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जगह-जगह 2.0 : पुणे के बहाने

जाऊ नका कोणी
तिथे जाऊ नका कोणी
जे गेले, नाही आले परतोनी

तुका पंढरीसी गेला
पुन्हा जन्मा नाही आला
पंढरीचे भूत मोठे

— संत तुकाराम (1608-1650)

संत तुकाराम इस अभंग में पंढरपुर के अलौकिक आकर्षण का वर्णन कर रहे हैं : ‘तुका (राम) एक बार पंढरपुर गया और फिर जन्म-जन्मांतर के चक्र से मुक्त हो गया, कोई पंढरपुर मत जाना; लौट नहीं सकोगे, पंढरपुर के भूत पीछा नहीं छोड़ते।’

महाराष्ट्र-कर्नाटक में यह अभंग दिनचर्या का हिस्सा है।

अपनी बात में चले आ रहे ‘पारलौकिक संदर्भ’ को गौण करते हुए; मैं कहना चाहता हूँ कि हम सभी ऐसी जगहों, स्थितियों और निर्णयों के प्रति जिज्ञासु तथा आतुर रहते हैं जो हमें मुक्त कर देंगे। मेरे लिए वह शहर पुणे है। यह पसंद, अपने आपमें शहर को महान् नहीं बनाती; लेकिन तथाकथित ‘हिंदी प्रदेश’ से मैं पहली बार महाराष्ट्र (बाद में कर्नाटक) गया जिससे मेरी चिंताओं और आकर्षण में भी अंतर पैदा हुआ।

मेरी रुचि इस बात को आत्मकथात्मक रूप देने की नहीं है, न पुणे के इलाक़ों और इतिहास की रमणीय सैर कराने वाले सफ़रनामा को लिखने की। मेरी रुचि पुणे के बहाने शहरों के प्रति हमारे रवैये को कुछ टटोलने की है। जहाँ एक तरफ़ स्पष्ट है कि भारत में शहरों (और महानगरों) की रिहायशी तथा बुनियादी अवसंरचनाओं का पतन हो रहा है, वहीं भारतीय होने की हमारी ‘नाशुक्राना’ प्रवृत्ति और अधिक ज़ोरों पर है। हमारा सिनेमा और साहित्य, गाँव बरअक्स शहर के वही पुराने ‘कल्चरल-शॉक’ से बाहर नहीं आ रहा जिसमें शहर एक दैत्य है, जहाँ त्रिलोचन की ‘चंपा’ कविता का नायक जाने वाला है और जहाँ रहमान अब्बास, अरुण कोलटकर तथा जेरी पिंटो को पढ़ा जाना बाक़ी है।

भारतीय शहरों का वह संसार इस सदी के दूसरी दहाई में समाप्त हो चुका है, जिसके गीत हमने गाए थे और जिसके वैभव से हमारा जीवन चमत्कृत हुआ फिरता था। वह इलाहाबाद, बनारस, जालंधर, बुरहानपुर, जबलपुर, बरेली अब बुझ चुका है। हो सकता है कि कुछ धमनियाँ फड़कें और कुछ चिंगारियों में वह ताप जल-जल बुझता हो, लेकिन इन शहरों को मुड़कर ही देखा जा सकता है।

बीसवीं सदी के अंत में भारत में जो नया मध्यवर्ग पैदा हो रहा था, वह शहरों के गौरव और प्रतिष्ठा से कोसों दूर था। वह पेंशनयाफ़्ता पीढ़ी की संतान भर नहीं था, बल्कि नई पूँजी से पैदा होते बाज़ार और अवसरों के लिए एक तैयार पौध था। पूँजी कहते ही इसमें एक ‘पारंपरिक नकारात्मकता’ का भाव दिखता है। मैं इससे सहमत नहीं, क्योंकि मैं स्वयं इस नए फैलते मध्यवर्ग का हिस्सा था। मैं गुरचरण दास की ‘इंडिया अनबाउंड’ का पाठक था। लेकिन मेरे जैसे सैकड़ों उन सभी ‘राजनीतिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षय एवं उदासीनता’ की कैप्सूल से न जाने कैसे इम्यून थे जिनके लिए शहर ‘रीयल स्टेट’ की एक लैब था। नए मध्यवर्ग की प्रकृति में एक ‘रिचार्ज’ प्रवृत्ति ने भी जन्म लिया जो जहाँ नागरिक दायित्व तथा नागरिक अधिकार के संतुलन में बदलाव आया और राजनीतिक सत्ताएँ ‘जनहित और विकास’ की एकमात्र प्रतिनिधि बन गईं।

मैं जब पहली बार जबलपुर से दिल्ली गया...

वह पहला महानगर दिल्ली ही था जिसमें मुझे रहना था। मैंने उसके पहले कलकत्ता और भोपाल देखे थे। कलकत्ता का ‘Hastings’ आज जिस क़दर सुंदर है, विश्वास नहीं होता कि प्रिंसेप घाट से कुछ दूर, कुछ दो सौ बरस पहले मीर अम्मन इस जगह में रहकर ‘चहार दरवेश’ का तर्जुमा कर रहे थे। पता नहीं क्यों लेकिन पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन में मुझे पुरानेपन का वह सौंदर्य और वैभव दिखता रहा जो जामा मस्जिद में नहीं मिला और वहाँ जाकर हमेशा लगा कि इस स्टेशन के पीछे ज़रूर कलकत्ते की फ़ोर्ट विलियम जैसी कोई जगह होगी। पुरानी दिल्ली से कोई ट्रेन चलती होगी जो न जाने कैसे, लेकिन इससे भी पुराने क़ाहिरा जैसे किसी रेलवे स्टेशन तक हमें ले जाती होगी। दिल्ली के पुरानेपन का दावा सत्यापित हो या न हो, यह एक रहस्यमय शहर है।

लेकिन दिल्ली में मैंने पहली बार देखा जो बाद में भारत में अन्य जगहों के लिए भी महसूस किया कि यहाँ शहरी गर्व एक ‘रिहायशी सुहूलियत’ से अधिक कुछ नहीं है। इसमें कोई सांस्कृतिक गौरव, वैभव तथा नम्यता नहीं है, बल्कि वे सब स्नायु अब सुन्न हैं। जगह-जगह से बनते खोखल ‘बाग़ीचों में खुलते दफ़्तर, सड़कों पर बनते घर और अहातों में बैठे सियार’ मुझे दिल्ली के लिए उदास करते रहे।

अब जब मैं दिल्ली कहता हूँ तो वह बस दिल्ली शहर नहीं है। जनसंख्या का उफान है, महत्त्वाकांक्षाओं का ग़लबा और उसको भुनाते राजनीतिक दल हैं। शमशेर का सूखता दोआबा है। गंगा-जमुना का बजबजाता मटमैलापन है। सुस्त होते और दरकते दिल्ली में गति सिर्फ़ घटनाओं और असुरक्षाओं की बढ़ रही है।

मैंने कई साम्राज्यों की राजधानी वाले महानगर इस्तांबुल को जब देखा तो कभी बाईजैंटियन अवशेषों पर लिखी लैटिन देखता था, कभी हमामों में लिखी उस्मानी तुर्की को पढ़ने की कोशिश करता था। जातीय तथा धार्मिक आक्रामक प्रवृत्तियों के प्रति तेज़ी से बढ़े तुर्की में भी इस्तांबुल का महानगरीय तथा बहुसांस्कृतिक तंतु अक्षुण्ण रहा। यह कहते हुए मैं भारत में बेंगलुरु, दिल्ली तथा मैसूरु में हुए धार्मिक उन्माद को याद कर रहा हूँ।

2018 में मैं पुणे पहुँचा

जैसे दिल्ली कहते हुए मैं उस पूरी संस्कृति को याद कर रहा हूँ जिसमें वैविध्य है, लेकिन एकरूपता भी है। उसी तरह पुणे का ज़िक्र मुझे पुणे ही नहीं, मुंबई और फिर बेंगलुरु तक खींचकर ले जाता है। यह मेरे लिए ‘ब्रेव न्यू वर्ल्ड’ है।

पहली सुबह मैंने धुली दहलीज़ों के सामने रांगोळी/कोलम बनते देखा और गली में बेफ़िक्र फिरती बिल्लियाँ देखीं। पशुओं का मानव समाज से नाता नया नहीं है। शहरी अकेलेपन में पशु पहली बार घर के अंदर आए जो परिंदे नहीं थे—ख़ासकर बिल्लियाँ और कुत्ते। कुत्ते लंबे समय से साथ रहे; लेकिन बिल्लियाँ जिस क़दर सावधान और संवेदनशील होती हैं, उनके सहज ही फिरने ने मुझे आकर्षित किया। पेरुमाळ मुरुगन की कहानियों में स्त्रियाँ अक्सर दहलीज़ के आगे कोलम बना रही होती हैं। सुबह का यह शऊर सुंदर है।

दो उपनदियाँ पुणे शहर के बीच से गुज़रतीं और उसे हर सात-आठ किलोमीटर में घेरे रहती हैं, इनके नाम ‘मुळा एवं मुठा’ हैं। ये जहाँ मिलती हैं, वह पुणे रेलवे स्टेशन के पास का इलाक़ा है जिसे संगमवाड़ी कहते हैं। पुणे में ढेरों पारसी कैफ़े हैं, सोडे की फ़ैक्ट्री ड्यूक और आर्देशिर वाला शर्बतवाला चौक आज भी है। ड्यूक और आर्देशिर दोनों ही पारसी उद्यम थे। यहूदी सिनेगॉग है जिसमें डेविड ससून की क़ब्र भी है। यहूदियों तथा पारसियों की इस मौजूदगी ने इस शहर को आर्किटेक्चरल तथा औद्योगिक नयापन दिया था और शहर के बाहर झाँकती एक नई दृष्टि भी।

पुणे पेशवाओं की सीट भी रहा है तो उनके सांस्कृतिक प्रतीक, इलाक़े, इमारतें तथा उससे संबद्ध गौरव आज भी यहाँ जन-मानसिकता का हिस्सा हैं। पिछले तीस वर्षों में पुणे का प्रसार हुआ। नए उभरते मध्यवर्ग और नौकरी के पलायन ने शहर को कई कोनों में फैला दिया। उत्तर पश्चिम की बिज़निस डिस्ट्रिक्ट पिम्परी चिंचवड़ है और पूर्व में विमाननगर, खराड़ी, मगरपट्टा आदि। ऑटो-मोबाइल सेक्टर की मौजूदगी के कारण जर्मन सीखने वाला वर्ग यहाँ बहुत बड़ा है।

इसके इतर, पुणे (या पुराना पुणे) वह है जहाँ पुराने पेठ मौजूद हैं। पेठ में मुख्यतः पुणे का भद्रलोक रहता है। पेठ से अर्थ बसाहट या बाज़ार के आस-पास बसी बसाहट से है। आप कर्नाटक और आंध्र-तेलंगाना में भी इस पेठ को ‘पेट’ में बदलता हुआ पाएँगे जैसे बेग़मपेट। पुणे के इस भद्रलोक में सांस्कृतिक नकचिढ़ापन है, किंतु इसमें अभद्रता नहीं है। यह वही वर्ग है जिसके बारे में ज्ञानरंजन ने कहा था ‘न अपनी जलेबी बचाएँगे न डोमिनो पिज्जा आने देंगे...’ 

मैं समुंदर को लेकर पूर्वाग्रही हूँ। वहाँ से सिर्फ़ हवाएँ नहीं आती। वहाँ से जीवन-शैली, विचार, संस्कृतियाँ, ख़तरे और नयापन भी आता है। अमर फ़ारूक़ी ने अपनी किताब ‘ओपियम सिटी’ में विस्तार से लिखा है कि मुंबई आज से दो-तीन सौ बरस पहले इतनी बड़ी जगह नहीं हुआ करता था और कैसे अफ़ीम व्यापार ने बिखरे हुए द्वीपों को इकठ्ठा किया। जहाँ पुणे मराठाओं की सांस्कृतिक राजधानी थी, मुंबई नया पनपता औपनिवेशिक शहर था। शहरों के इस भिन्न मिश्रण के स्थापत्य ने नए कलेवर को जन्म दिया।

महाराष्ट्र अक्सर अपनी सांस्कृतिक तथा भाषायी विरासत की सुरक्षा में आक्रामक रवैया अपनाने वाले राज्यों के रूप में ख़बरों में रहा है, मेरा इस रवैये से न सरोकार है और न ही मैं कभी इसका पक्षपोषण कर सकता हूँ। रोचक यह है कि महाराष्ट्र एक साथ ही आम्बेडकर और सावरकर की भूमि है। यहाँ दक्षिणपंथ का विरोधी होना स्वतः सावरकर का विरोधी होना नहीं होता और वही स्थिति आम्बेडकर के साथ है। राजनीतिक रुझान, सांस्कृतिक प्रतीकों का निषेध नहीं करता।

यद्यपि धार्मिक वैमनस्य की चपेट में पूरा भारत रहा है, लेकिन उत्तर में जिस तरह साहित्यिक विषयों के केंद्र पिछले 70-75 सालों से विभाजन, धार्मिक उन्माद, उजड़ते शहर आदि के इर्द-गिर्द ही रहे हैं। नया सांस्कृतिक संपर्क, नई जीवन-शैली के प्रश्न और अतीत-गौरव या विपदाओं के अतीत विलाप से बाहर आना संभव नहीं हो सका। इस आलम में इंतेख़ाब या इस्तिस्ना (अपवाद) इलाहाबाद जैसा शहर दिखता है। इसके बरअक्स पश्चिम या अधिक दक्षिण की तरफ़ बढ़ें तो वह आबादी विभाजन और धार्मिक उन्माद की घटनाओं से नहीं, लेकिन प्रभाव से बची रही।

पुणे मुंबई से सुरक्षित दूरी पर है। जिस भीषण पलायन और इंफ़्रास्ट्रक्चरल संकटों से भारतीय शहर जूझ रहे हैं—पुणे भी उसमें शामिल है; लेकिन नाराज़गी, सिनिसिज़्म में नहीं बदली है—बशर्ते उसे फिर जातीय उन्माद में भुनाना न शुरू कर दिया जाए।

मेरे लिए पुणे आज़ादी देने वाला शहर है। जिसमें मेरे कलात्मक रुझानों, काम-काज, परिप्रेक्ष्य में वैश्विकता, नागरिकता के दायित्व और अर्थपूर्ण एकाकीपन को जगह दी। मेरी चिंताएँ, नज़रिया और आकर्षण की धुरी तथा दिशाएँ स्पष्ट हो सकीं। एक बड़ी आबादी थी जिसके सरोकार थे और उसकी भाषा, मुहावरे, संबद्धता वैसी नहीं थी; न ही वह लौट-लौटकर पीछे मुड़कर देखती थी।

एक लंबे समय तक मैं अपनी जड़ें पंजाब, बनारस और दिल्ली के इर्द-गिर्द ढूँढ़ता रहा; वे वहाँ हैं भी... लेकिन पुणे आकर मैं उस तनाव से मुक्त हो सका जिसमें न गिरह सुलझती थी, न सिरे मिलते थे।

बेंगलुरु के कब्बन पार्क में एक रविवार की सुबह घूमते हुए मैंने नागरिकों को संत त्यागराज की एक कृति को साथ में गाते हुए सुना। वे सभी लोग एक-दूसरे से अजनबी थे, नौउम्र से लेकर वयोवृद्ध थे, टहल-दौड़कर आए थे और धूप में खड़े थे। धीरे-धीरे आवाज़ बढ़ती गई और मैं रचना के साथ ताल और सरगम भी सुन पा रहा था। मुझे वहाँ होना बहुत अच्छा लगा। मैं उस जगह और उस सभी का हिस्सा होना चाहता था।

हिस्सा होना और न होने के चुनाव का होना मुझे अच्छा लगा। मैंने कई घटनाओं और समूहों में हिस्सा लेना बंद किया और कइयों में शुरू किया। महानगरीय विकल्पों और चुनाव के स्वातंत्र्य का यह संसार मेरे लिए सभी शहरों ने खोला। लेकिन जहाँ सबसे अधिक सुरक्षित एवं नया महसूस कर सका वह पुणे था। मैं कहीं भी जाकर पुणे लौटने का ही सोचता रहूँगा, भले ही किसी अन्य शहर में बस जाऊँ।

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