जौहर : कायरता नहीं, मध्यकालीन अस्मिता और स्वाधीनता-बोध का आख्यान
अंबुज यादव
03 सितम्बर 2026
समकालीन नैतिक कसौटियों से मध्यकालीन जौहर को तौलकर उसे ‘कायरता’ की संज्ञा दे देना उस संपूर्ण सांस्कृतिक चेतना की उपेक्षा है, जिसमें अर्पण, तर्पण, समर्पण, पवित्रता, शुचिता, मर्यादा, आत्मसंयम, चरित्र, संस्कार और देशप्रेम जैसे मूल्य अपना अर्थ ग्रहण करते थे। इतिहास का मूल्यांकन उसकी अपनी युगीन चेतना में करना ही विवेकशीलता का प्रथम सोपान है; वर्तमान की मानदंड-व्यवस्था से अतीत को कठघरे में खड़ा कर देना एक प्रकार का अनैतिहासिक दुस्साहस है, जो घटना के बाह्य रूप को तो देखता है, किंतु उसके भीतर स्पंदित चेतना को छू नहीं पाता।
इस पद्धतिगत आग्रह की पुष्टि जॉन स्ट्रैटन हौली अपनी पुस्तक ‘भक्ति के तीन स्वर : मीरा, सूर, कबीर’ में करते हैं। उनके अनुसार, “अँग्रेज़ी तथा अन्य यूरोपीय-अधिकतर पश्चिमी-भाषाओं में लिखने वाले विद्वान ज़ोर देकर कहते रहे हैं कि किसी पाठ को समझने के लिए उन ऐतिहासिक परिस्थितियों की यथासंभव अधिक से अधिक जानकारी अवश्य होनी चाहिए जिनमें उस पाठ की रचना हुई है। अगर संबंधित पाठ उन परिस्थितियों की जानकारियाँ नहीं उपलब्ध कराता तो उन्हें हासिल करने के उपाय किए जाने चाहिए—न केवल यह कि लोग क्या कहते या मानते रहे हैं बल्कि यथासंभव ‘ठोस’ प्रमाणों के आधार पर।” इसी सूत्र को आगे बढ़ाते हुए प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल टिप्पणी करते हैं कि “अतीत से सीखना ज़रूर चाहिए, लेकिन सीखा तभी जा सकता है जब हम अतीत के अतीतपन का सम्मान करें। वर्तमान के राजनीतिक या सामाजिक द्वंद्वों को अतीत पर आरोपित करने से वर्तमान और अतीत दोनों की समझ धूमिल होती है।”
इन दोनों विद्वानों की दृष्टि मिलकर एक ही निष्कर्ष तक पहुँचाती है। साहित्य और इतिहास का संबंध सदैव इस बात पर निर्भर करता है कि हम पाठ को उसके संदर्भ-सहित पढ़ें अथवा संदर्भ-रहित; और यही अंतर किसी घटना को ‘वीरता’ अथवा ‘कायरता’ की कोटि में विभाजित करने का निर्णायक आधार बनता है।
मध्यकालीन भारत में, विशेषतः राजपूताना के परिवेश में, युद्ध केवल राज्य-विस्तार का साधन नहीं था; वह अस्मिता, कुल-प्रतिष्ठा और मर्यादा की समवेत परीक्षा भी था। जब कोई दुर्ग पराजय की कगार पर आ खड़ा होता, तब विजेता के हाथों स्त्रियों की जो दुर्गति संभावित थी, उसकी कल्पना उस समाज के लिए असह्य थी। ऐसी परिस्थिति में जौहर किसी क्षणिक भय की उपज नहीं था; वह उस समाज-व्यवस्था द्वारा गढ़ा गया एक सुदृढ़ प्रत्युत्तर था, जिसमें पराजित होकर पराए हाथों में सौंप दिए जाने के स्थान पर अपने अस्तित्व पर स्वयं का अंतिम अधिकार जताना श्रेयस्कर माना जाता था। यह भेद अत्यंत सूक्ष्म है, परंतु मौलिक भी—विवशता में मृत्यु स्वीकारना पृथक बात है, अपनी अस्मिता की अंतिम रक्षा हेतु मृत्यु को वरण करना सर्वथा भिन्न सत्य है।
इस संदर्भ में यह स्मरणीय है कि मध्यकालीन समाज में स्त्री और पुरुष दोनों के लिए मृत्यु एक निश्चित परिणति की भाँति स्वीकार्य थी, यदि उससे मर्यादा और सम्मान की रक्षा संभव हो। यह दृष्टिकोण आधुनिक जीवन-मूल्यों से भिन्न अवश्य है, किंतु उस युग की आंतरिक संगति में सर्वथा तर्कसंगत प्रतीत होता है। मृत्यु को वरण करने का यह भाव किसी दुर्बलता का परिणाम नहीं, एक सुदृढ़ नैतिक-दार्शनिक संरचना का परिणाम था, जिसमें जीवन से अधिक मूल्यवान गरिमा मानी जाती थी।
मलिक मुहम्मद जायसी के ‘पद्मावत’ में जौहर स्त्री-मृत्यु का साधारण वृत्तांत नहीं, यह प्रेम, स्वाभिमान और नियति के स्वेच्छा-चयन से गुम्फित प्रसंग है। यह आख्यान उस मध्यकालीन विश्वदृष्टि की उपज है, जिसमें देह की रक्षा से अधिक मूल्यवान मर्यादा और आत्मसम्मान की रक्षा मानी जाती थी। जायसी की कथा में अलाउद्दीन की सैन्य-विजय अंततः उसकी आत्मिक पराजय में परिणत हो जाती है। पद्मावती को पाने की कामना से प्रेरित होकर वह चित्तौड़ पर आधिपत्य तो स्थापित करता है, किंतु जिस वस्तु की अभिलाषा उसे प्रेरित करती है, वह उससे सर्वथा वंचित रह जाता है।
रत्नसेन की मृत्यु के उपरांत पद्मावती और नागमती एक साथ सती होने का व्रत लेती हैं, और इसी क्षण जायसी लिखते हैं—“छार उठाय लीन्ह एक मूँठी। दीन्ह उड़ाइ पिरथिमी झूठी॥” एक मुट्ठी भस्म का यह बिंब अत्यंत सारगर्भित है। सत्ता, सैन्यबल और विजयोन्माद के समस्त वैभव के बावजूद अलाउद्दीन के हाथ पद्मावती नहीं, उसकी राख आती है। यह प्रसंग सत्ता के समक्ष प्रेम की स्वायत्तता की उद्घोषणा प्रतीत होता है। देह पर अधिकार प्राप्त करना हृदय पर विजय पाना नहीं—इस भेद को जायसी अत्यंत काव्यात्मक सूक्ष्मता से उकेरते हैं। संसार की समस्त सत्ता-लिप्सा अंततः इस मिथ्या बोध पर टिकी होती है कि शरीर को वश में कर लेने से प्रेम भी वशीभूत हो जाएगा, पद्मावत इसी भ्रम को धूल-धूसरित करता है।
जायसी की यह पंक्ति संसार की क्षणभंगुरता (‘पिरथिमी झूठी’) की ओर भी संकेत करती है—विजय का संपूर्ण वैभव अंततः राख की एक मुट्ठी में सिमट जाता है, यह बोध स्वयं अलाउद्दीन के लिए भी एक प्रकार का आत्मबोधक क्षण बन जाता है। जायसी यहाँ न सिर्फ़ एक कथा-प्रसंग नहीं रच रहे, बल्कि सत्ता, वासना और नश्वरता के संबंध पर एक गंभीर दार्शनिक टिप्पणी भी प्रस्तुत कर रहे हैं। यह पंक्ति सूफ़ी काव्य-परंपरा की उस विशेषता को भी प्रतिबिंबित करती है, जिसमें सांसारिक विजय को अंततः मिथ्या और नश्वर सिद्ध किया जाता है, और आत्मिक सत्य को ही चिरंतन माना जाता है।
जायसी की दूसरी प्रसिद्ध पंक्ति में यह भाव और भी विस्तृत रूप ग्रहण करता है—“जौहर भई इस्त्री, पुरुष भए संग्राम”। पुरुष के लिए रणभूमि जिस प्रकार मर्यादा-रक्षा का क्षेत्र थी, स्त्री के लिए जौहर उसी मूल्य-व्यवस्था की समानांतर अभिव्यक्ति था। दोनों में समान रूप से आत्मसमर्पण नहीं, आत्मोत्सर्ग का भाव अंतर्निहित है। युद्ध में पुरुष अपने प्राणों की आहुति देकर मर्यादा की रक्षा करता था, स्त्री जौहर में वही आहुति भिन्न रूप में संपन्न करती थी। यह समानांतरता इस तथ्य की परिचायक है कि उस युग की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में दोनों कर्म एक ही दायित्व-बोध की दो शाखाएँ थीं, न कि एक-दूसरे से पृथक अथवा असमान घटनाएँ।
इस प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कि जौहर किसी एक स्त्री का व्यक्तिगत निर्णय नहीं होता था; वह एक समवेत, सामूहिक संकल्प का रूप धारण करता था। परस्पर स्पर्धा और मनोमालिन्य में रत रही सौतें भी अंतिम क्षण में एक साझी नियति को स्वीकार करती हुई एक साथ चिता में समाहित होती हैं। मृत्यु की इस घड़ी में व्यक्तिगत वैमनस्य विलीन हो जाता है, और एक व्यापक सामूहिक चेतना उदित होती है, जो पारस्परिक भेदभाव से परे एक साझा गरिमा की स्थापना करती है।
इसी सामूहिकता की व्याख्या करते हुए प्रोफ़ेसर बन्दना झा जौहर-प्रसंग पर टिप्पणी करती हैं कि “आत्मोत्सर्ग और स्वाभिमान की रक्षा का सामूहिक संकल्प है जौहर। सामूहिक चेतना की अभिव्यक्ति का प्रतीक है जौहर। ‘जौहर भई इस्तिरी, पुरुष भए संग्राम।’ जिसके पास मूल्य-दृष्टि और मूल्य-बोध की कमी हो, वह कैसे समझे जौहर को! जो अर्पण, तर्पण, समर्पण, पवित्रता, शुचिता, मर्यादा, आत्मसंयम, चरित्र, संस्कार और देशप्रेम का अर्थ नहीं समझते, वे जौहर का मर्म क्या समझेंगे।” इस टिप्पणी में निहित यह चेतावनी महत्त्वपूर्ण है कि किसी सांस्कृतिक संस्था का मूल्यांकन उस मूल्य-दृष्टि से रहित होकर करना, जिसमें वह संस्था जन्म लेती है, अंततः उसकी मूल आत्मा से ही वंचित रह जाना है। यह सामूहिकता ही जौहर को व्यक्तिगत आवेश की घटना से उठाकर एक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था के स्तर तक प्रतिष्ठित करती है।
पद्मावती इस आख्यान में किसी पुरुष की प्राप्ति-वस्तु नहीं बनती, वह अपनी मर्यादा और वैवाहिक निष्ठा के साथ उपस्थित होकर अपनी नियति स्वयं चुनती है। जायसी पद्मावती और नागमती के जौहर को उनके निष्ठा-भाव और प्रेम-चेतना के परिप्रेक्ष्य में प्रतिष्ठित करते हैं, न कि किसी बाह्य विवशता के परिणाम के रूप में। यह दृष्टि पद्मावती को एक निष्क्रिय पात्र से उठाकर उस स्त्री-चेतना के प्रतिनिधि रूप में प्रतिष्ठित करती है, जो अपने भाग्य-निर्णय में स्वयं की सक्रिय भागीदार होती है।
जिस युग में स्त्री का अस्तित्व प्रायः पुरुष-केंद्रित आख्यानों में गौण स्थान पाता था, उस युग में भी जायसी पद्मावती को निर्णायक भूमिका में प्रस्तुत करते हैं। यह स्वयं में एक साहित्यिक विशिष्टता है। पद्मावती का चरित्र-चित्रण सौंदर्य अथवा वैवाहिक निष्ठा तक सीमित नहीं रहता; वह बुद्धि, विवेक और आत्मनिर्णय की क्षमता से संपन्न पात्र के रूप में उभरती है, जो अंततः अपनी नियति का निर्णय स्वयं करती है, न कि किसी बाह्य शक्ति के आदेशानुसार।
वर्तमान समाज में जौहर अथवा आत्मदाह को आदर्श या अनुकरणीय आचरण मानना निस्संदेह अनुचित होगा; युगीन परिस्थितियाँ, सामाजिक संरचनाएँ और मूल्य-बोध सर्वथा परिवर्तित हो चुके हैं। आज स्त्री की अस्मिता और गरिमा की रक्षा के मार्ग भिन्न हैं, और उन्हें भिन्न ही रहना चाहिए। किंतु इतिहास और साहित्य को उसकी अपनी युगीन चेतना में पढ़ा जाना उतना ही अनिवार्य है, जितना वर्तमान का मूल्यांकन वर्तमान की कसौटी से करना आवश्यक है, जैसा जॉन स्ट्रैटन हौली और पुरुषोत्तम अग्रवाल दोनों संकेत करते हैं।
किसी ऐतिहासिक कर्म को उसके मूल संदर्भ से विलग कर वर्तमान की शब्दावली में बाँध देना—जैसे ‘कायरता’ कह देना—उस युग की चेतना, उसके मूल्य-बोध और उसके निर्णय की ऐतिहासिक गरिमा को नकारने के समान है। यह प्रवृत्ति स्वयं एक प्रकार का बौद्धिक अहंकार भी है, जो वर्तमान की श्रेष्ठता के भ्रम में अतीत की जटिलता को सरलीकृत कर देता है। साहित्यिक आलोचना का दायित्व यह होना चाहिए कि वह पाठ के भीतर निहित चेतना को उद्घाटित करे, न कि उसे बाह्य मानदंडों से नियंत्रित करे।
पद्मावत की “छार उठाय लीन्ह एक मूँठी। दीन्ह उड़ाइ पिरथिमी झूठी॥” पंक्ति यही स्मरण कराती है कि विजेता होना और किसी हृदय को जीत लेना—दोनों भिन्न सत्य हैं। अलाउद्दीन चित्तौड़ जीत सकता है, पद्मावती का प्रेम नहीं। हिंसा से प्रेम पाने के प्रयास में अंततः विजेता के हाथ में एक मुट्ठी राख ही अवशिष्ट रह जाती है—यही जायसी का चिरंतन संदेश है, जो मध्यकालीन इतिहास की व्याख्या नहीं, मानवीय सत्ता-लिप्सा और प्रेम की सीमाओं पर एक शाश्वत टिप्पणी भी है। जौहर को कायरता कह देने से पूर्व यह स्मरण रखना आवश्यक है कि प्रत्येक युग का अपना नैतिक व्याकरण होता है, और उस व्याकरण को समझे बिना किया गया कोई भी निर्णय अंततः सतही और अपूर्ण ही रह जाता है।
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अंबुज यादव नई पीढ़ी के लेखक हैं। वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में शोधार्थी हैं। उनका शोध-विषय ‘पद्मावत का सांस्कृतिक पुनर्पाठ : देशज आधुनिकता और संवाद-संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में’ है। उनके शोध-अध्ययन का प्रमुख क्षेत्र मध्यकालीन हिंदी साहित्य, सांस्कृतिक अध्ययन, देशज आधुनिकता तथा भारतीय साहित्य की संवादपरक परंपराओं से संबद्ध है।
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