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कहानी : लौट आएँगे

विवाह के इन दस वर्षों के दरमियान घर के ख़र्चों के साथ अब शब्दों में भी कटौती होने लगी है। राहुल के आने की आहट होती है, पत्नी रसोई से केवल पलकें उठाती है और फिर तुरत ही अपने काम में व्यस्त हो जाती है। शाम को लौटाने की ख़ुशी अब पस्त हो चुकी दीवारों की स्मृति से रोज़-रोज़ झर रही है। दस वर्ष पहले यही दीवारें चकमक हो उठती थी। एक मुस्कुराता हुआ चेहरा जैसे एक साथ हर चीज़ को रोशनी से भर देता था। सब कुछ छोड़कर जो हाथ एक वक़्त हल्के से स्पर्श के लिए लालायित होते थे, आज वही हाथ व्यस्त होने का बहाना खोज लेते हैं। घिंचा हुआ चेहरा जब उदास शाम के साथ घुल जाता तो उसका भय और बढ़ जाता। उससे भी अधिक भयावह लगता है, उस चुप मकान का बोलता हुआ सन्नाटा। ऐसा लगता कि इस सन्नाटे को किसी दैत्य ने चीर दिया हो या शायद मुट्ठी में कसकर दबोच लिया हो। इस स्थिति में अगर कहीं हल्की-सी चिचियाहट भी होती, वह भी इस भयावह माहौल को बदल नहीं पाती।

दौड़ती हुई दो जोड़ी ध्वनियाँ अर्चना और अनिल से पहले ही घर पर दस्तक दे चुकी होती हैं। पिता कमरे से अर्चना को नाम लेकर बुलाते तो वह आश्चर्य से भर उठती। अनिल की टी-शर्ट खींचते हुए वह पिता के अंतर्यामी व्यक्तित्व पर टिप्पणी करती है—“पिता को सब पता है, देखो ना हमें अभी देखा भी नहीं है और हमारे आने की ख़बर उन्हें पता चल गई।”

यह बालोचित गंभीरता अनिल पर भी व्यापी, पर वह इस पर ज़्यादा देर ध्यान नहीं देता और पापा-पापा कहते हुए कमरे की ओर लपकता है। अर्चना और तेज़ी से लपकती है क्योंकि पिता ने उसका नाम लिया था। कमरे में दोनों का प्रवेश और राहुल का निकलना, एक साथ होता है। राहुल अर्चना को गोद में उठा लेता है और प्यार से चूमता है। अर्चना चुम्बन वाली जगह को अपनी हथेली के पिछले हिस्से से साफ़ करती है और कनपटी से राहुल का चश्मा निकालकर गोद से उतरने को मचलने लगती है।

इस बीच अनिल वहीं पास खड़ा कुछ सोच रहा था, शायद कुछ कहना चाह रहा था—पर कहने के स्वाभाविक ढंग को लेकर असमंजस में था। राहुल ने जैसे अनिल को आया देखा ही ना था, वह सीधे अर्चना में ही खोया रहा। यकायक उसने पाया अनिल वहीं पास ही खड़ा कुछ सोच रहा था। उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहा, “बाबूजी कहाँ फिर रहे हैं, हमें भी तो पता चले।”

अनिल कुछ सुगबुगाया, लेकिन फिर रुक गया। शायद उसे लगा कि इस तरह भी वह पिता को खीझा सकता है। इसलिए उसने आगे कुछ नहीं कहा। उसने मम्मी की ओर देखा और ख़ुश हुआ।“आज मैं स्कूल से लौटते हुए अपने दोस्तों के साथ मुनगे तोड़ लाया हूँ, मम्मी उसी की कढ़ी बना रही है” और यह कहता हुआ रसोई की ओर दौड़ पड़ता है।

“अर्चू, अनिल! चलो, अपना होमवर्क पूरा करो। टीवी बाद में देख लेना...” कहते हुए नेहा को अपनी ही आवाज़ में अनचाही ऊँचाई महसूस होती है, जबकि रसोई से सटे बरामदे में दोनों बच्चे उसके बिल्कुल पास ही बैठे हैं। उसे खीझ होती है। पति की परवशता का बोझ बच्चों पर उतरना उसे कभी अच्छा नहीं लगता।

वह बरामदे में आती है, बिना कुछ कहे मुलामियत से बच्चों के हाथ से रिमोट लेती है और टीवी बंद कर देती है। फिर उसकी नज़र राहुल पर टिक जाती है—कुछ देर तक, भरपूर। मानो बिना शब्दों के ही पूछ रही हो कि आ गए आप?

अनिल अचानक मौक़ा देख बोलता है, “पापा, तीन दिन बाद स्कूल में स्लो साइकिलिंग रेस है। मुझे उसमें हिस्सा लेना है। ताऊजी से कह दीजिएगा, पार्थ अपनी साइकिल मुझे दे दे।”

यह कहते हुए उसने मानो नई साइकिल के पुराने वादे को उस क्षण पिता के सामने धोकर मिटा दिया हो। राहुल को माथे पर कुछ ढील-सी महसूस होती है। उसे कुछ याद आ जाता है। आज महीने की पहली तारीख़ थी। यकायक उसे महीने पहले हुई माँ की तेरहवीं का दिन याद हो उठता है। बड़े भाई ने झूठ बोल, माँ के कथित जेवरों पर राहुल के एकाधिकार की बात थोपकर ख़ुद को माँ की मृत्यु के कर्मकांड से अलगा लिया था। न चाहते हुए भी उसे अपनी गाढ़ी कमाई के 45 हज़ार रुपए सामाजिक दबाव के चलते ख़र्चने पड़े थे। बेचारे के हाथ पूरी तरह ख़ाली हो गए थे। उसे ऐसा लगा कि पुरखे जीवित हो ब्राह्मणों में समा गए हों और वहाँ मौजूद लोग पुरुखों के हक़ की दुहाई देते हुए उसका गला हलकान कर देने को बेताब हो।

इस सब के बीच उसे 75 हज़ार का लोन लेना पड़ा। इन पैसों से उसे दोनों बच्चों का स्कूल एडमिशन करवाना था और लंबे समय से रिस रही छत की मरम्मत भी करवानी होनी थी। उसने सोचा कि जब पैसा आ ही गया है और इतना सब काम भी हो रहा है तो क्यों न लगे हाथ नहानी की फ़र्श भी पक्की करवा लें, इस तरह उसने 15 हज़ार का क़र्ज़ और लेकर ऊपर के तीनों काम करवा डाले।

अब श्याम जब भी राहुल को घर लौटते देखता तो घृणा से भर उठता। 15 हज़ार रुपए के लिए राहुल ने उससे न जाने कितने वादे किए, लेकिन मजाल हो एक बार भी उसकी हथेली पर रुपया धरा हो। दो महीने में पैसे लौटा देने का भरोसा देकर, देखते-देखते आठ महीने बीत गए। इसी बात को लेकर न जाने कितने सवेरे दोनों के झगड़ों से शुरू हुए।

आख़िरकार राहुल ने इसका भी एक रास्ता निकाल लिया। उसने पत्नी के नाम पर 40 हज़ार रुपए का एक और क़र्ज़ लिया और श्याम का हिसाब चुकता कर छुट्टी पाई। अभी पिछले महीने की ही तो बात है—श्याम को उसके 15 हज़ार लौटाकर बचे हुए 25 हज़ार अपने खाते में जमा करवा लिए।

अनिल ने पिता को फिर से टोकने का मन बनाया ही था कि अर्चना के हाथ से पानी का गिलास छूट गया और उसका उत्साह भी पानी की तरह फैल गया। उसने मम्मी की ओर देखा, दोनों की गुफ़्तगू देखकर राहुल की आँखें चढ़ गई।

रोटी तोड़ते हुए उसने अनिल से बड़ी नरमी बरती, “बेटा! इस महीने और पैसे आते ही दिलवा देंगे साइकिल।” पिता की बात सुनकर बेचारा अनिल हमेशा मन मसोस कर रह जाता था। उससे कुछ कहते नहीं बना और ज़िरह करना तो जैसे उसे सिखाया ही नहीं गया। पिता साइकिल लेने की तारीख़ महीने के आख़िरी रोज़ तक टालते रहते और नए महीने की 2 तारीख़ को, तारीख़ की मियाद फिर उसी रोज़ तक खींच देते थे। क्रोध शायद ही इस परिवार ने कभी देखा हो लेकिन विद्रोह, खीझ, झुंझलाहट बराबर नज़रों से झरकर शांत होती जाती। राहुल और नेहा ने तंगी की खिसियाहट परिवार के बीच और आपस में कभी व्यक्त नहीं की। ऐसा लगता मानो कुछ बढ़ता जाता, लेकिन संतोष यह भी है कि उतना ही रिसता भी जाता।

2 तारीख़! और पिछली रात आए तीन मैसेज्स ने पूरी सुबह को जैसे आतंक से भर दिया। महीनों की जोड़-तोड़ और बचत एक ही झटके में बिखर जाती। हर महीने कोई आता, अपनी हिस्सेदारी उठाकर चला जाता और इतना भर छोड़ जाता कि अगले महीने फिर वसूली के लिए कुछ बचा रहे।

नेहा अभी-अभी उठी है। उसके बिखरे बाल ढीले गाउन पर छितराए हुए हैं। वह गाउन को जाँघों तक खिसका देखकर सहज ही नीचे खींच लेती है और फिर उस जानी-पहचानी, प्रतीक्षित सुबह में राहुल की ओर देखती है। उसे सब मालूम है। बिना कुछ पूछे वह राहुल का फ़ोन उठाती है और सीधे इनबॉक्स पर उँगली रख देती है।

वही तीन परिचित मैसेज—पहला बाईस सौ रुपए का, दूसरा सोलह सौ का और तीसरा सत्ताईस सौ का। आठ हज़ार रुपए महीने की नौकरी और उस पर हर महीने की ये कटौतियाँ—मानो सिर्फ़ तनख़्वाह नहीं, इस पूरे परिवार का जीवन कतर-कतर कर काट रही हों।

अभी पिछले महीने की ही तो बात है, राहुल के सिर पर एक गाज गिरी थी। पत्नी नेहा की नाराज़गी भी तभी से भीतर-भीतर बढ़ रही है और फिलहाल उसका कोई अंत दिखाई नहीं देता।

माँ की मृत्यु के साथ ही बड़े भाई ने रिश्ता तोड़ लिया था। उसी के साथ बँटवारे की नौबत भी आ गई। बँटवारा हुआ तो राहुल के हिस्से में आया जर्जर पुश्तैनी मकान और उसके साथ लगा टीन-टप्पर। जो कुछ ठीक-ठाक और रहने लायक़ था, वह बड़े भाई अपने नए घर ले गए, जो वहाँ से काफ़ी दूर था। पहले पास-पड़ोस में रहने से रिश्ते में जो पाट कम होती थी, दूरी ने उसे और चौड़ा कर दिया। फिर उस पाट को गहराई देने की कोशिशें भी होने लगीं।

कुछ समय पहले उसी बीच मोहल्ले में सभी बिजली के मीटरों की जाँच शुरू हुई। राहुल के घर भी कर्मचारी पहुँचे। वर्षों से बिजली का बिल जमा नहीं हुआ था। सारी रीडिंग जोड़ी गई, ब्याज लगा और कुल बकाया निकला—80 हज़ार रुपए। राहुल के सामने जैसे घना अँधेरा छा गया।

कैसे करके उसने बड़े भाई तक संदेश भिजवाया। शाम को वे अनिल के साथ आए। बात शुरू हुई, फिर कहा-सुनी में बदल गई। खींचतान के बीच खुली खिड़की से जो आख़िरी शब्द बाहर तक साफ़ सुनाई दिए, वे थे—“बँटवारे के साथ ही हमारा रिश्ता ख़त्म हो गया था। तुम्हारा तुम देखो, हमारा हम।”

उन शब्दों के बाद पूरे घर में एक भारी सन्नाटा पसर गया। नेहा भीतर ही भीतर कितना तिलमिलाई थी, यह राहुल जानता था। लेकिन उसने एक शब्द भी नहीं कहा। वह समझती थी कि बेवजह का शोर-शराबा किसी समस्या का हल नहीं होता; उलटे जो थोड़ा-बहुत बचा है—वह भी बिगड़ सकता है, सही समय आने पर बात हो सकती है। नेहा ने मन ही मन तय कर लिया था कि जो कुछ करना है, अब उन्हें अपने ही दम पर करना होगा।

राहुल के खाते में 25 हज़ार रुपए थे। बाकी 55 हज़ार जुटाने के लिए एक बार फिर क़र्ज़ ही रास्ता था।

इस बार लोन साझेदारी में लिया गया। कुल रक़म 50 हज़ार रुपए। बहुत मिन्नतें हुईं, माई-बाप की दुहाई दी गई, तब जाकर बिजली विभाग ने पाँच हज़ार रुपए की राहत दी। लेकिन शर्त यही रही कि पूरे 75 हज़ार रुपए एकमुश्त जमा करने होंगे।

काम फ़ास्ट हुआ, लेकिन काग़ज़-पत्तर में पाँच हज़ार रुपए अलग लग गए। यानी 55 हज़ार का लोन हुआ और पाँच हज़ार दलाल खा गया। आख़िरकार बिल जमा हुआ और घर रौशन। लेकिन इस रौशनी की चकमक ने गहरे दबे अँधकार को छिपा रखा था। यह अँधेरा दिल-दिमाग़ के पोर-पोर में इस तरह जम चुका था कि उससे उबरने में शायद बरसों लग जाते। और क्या पता, यह अँधेरा कहीं उनके जीवन के साथ ही ख़त्म होता।

दो तारीख़ की उस सुबह फ़ोन पर आया तीसरा मैसेज—सत्ताईस सौ रुपए की कटौती—दरअस्ल पिछले महीने गिरी उसी गाज का नतीजा था। नेहा को सुबह-सुबह राहुल का आतंकित चेहरा रास नहीं आया, उसने अपने हलके हाथों से उसकी पीठ सहला दी। राहुल जैसे किसी गहरे सदमे से बाहर लौटा आया हो। उसने घड़ी की ओर देखा—सात बज चुके थे।

जैसे ही राहुल उठा, उसकी आहट पाकर अर्चना भी जम्हाई लेते हुए बिस्तर में गुडुर-मुडुर लगी। अनिल देर से उठता है, तब तक नेहा आठ बजता देख उसे हल्के से झकझोर देती है, “साढ़े आठ बजे का स्कूल है और यह है कि अभी तक...”

दस साल का अनिल अब इतना बड़ा हो गया है कि अर्चना को साथ लेकर स्कूल चला जाता है, जैसे सुबह का यह काम उसने नेहा से ले लिया हो।

घर से निकलते-निकलते अर्चना अपनी डायरी राहुल के हाथ में थमा देती है, जिसे पढ़कर इसमें कुछ लिखना होता है। डायरी देखते ही राहुल कुछ देर स्थिर-सा हो जाता है और हमेशा की तरह नेहा को जैसे सब कुछ पता होता है—वह उससे डायरी ले लेती है और कुछ लिखकर अर्चना के बैग में डाल देती है।

पिछले पाँच महीनों से राहुल बच्चों की फ़ीस को माँ की मृत्यु का हवाला देकर टालता आया था। बच्चे स्कूल के लिए निकल गए। राहुल को हर बार की तरह यही भ्रम होता रहा कि अभी अनिल और अर्चना वापस लौट आएँगे। लेकिन ऐसा कभी नहीं होता। घड़ी में साढ़े नौ बज चुके हैं और अनिल बस निकलने ही वाला है।

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