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एक मछली पकड़ने का काँटा, एक खुली आँख, स्त्रीवादी दृष्टि और लेखन

तुम्हारा मेरा साथ 
जैसे आँख में धँसा कोई काँटा 
एक मछली पकड़ने का काँटा 
एक खुली आँख

कनाडियन कवि-लेखिका मारग्रेट एटवुड की ये कविता पढ़ते हुए एक लिखती हुई स्त्री और उसके परिवेश के बीच का संबंध बहुत स्पष्टता से आँखों के आगे सजीव हो उठता है। स्त्री का परिवेश धर्म, पितृसत्ता, घर, बाज़ार से तय होता है। ये तत्त्व मिलकर उसके अस्तित्व के लिए नियम गढ़ते हैं। स्त्री उनसे संवाद के क्रम में अपनी आकांक्षा, अपनी अस्मिता का सम्मान चाहती है, वह एक ऐसे सहअस्तित्व वाले समाज का स्वप्न देखती है जहाँ स्त्री-पुरुष एक दूसरे के पूरक हों, लेकिन सारी मुश्किलें इस चाह लेने की ही हैं। यहीं से जो संबंध साहचर्य का, प्रेम का होना चाहिए, वह एक खुली आँख में धँसा मछली पकड़ने का काँटा बन जाता है। यहाँ वह खुली हुई आँख है स्त्री की क़लम और मछली पकड़ने का काँटा बन जाता है वह समाज जिससे संवादरत रहते हुए अपना स्पेस पाने का स्त्री का संघर्ष चलता रहता है। स्त्री लेखन समाज की सभी जड़ परंपराओं पर रचनात्मक रूप से आघात करता हुआ, उसकी सभी विषमताओं, अन्याय पर उँगली रखता हुआ, रेशा-रेशा स्त्री के लिए पड़ी हुई हर गाँठ को खोलने के लिए प्रतिबद्ध है। वह पुरुष विरोध में रचा गया साहित्य नहीं है, वह एक ऐसे समाज की आकांक्षा रखता है जहाँ स्त्री, उसकी रचनात्मकता, उसके स्वप्न का एक मनुष्य के रूप में पर्याप्त आदर हो। एक ऐसा समाज जहाँ स्त्री-पुरुष का संबंध शोषक या विक्टिम का नहीं होकर सहकर्मी, सहयोगी का हो, हालाँकि ऐसा होता नहीं हैं। पितृसत्ता स्त्री-पुरुष-संबंधों की सारी सहजता नष्ट कर उन्हें एक दूसरे के ही ख़िलाफ़ खड़ा कर देती है। वह लिखती हुई स्त्री की रचनात्मक स्वतंत्रता को भी पूर्वाग्रही दृष्टि से देखती है और उसका निरपेक्ष मूल्यांकन नहीं कर पाती। 

स्त्रीवादी लेखन की आवश्यकता

‘लाफ़ ऑफ़ मेडुसा’ में हेलेन सिक्सू लिखती हैं, “स्त्री को स्वयं को लिखना चाहिए : उसे स्त्रियों के बारे में लिखना चाहिए और स्त्रियों को लेखन की ओर लाना चाहिए, जिससे उन्हें उतनी ही हिंसा से दूर किया गया है जितना कि उनके शरीर से—उसी कारण से, उसी क़ानून, उसी घातक उद्देश्य से। स्त्री को स्वयं को पाठ में डालना चाहिए, जैसे कि वह दुनिया और इतिहास में अपने गतिशील प्रयास से प्रवेश करती है।”

माना जाता है कि सदियों से जो लेखन में जो अज्ञात था, वह किसी स्त्री की ही क़लम थी। विश्व के अधिकांश कालजयी साहित्य में उस स्त्रीवादी दृष्टि का अभाव है जो स्त्री और हाशिये के समाज का भी प्रतिनिधित्व करता है, उन्हें भी प्रमुखता और बिना किसी पूर्वग्रह के अपनी बात रखने का अवसर देता है। यदि कहीं उनकी बात की भी जाती है तो वह ‘पुरुष लेंस’ से, उसके बनाए मापकों के आधार पर। 

स्त्रीवादी दृष्टि उसी ‘पुरुष लेंस’ को खंडित कर ‘फ़ीमेल गेज़’ से अपने समय और संसार को देखती है और उनमें अपना संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है। 

इस संदर्भ में ‘शृंखला की कड़ियाँ’ में महादेवी वर्मा बहुत मानीख्रेज़ बात कहती हैं, “यदि सामाजिक रूप से इसकी उपयोगिता जाँची जावे तो हम देखेंगे कि स्त्री का साहित्यिक सहयोग साहित्य के एक आवश्यक अंग की पूर्ति करता है। साहित्य यदि स्त्री के सहयोग से शून्य हो जाए उसे आधी मानव-जाति के प्रतिनिधित्व से शून्य समझना चाहिए। पुरुष के द्वारा नारी का चरित्र अधिक आदर्श बन सकता है, परंतु अधिक सत्य नहीं; विकृति के अधिक निकट पहुँच सकता है, परंतु यथार्थ के अधिक समीप नहीं। पुरुष के लिए नारीत्व अनुमान है, परंतु नारी के लिए अनुभव। अतः अपने जीवन का जैसा सजीव चित्र वह हमें दे सकेगी वैसा पुरुष साधना के उपरांत भी शायद ही दे सके।” 

लेखन और आलोचना में स्त्रीवादी हस्तक्षेप केवल विषय-विस्तार भर नहीं है, बल्कि स्थापित मानकों और सत्ता-केंद्रित दृष्टियों को चुनौती देने वाला एक वैचारिक परिवर्तन है। इस परिवर्तन की वैचारिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए सिमोन दी बोउवार की ‘द सेकेंड सेक्स’, वर्जीनिया वूल्फ़ की ‘ए रूम ऑफ़ वंस ओन’ जैसे पाठ ने स्त्री-अनुभव को राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में स्थापित किया। भारतीय संदर्भ में महादेवी वर्मा, इस्मत चुग़ताई, कृष्णा सोबती जैसी लेखिकाओं ने स्त्री-अनुभवों को निजी से सार्वजनिक और व्यक्तिगत से राजनीतिक विमर्श तक विस्तृत किया।

स्त्री-रचनाशीलता का यह उभार इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि यह केवल आत्माभिव्यक्ति नहीं, बल्कि संरचनात्मक असमानताओं के विरुद्ध एक आलोचनात्मक हस्तक्षेप है। लंबे समय तक साहित्य के मानदंड पुरुष-केंद्रित अनुभवों से निर्मित होते रहे; परिणामस्वरूप स्त्री की दुनिया, उसकी संवेदनाएँ, संघर्ष और अंतर्द्वंद्व हाशिए पर रहे। स्त्री-साहित्य ने इन हाशियों को केंद्र में लाने का कार्य किया। इस प्रक्रिया में उसने यह दिखाया कि निजी अनुभव भी सामाजिक संरचनाओं से निर्मित होते हैं और इसीलिए ‘व्यक्तिगत ही राजनीतिक है’ जैसी अवधारणा का अपना महत्त्व है। 

यहाँ यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि स्त्री-लेखन सिर्फ़ स्त्री के व्यक्तिगत संसार का साक्षात्कार नहीं है, वह व्यापक सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में मौजूद लिंगाधारित असमानताओं की परतें खोलता है। वर्ग, जाति, धर्म और लैंगिकता—इन सभी के अंतर्संबंधों को समझे बिना स्त्री-अनुभव की पूर्णता को नहीं समझा जा सकता। अनेक सामाजिक व्यवस्थाएँ असमानताओं को सामान्य बना देती हैं, जिससे उनके विरुद्ध आवाज़ उठाना अस्वाभाविक या दुस्साहसिक प्रतीत होता है। स्त्री-लेखन इस ‘सामान्यीकरण’ की प्रक्रिया को तोड़ता है और पाठक को उन वास्तविकताओं से रूबरू कराता है जो अक्सर अदृश्य बना दी जाती हैं।

अतः स्त्री-साहित्य को केवल एक साहित्यिक प्रवृत्ति के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की चेतना के रूप में देखना अधिक उचित है। यह अपने खोए स्वत्व की पुनर्प्राप्ति का प्रयास है, साथ ही समाज के समग्र पुनर्पाठ की प्रक्रिया भी।

स्त्री-लेखन का वर्तमान और उसकी चुनौतियाँ

स्त्री-भाषा

मालिक के अस्त्र से मालिक के घर में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। इसके लिए हमें अपना भाषा-संसार रचना होगा।

स्त्रीवाद के संघर्ष के मूल में स्त्रियों के समान राजनीतिक, आर्थिक अधिकारों की माँग थी जो अंततः उनकी सामाजिक स्थिति को भी उन्नत बनाते थे। भारतीय परिपेक्ष्य में भी ये स्त्री के शैक्षणिक, राजनीतिक, सामाजिक अधिकारों की बात करते रहे; लेकिन साथ ही पारिवारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक ढाँचे की सुरक्षा के लिए भी सजग रहे। 

सदियों से चला आ रहा यह संघर्ष बृहत्त उद्देश्यों के लिए आरंभ हुआ, लेकिन आज यह हर स्त्री के छोटे- छोटे सपनों, छोटी- छोटी ख़ुशियों में आकार लेता है। कहीं कोई स्त्री समान वेतन, अबॉर्शन राइट, सेक्सुअल फ़्रीडम के लिए आवाज़ उठाती होगी तो कहीं किसी कॉलोनी की मध्यवर्गीय स्त्रियाँ घर-पति-बच्चों से निबट कर किटी ग्रुप में सहेलियों संग हँसी के कुछ पल चुराती होंगी। कहीं कोई लेस्बियन कपल साथ रहने के अपने अधिकारों की बात करती होंगी तो कहीं कोई गाँव की लड़की मीलों साइकिल चलाकर कुछ बन जाने का सपना पाले स्कूल जाती होगी। स्त्रीवाद के इस चौथे चरण के मूल में जो आवाज़ है, वह है इसके समावेशी होने का आग्रह—इंटरसेक्शनैलिटी। 

आप स्त्रीवादी हैं; लेकिन आप वर्ग, रंग, धर्म, जाति, जेंडर, शारीरिक, मानसिक ढाँचे (उसके सामर्थ्य) से संबंधित किसी भी घृणा या द्वेष में फँसे हैं तो आपका स्त्रीवाद सीमित है, समावेशी नहीं। 

स्त्रीवाद का उद्देश्य समावेशी होकर भी हर स्त्री, ट्रांसजेंडर्स, दलित, दमित; यहाँ तक के पुरुषों के व्यक्तिगत अधिकारों की बात करता है। आजकल एक नया विमर्श उभरता हुआ देखती हूँ—पुरुष-विमर्श। यदि आप स्त्रीवाद के लक्ष्यों, सिद्धांतों को ठीक से समझ पाएँगे तो जानेंगे कि यहाँ सिर्फ़ स्त्री-अधिकारों की बात नहीं है, एक ऐसे समान समाज का स्वप्न है जहाँ हर व्यक्ति के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक अधिकार सुरक्षित हों। 

हिंदी की बौद्धिक दुनिया के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती या दायित्व है, वह है एक ऐसी भाषा का विकास, नए शब्दों का गढ़न जो अपने रूप में इस विविधरंगी दुनिया के लिए अधिक उदार, अधिक समावेशी, अधिक उन्नत हो। अँग्रेज़ी ने यह काम कर लिया है, वह लगतार एक उदार शब्दावली के विकास के लिए सजग और प्रतिबद्ध है। उदाहरण के लिए विभिन्न सेक्सुअल ओरिएंटेशन के लिए उसके अपने सर्वनाम हैं और अपनी संज्ञाएँ। हिंदी में अभी भी सब कुछ मुख्यतः पुरुषप्रधान है। 

अँग्रेज़ी ने शारीरिक सीमाओं के लिए बाक़ायदा एक उदार शब्दावली तैयार की है। मसलन आप ‘पर्सन्स विथ डिसेबिलिटी’ का हिंदी मान्य रूप देखें; जो अर्थ मिलेंगे वे पूर्वाग्रही, असंतुलित और अपमानजनक हैं। सत्ता द्वारा मान्यता प्राप्त शब्द दिव्यांग जन भी। डिसएबिलिटी न बीमारी है, न नकारात्मक तरीके से इस्तेमाल किए जाने का माध्यम न ही अतिरिक्त ग्लोरिफ़िकेशन की वस्तु। 

मसलन आप अगर अब भी यह कहते हैं, “हम बोल सकते थे, लेकिन हकलाकर रह गए...” (ऐसा ही कुछ एक अवॉर्ड-विनिंग कविता में पढ़ा था, तो आपको अपनी स्त्री-भाषा पर बहुत काम करना है।) या फिर बाँझ, नपुंसक, अपंग आदि आदि...

हिंदी में अब भी नॉन बाइनरी, फ़्लूइड आइडेंटिटी के लिए कोई शब्द तो दूर उनकी स्वीकार्यता भी नहीं है। 

स्त्रीवाद के इस चौथे चरण का प्रमुख उद्देश्य एक ऐसी भाषा का निर्माण और विकास है जहाँ सबके लिए स्पेस हो, सबका प्रतिनिधित्व हो और एक उदार तथा संतुलित भाव हो। स्त्रियों को भी यह समझना होगा कि वे कहाँ से चीज़ों, घटनाओं, समय को देख रही हैं। एक आम मध्यवर्गीय, नौकरीपेशा या गृहिणी स्त्री भी अपनी स्थिति में प्रिविलेज्ड हो सकती है यदि वह अपने आस-पास की विविधताओं पर दृष्टि डालेगी। उसकी इस दृष्टि को संतुलित, समावेशी, उदार होना ही होगा। किसी भी तरह का पूर्वाग्रह, द्वेष, घृणा या पक्षपात हमें स्त्रीवाद के सिद्धांतों के विरुद्ध ही ला खड़ा करता है, यह समझे और निरंतर अपने अंदर देखे जाने की ज़रूरत है। 

ऑड्रे लॉर्ड की इस बात को ऐसे पढ़ें कि आज की सबसे बड़ी आवश्यकता हमें अपनी भाषा गढ़ने और सँवारने की है। वह भाषा जो अभी स्त्रियों के लिए ही इतनी द्वेषी है तो बाक़ी विविधताओं के लिए क्या ही उदार या सहिष्णु होगी!

The master's tools will never dismantle the master's house. They may allow us to temporarily beat him at his own game, but they will never enable us to bring about genuine change.

देह मुक्ति दरअस्ल दिमाग़ की मुक्ति है

ब्रिटिश लेखिका एवं पत्रकार रेबेका वेस्ट ने लिखा था, “मुझे  लोग स्त्रीवादी बुलाते हैं; जब भी मैं अपने कुछ ऐसे विचार प्रकट करती हूँ, जो मुझे एक पाँवपोश या गणिका से अलग करते हैं।”

दरअस्ल, सदियों से स्त्री को इन्हीं दो खाँचों में क़ैद किया गया है। वह या तो एक मूक समर्पिता है, जिसका कर्त्तव्य समाज द्वारा तय की गई भूमिका निभाना है या वह एक गणिका है जो समाज के मनोरंजन के लिए आसानी से उपलब्ध है। दूसरे शब्दों में कहें तो त्यागमयी देवी या स्वच्छंद खलनायिका। इससे इतर उनकी कोई अन्य छवि आसानी से स्वीकार्य नहीं है।

यही वजह है कि स्त्रीवाद के संघर्ष को अक्सर देह-मुक्ति के संकीर्ण दायरे में बाँधकर देखने की कोशिश की जाती है। विशेषकर मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग में, आम लोग ही नहीं ख़ुद को स्त्रीवादी बुलाने वाले लोग भी यह ग़लती करते नज़र आते हैं। हालाँकि संकीर्ण देह-मुक्ति की अवधारणा नहीं, उसका अर्थ सीमित कर दिया गया है।

स्त्रीवाद बेशक देह पर स्त्री के अपने अधिकार की बात करता है, लेकिन इसके अर्थ कहीं व्यापक हैं। इसका अर्थ यह क़तई नहीं कि यह आज़ादी के नाम पर किसी तरह की यौनिक उच्छृंखलता को बढ़ावा देना चाहता है। एक स्त्री का अपने शरीर पर अधिकार हो, इसका मतलब वह अपने जीवनसाथी से लेकर माँ बनने तक के सभी निर्णय ख़ुद ले सके। उसे किसी भी उस व्यवस्था या समझौते का हिस्सा न बनना पड़े, जहाँ उसकी रज़ामंदी नहीं हो। भारत जैसे विकासशील देश में जहाँ लाखों स्त्रियाँ कुपोषण, प्रजनन-संबंधी जटिलताओं, जननांगों की बीमारियों से मरती हैं, अपने शरीर के स्वास्थ्य-संबधी सही निर्णय लेने का उन्हें पूरा अधिकार दिया ही जाना चाहिए। इस समाज में अभी भी स्त्रियों को बेटा पैदा करने की मशीन के रूप में देखा जाता है। हज़ारों स्त्रियाँ जबरन गर्भपात की स्थिति से गुज़रती दम तोड़ देती हैं। यह ज़रूरी है कि उन्हें अपने गर्भ-संबंधी निर्णय लेने का भी पूरा अधिकार हो। रेबेका वेस्ट द्वारा इस्तेमाल किए गए गणिका शब्द पर भी आपत्ति हो सकती है। लेकिन वास्तविकता यही है कि देह-व्यापार से जुड़ी अधिकांश स्त्रियाँ भी यह पेशा शायद ही अपनी मर्ज़ी से अपनाती हैं। यह भी समाज द्वारा उनकी देह पर थोपा गया एक निर्णय है जो स्त्रियों से सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार छीनता है और उन्हें एक वस्तु में तब्दील कर देता है।

देह-मुक्ति का वास्तविक अर्थ दरअस्ल एक स्त्री को सिर्फ़ देह से ही नहीं दिमाग़ से मुक्त करने में है। जब कोई स्त्री अपने देह के हित से जुड़े निर्णय लेने में सक्षम है, इसका अर्थ है वह दिमाग़ से भी मुक्त हो चुकी है। अपने तन और मन से जुड़े उचित निर्णय ले सकती है। 

स्वतंत्रचेता स्त्री यह भी समझती है कि स्वतंत्रता और उच्छृंखलता में एक महीन फ़र्क़ है। वह जानती है कि यह समाज दरअस्ल उसे एक देह में ही रिड्यूस कर देने के लिए लालायित है। उसे यौनिक मुक्ति का सड़ा गला पाठ पढ़ाकर वह सिर्फ़ अपनी अय्याशी का इंतज़ाम करना चाहता है और कुछ नहीं। उसे देह सौंदर्य के दायरे में क़ैद करने के पीछे भी उसकी यही मानसिकता रहती है। यही वजह है कि समाज ने स्त्री देह के लिए भी मापक तय किए हुए हैं और एक स्त्री पर उसका पालन करने का ताउम्र दबाव रहता है। देह-मुक्ति का विचार स्त्री को उन मापकों को भी कचड़े के डब्बे में फेंकने की आज़ादी देता है जो उसे बदसूरत, मोटा या भद्दा ठहरा कर उसकी व्यक्ति-गरिमा को घटाते हैं।

स्त्रीवादी लेखन यहीं हस्तक्षेप करता है। वह बताता है कि स्त्री-यौनिकता के प्रश्न उसके अपने हित के लिए हों। उसका उद्देश्य एक स्त्री की वास्तविक स्वतंत्रता हो, यह नहीं कि अनजाने में वह किसी के मनोरंजन और विलास का साधन बनकर रह जाए। नई स्त्री को यह देखना चाहिए कि देह-मुक्ति के उसके नारे के पीछे का उद्देश्य क्या है! वह समाज की लाखों स्त्रियों को सम्मान और गरिमा से जीने का अधिकार दिलाने में सक्षम है, या उसके प्लेज़र का सामान बनकर अपने लक्ष्य से भटक तो नहीं रहा।

स्त्री उपसर्ग के साथ, स्त्री उपसर्ग के परे भी

लेखन अंततः एक एकाकी प्रक्रिया है, जहाँ अंत में अपने लिए सिर्फ़ आप बचते हैं; अपनी सभी अनुभूतियों, अनुभवों, अपनी सारे भय, संशय और अंतर्द्वंद्व के साथ। किसी रचना को काग़ज़ पर उतारने की सारी सफलता या असफलता के साथ। तब कोई भी सामूहिक चेतना आपके रेस्क्यू के लिए नहीं आ सकती। सामूहिकता से उत्सव हो सकता है, अनुभव और दृष्टि प्राप्त की जा सकती है। लिखते हुए घोर एकांत ही लेखक का चयन हो सकता है, यही उसकी नियति है। रिक्ल्यूज़ होने को अभिशप्त है वह।

ऐसा करते वह किसी सामूहिक चेतना या विमर्श के साथ गद्दारी नहीं कर रहा होता है। बहुत सारे लेखक (हर जेंडर के) स्वयं को किसी विमर्श के अंदर बाँधकर मूल्यांकित नहीं होते देखना चाहते। यह माँग रखते हुए भी वह जिस किसी विमर्श के लिए आस्था रखते हैं, उसके प्रति उतने ही निष्ठावान् होते हैं। बस उन्हें अपने लिए एक परिधि तय कर लिया जाना, स्त्री या ऐसा ही अन्य कोई उपसर्ग निश्चित कर दिया जाना मंज़ूर नहीं होता है। 

अंतत: जब लिखना एक निजी और स्वसंवाद की प्रक्रिया है तो यह किसी लेखक का अधिकार है कि वह अपनी रचनात्मकता की दिशा और दशा भी स्वयं तय करे। 

बीते दिनों ‘वीमेन राइटर्स एट वर्क’ पढ़ रही थी, डोरोथी पार्कर ने इस द्वंद्व पर बहुत सुंदर तरीक़े से अपना मत रखा है कि किस तरह स्त्री लेखक शब्द से स्वयं को अलगाना स्त्रीवाद के साथ किसी स्त्री की निष्ठा को कम नहीं करता। ये दो बातें बिल्कुल स्वतंत्र रूप से ही देखी और समझी जानी चाहिए।

वह कहती हैं, “मैं स्त्रीवादी हूँ और ईश्वर जानता है कि अपनी प्रजाति के लिए वफ़ादार भी! सड़कों पर स्त्री स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते हुए मैंने सभी ख़तरे उठाए हैं। स्त्री-समानता के अधिकार के लिए सड़कों पर लैंप-पोस्ट से बाँधी गई हूँ, मर्दों की बैठक में अपमानित हुई हूँ; लेकिन मैं नहीं जानती थी, मेरी बच्ची कि एक दिन हम स्त्री लेखक होंगी!” 

जॉयस कैरल ओट्स स्त्री लेखक होने के लाभ के पूछे जाने पर मारक तंज़ करती हैं, “स्त्री होने के लाभ बहुत सारे हैं; क्योंकि सभी पुरुष आलोचकों द्वारा बनाई गई एक दो तीन की किसी श्रेणी में मेरा नाम नहीं होता, मैं स्वतंत्र होती हूँ!”

हिंदी साहित्य में भी ममता कालिया, मृदुला गर्ग आदि लेखिकाएँ स्वयं को स्त्री-फ़्रेम में अँटा कर मूल्यांकित किए जाने का विरोध करती हैं। यहाँ यह समझे जाने की आवश्यकता है कि स्त्रीवादी दृष्टि एक समावेशी दृष्टि है; जिसका दायरा सिर्फ़ स्त्री के मैं तक सीमित नहीं है, यदि आलोचना ने इस स्त्रीवादी दृष्टि को स्त्री उपसर्ग की क़ैद में डालकर सीमित कर दिया है, तो उन्हें स्त्री लेखन के मूल्यांकन के लिए नए टूल्स ईजाद करने होंगे। दिक़्क़त स्त्रीवादी लेखन में नहीं, आलोचना की पूर्वाग्रही दृष्टि में है; जो स्त्री होने को ही कमतर मानकर चल रही है, उसके अनुभव को सीमित समझती है। 

यह किसी विमर्श की भी सीमा है, अगर उसने अपने आपको पढ़े-समझे और गुने जाने की कोई रूल-बुक बना दी है और उससे इतर एक वाक्य भी उन्हें स्त्री-द्वेष लगने लगता है! अगर ऐसा होता तो स्त्रीवाद की इतनी धाराएँ नहीं होतीं, ब्लैक फ़ेमिनिज़्म, समलैंगिक अधिकारों का आंदोलन नहीं होता। जहाँ कहीं भी अपने से इतर विचार का स्वागत नहीं है, उसके लिए स्पेस बनाने की गुंजाइश नहीं है, वह विचार स्वयं में कट्टर है और उसे इंट्रोस्पेक्शन की बहुत ज़रूरत है। कोई विमर्श किसी लेखक को हंटर लेकर यह कैसे बता सकता है कि वह क्या लिखे, कैसे रचे, कैसे सोचे! यह तो सिर्फ़ वह तय करेगा या उसके पात्र!

सामूहिक चेतना आत्मसात् करते हुए भी एक लेखक को छूट है कि अपने लेखन के लिए वह निहायत आत्मकेंद्रित हो, रिक्ल्यूज़ हो, स्वार्थी हो। यही उसका शाप है और इसी में उसकी मुक्ति है। लिखती हुई स्त्री सिर्फ़ एक स्त्री मात्र भी नहीं रह जाती। वह एक मनुष्य मात्र की तरह जीवन, प्रकृति और समाज से संवाद स्थापित करती है। उसके दृश्य का दायरा फिर एक स्त्री मात्र का नहीं रहता है, एक लेखक का रहता है जो कई बार देश, काल, लिंग, धर्म आदि सभी सीमाओं से ख़ुद को मुक्त कर वस्तुओं, घटनाओं को उनके बृहत परिप्रेक्ष्य और पृष्ठभूमि में निरखती परखती है। वह देखे गए, भोगे गए जीवन के अतिरिक्त अपनी कल्पना से भी किसी दृश्य को साकार करती है; जोकि किसी भी कला का अनिवार्य तत्त्व है। एक सार्थक कला यथार्थ, स्मृति और कल्पना के उचित संयोजन द्वारा ही अपनी रचनात्मक पूर्णता को प्राप्त करती है। उसी प्रकार सिर्फ़ अपने भोगे गए यथार्थ का वर्णन ही एक अच्छे साहित्य की पहचान नहीं होता, बल्कि उसकी संपूर्णता इसी में है कि वह मैं के दायरे से होता हुआ, उस अन्य को भी स्वयं में शामिल कर सके जो कहीं हाशिये पर छूट गया है। टी. एस. एलियट जिसे अपनी ‘इम्पर्सनल थ्योरी’ में विस्तार से कहते हैं कि कला के लिए एक वस्तुनिष्ठ दृष्टि की आवश्यकता है जो अपने व्यक्तित्व और भावनाओं से परे जाकर ही पाई जा सकती है। हालाँकि यह एक संवाद का विषय है कि क्या यह पूर्णरूपेण संभव है, अपनी भावनाओं, अपने भोगे गए यथार्थ, अपने व्यक्तित्व से क्या पूरी तरह निस्तार पाया जा सकता है! विशेषकर लेखन के संदर्भ में किसी भी कथा या कविता में लेखक भी अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से एक पात्र रहता ही है। यह अलग बात है कि वह पात्र या वह लेखकीय हस्तक्षेप लेखक के स्व से कहीं आगे बढ़ जाता है और उसमें कई अन्य तत्त्व मसलन विचारधारा, स्मृति, कल्पना, इतिहास आदि भी पात्र और पृष्ठभूमि के निर्माण में सहायक होते हैं और इस तरह किसी रचना में उसका लेखक होकर भी शामिल नहीं रहता है। वह रचना उससे विस्तार लेते हुए अपनी समग्रता में कई लोगों का यथार्थ, उनकी कथा भी बन जाती है। 

जब दमित वर्ग किसी कला को अपनी अभिव्यक्ति का साधन बनाते हैं तो वहाँ उनके प्रति मुख्यधारा द्वारा किया गया अन्याय अपनी जगह बनाता ही है। ऐसा प्रतीत हो सकता है कि यह किसी की निजी जीवन से जुड़ी कथा या अनुभव है, लेकिन उसका दायरा उस समस्त दमित वर्ग तक फैला होता है। सभी अव्यक्त पीड़ाएँ वहाँ ध्वनित होती हैं। स्त्रियाँ भी उसी दमित वर्ग का हिस्सा हैं, जिनके लिए उनका लेखक लग्ज़री नहीं होता। कविता के संदर्भ में ऑड्रे लॉर्ड ने जो कहा है, उसे समस्त स्त्री-लेखन के संदर्भ में समझा जा सकता है, “कविता  विलासिता नहीं है। यह उस गुणवत्तापूर्ण प्रकाश का निर्माण करती है, जिसकी रोशनी में हम अपने अस्तित्व और परिवर्तन के लिए आशा और स्वप्न गढ़ते हैं, पहले भाषा में, फिर विचार में और फिर मूर्त क्रिया में।”

अधिकांशत: स्त्रियाँ लेखन को एक समय व्यतीत करने वाली हॉबी की तरह नहीं लेतीं, क्योंकि हमारे समाज के सख़्त बुनावट में उन्हें इतनी आज़ादी भी नहीं है। उनके लिए उनका लेखन एक प्रतिरोध है, एक राजनीतिक वक्तव्य जिसके माध्यम से वे अपनी दमित अस्मिता को आवाज़ देती हैं। वे सभी आकांक्षाएँ, स्वप्न, मनुष्य की तरह समझे जाने का आग्रह उनके लेखन में रचनात्मक विरोध की तरह उतरता है। लेकिन स्त्री-लेखन का मूल्यांकन सिर्फ़ इसी दृष्टि से करना अनुचित है। 

स्त्री-लेखन और आलोचना

एक लिखती हुई स्त्री सिर्फ़ अपनी पीड़ा ही नहीं लिखती, उसकी लेखनी में उन सैकड़ों, हज़ारों स्त्रियों की अनकही दास्तान भी होती हैं, जिन्हें अपनी बात कह सकने का मौक़ा समाज ने नहीं दिया। वे पुरखिनें चुपके से आकार लिखती हुई स्त्री की क़लम थाम लेती हैं, उसका संबल बन जाती हैं। उसके लेखन में देश, समाज, काल और उसकी कई ध्वनियाँ भी अपना स्थान बनती हैं, जिन्हें अमूमन सुन सकने की सचेत कोशिश नहीं की जाती। स्त्री का भाषा घर अपने समय को दर्शाने के लिए बहुत नवीन, टटके बिम्ब गढ़ता है जिसे आत्मसात् करने के लिए भी एक पक्षपात रहित संवेदशील दृष्टि की आवश्यकता है। अमूमन ऐसा होता नहीं है। स्त्री-लेखन को बहुत ही स्थूल लगभग असंवेदनशील दृष्टि से देखते हुए उन्हें स्त्री-लेखन के एक ‘विशेष चौखटे’ में क़ैद कर दिया जाता है, जिसके मानक पहले से तय हैं।

एक लिखती हुई स्त्री को कभी बृहत परिप्रेक्ष्य में शायद ही परखा जाता है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो यह रहता है कि उसके शब्दों के बीच से उसका निजी जीवन, उसका चरित्र तलाशने की कोशिश की जाती है। यह प्रयास रहता है कि कहीं कुछ मसालेदार चीज़ों का सूत्र मिल जाए जो उसके जीवन और देह से जुड़े हों। स्त्री के लेखन को भी उसके शरीर से जोड़कर एक विशेष प्रकार का रति सुख लेने की प्रवृत्ति रही है। साथ ही बदले में उनके लिए चरित्रहीन, बोल्ड लेखन आदि कई टैग भी सुरक्षित कर दिए जाते हैं। यही वजह है कि अपनी यौनिकता, अपने शरीर से जुड़े गंभीर मसलों, स्त्री जीवन को प्रभावित करने वाले सामाजिक संदर्भों पर भी खुलकर क़लम चलाते हुए एक स्त्री संकोच या भय से घिर जाती है। उसे यह चिंता सताती है कि उसके लेखन को उसके निजी जीवन से जोड़कर उसके चरित्र का पोस्टमार्टम न किया जाने लगे! कहीं परिवार एवं समाज द्वारा उसकी निंदा या बहिष्कार न आरंभ हो जाए! और यह चिंता पूरी तरह ग़लत भी नहीं हैं। अभी भी लिखती हुई स्त्री पर कई तरह के पारिवारिक एवं सामाजिक दबाव हैं जिनका घोषित-अघोषित बोझ उसकी क़लम उठाती रहती है। बुद्धिजीवी माना जाने वाला साहित्यिक वर्ग भी स्त्री के मामले में अपना पहना गया जेंडर लेंस उतार नहीं पाता। उसके लिए भी लिखती हुई स्त्री, एक स्त्री देह पहले हो जाती है, एक लेखक या कलाकार बाद में। 

स्त्रियों ने सदियों बाद अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी पाई है। सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों ने उसे पहले से अधिक अवसर और स्वतंत्रता भी दिलाई है, लेकिन यह आज़ादी अब भी अधूरी है। अब भी यात्रा लंबी और काँटों से भरी है; क्योंकि जिस समाज से एक मुक्तिगामी स्त्री संवादरत है, उसकी सोच में बहुत बदलाव अब भी नहीं आया है। ऐसे में ज़रूरत है कि एक स्वतंत्रचेत्ता स्त्री ही अपनी क़लम को तमाम व्यर्थ के बंधनों से मुक्त करे और अपनी दृष्टि को खुलकर व्यक्त करे। जब एक लिखती हुई स्त्री हर तरह के सामाजिक, पारिवारिक दबावों और अपनी मानसिक निर्मितियों से मुक्त होकर लिखेगी, तब उसे यह फ़र्क पड़ना भी बंद हो जाएगा कि कौन उसके लेखन के बहाने उसके निजी जीवन में झाँक लेने की कोशिश में है। स्त्री को अपनी चरित्र की निर्मिति से मुक्ति पानी ही होगी; जब वह ऐसे लांछनों को हँसकर झटक देना सीख लेगी, उसका लेखन भी तमाम बाहरी दबावों से मुक्त हो जाएगा।

स्त्री-सरोकारों को सत्ता-संरचनाओं, संसाधनों, लोकतंत्र और मानवीय अस्मिता के प्रश्नों से भी जुड़ना होगा, उन्हें हाशिये के समाज को अभी अपने पाठ में संपूर्ण प्रतिनिधित्व देना होगा। विस्थापन हो या विकास की अंधी दौड़—सबसे अधिक मार स्त्रियों पर ही पड़ती है। इसी तरह युद्ध, सांप्रदायिक हिंसा और फ़ाशीवादी प्रवृत्तियाँ भी स्त्री-शरीर और उसकी अस्मिता को निशाना बनाती रही हैं। इस संदर्भ में स्त्री-विमर्श सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का भी विमर्श बन जाता है।

हिंदी स्त्री-लेखन की परंपरा व्यापक और समृद्ध है। महादेवी वर्मा से लेकर मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग, ममता कालिया, नासिरा शर्मा, सुधा अरोड़ा, सविता सिंह, अनामिका, अलका सरावगी, वंदना राग, गीतांजलि श्री, नीलेश रघुवंशी, गीता श्री, प्रत्यक्षा, आकांक्षा पारे, कविता, अनीता भारती, जया जादवानी, गरिमा श्रीवास्तव, रोहिणी अग्रवाल, रेखा सेठी, रश्मि रावत आदि रचनाकारों-आलोचकों ने स्त्री-अनुभव के विविध आयामों को उजागर किया है; अपने समय के राजनीतिक-सामाजिक सरोकारों को लेकर भी सजग और पूर्वग्रहमुक्त रह सकी हैं। वर्तमान समय में जब सांप्रदायिकता, कॉरपोरेट वर्चस्व, धार्मिक उन्माद और राजनीतिक दुष्चक्र समाज को प्रभावित कर रहे हैं; तब स्त्री-लेखन के सामने चुनौती और ज़िम्मेदारी दोनों बढ़ जाती हैं। धर्म, पितृसत्ता और बाज़ार के गठजोड़ को समझे बिना स्त्री-मुक्ति की बात अधूरी रहेगी। यदि कोई भी सत्ता-संरचना स्त्री को पुनः दोयम दर्जे पर धकेलने का प्रयास करती है, तो उसका वैचारिक प्रतिरोध स्त्री-विमर्श का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए।

वर्तमान में स्त्री-लेखन में व्यक्तिगत पीड़ा से लेकर वैश्विक राजनीति तक सब समाहित है। यह आवश्यकता है कि स्त्रीवादी लेखन अधिक अंतर्संबंधित (intersectional) दृष्टि अपनाए—जाति, वर्ग, धर्म, भाषा, क्षेत्र, पर्यावरण और लोकतंत्र के प्रश्नों को स्त्री-अनुभव से जोड़कर देखने का प्रयास निरंतर जारी रखे। इसके साथ ही, आलोचना को भी वह पूर्वग्रहमुक्त दृष्टि अपनानी होगी जो स्त्रीवादी पाठ को दोयम दर्जे या किसी विशेष खाँचे में रखकर मूल्यांकित नहीं करे। स्त्री-लेखन का मूल्यांकन करते हुए उनके पाठ की संवेदनशील बुनावट को किसी रंगीन चश्मे की आड़ से पढ़ते हुए कभी आत्मसात् नहीं किया जा सकता। उसके लिए भी स्त्री मन, उसके भाषा-संसार, उसकी अनुभूतियों में बहुत ही संजीदगी से उतरना होगा। एक मुक्तिगामी स्त्री के लेखन-संसार में मुक्त मन से प्रवेश करते हुए उसके भाषा-संसार का हिस्सा बनना होगा।

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‘कथादेश’ (स्त्री वैचारिकी अंक, मार्च-2026) से साभार।

  

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