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कचर-कचर : एक सिनेमाई आतंकवाद

थिएटर की बत्ती बुझती है। स्क्रीन पर किसी गंभीर दृश्य की नींव रखी जा रही होती है। नायक का दिल टूटने वाला होता है या सस्पेंस अपनी पराकाष्ठा पर होता है। और ठीक उसी पल आपके दाहिने या बाएँ कान के पास से आवाज़ आती है—कचर-कचर, कचर-कचर! मन करता है कि सिर पटक लें। डायलॉग सुनें, कैमरे का फ़्रेम देखें या बग़ल में बैठे उस ‘महानुभाव’ की मौखिक जुगाली की फ़्रीक्वेंसी मैच करें? टिकट के ठीक-ठाक पैसे देकर हम सिनेमा देखने जाते हैं, लेकिन मुफ़्त में उस पड़ोसी दर्शक के चबाने का डरावना साउंड इफ़ेक्ट झेलना पड़ता है।

पाँच-दस मिनट की बात हो तो इंसान सहिष्णुता दिखाए। लेकिन जन्म-जन्मांतर से पॉपकॉर्न के पिपासु इसे घंटे भर कचरते हैं—जैसे पर्दे पर फ़िल्म नहीं, मकई की फ़सल खड़ी हो और इन्हें इंटरवल से पहले पूरी काटनी है! इस चक्कर में मनोरंजन की ऐसी ‘मम्मी-दीदी’ होती है कि आदमी फ़िल्म छोड़, जीवन के सारे पाप-पुण्य का हिसाब लगाने बैठ जाए।

1930 का दशक चल रहा था। अमेरिकी मल्टीप्लेक्स मालिकों को जब लगा कि सिर्फ़ फ़िल्म दिखाकर धंधा नहीं चल रहा, तो उन्होंने थिएटर के बाहर बिकने वाले सस्ते पॉपकॉर्न को अंदर प्रवेश दे दिया। वही अभिशाप आज तक हमारी शांति का गला घोंट रहा है। दिन के शो तो छोड़िए, ‘मिडनाइट शो’ में भी ये पॉपकॉर्न-भक्षक प्रकट हो जाते हैं। रात के डेढ़ बजे इन्हें कौन-सी ऐसी जैविक ऊर्जा की आवश्यकता पड़ जाती है कि काग़ज़ की बाल्टी में हाथ डालकर 120 किलोमीटर/घंटा की स्पीड में कचरना शुरू कर देते हैं?

आपने कभी ग़ौर किया है, पॉपकॉर्न खाने की आवाज़ में भी अलग-अलग वेरिएशन होते हैं! पहले बाल्टी खुलती है—चर्ररर... फिर हाथ अंदर जाता है—खर्र... खर्र... फिर दाना खोजा जाता है। एक दाना मिलता है, वह उठता है; ऐसा लगता है जैसे समुद्र मंथन से अमृत का कलश निकला हो! फिर मुँह तक पहुँचता है, एक सेकंड का मौन... और फिर—कचर-कचर! यह सिर्फ़ पॉपकॉर्न नहीं है, यह सिनेमाई आतंकवाद है!

आप फ़िल्म में डूबे हैं। हीरो को पिता की मौत की ख़बर मिली है। कैमरा धीरे-धीरे उसके चेहरे की तरफ़ बढ़ रहा है, आँखों में आँसू हैं, बैकग्राउंड में सिर्फ़ हवा की आवाज़ है। निर्देशक ने तय किया है कि इस दृश्य में कोई संवाद नहीं होगा। और तभी आपके कान के पास—कचर-कचर! आपके भीतर का भावुक दर्शक वहीं से उठकर बाहर चला जाता है।

आपकी नज़र पर्दे की बजाय पॉपकॉर्न की बाल्टी पर जाती है—‘कितना बचा है अभी!’ लेकिन ‘सब्जेक्ट’ को कुछ फ़ील नहीं होता। उसे देखकर लगता है कि वह सिनेमा देखने नहीं, घर में राशन का अभिन्न संकट निपटाने आया है। हाथ अंदर—खर्र... दाना बाहर—कचर! फिर हाथ अंदर—खर्र... दाना बाहर—कचर! मैं पूछना चाहता हूँ—भाई, यह फ़िल्म है या अंतिम भोजन? क्या तुम्हें कोई विशेष सूचना मिली है कि कल से पृथ्वी पर मकई उगना बंद हो जाएगी?

समस्या सिर्फ़ पॉपकॉर्न नहीं, उसकी बाल्टी भी ‘पार्टनर इन क्राइम’ है। वह काग़ज़ की बाल्टी नहीं होती, वह आपकी धैर्य की परीक्षा होती है। आपके बग़ल वाला जब उसमें हाथ डालता है तो पूरा थिएटर सुनता है—खर्र... खर्र... खर्र... आपको लगता है किसी पुरानी हवेली में कोई संदूक़ खोला जा रहा है। फिर हाथ नीचे तक जाता है—और नीचे... और नीचे... फिर अचानक बाल्टी हिलती है। आप सोचते हैं—मिल गया! अमृत मिल गया! लेकिन नहीं, सिर्फ़ एक दाना निकला है। और उस एक दाने के लिए ‘समुद्र मंथन’ का पूरा ऑडियो चला है!

वैसे, कसूर इनका भी नहीं है। देश आज़ाद है, संविधान ने खाने की आज़ादी दी है; लेकिन यह कहीं नहीं कहा कि आपकी कुरकुरी आज़ादी मेरे कान के परदे पर आकर फूटे! मैं भी पॉपकॉर्न के ख़िलाफ़ नहीं हूँ। पॉपकॉर्न खाइए—घर में खाइए, बालकनी में खाइए, छत पर खाइए, पड़ोसी के घर जाकर खाइए; लेकिन सिनेमा हॉल में मत खाइए। क्योंकि वहाँ आप अकेले नहीं होते। वहाँ कुछ और लोग भी होते हैं जिन्होंने टिकट ख़रीदा है और वे भी फ़िल्म देखने आए हैं, आपके पॉपकॉर्न की आवाज़ सुनने नहीं। मैं आपको पॉपकॉर्न खाने से नहीं रोक रहा; मैं सिर्फ़ कह रहा हूँ—अपने पॉपकॉर्न खाने की स्वतंत्रता और मेरे सिनेमा देखने के मौलिक अधिकार के बीच संतुलन रखिए।

गब्बर सिंह में लाख बुराइयाँ थीं—डाकू था, हत्यारा था, क्रूर था, उसने ठाकुर के हाथ काट दिए थे। लेकिन एक बात माननी पड़ेगी—गब्बर पॉपकॉर्न नहीं खाता था! आप सोचिए—बसंती नाच रही थी, गब्बर देख रहा था। उधर सांभा छोटी पहाड़ी पर हाथ में पॉपकॉर्न की बाल्टी लिए बैठा था।

गब्बर पूछता—“अरे ओ सांभा!”
सांभा—“खर्र... खर्र...”
गब्बर—“कितना इनाम रखे हैं सरकार हम पर?”
सांभा—“कचर-कचर...”

बस फिर क्या... सांभा को जय ने नहीं, गब्बर ने ही मार दिया होता!

‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ में राज सरसों के खेत में भाग रहा है, सिमरन दौड़ रही है, पृष्ठभूमि में संगीत बज रहा है। राज कह रहा है—“पलट...”

और पीछे से—“कचर-कचर...”

सिमरन पलटती है, राज भी पलट जाता है... पॉपकॉर्न खाने वाले की तरफ़!

और फिर आता है इंटरवल! इंटरवल सिनेमा का वह पवित्र समय है जब पॉपकॉर्न प्रेमी को वैधानिक रूप से भोजन करने की अनुमति है। लेकिन नहीं, वह इंटरवल के बाद फिर नई बाल्टी लेकर लौटता है! मैंने कई बार लोगों को दूसरी बाल्टी ख़रीदते देखा है। दूसरी! पहली बाल्टी अभी-अभी शहीद हुई है, उसकी राख भी ठंडी नहीं हुई कि नई बाल्टी आ गई! ऐसा लगता है जैसे परिवार नियोजन का संदेश इन तक पहुँचा ही नहीं।

‘लगान’ में आख़िरी गेंद बची है, ‘दृश्यम’ में रहस्य खुलने वाला है... और पीछे से या बग़ल से—कचर-कचर! ‘कचर’ करने वाला व्यक्ति शायद सोचता है कि वह सिर्फ़ पॉपकॉर्न खा रहा है। नहीं भाई! तुम दूसरे आदमी की कहानी में सीधा हस्तक्षेप कर रहे हो।

मल्टीप्लेक्स वालों से भी मेरा एक सवाल है—आप टिकट महँगा करिए, कोई शिकायत नहीं। कुर्सी महँगी करिए, कोई शिकायत नहीं। 3D चश्मा बेचिए, कोई शिकायत नहीं। लेकिन हर फ़िल्म के साथ पॉपकॉर्न की बाल्टी बेचना क्यों अनिवार्य है? क्या सिनेमा देखने के लिए हमारा मुँह भी बुक करना ज़रूरी है? क्या यह सिनेमा हॉल है या कोई फ़ूड कोर्ट, जिसमें ग़लती से फ़िल्म चल रही है?

इसलिए अब समय आ गया है कि इस समस्या के ख़िलाफ़ एक आंदोलन खड़ा किया जाए—‘पॉपकॉर्न हटाओ, सिनेमा बचाओ आंदोलन!’

…क्योंकि बात सिर्फ़ पॉपकॉर्न की नहीं है, बात ध्यान (focus) की है। हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ हमारा ध्यान वैसे ही टुकड़ों में बँटा हुआ है। फ़ोन बज रहा है, नोटिफ़िकेशन आ रहा है, रील चल रही है, बग़ल वाला बात कर रहा है... और ऊपर से कोई पॉपकॉर्न कचर रहा है!

सिनेमा उन थोड़ी-सी जगहों में से एक है जहाँ हम दो-ढाई घंटे के लिए दुनिया से कट सकते हैं। जहाँ अँधेरा होता है, पर्दा चमकता है और कोई दूसरा आदमी हमारे लिए एक काल्पनिक दुनिया रचता है। उस कहानी को महसूस करने के लिए हमें सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए—सन्नाटा। इसलिए यह आंदोलन पॉपकॉर्न के ख़िलाफ़ नहीं, उस ‘कचर-कचर’ के ख़िलाफ़ है। मकई से हमारी कोई दुश्मनी नहीं, बाल्टी से भी नहीं; दुश्मनी उस क्षण से है जब किसी और के सिनेमाई अनुभव की गर्दन पकड़कर उसे पॉपकॉर्न के दाने के साथ दाँतों के बीच पीस दिया जाता है।

उत्तराखंड सरकार अगले बरस आने वाले कुंभ के विज्ञापन मल्टीप्लेक्स की बड़ी स्क्रीन पर चला रही है और सिनेमचियों को हर की पौड़ी पर डुबकी लगाने बुला रही है। अगर कोई सच में धर्म और मोक्ष का रास्ता ढूँढ़ रहा है, तो हमारा स्पष्ट मानना है—फ़िल्म के गंभीर दृश्यों के बीच में ‘कचर-कचर’ करके दूसरों का दिमाग़ी संतुलन बिगाड़ने वालों को सबसे पहले कुंभ में डुबकी लगानी चाहिए! उनके ये ‘पॉपकॉर्न-पाप’ गंगाजल में नहाए बिना धुल ही नहीं सकते। जहाँ तक बात सरकार की है, उसे मुद्दे की गंभीरता देखते हुए संसद का विशेष सत्र बुलाना चाहिए और ज़रूरी सुधार के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन करना चाहिए!

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