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दुनिया गोल ही है

हर गोल पूरी तरह गोल नहीं है। जैसे अपनी पृथ्वी जिसे हम गोल कहते हैं, लेकिन वह कहीं-कहीं उभरी हुई है और कहीं गहरी धँसी हुई। सूरज के चारों ओर घूमने वाली पृथ्वी की कक्षा भी तो पूरी तरह गोल नहीं, बल्कि अंडाकार है। जैसे गोल लड्डू... जैसे गोलगप्पा... वे भी पूरी तरह गोल कहाँ हैं! उनमें कहीं-कहीं उन्हें बनाने वाले के हाथ का चपटापन शामिल होता है। अमूमन यही हाल बर्फ़ के गोले का भी है।

दीदी जब रोटी बेलती है, तो वह न चतुर्भुज होती है, न पंचभुज। वह तो कोई बहुभुजाकार आकृति होती है। हाँ, मम्मी की रोटी के सिरों पर यदि हम उँगली घुमाएँ, तो वह बिना किसी तीखे मोड़ पर मुड़े वापस अपने आरंभिक बिंदु पर पहुँच जाती है। यह उसे वृत्त होने के क़रीब तो पहुँचाता है, फिर भी रोटी वृत्त की उस मूल परिभाषा से दूर ही रह जाती है, जिसमें कहा गया है कि परिधि पर स्थित प्रत्येक बिंदु केंद्र से समान दूरी पर होना चाहिए।

जैसे गोलू जो गोल-मटोल तो है, पर पूरी तरह गोल नहीं है। गोलू से जब उसकी टीचर कोई सवाल पूछती है, तो गोलू जवाब देता है। लेकिन गोलू के जवाब को सुनकर टीचर कहती है, “ऐसे गोलमोल जवाब मत दो, गोलू! ठीक-ठीक बताओ।”

अब गोलू का जवाब भला गोल कहाँ था! वह ठीक था या नहीं, इस पर तो सवाल उठाया जा सकता है, लेकिन वह गोल तो हरगिज़ नहीं था। उसने तो बाक़ायदा एक लंबा जवाब दिया था। जैसे गोल चक्कर, जहाँ बीच में बना हुआ ट्रैफ़िक पुलिस का स्टैंड हमेशा गोल तो नहीं होता।

जैसे दवा की गोली... कितनी ही दवाओं की गोलियाँ गोल नहीं होती मगर ख़रीदने वाला हमेशा मेडिकल स्टोर के मालिक से यही कहता है कि लेवीपिल की गोलियों का एक पत्ता दे दो और दुकानदार उसे चौकोर आकार की दवाओं का एक पत्ता थमा देता है।

हाँ, एक बस पहिया होता है जो पूरी तरह गोल होता है। यदि वह गोल के अतिरिक्त कुछ भी और होने की कोशिश करता है तो यह दुनिया अपनी पटरी से उतरने लगती है। फिर भी हम उसे गोल पहिया या गोल टायर नहीं कहते हैं। अब पहिया है तो गोल ही होगा, यह उसकी बुनियादी और इकलौती शर्त है। उसके नाम में उसके गुण का बोध निहित है भले ही वह गुण उसके नाम का हिस्सा न हो।

जैसे अगर हम किसी कवि का संदर्भ देते हुए यह कहें कि वे बड़े संवेदनशील कवि हैं तो यह सुनने में ऐसा ही अटपटा लगता है जैसे यह कहना कि वह एक गोल पहिया है। हालाँकि आज के समय में किसी कवि का संवेदनशील न होना शायद उतने बड़े आश्चर्य का विषय नहीं होगा जितना पहिये का गोल न होना। पर यह विशेषण कवि नामक पहिये को अतिरिक्त गोलाई प्रदान करता है मानो सूत्रधार श्रोताओं से कह रहा हो कि यह कवि लंबा चलने वाला है।

जैसे खेलों में फ़ुटबॉल का गोलपोस्ट जो विधिवत आयताकार होने के बाद भी गोल ही कहलाता है। और अगर इतिहास को टटोला जाये तो यह पड़ताल का विषय हो सकता है कि गोलमेज सम्मेलन के दौरान इस्तेमाल की गई मेज़ क्या वाक़ई गोल थी? ऐसी अनेक चीज़ें और उदाहरण हो सकते हैं जिनके नाम या पहचान में उनके आकार में गोल होने का बोध होता है भले ही वे पूरी तरह गोल न होती हों। लेकिन इसके अलावा भले ही दूसरे अर्थ में हो, फिर भी ‘गोल’ हमारे समाज का बहुत बड़ा सत्य है।

जैसे : 

पेंशन कार्यालय में किसी रामसजीवन की पेंशन-फ़ाइल गोल है।
विधायक निधि के उपयोग का ब्यौरा गोल है।
किसी सुबह किसी मंदिर में मूर्तियों के मुकुट गोल हो जाते हैं।
मंदिर में किए गए दान का एक हिस्सा गोल है।
नेताओं से शर्म गोल है।
इतिहास की पुस्तक में कोई घटना गोल है।
ऐन गवाही के दिन संभावित अपराधी के विरुद्ध गवाही देने वाला गवाह गोल है।
ग़रीबी का ठीक-ठीक आंकड़ा गोल है।
पुस्तक मेले में नेता-अभिनेता-लेखक-प्रकाशक-मीडिया तो है, लेकिन पाठक गोल है।
अस्पताल से बच्चा गोल है।
मॉनसून में बारिश गोल है।
संसद के सत्र से मंत्री गोल है।
स्कूल की रसायन प्रयोगशाला से बीकर गोल है।
मध्य पूर्व से शांति गोल है।
आडम्बर है पर आस्था गोल है।
बारिश में डूबकर गाँव का रास्ता गोल है।

अगर हम सोचते जाएँ तो इस वाले गोल की लिस्ट अंतहीन होगी। गोल शब्द अपनी भौतिक अवस्था में और अपने दूसरे तात्पर्यों के साथ हमारी भाषा का एक बहुत उपयोगी और ज़रूरी हिस्सा है।

अगर ‘गोल’ न होता तो देश के हितैषी यह कैसे कह पाते कि जेन ज़ी की भाषा से शालीनता और मर्यादा गोल है। पृथ्वी अपने गणितीय अर्थ में भले ही पूरी गोल न हो लेकिन गोल के वृहद अर्थ में यह दुनिया गोल ही है।

अंत में मुझे महान् रूसी लेखक गोगोल का एक कथन याद आता है : तुम किस पर हँस रहे हो? तुम ख़ुद पर हँस रहे हो।

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