हमें खिड़कियों की ज़रूरत है
प्रवीण कुमार
26 फरवरी 2025

खिड़कियों के बाहर कई तरह के रंग होते हैं, धरती के भी-आसमान के भी। पर खिड़कियाँ अपने रंगों से नहीं अपने हवादार होने से जानी जाती हैं। वे इतनी बड़ी नहीं होतीं कि दरवाज़ा हो जाएँ, न इतनी छोटी कि आप झरोखा या रोशनदान कहें। खिड़कियों के आकार का कोई रंग नहीं होता, बस आकार होता है, एक हवादार आकार। कई बार सोचता हूँ कि ज़िंदगी को हवादार खिड़की की तरह होना चाहिए, जिससे हम आसमान के बदलते रंगों को देख सकें। धरती के चौकोरपने को नाप सकें। हवा को महसूस कर सकें। इस देश को दरवाज़ों की नहीं खिड़कियों की सख़्त ज़रूरत है। आप खिड़की से जब भी बाहर की ओर देखते हैं—तब दुनिया कुछ ज़्यादा ही हसीन दिखती है और जब आप बाहर से खिड़की को देखते हैं; तब खिड़की भी कुछ ज़्यादा मुग्धकारी दिखती है, बिल्कुल ज़िंदगी की तरह।
कई बार सोचता हूँ कि हमारे सौंदर्यबोध का क्या होता यदि खिड़कियाँ न होतीं? बिना खिड़कियों के दरवाज़े नहीं शोभते, न ही कमरे में जान आती है। हवाएँ तो दरवाज़े से भी आ सकती हैं, कुछ दृश्य भी देखे जा सकते हैं, फिर भी कुछ-कुछ रह जाता है कमरे में टीस की तरह; बिना खिड़कीवाले कमरे से कभी पूछकर देखें!
दरवाज़ा तक अधूरा लगता है खिड़कियों के बिना। खिड़की से कच्चे आमों को पेड़ पर लटका हुआ देखें या उस पेड़ पर छुपकर गाते हुए कोयल की आवाज़ को ढूँढ़ें या फिर उसकी भीगी डाली पर से फड़फड़ाकर उड़ते हुए परिंदे को अनंत में लीन होते हुए देखें; यह देखना किसी तिलिस्मी अनुभूति से बिल्कुल कम नहीं, एकदम जादुई!
अरसा गुज़र जाता है शहरों में, हम बिना आसमान देखे सो जाते हैं; चाँद को कब चाँदनी में नहाते हुए देखा, याद नहीं। धरती और समय का घूर्णन शहरों में इतना तेज़ है कि उसके छूट जाने के भय से हम उसी में ख़ुद को लपेटे रहते हैं। ऐसे में बस खिड़कियाँ ही हैं जो कभी-कभी हमें बचा लेती हैं। कुछ दिखा देती हैं। खिड़कियाँ हमारे होने का एहसास कराती हैं, कुछ देर सुस्ताते हुए हम उस हवादार आकार से दुनिया देखते हैं, दिमाग़ के फेफड़े में ताज़ी हवा भर जाती है। क़िस्मतवाले हैं वे जिनके पास एक खिड़की है, किताबें न भी हों, खिड़की ज़रूर हो। हालाँकि बड़े शहरों में खिड़की की कामना किसी अय्याशी से कम नहीं, जहाँ बहुसंख्यक आबादी अँधेरे बंद कमरे में ज़िंदगी गुज़ारती है, फिर भी एक खिड़की का सपना पालना कोई पाप नहीं। खिड़कियाँ मनुष्य की रचनात्मक प्यास की तरह होती हैं, वहीं से दृश्यों का सोता बहता रहता है। बस आँखें चाहिए, तीसरी आँख। जिनके पास ये दोनों हैं उन्होंने खिड़कियों से एक दुनिया बनाईं, बिना ईंट-गारे के।
अंतिम दिनों में शाहजहाँ मुमताज़ को खिड़की से ही झाँका करता था, आप और हम उस मुमताज़ को ताजमहल कहते हैं। ताज को जितना खिड़की के सहारे समझा जा सकता है, उतना उसको भीतर से नहीं। आलीशान महलों की राज-बैठकों को उन खिड़कियों से देखने पर—जहाँ से रानियाँ और राजकुमारियाँ बैठकों को देखती थीं—औरत की निगाह हम पा लेते हैं, वहाँ न जाने कितनी सिसकियाँ और सपने भीतर ही भीतर जज़्ब होते महसूस होते हैं। यहाँ खिड़कियाँ बाहर की ओर नहीं भीतर की ओर खुलती हैं। जिनके पास भीतर की खिड़की नहीं होती, वहाँ बाहर की खिड़की भी ग़ायब होती है। एक के न होने पर दूसरी ग़ायब हो जाती है, मानो किसी का शाप लगा हो। हवाओं के रुख़ का अंदाज़ हम अक्सर खिडकियों से ही लगाते हैं। आँधी और तूफ़ान आने पर खिड़कियाँ तो बंद की जाती हैं; पर तूफ़ानों के गुज़र जाने पर हम सबसे पहले खिड़की ही खोलते हैं, पहला दृश्य वहीं से देखते हैं और कहते हैं—“अरे! दुनिया तो बिल्कुल बदल गई!”
खिड़की प्रेम की तरह है, जिसे सुंदर और कुरूप में नहीं बाँटा जा सकता, वह बस होती है और जीवन सुधर जाता है। उसका न होना प्रेम के न होने जैसा खटकता है। हमारे रीतिकालीन आचार्यों ने ‘नायिका-भेद’ के न जाने कितने हिस्से किए हैं, हम ग़ौर करें तो खिड़कियाँ भी ‘माननी’ और ‘मुग्धा’ होती हैं। कुछ तो खुलती ही नहीं, और जब वे खुलती हैं तो हम सबको भूल-भाल जाते हैं। ‘मुग्धा’ खिड़की घरवालों से ज़्यादा पड़ोसियों के आकर्षण का केंद्र होती हैं, कुछ पड़ोसी तो डाह भी करते हैं। बड़े शहरों की ‘अपार्टमेंट-संस्कृति’ में बच्चे खिडकियों से नहीं झाँकते, पर छोटे शहरों और क़स्बों में ये शरारती खिडकियों पर ही झूलते रहते हैं। ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ याद है? इसने तो बच्चों की सारी मुरादें ही पूरी कर डालीं, रघुवर प्रसाद की पूरी पहचान ही खिड़की से जुड़ गई है, जो खिड़की न होती तो रघुवर भी न होते। खिड़कियों पर कई कविताएँ, कहानियाँ और उपन्यास लिखे गए हैं, फ़्योदोर दोस्तोयेवस्की के ‘अपराध और दंड’ के तो लगभग बेहतरीन दृश्य, विचार और मार्मिक प्रसंग नायक के कमरे की खिड़की के सहारे व्यक्त हुए हैं, यहाँ ये दोनों ओर खुलती हैं। निर्मल वर्मा की ‘चीड़ों पर चाँदनी’ में पेरिस सबसे ख़ूबसूरती से खिड़की सहारे व्यक्त हुआ है, निर्मल खिड़की से झाँकते हुए पेरिस में हुई रंग-क्रांति को याद करते हैं कि कैसे पेरिस की छतों की ख़ूबसूरती के पीछे इस रंग-क्रांति ने काम किया। बस, आलोचना में खिड़कियाँ ग़ायब हैं। ऐसा क्यों है? क्या आलोचक के घर खिड़की नहीं होती? जबकि सच यह है कि आलोचक सदैव दिमाग़ की खुली खिड़कियों से रचना-प्रक्रिया को समझने का आग्रह करते हैं। संस्कृति की बड़ी बहसें अक्सर खिड़कियों के बिंब के सहारे की जाती हैं, गांधी जी ने खिड़कियों को खुला रखने की बात इसी मुद्दे पर की थी। घर में खिड़कियों का जो आग्रह है—वही जीवन में उदारता और अपनावे का आग्रह है, दोनों एक ही हैं।
हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं, जहाँ बाज़ार ने हर तारीख़ को उपभोक्ता ‘डे’ में तब्दील कर दिया है। उत्सव या तो पैदा किए जा रहे हैं या उनका अपहरण हो रहा है, पर इसके बावजूद यह आग्रह ग़लत न होगा कि साल का एक दिन ‘खिड़की-दिवस’ के रूप में मनाया जाए, उस दिन जिनके पास खिड़की हो; वे कम-से-कम दो घंटे खिड़की के पास बैठें, सोचे-समझें, ‘कुछ’ महसूस करें और जिनके पास खिड़की न हो, वे खिड़कीवाले मित्रों की तलाश करें।
‘खिड़की-पर्व’ की बात थोड़ी अटपटी ज़रूर लगती है; पर ये उन त्योहारों से ज़्यादा अटपटी नहीं हैं, जिन्हें आजकल बाज़ार ने पैदा किया है। यह ऐसा त्योहार होगा जो किसी के भीतर से बाहर की ओर आएगा, आरोपित नहीं होगा। यहाँ ख़रचने के लिए समय; थोड़ी ऊर्जा और और बहुत सारी कल्पना-शक्ति चाहिए होगी, जिसे रूपए-पैसे की योग्यता ने आजकल कुंद कर डाला है। अनुभूति की क्षमता ही यहाँ योग्यता होगी और दृश्यों की पकड़ ही उत्सव की सार्थकता। कुछ लोग सवाल उठा सकते हैं कि इस त्योहार में ‘मज़ा’ कहाँ है, लेकिन ‘मज़े’ की परिभाषा कौन तय करेगा? मज़े को महिमामंडित करने वाले कौन हैं? मज़ा अपने आपमें एक तीव्र आवेग की अनुभूति है, अनुभूति की विराट परिधि में मज़ा बस केवल एक जैविक खंड भर है, दुनिया अगर मेला है तो मेले के किसी एक हिस्से में—चाहे वह कितना ही शानदार क्यों न हो—पड़े रहने वाला कभी भी पूरे मेले को देखने का दावा नहीं कर सकता। क्या पता मेले के किसी दूसरे हिस्से में कोई बेहतरीन चीज़ मिल जाए? अनुभूति की विविधता के आगे ‘मज़ा’ एक मामूली शब्द लगता है और इसका आभास खिड़कियाँ कई बार कराती हैं। टेलीविज़न पर घंटों तीन सौ चैनल देखनेवाले उस अकेले आदमी से पूछिए कि ‘मज़ा’ क्या है, वह बताएगा कि इस मज़े से वह परेशान है और खिड़की से आने वाली हर आहट पर वह कैसे दौड़ता हुआ आकर झाँकता है। उसके भागने में जो वेग है; यह वेग बुद्धू-बक्से के ऊब ने पैदा की होती है और उसके झाँकने में जो उत्साह है, वह खिड़की की बदौलत है।
खिड़की की आहट में ज़िंदगी की सीधी धमक होती है, जहाँ दृश्य पूर्वनियंत्रित नहीं होते। मज़े से मरी जा रही इस दुनिया में खिड़की अब भी एक संभावना है!
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