हमने चीख़ को ही रिपोर्टिंग समझ लिया
रोहित अनिल त्रिपाठी
12 अगस्त 2026
आज 12 अगस्त है। छह साल पहले कांग्रेस के प्रवक्ता राजीव त्यागी ने न्यूज़ डिबेट के दौरान आए हार्ट अटैक में अपनी जान गँवा दी थी। कम से कम उनके डॉक्टर ने तो यही कहा था। हर साल उनकी याद आती है। इस बार याद करते हुए एक दूसरी बात भी याद आ गई।
आज ही मैं अपने एक दोस्त से कह रहा था कि मैं रिपोर्टिंग सही से नहीं कर पाता। एक तय समय के बाद टीवी बन जाता हूँ। आवाज़ बदल जाती है। सवालों में एक अजीब-सी जल्दबाज़ी आ जाती है। सामने वाला अपनी बात कह रहा होता है और दिमाग़ अगले सवाल पर पहुँच चुका होता है। कभी-कभी लगता है कि सामने वाले से जवाब नहीं चाहिए, बस अपनी मौजूदगी दर्ज करानी है।
मैं सोच रहा था, ऐसा क्यों होता है? शायद इसलिए कि हम लोग टीवी के उस दौर को देखते और सुनते हुए बड़े हुए हैं, जिसमें रिपोर्टर हर घटना के बीच खड़ा होकर कहता था—“आप देख सकते हैं मेरे पीछे...” हमने रिपोर्टिंग को अक्सर रिपोर्टर के साथ जोड़कर देखा। रिपोर्टर जहाँ खड़ा है, वही कहानी का केंद्र है। उसके पीछे भीड़ होनी चाहिए। पुलिस होनी चाहिए। धुआँ होना चाहिए। नारे होने चाहिए। कुछ ऐसा होना चाहिए जिसे देखकर लगे कि हाँ यहाँ ख़बर हो रही है।
शांत खड़ा रिपोर्टर शायद रिपोर्टर नहीं लगता था। हमने अँग्रेज़ी की वह ‘विनम्र’ रिपोर्टिंग भी बहुत कम देखी, जिसमें रिपोर्टर को हर वक़्त यह साबित करने की ज़रूरत नहीं होती कि वह रिपोर्टर है। हमारी चिंता कुछ और थी। बिजली थी जो आती ही नहीं थी। पानी था जिसके लिए लाइन लगती थी। सड़क थी जो सड़क कम और गड्ढा ज़्यादा थी। सरकारी दफ़्तर था, जहाँ एक छोटे-से काम के लिए कई चक्कर लगाने पड़ते थे... और टीवी था जो इन सबको चीख़-चीख़कर दिखाता था। शायद इसलिए हमने चीख़ को ही रिपोर्टिंग समझ लिया। जितनी तेज़ आवाज़, उतनी बड़ी खबर। जितना आक्रामक सवाल, उतना अच्छा पत्रकार। धीरे बोलने वाला पत्रकार कमज़ोर। सवाल पूछकर चुप हो जाने वाला पत्रकार शायद अनजान और सामने वाले की बात पूरी सुन लेने वाला? पता नहीं, उसके लिए हमारे पास कोई टीवी भाषा ही नहीं थी। बाद में Noe Zavaleta का एक लेख पढ़ा। शीर्षक था—“No, you are NOT the story.”
बात बहुत साधारण है, लेकिन पत्रकारिता में शायद सबसे मुश्किल बात भी यही है।
आप ख़बर नहीं हैं। आप उस आदमी की कहानी नहीं हैं, जिसका घर टूट गया। आप उस छात्र की कहानी नहीं हैं, जिसने परीक्षा के लिए दो साल लगाए। आप उस किसान की कहानी नहीं हैं, जिसकी फ़सल बर्बाद हो गई। आप वहाँ इसलिए हैं कि उनकी कहानी लोगों तक पहुँचे। लेकिन यह बात समझना इतना आसान नहीं है। पत्रकारिता करते-करते कहीं न कहीं पत्रकार ख़ुद कहानी में घुसने लगता है। कैमरे के सामने खड़े होकर हमें लगने लगता है कि हमारी आवाज़ भी ख़बर का हिस्सा है। हमारे सवाल का अंदाज़ ख़बर का हिस्सा है। हमारी नाराज़गी ख़बर का हिस्सा है। कभी-कभी तो हमारा चेहरा भी ख़बर से बड़ा हो जाता है... और शायद यहीं से रिपोर्टिंग और प्रदर्शन के बीच की दूरी कम होने लगती है।
रिपोर्टर का काम अपनी राय साबित करना नहीं है। कम से कम हर वक़्त तो नहीं। उसका काम यह पता करना है कि हुआ क्या, क्यों हुआ, किसके साथ हुआ, किसने कहा, उसके पास इसका सबूत क्या है... और जो व्यक्ति सामने बैठा है, वह क्या कह रहा है।
यह आख़िरी बात सबसे मुश्किल है—सुनना... क्योंकि सुनने के लिए आपको थोड़ी देर के लिए ख़ुद को पीछे करना पड़ता है। Noe Zavaleta ने पत्रकार की सबसे बड़ी अहंकार भरी ग़लती इसी को माना है—“the most arrogant thing a journalist can do is not to listen.” बहरहाल, शायद हम इसलिए चिल्लाते हैं; क्योंकि हमें डर होता है कि हमारी बात कहीं दब न जाए। लेकिन पत्रकार की बात दबनी भी चाहिए। कई बार... क्योंकि ख़बर पत्रकार की बात नहीं है। ख़बर उस आदमी की बात है, जिसके पास कैमरा नहीं है, जिसके पास अख़बार नहीं है, जिसके पास स्टूडियो नहीं है, जिसके पास अपनी बात कहने के लिए बस पाँच मिनट हैं और उन पाँच मिनटों में भी वह सोच रहा है कि कहीं वह ग़लत तो नहीं बोल रहा। वहाँ पत्रकार का काम अपनी आवाज़ ऊँची करना नहीं है। अपना माइक उसकी तरफ़ करना है। रिपोर्टिंग में हर सवाल के बाद तुरंत दूसरा सवाल ज़रूरी नहीं। कभी-कभी चुप रहना भी सवाल होता है। कभी सामने वाला कुछ कहकर रुक जाए, तो उसे भरने के लिए अपनी आवाज़ मत डालिए। उस ख़ामोशी को रहने दीजिए। हो सकता है कि अगली बात वही हो, जिसके लिए आप वहाँ गए थे।
इन दिनों सिद्धांत मोहन रोज़ लिख रहे हैं—“आप खबर नहीं हैं।” उनके पोस्ट पढ़ते हुए मुझे बार-बार Noe Zavaleta याद आ रहे हैं। शायद इसलिए भी कि कुछ बातें हम पढ़कर नहीं, बहुत देर बाद अपनी ग़लतियाँ करते हुए समझते हैं। मुझे लगता है कि मैं भी अभी उसी सीखने के दौर में हूँ। किसी रिपोर्ट में अपनी आवाज़ कम करना। सामने वाले को पूरा बोलने देना। हर ख़ामोशी को अपनी आवाज़ से न भरना। कैमरे के सामने खड़े होकर यह न भूलना कि कैमरा मेरे लिए नहीं, कहानी के लिए है।
...और शायद सबसे मुश्किल बात—यह मान लेना कि पत्रकार को कहानी में सबसे आगे खड़े होने की ज़रूरत नहीं।
राजीव त्यागी को याद करते हुए टीवी की उस दुनिया के बारे में सोचना स्वाभाविक है, जहाँ बहस ख़त्म नहीं होती। जहाँ हर बात का जवाब तुरंत चाहिए। जहाँ चुप्पी को हार समझ लिया जाता है। लेकिन ज़िंदगी टीवी डिबेट नहीं है। हर बात का जवाब तुरंत नहीं होता। हर कहानी में दो पक्ष नहीं होते। हर आदमी को क्रॉस-एग्ज़ामिन करने की ज़रूरत नहीं होती और हर रिपोर्टर को कहानी के बीच में खड़े होने की ज़रूरत नहीं होती। कभी-कभी सबसे अच्छी रिपोर्टिंग वही होती है, जिसमें रिपोर्टर को याद ही नहीं किया जाता। लोगों को कहानी याद रहती है, चेहरे याद रहते हैं, आवाज़ें याद रहती हैं, और पत्रकार? वह बस वहाँ था। उसने सुना। उसने देखा। उसने ठीक-ठीक बताया... और फिर पीछे हट गया।
राजीव त्यागी की याद के साथ आज बस इतना ही सोच रहा हूँ कि पत्रकारिता में बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ भूल भी गया। अब शायद कुछ चीज़ें फिर से सीखनी हैं। फिर से सीखना है कि ख़बर मैं नहीं हूँ।
•••
रोहित अनिल त्रिपाठी को और पढ़िए : एक नीट अभ्यर्थी और उम्मीद का न्यूनतम बैलेंस | नशे से ‘नशा मुक्ति केंद्र’ तक का सफ़र | मैं वीगन क्यों नहीं हूँ!
संबंधित विषय
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट