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एक नीट अभ्यर्थी और उम्मीद का न्यूनतम बैलेंस

नीट की परीक्षा देने गए मेरे एक भाई के बाल बड़े थे। बाहर खड़े ज़िम्मेदारों ने उसके बालों में हाथ डालकर यह जाँच की कि कहीं उसमें कोई पुर्ज़ी तो नहीं है। मुझे इस सख़्ती पर ऐतबार भी आया और ग़ुस्सा भी। भरोसा हुआ कि सब लोग शायद इसी तरह की स्क्रीनिंग से गुज़र रहे होंगे। ग़ुस्सा इसलिए कि मैं उसे जानता था, जिसे इस हद तक जाँचा गया। तीन साल से वह केवल मेहनत और अनुशासन के दम पर यह उम्मीद कर रहा है कि अबकी बार पक्का हो जाएगा।

एक बार उसके 600 से ज़्यादा नंबर आए, तो पेपर लीक हो गया। एक बार घर में किसी की मृत्यु और उससे पहले किसी की शादी ने उसका अनुशासन हिला दिया, जिसका असर परिणामों में साफ़ दिखाई दिया। इस बार जब वह इसी महीने की तीन तारीख़ को पेपर देकर लौटा, तो मैंने याद करने की कोशिश की कि हमने आख़िरी बार कब साथ में कुछ ऐसा खाया था जिसकी इच्छा जीभ को कभी-कभी होती है। तय हुआ कि अगले दिन ऐसा ही कोई आयोजन होगा।

लेकिन रात में दो घटनाएँ हुईं। पहली, ऐसी छिटपुट ख़बरें चलने लगीं कि पेपर लीक हो चुका है। दूसरी, कि उसी रात मेरे घर का एक सदस्य हमेशा-हमेशा के लिए कम हो गया।

बाइक चलाकर जब मैं उस ओर बढ़ रहा था, तो किसी के मरने के दुख के बीच एक प्रतिशत ही सही, यह सुकून था कि यह घटना उसकी परीक्षा के पहले नहीं हुई। इंसान एक ही समय में अपने भीतर कितनी तरह की उलटबाँसियाँ रख सकता है, इसका एहसास मुझे पहली बार नहीं हुआ था। लेकिन इस बार मुझे हैरत ज़रूर हुई।

पहली बार ऐसा तब हुआ था जब पिता की मौत के तीन दिन बाद ही मैं एक व्यक्ति से काम के सिलसिले में बात कर रहा था और उसे यक़ीन दिला रहा था कि हाँ, मैं काम करके दे दूँगा। शायद इसलिए कि भले मुझे एहसास था कि मेरे पिता नहीं रहे, लेकिन इसके साथ ही यह एहसास भी डराए हुए था कि मेरे पास पैसे भी नहीं रहे।

बहरहाल, बात शुरू नीट से हुई थी।

मैंने अपने होश सँभालने से लेकर अब तक जो बात सबसे ज़्यादा सुनी है, वह यह कि औसत व्यक्ति भी अनुशासन के साथ सफल हो सकता है, लेकिन हज़ारों तरह के गुण और प्रतिभाएँ रखने वाला व्यक्ति अनुशासन के बिना तबाह भी हो सकता है। क्रिकेटर पृथ्वी शॉ इसका उपयुक्त उदाहरण हैं। इसलिए मुझे अनुशासन पर यक़ीन है।

लेकिन अनुशासन तो उनके पास भी है, जो हज़ारों तरह के जतन करके परीक्षा से पहले ही पेपर निकाल देने का हुनर रखते हैं। उनके पास हुनर है, अनुशासन है और कंसिस्टेंसी भी। फिर एक सिस्टम भी है, जो उनके समर्थन में अंत तक खड़ा दिखाई देता है।

ऐसे में बहुत मुश्किल लगता है यह विश्वास बनाए रखना कि मेरे घर के एक बच्चे का अनुशासन और उसकी मेहनत, इन पेपर-लीक विशेषज्ञों के अनुशासन और जतन को हरा पाएँगे। लेकिन बग़ैर यक़ीन और उम्मीद के कैसे जिया जाएगा?

फिर वही उम्मीद, जहाँ ‘हाँ’ से ज़्यादा ‘ना’ ने आपको बार-बार तोड़ा है। जहाँ हिम्मत पर डर भारी है। तो फिर आप क्या करेंगे? कुछ कर सकेंगे क्या? शायद नहीं।

लेकिन मैं यह भी स्वीकार करूँगा कि यह लाचारी भी विशेषाधिकार प्राप्त लोगों की लाचारी है।

इससे एक सीढ़ी नीचे जाने पर मुझे वह व्यक्ति दिखाई देता है, जिसने पेट्रोल-पंप पर मेरे साथ 40 मिनट तक लाइन लगाई और फिर 120 रुपये का पेट्रोल लिया। पंप पर तेल भरने वाला उसे कोस रहा था कि तुमने अपने 40 मिनट सिर्फ़ इसलिए बर्बाद किए कि तुम्हें लगभग एक लीटर तेल लेना था? अरे, बाकियों को देखो। अगर वे वक़्त बर्बाद कर रहे हैं तो टैंक फुल कराने के लिए।

कल तुम फिर आओगे। फिर वही प्रक्रिया दोहराओगे। यह बुद्धिमानी तो नहीं ही है।

लेकिन मेरा ऐसा मानना नहीं था। मैं यह मानता हूँ कि उस व्यक्ति ने अपनी औक़ात भर की बुद्धि तो लगा ही ली थी। वह, जो अमूमन अपनी बाइक में 50 रुपये का पेट्रोल भराता होगा, उसने 120 का भराया। 70 रुपये का अतिरिक्त।

वह घर जाकर संतोष से सोएगा, क्योंकि उसके पास 70 रुपये का अतिरिक्त ईंधन है। हो सकता है उसे कल पेट्रोल-पंप न आना पड़े। लेकिन यह दुनिया उसकी जेब को, उसके निर्णय को अपनी नज़र से देख रही है। और उन नज़रों में वह होशियार नहीं, मूर्ख है।

ये सारे प्रसंग एक-दूसरे से कितने अलग-अलग हैं। ज़मीन पर ही घटते हुए भी एक-दूसरे से अनजान। लेकिन ये हैं तो।

अब देखिए, मैं यह लिख रहा हूँ और अभी-अभी बैंक का संदेश आया है कि खाते में न्यूनतम शेष राशि 10,000 रखिए, या फिर कहीं से वेतन आने का जुगाड़ कीजिए। चूँकि मेरा खाता वेतनभोगियों वाला खाता है, इसलिए यह उपक्रम मुझे करना पड़ेगा। वरना बैंक मुझसे मेरी ग़रीबी का जुर्माना वसूलेगा या फिर मेरे बेरोज़गार होने का।

इन सबसे संघर्ष करते हुए लोग बड़ी आसानी से अपनी पीड़ाओं का विमर्श टाल चुके हैं। अब देखिए, क़ायदे से तो मुझे इन सब पर ही बात करनी चाहिए। रोज़ करनी चाहिए। लेकिन मैं अभी-अभी X (formerly known as Twitter) पर यह लिखकर आया हूँ कि नई-नई बनी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को क्यों संदेह की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

क़ायदे से मुझे कहना चाहिए कि मैंने अपने घर के एक आयोजन के लिए 2200 रुपये का सिलेंडर ब्लैक में ख़रीदा, बल्कि यह कहूँ कि मुझे ख़रीदना पड़ा। लेकिन सोशल मीडिया पर मैं इस बात से निराश हूँ कि सौरभ द्विवेदी ने ‘कर्त्तव्य’ नाम की फ़िल्म में बढ़िया अभिनय न करके उन नौजवानों को नीचा दिखाया है, जो अद्भुत अभिनय-कला लिए बंबई की लोकल ट्रेनों में मारे-मारे फिर रहे हैं।

मेरी एक दोस्त ने कल मुझसे ठीक ही कहा कि तुम पहले यह तय कर लो कि तुम्हें करना क्या है! कभी तुम्हें दाल-चावल और भिंडी की सब्ज़ी खाकर दुपहर में सोना अच्छा लगता है और कभी तुम कहते हो कि यह जीवन तो देश के करोड़ों लोग जी रहे हैं, मुझे यह नहीं जीना।

मैं सोचता हूँ कि मुझे सचमुच नहीं पता कि मुझे करना क्या है! शायद किसी को नहीं पता कि उसे करना क्या है!—न इस देश के प्रधानमंत्री को, जिन्होंने वर्क फ़्रॉम होम की अपील करके रोम जाने का फ़ैसला लिया। न एनटीए के अध्यक्ष को, जिन्होंने यह कह दिया कि कुछ प्रश्न परीक्षा से पहले बाहर आ गए थे, इसका मतलब यह नहीं कि समूचा पेपर लीक हो गया था। यह वैसा ही था जैसे कोई प्लंबर पाइप के एक छेद को ‘लीक’ मानने से इनकार कर दे।

इन सब बातों पर दिमाग़ी कसरत करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि हमेशा बुद्धिमान प्लंबर चुनना चाहिए। किसी भी एक परीक्षा की तैयारी की जाए, लेकिन साथ में बी.ए. ज़रूर करना चाहिए, भले ही वह ‘प्लेन’ बी.ए. हो।

और एक बहुत ज़रूरी बात, अगर पेट्रोल पंप पर चिलचिलाती गर्मी में 40 मिनट खड़े रहने भर का धैर्य हो, तो टैंक फ़ुल कराने भर का क़र्ज़ ले लेना चाहिए, ताकि कोई आप पर हँस न सके और आपको केवल इस बात की चिंता हो कि किसी का क़र्ज़ चुकाना है, न कि इस बात की कि कल फिर पेट्रोल-पंप की लाइन में लगना पड़ेगा।

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