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जगह-जगह 2.0 : अलिफ़ शफ़क़ के दो उपन्यास : सभ्यताओं का नमक और इतिहास की चुप्पियाँ

तुर्की उपन्यासों का नमक सभ्यताओं के बीच संवाद और उनका अंतर्विरोध है। 20वीं सदी के बड़े तुर्की उपन्यासकार गाहे-बगाहे अपनी सही जगह तलाशते रहे हैं। उनके यहाँ आधुनिकता और इस्लाम के बीच फाँक है, यूरोपीय और पूर्वी जीवनशैलियों के बीच तनाव है, तुर्क, अर्मेनियाई और कुर्द पहचान के सवाल हैं। उस्मानिया साम्राज्य की स्मृति और राष्ट्रवादी आकांक्षाएँ हैं। दीनी कट्टरपंथ के बरक्स इस्तांबुल जैसे शहरों की अत्याधुनिक नागर संस्कृति है। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में उस्मानिया दौर में विकसित तुर्की उपन्यास ने आधुनिक गणराज्य के साथ नए रूप और सरोकार हासिल किए। पश्चिमीकरण, राष्ट्रीय पहचान और साम्राज्य की स्मृति उसके साहित्य में बार-बार लौटने वाले विषय रहे हैं।

अलिफ़ शफ़क़ अँग्रेज़ी में लिखती हैं और लंदन में रहती हैं। अपने दो उपन्यासों में उन्होंने मार्मिकता, संवेदनशीलता और हौसले के साथ उन विषयों को छुआ है, जो राजनीतिक रूप से प्रतिबंधित या विवादास्पद रहे हैं। तुर्क-फ़ारसी-अरबी दुनिया और उस्मानिया साम्राज्य के इतिहास के जटिल और असहज पहलुओं को उठाना उनके लेखन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। तुर्की साहित्य में यह अपेक्षाकृत जोखिम भरा काम रहा है। नोबेल पुरस्कार विजेता ओरहान पामुक को भी अपने लेखन के कारण तिरस्कार और मुकदमों का सामना करना पड़ा है।

अलिफ़ शफ़क़ का गद्य आकर्षक और समृद्ध इस अर्थ में है कि तुर्की समाज से उनके अंतरंग परिचय और उसे अँग्रेज़ी में व्यक्त करने की प्रक्रिया के बीच कोई द्वंद्व या फ़ासला उनकी भाषा में दिखाई नहीं देता। बल्कि ‘व्यक्त करना’ यहाँ अतिरेक है। ‘The Forty Rules of Love’  पढ़ते हुए लगा था कि वह तुर्की और रूमी को अँग्रेज़ी दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में सांस्कृतिक प्रतीकों के दुश्वार इस्तेमाल के जोखिमों को लेकर बहुत सतर्क हैं। लेकिन यह एक जल्दबाज़ पाठ था। अलिफ़ शफ़क़ को तुर्की इतिहास, वर्तमान और समाज को अपना विषय बनाने वाली अँग्रेज़ी लेखिका की तरह पढ़ा जाना चाहिए, न कि एक तुर्की लेखिका की तरह, जो अँग्रेज़ी में लिखती हैं।

उनकी अब तक 21 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 13 उपन्यास हैं। मैंने उनकी कुल प्रकाशित पुस्तकों का आधा भी नहीं पढ़ा है। यहाँ जिन दो उपन्यासों की चर्चा कर रहा हूँ, वे मेरे लिए रुचिकर रहे। उनकी कुछ बेहद प्रसिद्ध पुस्तकों के बजाय इन अपेक्षाकृत कम चर्चित रचनाओं को चुनना मेरी अपनी रुचि का नतीजा भी हो सकता है या महज़ संयोग।


‘The Bastard of Istanbul’ : पहचान और इतिहास का रोज़मर्रा

“The Armenians and the Turks lived in different time frames, for the Armenians, time was a cycle in which the past incarnated in the present birthed the future, for the Turks, time was a multihyphenated line, where the past ended at some definite point and the present started anew from scratch and there was nothing but rupture in between.”

‘The Bastard of Istanbul’, p. 165

उपन्यास ‘The Bastard of Istanbul’ 2006 में प्रकाशित हुआ। तुर्की और आर्मेनिया के संबंधों में कड़वाहट की एक बड़ी वजह 1915 में उस्मानिया साम्राज्य के अंतिम वर्षों में अर्मेनियाइयों की सामूहिक हत्या और निर्वासन का इतिहास है। इन घटनाओं की स्मृति और उनकी व्याख्या आज भी विवाद का विषय हैं। शफ़क़ इसी असहज इतिहास को दो परिवारों की कहानी में बुनती हैं। उपन्यास की एक प्रमुख पात्र अस्या है, इस्तांबुल में रहने वाली उन्नीस साल की लड़की, जो अपने परिवार की कई पीढ़ियों की औरतों के बीच पली-बढ़ी है। उसे जॉनी कैश और फ़्रांसीसी अस्तित्ववादियों में दिलचस्पी है। दूसरी ओर अरमानूश है, एक अर्मेनियाई-अमेरिकी लड़की जो अपने परिवार के अतीत और अपनी जड़ों को समझने के लिए इस्तांबुल पहुँचती है। इन दोनों लड़कियों के ज़रिये शफ़क़ स्मृति और विस्मृति, इतिहास और उसकी चुप्पियों के सवाल उठाती हैं।

उपन्यास के केंद्र में स्त्रियाँ हैं। एक ही परिवार में कई पीढ़ियों की औरतें हैं, जिनके स्वभाव, जीवन-दृष्टि और मान्यताएँ अलग-अलग हैं। दीनी आस्थाओं और परंपराओं से लेकर आधुनिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तक, उनके नज़रियों में पर्याप्त भिन्नता है। यह उपन्यास की सांस्कृतिक रूपरेखा के प्रति एक तरह का एहतराम ही है कि बहुत सारे ऐसे तत्त्व और किरदार, जिन्हें अंधविश्वास या bad faith कहकर रद्द किया जा सकता है, उपन्यास में बिना किसी पूर्वाग्रही राय और क्षेपक के आते हैं।

उपन्यास में शफ़क़ के किरदार रसोई, सड़कों, क्लब और बैठक के दृश्यों में होने वाले संवादों के माध्यम से अस्मिता और राष्ट्रीयता के सवालों को कथा के केंद्र में लाते हैं। मसलन, परिवार क्या याद रखते हैं, क्या छिपाते हैं, इतिहास के किन संस्करणों को उनके बीच मान्यता मिलती है और किन विषयों को सार्वजनिक बातचीत से बाहर कर दिया जाता है।

“I don't know much about those things,” Mustafa had replied, shutting her out with a genteel but equally stiff manner. “It's all history, you should talk to historian.”

‘The Bastard of Istanbul’, p. 104

सामूहिक विस्मृति का एक पहलू यह है कि घटनाएँ परिवारों की कहानियों, खान-पान, नामों और रोज़मर्रा के जीवन में बची रहती हैं, लेकिन उनके ऐतिहासिक संदर्भ को स्वीकार नहीं किया जाता। स्मृति जीवन में मौजूद रहती है, लेकिन उसे पहचानने और उसका अर्थ निकालने की गुंजाइश समाप्त हो जाती है। राष्ट्रीय पहचान के निर्माण में यह विस्मृति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अतीत का सुविधाजनक चुनाव होता है। कुछ प्रसंग गौरव का हिस्सा बनते हैं और अन्य पर चुप्पी साधना मामूल हो जाता है। नई पीढ़ियाँ इसी चयनित और तैयार स्मृति के भीतर बड़ी होती हैं। यह विस्मृति की विडंबना है कि वह रोज़मर्रा में रिसती रहती है और उसकी हूक अनजान भय या पीड़ा की तरह सालती रहती है।

उपन्यास की एक कमज़ोरी इसका अनावश्यक फैलाव है। शफ़क़ अपने किरदारों और उनके संसार से इतनी सारी बातें कहलवाना चाहती हैं कि उपन्यास में पंख ही पंख मिलते हैं, उड़ान कम। मूल कथा और उसकी विडंबना के लिए कई ढीले और बोझिल विवरण आरोपित किए गए हैं, जो कभी-कभी टेक्स्ट का स्वाभाविक हिस्सा नहीं लगते। इसके बावजूद, उपन्यास की मूल विषयवस्तु और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि इसे पढ़ते रहने की वजह देती हैं।

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‘The Architect’s Apprentice’ : स्थापत्य, सत्ता और स्मृति

उपन्यास को समर्पित करते हुए अलिफ़ शफ़क़ लिखती हैं : “For apprentices everywhere: no one told us that love was the hardest craft to master.”

यह अकेला वाक्य पूरे उपन्यास की बुनियाद की तरह पढ़ा जा सकता है।

अलिफ़ शफ़क़ ने सोलहवीं सदी के उस्मानिया साम्राज्य में शाही स्थापत्य की कथा के ज़रिये ऐतिहासिक शोध और कल्पनाशीलता का नायाब परिचय दिया है। उपन्यास का फैलाव इस्तांबुल के शाही दरबार और निर्माणस्थलों से लेकर रोम और आगरा तक है। यह मूलतः एक प्रेम-विरह कथा है। इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में सुल्तान सुलेमान, मे'मार सिनान और उनके दौर की स्थापत्य-उपलब्धियाँ हैं। कथा के केंद्र में जहान और उसका सफ़ेद हाथी ‘छोटा’ है। जहान मे'मार सिनान का शागिर्द है। शफ़क़ उस्मानिया साम्राज्य और तत्कालीन यूरोप के ऐतिहासिक स्थापत्यकारों, वास्तविक इमारतों और कल्पित पात्रों को एक साथ रखकर साम्राज्य के इतिहास को निजी जीवन, कला और महत्त्वाकांक्षा की कहानी में बुनती हैं।

इस्तांबुल की स्थापत्य विरासत इस उपन्यास में ख़ास जगह घेरती है। सुलेमानिया मस्जिद, शहज़ादे मस्जिद और हागिया सोफ़िया [जिसे अब अया सोफ़्या कहा जाता है] जैसी इमारतों के ज़रिये शफ़क़ मे'मार सिनान की प्रतिभा, तकनीकी दक्षता, सौंदर्यबोध और धार्मिक निष्ठा का ख़ाका प्रस्तुत करती हैं। उनसे संबंधित विवरण इस्लामी स्थापत्य के उन उसूलों की ओर इशारा करते हैं, जिनमें कलाकार अपने हुनर के माध्यम से एक बड़े उद्देश्य का निमित्त बन जाता है। उदाहरण देखिए :

“We are not destroying the buildings, son. We are destroying our desire to possess them. Only God is the owner. Of the stone and of the skill.”

‘The Architect’s Apprentice’, p. 97

अलिफ़ शफ़क़ उस्मानिया साम्राज्य की दास-प्रथा, देवशिर्मे व्यवस्था और मे'मार सिनान की विवादित अर्मेनियाई या यूनानी पहचान जैसे असहज प्रश्नों को भी कथा में रखती हैं। तक़ीउद्दीन मुहम्मद इब्न मारूफ़ की वेधशाला (observatory) के प्रसंग में वह दिखाती हैं कि शेख़-उल-इस्लाम क़ादीज़ादा, अहमद शम्सुद्दीन अफ़ंदी और उनके समर्थकों ने प्लेग तथा ईरान (सफ़वी) के विरुद्ध युद्ध के घटनाक्रम को वेधशाला के ख़िलाफ़ तर्क के रूप में इस्तेमाल किया। दीनी प्रतिष्ठान और दरबारी प्रतिद्वंद्विता की इस राजनीति में वैज्ञानिक तक़ीउद्दीन की वेधशाला को 1580 में नष्ट कर दिया गया।

उपन्यास में मे'मार सिनान के दूसरे शागिर्दों की दुनिया भी है, जहाँ स्थापत्य का हुनर दरबारी प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, वफ़ादारी और महत्त्वाकांक्षा से उलझता रहता है। जहान और उसके साथियों की रोम यात्रा तथा माइकलएंजेलो से जुड़ा प्रसंग उपन्यास को पुनर्जागरणकालीन यूरोप की कला और स्थापत्य की दुनिया के पास तक ले जाता है। सेंट पीटर्स बेसिलिका और उसके निर्माण से जुड़ी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बीच शफ़क़ दो अलग सांस्कृतिक संसारों को एक कथा में ले आती हैं। वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्तियों के साथ काल्पनिक पात्रों को रखकर वह कला, स्थापत्य और उनके पारस्परिक प्रभावों की कथा कहती हैं। इस विस्तार में शोध की भूमिका स्पष्ट है, लेकिन कुछ विवरण एक रहस्यमयी-सी मौजूदगी रखते हैं। मसलन :

“Jahan thought that there were two main types of temple built by humankind: those that aspired to reach out to the skies and those that wished to bring the skies closer down to the ground. On occasion, there was a third: those that did both. Such was San Pietro.”

‘The Architect’s Apprentice’, p. 417

कहानी का एक सिरा आगरा और शाहजहाँ के दौर से भी जुड़ता है। सत्रहवीं सदी में वृद्ध जहान अब आगरा में है और ताजमहल के निर्माण का समय आ पहुँचा है। इस प्रसंग से उपन्यास की स्थापत्य-दृष्टि एक नए भूगोल तक पहुँचती है। सिनान की स्थापत्य-विरासत और मुग़ल दरबार में शाहजहाँ की स्मारकीय महत्त्वाकांक्षा अलग ऐतिहासिक संदर्भों से आती हैं, फिर भी दोनों में स्थापत्य शाही सत्ता, दीनी-आस्था और स्मृति को स्थायी रूप देने का माध्यम बनता है।

अलिफ़ शफ़क़ ने मे'मार सिनान की विरासत को एक काल्पनिक शागिर्द के जीवन से जोड़कर इतिहास को देखने का एक दिलचस्प रास्ता बनाया है। सुलेमानिया मस्जिद से सेंट पीटर्स बेसिलिका और ताजमहल तक फैली इस कथा में इमारतें अपने समय की आकांक्षाओं, संघर्षों और स्मृतियों को सँजोने वाली संरचनाएँ बन जाती हैं।

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