ताज़ा कविता से दिलासा दिया।

पलक झपकते ही उनके सामने मेरी सर्वांगसुंदरी समुपस्थित हो गईं। ट्रे में चाय-बिस्किट को ऐसे सजाया था जैसे कोई कुशल कवि अपनी कविताओं में शब्दों को सादर समुचित स्थान देता है। नमस्कार के बाद उन्होंने एक यक्ष प्रश्न कवि के सामने उछाल दिया—“मैं जानती हूँ कि आप कवि हैं, अच्छी बात है। लेकिन इसके अलावा और कोई काम, नौकरी या व्यवसाय?” कवि का आलोक धूम्राच्छादित हो गया। उस दिन पत्नी की इस बेजा हरकत पर मैं बुरी तरह शर्मिंदा हुआ। यह एक कवि का ही नहीं, कविता का अपमान था। एक कलाकार ही कलाकार की व्यथा को समझ सकता है। कवि ने अपना झोला सँभाला और उठ खड़े हुए। शिष्टाचार का तकाज़ा था कि उन्हें छोड़ने के लिए मैं बाहर तक आया। वह उदास दिख रहे थे, परंतु इस बार आह से कविता नहीं उपजी, अपितु लघुकथा निकली।

उनका मन हल्का हो, इसलिए मैंने ध्यान से सुनना शुरू किया। वह गंभीर हुए और सुनाना शुरू किया—“मेरे अंचल में एक लोक कलाकार हुए। वह तरह-तरह की छवियों में प्रकट होते थे और शानदार मिमिक्री करते थे। परंतु जब कपि-अवतार में प्रकट होते थे, तो लोग अचरज में पड़ जाते थे। कालांतर में वह ‘कपिछवि’ नाम से सुख्यात हुए। वह राजकीय समारोहों में सादर बुलाए जाते थे। बाद के दिनों में जब कला के क़द्रदान नहीं रहे, वह धनवानों की बारातों में भी मनोरंजनार्थ जाने लगे और यहीं से उनका अवमूल्यन शुरू हुआ। ऐसे ही एक दिन किसी बारात पार्टी में किसी शरारती ने उन्हें चिढ़ा दिया और वह तत्काल मंच से उतरकर चल पड़े। वह उस इलाक़े में फिर कभी नहीं दिखे; उन्होंने उस प्रांत को ही छोड़ दिया। जानते हो, कलाकार के दिल पर जब ठेस लगती है तो वह गा उठता है—ये दुनिया, ये महफ़िल मेरे काम की नहीं। अब मैं भी इस गली में क़दम नहीं रखूँगा। इतना बेआबरू होकर कभी किसी कूचे से नहीं निकला था। किसी स्त्री से उसकी उम्र और किसी व्यक्ति से उसकी तनख़्वाह पूछना यदि अशिष्टता है, तो किसी कवि से उसका पेशा पूछना सरासर अपमान है—जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।” यह कहकर वे तेज़ी से निकल पड़े। मैं बहुत देर तक दोनों हाथ जोड़े पूर्णकालिक कवि को जाते हुए देख रहा था। कवि ने एक बार भी पलटकर नहीं देखा।

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