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नशे से ‘नशा मुक्ति केंद्र’ तक का सफ़र

नशे से ‘नशा मुक्ति केंद्र’ तक का सफ़र सिर्फ़ दूरी का नहीं होता; यह एक ऐसे अँधेरे से गुज़रने जैसा होता है, जहाँ हर क़दम पर आदमी ख़ुद से थोड़ा-थोड़ा टूटता है... और मैं अब इस झूठ के साथ नहीं जीना चाहता कि यह सब ‘इलाज’ है।

छह महीने… सुनने में छोटा लगता है, लेकिन जीने में ये एक-एक दिन खिंचकर साल जैसा हो जाता है। यहाँ वक़्त घड़ी से नहीं, तकलीफ़ से मापा जाता है। सुबह कब होती है और रात कब ख़त्म, इसका कोई मतलब नहीं रहता। बस एक रूटीन है जिसमें इंसान नहीं, आदतें चलती हैं।

सुबह की शुरुआत किसी उम्मीद से नहीं, एक आदेश से होती है—उठो, लाइन में लगो, काम करो... कोई यह नहीं पूछता कि रात कैसी गुज़री, नींद आई या नहीं, दिमाग़ में क्या चल रहा है! यहाँ सवालों की इजाज़त नहीं होती, सिर्फ़ कहे गए का पालन करना होता है।

रसोई में जो मिलता है; वह खाना कम, सज़ा ज़्यादा लगता है। हाथ से फोड़े हुए आलू, उबली हुई सोयाबीन—जैसे स्वाद से कोई दुश्मनी हो। हर निवाला यह याद दिलाता है कि तुम यहाँ क्यों हो, और शायद यह भी कि तुम्हें यहाँ रहकर क्या सहना है। कई बार खाना सिर्फ़ पेट भरने का ज़रिया नहीं, बल्कि यह जताने का तरीक़ा बन जाता है कि तुम्हारी पसंद-नापसंद की कोई क़ीमत नहीं।

लेकिन सबसे मुश्किल हिस्सा खाना नहीं, वह ख़ामोशी है जो हर जगह फैली रहती है। उस ख़ामोशी में कई कहानियाँ दबकर रह जाती हैं। कोई अपनी ज़मीन बेचकर आया है—यह उम्मीद लेकर कि यहाँ ठीक हो जाएगा। किसी ने साइकिल चुराई, उसे बेचा और फिर यहाँ लाकर छोड़ दिया गया... जैसे वह इंसान नहीं, कोई ग़लती हो जिसे बंद कर देना है।

हर चेहरा एक कहानी है, लेकिन यहाँ किसी को सुनने की फ़ुर्सत नहीं। सब अपने-अपने दर्द के साथ बैठे हैं और उस दर्द को छिपाने की ट्रेनिंग दी जा रही है।

इसके बाद आती है मार-पीट। यह वह हिस्सा है, जिसके बारे में बाहर कम लोग जानते हैं और जो जानते हैं, वे अक्सर मानते नहीं। यहाँ सुधार के नाम पर सख़्ती नहीं, कई बार क्रूरता होती है। अगर तुम नियम तोड़ो या कभी बस कमज़ोर पड़ जाओ तो तुम्हें ‘सीख’ दी जाती है।

यह सीख शरीर पर पड़ती है, लेकिन असर दिमाग़ पर होता है। हर थप्पड़, हर धक्का यह एहसास कराता है कि तुम्हारी इज़्ज़त अब तुम्हारे हाथ में नहीं रही।

मैंने लोगों को टूटते देखा है। ऐसे लोग, जो बाहर शायद मज़बूत थे, यहाँ आकर चुप हो गए। उनकी आँखों में जो आग थी, वह बुझ गई... और जो बचा, वह सिर्फ़ एक ख़ालीपन था।

इस सबके बीच मैंने अपने अंदर भी एक बदलाव देखा—सबसे ख़तरनाक बदलाव। मेरे सपने छोटे हो गए। पहले मैं दूर तक सोचता था। बड़ी-बड़ी चीज़ों की कल्पना करता था। अपनी ज़िंदगी को एक खुले आसमान की तरह देखता था, जहाँ कुछ भी संभव हो सकता है। लेकिन अब... मेरी आँखें वैसा कुछ देख ही नहीं पातीं।

अब सपने भी इस जगह की दीवारों जैसे हो गए हैं—सीमित, बंद, थके हुए।

पहले जहाँ मैं ख़ुद को आगे बढ़ते हुए देखता था, अब बस यह सोचकर रह जाता हूँ कि दिन कैसे कटेगा! पहले जहाँ उम्मीदें थीं, अब सिर्फ़ एक तरह की आदत बची है; जैसे ज़िंदगी को बस निभाना है, जीना नहीं।

कभी-कभी लगता है कि यहाँ इलाज कम, एक ढाँचा ज़्यादा है, जहाँ सबको एक ही तरीक़े से ढालने की कोशिश होती है। लेकिन हर इंसान एक जैसा नहीं होता। हर नशा, एक जैसा नहीं होता और हर दर्द का इलाज भी एक जैसा नहीं हो सकता।

मुझे याद है एक आदमी, शायद चालीस-पैंतालीस साल का होगा। वह हर शाम चुपचाप कोने में बैठ जाता था। किसी से बात नहीं करता था। एक दिन उसने बस इतना कहा, “मैं अपनी ज़मीन बेचकर आया हूँ। सोचा था यहाँ आकर ठीक हो जाऊँगा... लेकिन यहाँ आकर मैं ख़ुद को और खोता जा रहा हूँ।”

उसकी आँखों में जो ख़ालीपन था, वह डराता था, क्योंकि वह सिर्फ़ उसका नहीं था—वह यहाँ कई लोगों की सच्चाई थी।

और फिर मैं ख़ुद को देखता हूँ। सोचता हूँ कि क्या मैं भी धीरे-धीरे वैसा ही हो रहा हूँ? क्या मैं भी इस सिस्टम का हिस्सा बनता जा रहा हूँ; जहाँ दर्द को दबाना सिखाया जाता है, समझना नहीं?

मैं मानता हूँ कि नशा ग़लत है। यह इंसान को तोड़ देता है और रिश्तों को ख़त्म कर देता है। लेकिन क्या उसका इलाज यह है कि इंसान को और तोड़ा जाए?

यहाँ कई लोग ऐसे हैं जिन्हें मदद चाहिए थी, लेकिन उन्हें सज़ा मिली। जिन्हें समझ की ज़रूरत थी, उन्हें आदेश दिए गए। जिन्हें सहारा चाहिए था, उन्हें अकेला छोड़ दिया गया।

छह महीने कम नहीं होते। इन छह महीनों में इंसान बहुत कुछ खो सकता है—अपनी पहचान, अपनी आवाज़, अपनी उम्मीद... और अपने सपनों का आकार भी।

मैं अब और यह झूठ नहीं जी सकता कि यह सब कुछ मेरे भले के लिए है। अगर इलाज का मतलब यह है कि इंसान को उसकी ही नज़रों में छोटा कर दिया जाए, तो यह इलाज नहीं... एक और तरह का नशा है—जहाँ इंसान धीरे-धीरे ख़ुद से दूर होता जाता है।

मैं ठीक होना चाहता हूँ। मैं यह सच में चाहता हूँ। लेकिन ठीक होने का मतलब यह नहीं हो सकता कि मैं अपने साथ हो रही हर ग़लत चीज़ को सही मान लूँ।

नशे से निकलने का रास्ता मुश्किल है, यह मैं जानता हूँ। लेकिन उस रास्ते पर चलने के लिए इंसान को ताक़त चाहिए, इज़्ज़त चाहिए और सबसे ज़्यादा—सच चाहिए।

मैं अब उसी सच के साथ खड़ा होना चाहता हूँ, क्योंकि झूठ के सहारे कोई भी सफ़र बहुत दूर तक नहीं जाता—चाहे वह नशे का हो या ‘नशा मुक्ति केंद्र’ का।

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