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धारावाहिक उपन्यास : जंकामंका गैंग : यही सब आज का हिंदी साहित्य है

गताध्याय से आगे...

नौ 

उदय का दुख यह नहीं था कि वह ब्राह्मणों के बीच अछूत है, बल्कि यह है कि वह पिछड़े और एससी के बीच ब्राह्मण है। वह उनके लिए कुछ भी कर दे, जान की बाज़ी लगा दे, तो भी सवर्ण था, ऊँची जाति का था। इस नियति का क्या करे, अपने स्वभाव का क्या करे। जहाँ दुर्गंध देखता था, बदबू है, कह देता था, जहाँ अन्याय देखता था, ग़लत है, कह देता था, हिंदी की दुनिया में, साहित्य की दुनिया में, अकादेमी की दुनिया में... जहाँ भी कहीं बुरा होता देखता था, ग़ुस्से से लाल हो जाता था। महाविद्यालयों के कई युवा प्राध्यापक आकर बताते कि उनके साथ बोर्ड ऑफ़ स्टडीज में ज़्यादती की जाती है, भेदभाव किया जाता है और जब उदय उनकी बातों पर ग़ौर करता था तो आपे से बाहर हो जाता था। किसी भी प्राध्यापक के साथ भेदभाव हो, किसी भी जाति का हो, उदय के लिए जाति से फ़र्क़ नहीं पड़ता था, बस सामने वाले के साथ बुरा हो रहा हो तो वह उसका सगा है उसकी जाति का है, साथी है, पिछड़े के साथ बुरा होगा, तो वह भी पिछड़ा हो जाएगा, एससी के साथ बुरा होगा तो एससी हो जाएगा, यहाँ तक कि किसी स्त्री के साथ बुरा होगा तो स्त्री हो जाएगा। अस्ल में वह पीड़ित के साथ होता था, किसी जाति या लिंग के साथ नहीं। प्राध्यापक तो प्राध्यापक, विद्यार्थियों के साथ बुरा हो रहा हो, तो उनके लिए विकल हो जाता था। हिंदी के विद्यार्थियों को पीएचडी करने के बाद बेरोज़गार देखता था, तो दुखी हो जाता था, हायर एजुकेशन कमीशन में भ्रष्टाचार देखता था, तो दुखी हो जाता था, जिन बच्चों की हैसियत तीस लाख घूस देने की नहीं होती थी, उन्हें देखता था तो दुखी हो जाता था। सरकार किसी भी पार्टी की हो, सब में भ्रष्टाचार देखता था, दुखी हो जाता था। उन बच्चों के लिए भी दुखी होता था, जो एमए करने के बाद जेएनयू चले गये, पीएचडी जेएनयू से की, दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध किसी कॉलेज में मानदेय पर बारह साल पढ़ाने के बाद बाहर कर दिए गए। इसलिए कि उनके पास तीस लाख नहीं था। कोई जुगाड़ नहीं था। अकादेमी की दुनिया प्रतिभा से नहीं, जुगाड़ से चलती थी। कुलपति होने के लिए पार्टी का जुगाड़ और उसके साथ पाँच करोड़ रुपया, यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई थी। जहाँ प्रतिभा के लिए कहीं कोई जगह नहीं थी। प्रतिभा के लिए जगह होती तो बल्ली और हौदा जैसे प्रोफ़ेसर, उदय के सामने खड़े हो पाते? जंकामंका शास्त्री के कंधे पर बैठकर ये दोनों सबके सिर पर पेशाब कर रहे होते? उदय अपना ग़ुस्सा जहाँ निकाल सकता था, निकालता था, जहाँ जितना अन्याय का विरोध कर सकता था, करता था। कुछ नहीं तो बोर्ड ऑफ़ स्टडीज की बैठक में मेज़ पर ही मुक्के से अपना ग़ुस्सा निकालने लगता था। तूफ़ान मचा देता था। बोर्ड ऑफ़ स्टडीज के सभी सदस्य एक तरफ़ होते थे और दूसरी तरफ़ उदय अकेला। 

विभाग के ओबीसी, एससी और मार्क्सवादी प्रोफ़ेसर पीड़ितों के पक्ष में नहीं होते थे। सच तो यह कि ये सब बल्ली और हौदा के सामने मूत मारते थे। उदय सोचता, ऐसे मार्क्सवाद से दुनिया भला कैसे बदलेगी। मार्क्सवाद को प्रोफ़ेसर साथी और प्रोफ़ेसर हाथी जैसे लोगों ने मज़ाक़ बनाकर रख दिया था। प्रोफ़ेसर साथी ओर प्रोफ़ेसर हाथी जैसे मार्क्सवादी तो नित्य हिला-हिलाकर अपने मार्क्सवाद पर ही मूतते रहते थे। ये हिंदी साहित्य और विश्वविद्यालयों का भला करने के लिए, विद्या और साहित्य के मंदिर में नहीं आए थे, ये तो इन मंदिरों में ही-ही करने के लिए पैदा हुए थे। जनखई करने के लिए आए थे। 

कुछ ही मिनटों में आसमान नीला से काला जैसा हो गया था। बादलों ने अपना रंग-ढंग बदल लिया था। हवा बहुत तेज़ हो गई थी। बिजली रह-रहकर चमकती थी और बादल लगातर गरज रहे थे, अजीब आवाज़ कर रहे थे। हिंदी विभाग के उदय सर के कमरे में, मैं और झंकार खिड़की से बाहर मौसम को करवट बदलते हुए देख रहे थे। जायसी याद आने लगे थे। उनका ‘चढ़ा अषाढ़ गगन घन...’ याद आने लगा था। दरवाज़े के सामने से ख़ुशबू का तेज़ झोंका आया तो हमने पलटकर दरवाजे़ की तरफ़ देखा कि कहीं बादलों की कोई चाल जो नहीं, लेकिन यह बादलों की नहीं, मल्लिका मणि मंजुला मिश्र की विभाग में मद्धिम-मद्धिम ख़ुशबू बिखेरती रहने वाली चाल थी। ख़ुशबू इतनी तेज़ थी कि हमें तुरत बेहोश हो जाना चाहिए था, बेहोश हुए भी लेकिन कुछ क्षण के विलंब से और थोड़ी देर के लिए। मैडम मल्लिका मणि मंजुला मिश्र, ऐसी ख़ुशबू रोज़ ही छोड़ती रहती थी। बल्ली भले अश्चितकालीन मूर्च्छा में रहते हों। हम तो मिनट के हज़ारवें हिस्से के लिए मूर्च्छित होकर चैतन्य हो जाते थे। ख़ुशबू की मशीन मैडम मल्लिका जाकर बग़ल के कमरे में बैठ गई थी। हमारे आसपास ख़ुशबू की छाया रह गई थी। वहाँ से भी ख़ुशबू मैडम उठीं, कपड़े ठीक किए, पर्स से गोल-सा नन्हा शीशा निकालकर अपना मुख देखा, लटें ठीक कीं और स्टाफ़रूम में चली गई थीं, क्योंकि सभी प्रोफ़ेसर वहाँ थे। बाहर से विषय-विशेषज्ञ के रूप में हिंदी विभाग की बोर्ड ऑफ़ स्टडीज की उस बैठक में कोलकाता से आया मटुकनाथ शर्मा विशेषज्ञ के रूप में मौजूद था। मीटिंग शुरू हो चुकी थी, मल्लिका मैडम की कुर्सी ख़ाली थी, जिस पर मल्लिका मैडम को बहुत आहिस्ता से ख़ुद को बहुत सँभालकर रखना था। उनका ध्यान दहाड़ते हुए बल्ली सर पर था ओर वह बल्ली सर की आवाज़ से ही बेसुध होने लगती थीं। कुर्सी के हत्थे पर ही बैठने लगीं थीं। कुर्सी गिरने को हुई, तब उन्हें ध्यान अया कि उनका ध्यान कहीं और था। ध्यान को फिर कुर्सी पर लगाया और ठीक से बैठ जाने के बाद ध्यान जहाँ था, उसे वहीं लगा दिया। बल्ली ने जैसे ही कहा कि सेल्फ़ फ़ाइनेंस कॉलेजों के सभी प्राध्यापकों को परीक्षक बनाना संभव नहीं है। उदय उछल पड़ा और ललकारते हुए कहने लगा था, “वाह भाई वाह! उनके पढ़ाने की वजह से मिली फ़ीस से हमें सेलरी मिलती है और हम उन्हें परीक्षक नहीं बना सकते हैं। क्यों आख़िर क्यों? पाँच-सात हज़ार रुपये उन सबको मिल जाएँगे तो हम लोग भूखों मरने लगेंगे क्या? हमारी जेब से उन्हें मिलेगा क्या?  सरकार हमारे विश्वविद्यालय को साल में नौ करोड़ देती है, जितने में हमारा साल भर का वेतन नहीं हो सकता है। एडेड कालेज पाँच हैं और सेल्फ़ फ़ाइनेंस कॉलेजों की संख्या तीन सौ है। उनकी इग्जामिनेशन फ़ीस और दूसरे शुल्क न आएँ तो विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर साहब लोग भूखों मरेंगे।” 

बल्ली ने बैठे-बैठे हाथ मटकाते हुए कहा, “अरे भाई उनकी योग्यता कम है, वे अस्थाई हैं, उनका विनियमितीकरण नहीं हुआ है।” उदय का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया, “वाह! वे योग्य नहीं हैं, तो पढ़ा कैसे रहे हैं, उनका चयन तो आप लोगों ने ही किया है... क्यों किया है? आप लोग हिंदी की महान् आत्माएँ हैं और वे बेचारे अकादमिक शूद्र, तो सेल्फ़ फ़ाइनेंस कॉलेजों को बंद क्यों नहीं कर देते? हमें शर्म आनी चाहिए कि हमारे ही विद्यार्थी इन कॉलेजों में पाँच से दस हज़ार रुपये महीने पर पढ़ाते हैं। उनमें से कई के दो-दो बच्चे हैं। परिवार है। आपको उनका हिस्सा देने में नानी याद आती है। आप लोग हिंदी के डाकू हैं। हौदा सर का बेटा तीन जगह पेपरसेटर है और छह जगह इग्ज़ामिनर और सेल्फ़ फ़ाइनेंस कॉलेजों के प्राध्यापक एक जगह भी इग्ज़ामिनर नहीं हैं। हद है!” काफ़ी देर से बैठे मटकनाथ शर्मा को ध्यान आया कि उन्हें अपने मित्र हौदा सर के बेटे को बचाने के लिए कुछ कहना चाहिए और वह खड़े हो गए, हालाँकि वह बैठकर भी अपनी बात कह सकते थे, लेकिन उन्हें टीए डीए का हक़ अदा करना था... इसलिए तैश में बोलना शुरू कर दिया, “देखिए यहाँ किसी सदस्य के बेटे का संदर्भ लेकर चर्चा करना सर्वथा अनुचित हे। किसी सम्मानित सदस्य को अपमानित करना है। मैं इस प्रसंग का उल्लेख करते हुए कुलपति से अशालीन आचरण की शिकायत करूँगा।” तब तक उदय फिर उछल पड़ा, “अरे वाह! हिंदी विभाग का भ्रष्टाचार छिपाते शर्म नहीं आ रही है। कोलकाता से हौदा की मदद के लिए आए हैं। जाइए कुलपति से शिकायत कीजिए या हौदा सर का चूतड़ धुलिए। आप सब लोग हिंदी के विद्वान् नहीं, आचार्य नहीं, लेखक नहीं, डाकू है, डाकू...” हंगामी बैठक अब और सँभाली नहीं जा सकती थी। बल्ली सर और उदय के बीच हाथापाई की नौबत आ गई थी। एडेड कॉलेज के प्रतिनिधि बेचारे हतप्रभ थे। तीन सौ सेल्फ़ फ़ाइनेंस कॉलेजों का एक भी प्रतिनिधि बोर्ड ऑफ़ स्टडीज की बैठक में नहीं था। उन्हें बोर्ड ऑफ़ स्टडीज का मेंबर बनाने के लिए स्टेच्यूट में कोई परिवर्तन होने ही नहीं दिया जा रहा था। उदय अकेले ही उनके लिए लड़ रहा था।

बोर्ड ऑफ़ स्टडीज की हंगामी बैठक में जो शख़्स शुरू से अंत तक चुप थे, तो वे जंकामंका सर थे, असीम सर थे, कीट सर थे पतंग सर थे। मल्लिका मैडम बैठक में ग़ज़ब कर रही थीं, बोल भी रही थीं और चुप भी थीं और दोनों काम एक साथ कर रही थीं। आँखों से बल्ली सर को देखने और बोलने का काम एक साथ ले रही थीं। साथी सर और हाथी सर तो चुप भी थे, किसी की ओर देख भी नहीं रहे थे और किसी को सुन भी नहीं रहे थे। साथी सर और हाथी सर थे तो दो, लेकिन मार्क्सवाद के दो बंदर लगने की जगह गांधी जी के तीन बंदर लग रहे थे। ऐसे में बैठक जहाँ पहुँच गई थी, वहाँ कोई उसका माई-बाप नहीं था। कहने को जंकामंका सर की अध्यक्षता में सब हो रहा था, लेकिन जंकामंका सर थे और नहीं थे। वह जब कोई चीज़ सँभाल नहीं पाते थे, तो उसे वहीं रोक देना चाहते थे। जंकामंका सर ने मुन्न से कहा कि अगली बैठक में बात होगी और आनन-फ़ानन में बैठक ख़त्म कर दी गई थी। 

असीम सर बुरे थे भी तो इतना कम बुरे थे कि उदय को कभी-कभी बिल्कुल बुरे नहीं लगते थे। उनका स्वभाव ही ऐसा था कि किसी से लड़ना-भिड़ना नहीं चाहते थे। उदय को बिल्कुल सहज लगते थे, साधारणता की प्रतिमूर्ति। उदय को उनकी इस साधारण की असाधारण मूर्ति से प्रेम था। वह बिल्कुल गाँव के ठेठ किसान की तरह सहज थे। कोई शहरातीपन उनमें नहीं था। उदय से उनकी बनती थी, उनकी सीमाओं के बावजूद। असीम सर निन्यानबे फ़ीसद जंकामंका गैंग के साथ थे, तो एक फ़ीसद उदय के साथ थे। जहाँ तक प्रतिभा की बात थी, तो सौ फ़ीसद उदय के साथ थे, बल्ली के साथ नहीं थे, लेकिन जब दंद-फंद की बात आती थी, तो सौ फ़ीसद बल्ली के साथ होते थे। असल में असीम सर उदय सर को भी साधु ही समझते थे, चरित्रवान्, सत्यवादी, निर्मल स्वभाव, निश्छल, लेकिन एक झगड़ालू साधु समझते थे। असीम सर का उदय के साथ संबंध का गणित देखने में था तो बहुत सरल, लेकिन था एक हद तक बहुत जटिल। वे उसके साथ होते थे, तो दिल से, उसके साथ बातें करते थे, पूरा जुड़ते थे, लेकिन इसी बीच कब वे अपने गैंग के साथ जुड़ जाते थे, जानना मुश्किल हो जोता था, लेकिन चूँकि उदय उन्हें जानता था, इसलिए जान जाता था। हफ़्ते में एक दिन वे एक पूरा पीरियड साथ होते थे। एमए प्रीवियस में उदय की क्लास होती थी और फ़ाइनल में असीम सर की, उसके बाद एक पीरियड पूरा ख़ाली होता था। फिर अगली क्लास। इस ख़ाली पीरियड को वे दोनों दिल से भरते थे। असीम सर बिल्कुल स्वतंत्र होते थे, कोई बंधन नहीं होता था। किसी के भी बारे में साफ़-साफ़। आरपार। असीम सर मल्लिका मैडम के बारे में भी उदय को चौंका देते थे। असीम सर ज्योतिष के जानकार थे, इसलिए अक्सर मल्लिका मैडम अपना हाथ असीम सर को पकड़ा देती थीं। असीम सर, ख़ाली पीरियड में कई बार मल्लिका मैडम का भविष्य उदय को बताने लगते थे। असीम सर ने उदय से तीन बार कहा होगा, मल्लिका बार-बार अपना हाथ पकड़ा देती है, उसका भविष्य कई बार देखने के बावजूद रेखाओं का सत्य नहीं बदलता है। निष्कर्ष नहीं बदलता है कि उसका भविष्य इकहरा नहीं है, दोहरा भी नहीं है, तिहरा है। मल्लिका अपने जीवन में, किसी का ख़ून सकती है, ख़ुदकुशी कर सकती है, किसी के साथ भाग सकती है। असीम सर ने उदय की आँखों में झाँककर पूछा था, किसका ख़ून कर सकती है? अपने पति का क्यों करेगी? वह तो पालतू है। फिर किसका करेगी? तुम्हारा तो नहीं करेगी? उदय चौंका था, मेरा क्यों करेगी? असीम सर ने भी फ़ुल मुस्कान छोड़ते हुए कहा था, क्योंकि तुम उसकी जान के दुश्मन हो, उसकी जान का विरोध करते हो, उसकी जान से लड़ते रहते हो। घबड़ाओ मत मल्लिका तुम्हारा ख़ून नहीं करेगी, उसके पास तो भरा-पुरा दिल है, किसी कवि का ख़ून नहीं कर सकती है। असीम सर उदय के साथ खेल रहे थे और उदय को भी असीम सर के साथ अक्सर ख़ाली पीरियड में खेलते हुए मज़ा आता था।

असीम सर ने कहा, “मुझे लगता है कि तीसरा विकल्प ही सत्य होगा। सवाल सह है कि बल्ली के साथ भागेगी क्यों, उसके साथ तो कोई समस्या ही नहीं है, मल्लिका का पति स्वयं दरवाज़ा खोलकर बल्ली का स्वागत करता है, फिर भागेगी किसके साथ?” एक सेकेंड के लिए असीम सर आधा चुप हुए थे और आधा मुस्कराए थे। उदय उनकी इस अदा को जानता था। उसने भी एक फ़ुल मुस्कान छोड़ते हुए कहा था, तो क्या आप मल्लिका के साथ भागने का प्लान आप बना रहे हैं? फिर तो आधा मुस्कराने ओर आधा हँसने का क्रम कुछ देर तक चलता रहा। सहसा असीम सर चुप हुए और संजीदा भी, फिर सहज हो गए थे। असीम सर ने मल्लिका-प्रसंग को फिर उदय की ओर मोड़ा, तुम्हारे साथ भागेगी, तुम्हें लेकर भाग जाएगी, किसी और यूनिवर्सिटी में लेकर चली जाएगी, ताकि तुम उसकी जान का विरोध करना छोड़ दो। उदय ने साफ़ किया, देखिए, मैं किसी व्यक्ति का नहीं, चरित्र का, प्रवृत्तियों का विरोध करता हूँ। विश्वविद्यालय हो या साहित्य, भ्रष्टाचार का विरोध करता हूँ। 

असीम सर ने उदय के कंधे पर हाथ रखते हुए बड़े प्यार से पूछा, “अच्छा उदय, यह सब ख़त्म क्यों नहीं कर लेते, जो भी मामला है, हल नहीं हो सकता है? तुम एक बार जंकामंका सर के साथ सब सेटल क्यों नहीं कर लेते हो, जो सब करते हैं, वही तुम भी क्यों नहीं करते?” उदय को हैरानी हुई और नहीं हुई। जानता था कि असीम सर की धुरी हैं तो जंकामंका सर ही। उदय ने असीम सर की आँखों में आँखें डालकर पूछा, “तो आप चाहते हैं कि जो सब करवाते हैं वही मैं भी करवाकर छुट्टी करूँ?” असीम सर ने सिर हिलाया। उदय ने सिर उठाया और कहा, “देखिए मराने में बुराई नहीं है, मैं भी चाहता हूँ कि एक बार गाँड़ मराकर छुट्टी करूँ, लेकिन किससे मराऊँ? कौन है, जिसने किसी से मराया नहीं है?” 

“ओह, तो तुम किसी सीलबंद शख़्स के साथ ऐसा करना चाहते हो, लेकिन विश्वविद्यालय और साहित्य की दुनिया में ऐसा तो कोई मिलेगा नहीं, जिसने किसी से मराया न हो।” असीम सर ने माथे पर बल दिया, “अच्छा तो तुम यह शुभकार्य डायरेक्ट प्रभु के साथ संपन्न करना चाहते हो?” दोनों ने एक साथ ज़ोर से ठहाका लगाया था, ठहाका इतनी ज़ोर का था कि सामने की क्लास का दरवाज़ा खोलकर मल्लिका मैडम असीम सर और उदय सर को देखकर मुस्करा दीं और दरवाज़ा बंद करके बच्चों को बिहारी का अगला दोहा पढ़ाने लगीं थीं। पढ़ाने क्या लगी थीं, विद्यर्थियों को सीधे मुक्ति का उपाय बताने लगी थीं : 

चमक तमक हाँसी ससक मसक झपट लपटानि।
एजिहिं रति सो रति मुकति और मुकति अति हानि।।

मल्लिका मैडम ने अभी शुरू ही किया था। इस दोहे में कवि कहता है कि जिस काम-क्रीड़ा में मुख्य चेष्टा के साथ सहायक चेष्टाएँ भी उतनी ही तीव्रता से हो रही हों, तो वह क्रीड़ा मुक्ति के समान है। हाथ उठाकर पीठे की बेंच पर बैठा एक विद्यार्थी खड़ा हो गया और मैडम मल्लिका से प्रश्न करने लगा, “मैडम, मुख्य चेष्टा किसे कहते हैं और सहायक चेष्टा में क्या करना होता है?” मैडम को छात्र की ओर देखकर बताने में थोड़ी झिझक तो ज़रूर हुई, लेकिन बताने के लिए मुँह खोलते ही घंटी बज गई। “अगली क्लास में आगे इस दोहे पर फिर बात करेंगे...” उन्होंने यों कहा और एक झटके में बड़ी अदा से रजिस्टर उठाकर सीने से लगाया और क्लास से बाहर निकल आई थीं। 

जब हम, इस वक़्त हम का मतलब, मैं और झंकार, हिंदी विभाग के उस प्रसिद्ध बरामदे में पहुँचे, जहाँ अक्सर उदय बैठा करता था। काम करना होता था, तो कमरे में मेज़ पर होता था। बरामदे के सामने लान में फूल-पत्तियों से गु़फ़्तगू करनी होती थी, चाहे खुले में बैठने का मन होता था, चाहे असीम सर के साथ दिलबहलाव करना होता था, चाहे सर्दियों में गुनगुनी धूप से दोस्ती करनी होती थी, चाहे मूँगफली खाना होता था, चाहे विभाग के चाय क्लब की चाय पीना होता था, चाहे बच्चों की चहल-पहल से अपने मन की विकलता, ग़ुस्सा, दुश्चिंता को शांत करना होता था, तो उदय उसी बरामदे में बैठता था। एक और बात थी, उदय उस जगह को विभाग की सत्ता के नियंत्रण से मुक्त मानता था। न वहाँ क्लास लगती थी, न वहाँ कोई मीटिंग होती थी, न वह विभागाध्यक्ष का कक्ष था। किसी प्रोफ़ेसर का कमरा, स्टाफ़रूम, ऑफ़िस, प्रसाधनकक्ष वग़ैरा कुछ भी नहीं था। कह सकते थे कि वह जगह विभाग में थी और नहीं थी। वहाँ कोई भी आकर बैठ सकता था। हम भी बैठ सकते थे। अस्ल में हम तो यहाँ बैठने के लिए ही आते थे, लेकिन विश्वविद्यालय बनाने वालों ने हमारे लिए ऐसी कोई जगह बनाई ही नहीं थी, जहाँ आलतू-फ़ालतू लोग आकर बैठ सकें। वैसे हम लोग पूरी तरह फ़ालतू थे भी नहीं, उदय के सखा थे, उसकी आत्मा के सहचर थे, इस रिश्ते से बैठने पर, सिवाय इम्तहान के दिनों के, कोई मनाही भी नहीं हो सकती थी; क्योंकि हम न तो दूसरे विभागों के छात्रों की तरह और न छात्रावास के छात्रों की तरह यहाँ कुछ ताड़ने आते थे। हम तो इतने शरीफ़ आदमी थे कि मैडम मल्लिका मणि मंजुला तक को नहीं ताड़ते थे, भले वे हमें या पूरे ज़माने को ताड़ने के लिए मजबूर करती रहें। 

समय और परिस्थितियाँ आदमी को, जो वह नहीं करना चाहता है, उसे करने के लिए मजबूर कर देती है। हम जैसे ही बरामदे में पहुँचे, किसी अज्ञात गुरुत्वाकर्षण से हमारी नज़रें उदय से बाद में मिलीं, पहले मैडम मल्लिका मणि मंजुला की नज़रों से टकरा गई थीं। इसमें न तो मेरी कोई ग़लती थी और न झंकार की। तुरत हम किसी अनहोनी से बचने के लिए उदय की ओर देखना शुरू कर चुके थे। हमारा दिल धड़का तो, लेकिन किसी और बात से नहीं, बल्कि इस बात से कि कहीं मैडम बात का बतंगड़ न बना दें। वैसे बात तो कोई हुई ही नहीं थी, लेकिन जिस समय में हम रह रहे हैं, बिना किसी बात के बतंगड़ होते देर कहाँ लगती है। ख़ासतौर से तब जब मैडम मल्लिका जैसी शख़्सियत हो। हम तो कहेंगे यही कि हमारी क़िस्मत अच्छी थी़ कि मैडम ने ख़ुद ही अपनी नज़रें फेर ली थीं। मैडम बरामदे और लॉन के बीच उस जगह पर बैठी थीं, जहाँ लॉन के गुलाब के फूल झुक कर मैडम के बालों को छू रहे थे और काँटे अदब से दूर खड़े थे। दूर मतलब उतना दूर जितना मुझमें और झंकार में फ़ासला था, जितना असीम सर और मैडम में फ़ासला था। बोले तो गुलाब मैडम को छू रहा था और काँटा भी बिल्कुल पास था। उतना ही फ़ासला काँटे और मैडम के बीच था, जितना मैडम और उदय की कुर्सी के बीच था। तब तक असीम सर ने भी हमें देख लिया था और देखते हुए कहा था, “आओ संटी सुकुल, आओ झंकार मिसिर। अपने दोस्त से मिलकर लौट जाते हो, मुझे भी जवार का हालचाल दे दिया करो।” अस्ल में असीम सर भी थे तो हमारे जवारी ही, लेकिन जंकामंका गैंग में भर्ती हो गए थे। असीम सर ने ख़ाली कुर्सियों की ओर इशारा करते हुए बहुत प्यार से कहा, “बैठो संटी... बैठो झंकार, चाय आ रही है।” झंकार ने उतने ही प्यार से असीम सर को देखते हुए कहा था, “सर हम लोग कोई प्रोफ़ेसर साहब और लेखक-वेखक हैं नहीं, हम तो हिंदी की दुनिया में सिर्फ़ चाय पीने के लिए आते हैं, इसी बहाने आप लोगो का दर्शन हो जाता है। हिंदी की विभूतियाँ अब गाँवों में कहाँ जाती हैं, हम लोगों को ही उनका दर्शन करने के लिए शहर आना पड़ता है।” तब तक चाय आ गई थी। असीम सर ने ही कहा, “अच्छा-अच्छा दर्शन-वर्शन होता रहेगा, पहले चाय पियो।”

वैसे मेरा, झंकार और उदय का आज चाय पीने का कार्यक्रम बीदास के साथ था। इसलिए हम हिंदी विभाग की चाय दो घूँट पीने के बाद चल दिए। निकलते समय मैंने बहुत विनम्रतापूर्वक झुककर असीम सर से कहा कि अनुमति दीजिए, निकलना ज़रूरी है। दर्शन का कार्यक्रम फिर करेंगे। इस प्रकार हम असीम सर और मल्लिका मैडम को अकेला छोड़कर अपने बाल सखा बीदास से मिलने के लिए उदय की एट हंड्रेड में बैठकर चल दिए। रास्ते में बीदास का रेल इंजन फिर दिखा। इस बार झंकार ने पूछा, “संटी इंजन पर चढ़ोगे?” मैंने इंजन से मुँह फेरकर कहा, “नहीं, मुझे डिब्बा पसंद है।” उदय ने कहा, “छोड़ो इंजन-फिंजन, बीदास का दफ़्तर शानदार है। वाइस चांसलर के दफ़्तर की तरह है।” झंकार ने कहा, “उसकी चाय, हिंदी विभाग की मूत जैसी चाय से बहुत अच्छी है। प्योर दूध की, मलाई वाली चाय।” हम एट हंड्रेड से उतरकर बीदास के दफ़्तर पहुँचे तो दो बातें हुई। पहली बात यह कि वहाँ बाहर बेंच पर बैठकर मीटिंग ख़त्म होने का इंतिज़ार करते हुए धुरहू प्रसाद जी मिले। उन्होंने हमें बताया कि बीदास जी से अपने भतीजे का रिज़र्वेशन टिकट कंफ़र्म कराने के लिए आए हैं। दूसरी बात यह कि कोई मैराथन मीटिंग थी। जो एक घंटे से चल रही थी। एक तीसरी बात भी हुई, उदय ने एक स्लिप पर अपना, मेरा और झंकार का नाम लिखकर बीदास के पास भिजवाया और दो मिनट में मीटिंग ख़त्म हो गई। मीटिंग ख़त्म हुई ही इसलिए थी कि बालसखाओं की मीटिंग हो सके। बीदास चाहे जितना बड़ा अफ़सर हो गया हो, हमें देखकर प्राइमरी स्कूल, हाईस्कूल के दिनों में लौट आता था। जहाँ हम उसका कॉलर पकड़ सकते थे, कंधे पर हाथ रख सकते थे, उसका भूजा छीनकर खा सकते थे, कोई-कोई दिन स्कूल न जाकर गंज गोबरहवा के लोहे के पुल पर बैठकर टाइम पास कर सकते थे, एक ही सिगरेट से कश ले सकते थे, बड़े होकर कलेक्टर, कप्तान और इंजीनियर बनने के सपने देख सकते थे, जिस दिन हम क्लास बंक करते थे उस दिन सुट्टा मारते हुए ऐसे हसीन सपने ख़ूब देखते थे। बीबी सिंह मेरा मतलब बीदास से है, अफ़सर हुआ तो हम चारों को एक जैसी ख़ुशी हुई थीं। मुझे याद है, झंकार मिसिर ने उस समय मज़ाक़ में कहा था, “यार तुम तो रेल का इंजन बन गए हो, हम लोगों को डिब्बा बना लेना।” बीदास शरमा जाता था। जैसे इंजन बनकर उसने अपने दोस्तों के साथ कोई अपराध किया है। बीदास ने कई बार झंकार की मदद करने की कोशिश की थी, लेकिन झंकार तो झंकार था, किसी की मदद कहाँ लेने वाला था! आज भी झंकार ने दूसरे की मदद करने के लिए ही कहा, “बाहर धुरहू प्रसाद हैं, उनको बुला लो और उनके भतीजे का टिकट कंफ़र्म करा दो। धुरहू प्रसाद बुलाए गए। बीदास ने पीए को बुलाकर उसे टिकट का ब्योरा देते हुए धुरहू प्रसाद का काम करा देने के लिए और सबके चाय के लिए कहा। धुरहू प्रसाद से बीदास ने ही पूछा, “जंकामंका सर का क्या हालचाल है?” धुरहू प्रसाद ने हँसते हुए कहा था, “उनकी दसों उँगलियाँ घी में हैं...” बीदास ने मुस्कराते हुए पूछा था, “हिंदी की थाली दोनों हाथों से खाते हैं क्या?” और ठहाका लगाने की बारी थी। धुरहू प्रसाद ने ठहाका लगाते हुए ही बताया था, “जंकामंका सर इस समय दो गाड़ी पर सवार हैं।” बीदास चौंककर बोला, “अरे लेकिन कोई आदमी दो गाड़ी पर एक साथ सफ़र नहीं कर सकता है। जंकामंका सर कोई भूत-प्रेत हैं क्या?” धुरहू प्रसाद ने रहस्य को तुरत खोल दिया, “इस समय दो चीज़ पाने के लिए हाथ-पाँव मार रहे हैं। मेरा मतलब जुगाड़ लगा रहे हैं। एक तो साहित्य अकादेमी का अध्यक्ष बनना चाह रहे हैं, दूसरे नोबेल और भारत रत्न में से कोई एक पाना चाह रहे हैं। इस साल कुछ न कुछ पाकर रहेंगे।” झंकार ने बात बदलते हुए कहा, “बीदास, शंकर के लड़के ने हाईस्कूल पास नहीं किया है, क्या फ़ोर्थ क्लास में कहीं बात बन सकती है?” बीदास ने सिर्फ़ इतना कहा कि बाद में बताएंगे। उसके बाद हम फिर घर-परिवार की बात करने लगे थे। बीदास ने झंकार के बेटे का हालचाल लिया, उसकी नौकरी और शादी के बारे में पूछा। झंकार ने कहा, “तुम्हारे पास तो आता है, तुम्हें तो सब बताता होगा।” बीदास के पीए ने आकर उसे बताया कि सर जीएम सर के यहाँ मीटिंग है, टाइम हो गया है। बीदास ने कहा, हाँ-हाँ, निकलते है। बीदास ने हम लोगों से कहा कि यहाँ बैठकर चाय-वाय पीते रहो, कैंटीन से डोसा मँगवाते हैं। खाकर जाना। उदय ने रोका, नहीं हम लोग भी चलेंगे। 

एट हंड्रेड में बैठकर हम लोग उदय के घर जा रहे थे। उदय ने रेडियो चालू कर दिया था... “कवने खेतवा में लुकाइलू, अहि रे बालम चिरई...” बज रहा था। हम चुप हो गए थे और अपनी-अपनी बालम चिरई में खो गए थे। लोहे का पुल पार करने के पहले उदय ने पूछा था, “कुछ देर पुल पर रुकना चाहोगे?” मैंने कहा, “हाँ...’ और एट हंड्रेड पुल के बिल्कुल पास रुक गई थी। हम बाहर निकले, यादों का सूरज अभी डूबा नहीं था। हम मेरा मतलब मैं, उदय और झंकार पुल पर बैठकर यादों के सूरज को डूबते हुए देखने लगे थे। जैसे रोज़ सूरज डूबता है, फिर निकलता है, उसी तरह यादों का सूरज रोज़ डूबता है, रोज़ निकलता है। हम अपने-अपने यादों के सूरज के साथ रोज़ जीते और मरते है। हमारा यह मरना एक बार नहीं होता था। रोज़ थोड़ा-थोड़ा जीना, रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरना। हम दोस्तों के अपने मसाइल थे, अपनी यादें थीं, साझा यादें थीं। कहते हैं कि सफल लोग यादों में नहीं, आगे का सोचकर जीते हैं, आगे के लिए मरते है। जंकामंका भी यादों में नहीं, वर्तमान में भी नहीं, भविष्य के पुल पर बैठते थे, भविष्य की चाँदनी रातों में विचरण करते थे। 

ये दिन न पहले जैसे थे, न लेखक पहले जैसे थे, न साहित्य की दुनिया पहले जैसी थी। बहुत कुछ बदल गया था। आप से आप बदल गया था। इन दिनों एक और दुनिया पैदा हो गई थी, सोशल मीडिया की धुरी पर टिकी हुई थी। जिसमें जो एक बार जाता था, उसी का होकर रह जाता था। इस दुनिया की ख़ूबी यह थी कि सब आर-पार दिखते थे। यहाँ विचार का एक्सरे कर सकते थे, आचरण का एक्सरे कर सकते थे, चरित्र का एक्सरे कर सकते थे। मतलब ये कि यहाँ जो आता था, सबका सब दिख जाता था। साइंस ने पहली ऐसी दुनिया की ईजाद की थी, जिसमें हर शख़्स दिखता था अपना चेहरा और चेहरे के साथ-साथ पीछे से उसका पूरा चूतड़ भी दिख जाता था। यहाँ सब चेहरा दिखाने के लिए ही आते थे। यह ख़ुद को दिखाने की जगह थी। ख़ुद को दिखाने की ग़ज़ब की होड़ थी। दिखाने की इस होड़ में हिंदी के लेखक सबसे आगे थे। वे कभी अपना नया जूता दिखाते, अपना नया मोज़ा दिखाते, अपनी नई ड्रेस दिखाते, अपना नया बस्ता दिखाते, अपनी पानी की नई बोतल दिखाते, अपनी नई ड्राइंग बुक दिखाते, लड़कियाँ नई नेल-पॉलिश दिखातीं, मेंहदी की नई डिजाइन दिखातीं। हिंदी के लेखक बच्चों की तरह ऐसे रोज़ कोई चीज़ दिखाते। दिखाते कि देखो मेरे पास कितनी अच्छी चीज़ है। लेखक लिखने की मेज़ पर नहीं, यहाँ ख़ुद को दिखाते-दिखाते अपनी जान देना चाहते थे। वे समझते थे कि प्रसिद्ध होने की असली जगह पाठकों का संसार नहीं है, बल्कि जो है—यह आभासी दुनिया है। यहाँ दिखा दिया तो समझो कि मशहूर होने की दुनिया को फ़तह कर लिया। वास्तव में ये ख़ुद को इतना ज़्यादा समझदार समझते थे कि सिर्फ़ यह समझते थे लोग उनका चेहरा देखते है। उनकी आँखें, आँखों का काजल देखते है। गुलाबी होंठ देखते है, होंठों की लाली देखते है। स्निग्ध कपोल देखते है, कोमलता और सुंदरता देखते है। वे यह देख नहीं पाते थे कि कुछ लोग ऐसे भी है, जो आगे से जितना देखते है, पीछे से भी उतना देखते हैं। यही कुछ लोग थे, जो सचमुच बहुत कम कुछ लोग थे, जो लेखक का विचार देखते थे तो उसका आचरण भी देखते थे। उसकी कविता देखते थे, तो उसका जीवन भी देखते थे। लेखक का पुरस्कार देखते थे तो पुरस्कार पाने के लिए घिसे हुए उसके घुटने को देखते थे, जूते और जूतियों के घिस गये तल्ले को देखते थे, और तो और पुरस्कार पाने वाले का चूतड़ देखते थे, उस पर पुरस्कार देने वाले का ठप्पा देखते थे। एक पंक्ति में कहूँ तो जहाँ सबने इस माध्यम का इस्तेमाल प्रदर्शन के लिए किया, अपना चेहरा चमकाने के लिए किया, अरे भाई जेएनयू का वह प्रोफ़ेसर भी अपने उपन्यास पर दक्षिण के किसी विश्वविद्यालय के एमए की छात्रा द्वारा लिखे गए लघुशोघप्रबंध के कवर पेज की फ़ोटो यहाँ दिखा रहा था। इससे बड़ा चूतियापा इस माध्यम पर दूसरा नहीं हो सकता था। वही उदय जैसे लोगों ने इस माध्यम का इस्तेमाल साहित्य की मुख्यधारा में हस्तक्षेप करने के लिए किया था। साहित्य के भ्रष्टाचार और पुरस्कार के अंधविश्वास के ख़िलाफ़ अभियान चलाने के लिए किया था। उदय जैसे लोग बहुत कम थे, जबकि सोशल मीडिया ऐसे लोगों से लबालब था जो अपना चेहरा दिखाने और चमकाने आते थे और चूतड़ दिखाते रहते थे। हिंदी के ऐसे लेखकों की यहाँ भरमार थी। बूढ़े, कम बूढ़े, युवा, ज़्यादा युवा लेखकों; बूढ़ी, कम बूढ़ी, प्रौढ़, युवा और बिल्कुल युवा लेखिकाओं का मजमा लगा हुआ था। जो लेखक नहीं था, वह भी लेखक के रूप में मशहूर होना चाहता था। हर कोई अधिक से अधिक मशहूर होना चाहता था, दूसरे के सिर पर पैर रखकर आगे निकल जाना चाहता था, किसी मठाधीश, उपमठाधीश का चरणरज मुँह पर मलकर चाहे माँग में सजाकर अखंड सौभाग्यवती हो जाना चाहता था। कह सकते हैं कि एक ऐसा हम्माम था, जिसमें औरत-मर्द सब नंगे थे। मज़े की बात यह थी कि पहनते थे अच्छे से अच्छा क़ीमती कपड़ा और दिखते थे नंगे। उदय ने यह सब बताया नहीं होता तो मैं जान भी नहीं पाता कि साइंस ने लेखकों और लेखिकाओं को इस तरह से सामूहिक रूप से नंगा होने की कोई जगह ईजाद की है, जो न धरती पर है, न आसमान में; न काग़ज़ पर है, न भोजपत्र में। जंकामंका सर सोशल मीडिया पर नहीं थे, मशहूर सिंह भी नहीं थे, हँसमुख वाजपेयी वग़ैरा भी लगभग नहीं थे। जो यहाँ नहीं थे। कहीं और लंबा हाथ मार रहे थे। फ़ाउंडेशन चला रहे थे, पत्रिका निकाल रहे थे, साहित्य अकादेमी और भारत भवन जैसी संस्थाओं को लूट रहे थे। उनका उद्देश्य साहित्य का उद्देश्य हासिल करना नहीं था, बल्कि साहित्य की सत्ता हासिल करना था। साहित्य के शक्तिकेंद्रों पर क़ब्ज़ा करना था।

जंकामंका सर सचमुच के चोर तो नहीं थे, लेकिन साहित्य में सेंध बहुत अच्छे से लगाते थे। उन्होंने ज़बरदस्त काम किया। राजधानी के तोप लेखक समझे जाने वाले मशहूर सिंह, हँसमुख वाजपेयी जैसे लोग अपनी-अपनी गद्दी पर, चाहे पालकी में बैठ-बैठे हुक्का पीते रह गए, बल्कि कह सकते हैं कि देश भर के मंचों पर लगाए जाने वाले साहित्य के हुक़्क़ाबारों का उद्धाटन करते रह गए और पट्ठे ने साहित्य अकादेमी की सबसे बड़ी कुर्सी को हथिया लिया था। जंकामंका शास्त्री की यह कामयाबी हैरतअंगेज थी। मशहूर सिंह, हँसमुख वाजपेयी जैसे लोगों ने यह कभी सपने में भी यह नहीं सोचा होगा कि ऐसा भी दिन देखना पड़ेगा कि गंज गोबरहवा से आकर कोई जंकामंका शास्त्री उनकी दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लेगा और वह हाथ पर हाथ धरे रह जाएँगे। साहित्य की दिल्ली सदमे थी और जंकामंका गैंग मज़े कर रहा था। जुलूस निकाल रहा था। जंकामंका शास्त्री दिल्ली फ़तह करने के बाद पहली बार दिल्ली से आए तो ट्रेन के एसी टू टियर के डिब्बे से उतरते ही बल्ली, हौदा, असीम सर, लाल सर, प्रोफ़ेसर साथी और हाथी, प्रोफ़ेसर कीट और पतंग वग़ैरा ने जंकामंका सर को फूल-मालाओं से लाद दिया था। और तो और मल्लिका मैडम ने भीड़ में दरेरा देकर जंकामंका सर को फूलों की माला पहनाने के बाद कान में बधाई देते समय, हल्के से मुँह घुमाकर उनके गाल को हल्का-सा चूम भी लिया था। यह अलग बात है कि मल्लिका मैडम ने चुंबन-प्रसंग की किसी को ख़बर नहीं होने दी थी। बग़ल में खड़े बल्ली और हौदा अख़बार के फ़ोटोग्राफ़रों को जंकामंका सर का बढ़िया फ़ोटो लेने के लिए कहते रह गए और उन्हें ख़बर ही नहीं हुई कि मल्लिका मैडम ने कोई कांड कर दिया है। सच तो यह कि मैडम मल्लिका मैडम ने यह कांड जानबूझकर नहीं किया था। वह कान में बधाई दे रही थी, उनका मुँह अपने आप कुछ डिग्री धूम गया था और होंठों ने मल्लिका से पूछे बिना जंकामंका सर को चूम लिया था। जंकामंका सर को भी ख़बर नहीं हुई, वह तो फूल-मालाओं और बैंड-बाजे के नशे में थे, उन्होने समझा कि मल्लिका बधाई दे रही हैं और बधाई दे लेने दिया, बस! इस तरह हिंदी इतिहास में यह लघु चुंबन-प्रसंग हमेशा-हमेशा के लिए दब गया था। कितना शोर था, बैंड-बाजे का इंतज़ाम बल्ली और हौदा ने बहुत शानदार किया था। इतना शानदार कि बैंड-बाजे के शोर में जाती हुई गाड़ी के इंजन और उसकी सीटी की आवाज़ भी उसमें दब गई थी। 

जंकामंका सर दिल्ली फ़तह करके लौटे थे। बल्ली और हौदा तो हाथी और घोड़े का जुलूस निकालना चाहते थे, लेकिन बाद में असीम सर ने कहा कि नहीं, हाथी-घोड़े से लगेगा कि जंकामंका सर सामंती हैं, इसलिए मोटर साइकिलों का जुलूस ठीक रहेगा, साहित्य की मार्क्सवादी दिल्ली को फ़तह किया है तो यह दिखना भी चाहिए यह हिंदी के मार्क्सवादियों पर, सोशलिस्टों की जीत है, गांधीवादियों की जीत है। हालाँकि इसे मार्क्सवादियों के बीच फ़ाशिस्टों की जीत कहा गया था। मज़े की बात, नहीं-नहीं, गिरी हुई बात कहें, कि इन्हीं मार्क्सवादियों ने जिन्हें फ़ाशिस्ट कहा, उसी के हाथ से सम्मान भी लिया। उसी के न्योते पर अकादेमी में दौड़-दौड़कर गए भी। कुछ मार्क्सवादी तो प्रोफ़ेसर साथी और हाथी जैसे बड़े मार्क्सवादियों की तरह, जंकामंका सर के सामने श्वान-मुद्रा में बैठे भी रहे। अकादेमी में कविता पढ़ने वाले नीच मार्क्सवादियों की फ़ेहरिस्त लंबी थी। झंकार मुझसे पूछता, “भाई संटी, हिंदी में नीच मार्क्सवादी ही क्यों होते हैं? निर्मल आचरण और दृढ़ चरित्र वाले उच्च मार्क्सवादी क्यों नहीं होते हैं?” झंकार ने पूछा तो यह भी कि ये मार्क्सवादी, ग़ैर-मार्क्सवादियों की तरह मशहूर होने और पुरस्कार पाने के लिए गाँड़ क्यों मराते हैं? अफ़सोस, मैं गाँड़ मराना लिख नहीं सकता था, इसलिए इसकी जगह शुद्ध तत्सम भाषा में लिखा कि ये नीच मार्क्सवादी, नीच ग़ैर-मार्क्सवादियों की तरह यश और पुरस्कार के लिए मठाधीशों का नित्य-पृष्ठ-प्रक्षालन करते थे। मराना क्रिया बदलकर धुलना कर दिया है। अस्ल में आज़ादी के बाद से ही हिंदी के शक्तिकेंद्रों पर बेईमान मार्क्सवादियों ने क़ब्ज़ा कर लिया था। प्रकाशनगृह हों या संस्थाएँ, सब उनके चंगुल में थीं। हिंदी के लेखकों और लेखिकाओं की सचमुच की इज़्ज़त उनके चंगुल में तो थी ही।  

जंकामंका सर चूँकि बहुत कम कौड़ी के लेखक थे, इसलिए अकादेमी फ़तह करने के बाद भी साहित्य की दिल्ली को फ़तह नहीं कर पाए थे। क्योकि इसके बाद भी दिल्ली में उनकी कोई इज़्ज़त नहीं थी। साहित्य अकादेमी की कुर्सी पर चाहे जितना हुमुचकर बैठ लें, लेकिन दिल्ली में किसी आयोजन की अध्यक्षता उनके भाग्य में नहीं लिखी थी। वह न तो मशहूर सिंह की तरह बड़े आलोचक थे, न हँसमुख वाजपेयी की तरह दंद-फंद वाले साहित्य के सर्कस के सबसे बड़े रिंगमास्टर थे। हिंदी साहित्य के इतिहास में भले हँसमुख वाजपेयी का नाम कवि और आलोचक के रूप में रोशनाई या बैल के मूत्र से भी न लिखा जाए, लेकिन उनके वाजपेयी सर्कस का उल्लेख जरूर किया जाएगा। कोई और न भी करे तो भी कोई बात नहीं, मैं ज़रूर करूँगा। इतनी कृपा तो मैं हँसमुख भाई पर कर ही सकता हूँ। हिंदी साहित्य में इतना बड़ा सर्कस कभी नहीं हुआ था। इन मशहूर सिंहों और हँसमुखों ने अपनी तरफ़ से हिंदी को जितना नुक़सान किया, उससे कम तो जंकामंका ने भी नहीं किया। फिर भी जंकामंका और हँसमुख में मूलभूत अंतर यह था कि जंकामंका पर स्त्री को बुरी नज़र से नहीं देखते थे और हँसमुख के लिए पृथ्वी पर कोई भी योनि वर्जित नहीं थी। जहाँ जंकामंका गैंग में एक मल्लिका मणि मंजुला थीं; वहीं हँसमुख के सर्कस में अनेक मल्लिकाएँ, मणियाँ ओर मंजुलाएँ थीं।

सोशल मीडिया पर कॉकटेल पार्टी की जो तस्वीरें वायरल हो रही थीं, उसमें सच्चाई थी। एक फ़ोटो में सभी लेखकों और लेखिकाओं को दिखा पाना संभव नहीं था। संख्या काफ़ी थी और चार-छह के समूह दसियों थे। सो तस्वीरें अलग-अलग थीं। कुछ की नहीं भी थीं। हर समूह में हँसमुख का खिला हुआ चेहरा, झूमती हुई धज और चिपक जाने के लिए आमंत्रण देता प्याज़ी रंग का कुर्ता बाँहें फैला रहा था। इन समूहों में अलग-अलग क़िस्म की मदिरा, एक ख़ास क़िस्म के प्याले में लिए लेखिकाएँ और लेखक, आधा खड़े थे और आधा झूम रहे थे। चूँकि धुरहू प्रसाद जी पीते नहीं थे, इसलिए चाहकर भी शराब की क़िस्मों के नाम नहीं बता पा रहे थे। वे दैवयोग से अकस्मात् उस पार्टी में पहुँच गए थे, न किसी ने उन्हें बुलाया था, न किसी ने भगाया ही। उन्होंने हँसमुख वाजपेयी को अपने हाथों से बनाकर हज़ारों बार चाय पिलाई थी। हँसमुख वाजपेयी ने तो उनके आने पर ख़ुशी ज़ाहिर की। धुरहू प्रसाद का ध्यान जितना लेखिकाओं को देखने पर था, उतना ही हँसमुख की ख़ुशी पर। उन्होंने देखा कि सभी लेखिकाएँ, हाथ में प्याला लिए हँसमुख वाजपेयी की आँखों में आँखें डालकर, लाल-लाल डोरे वाली आँखों से झक सफ़ेद चाँदी जैसे बालों वाले हँसमुख को देखते हुए जर्जर भिक्षु-जर्जर भिक्षु इस अदा से कह रही थीं, जैसे पूरा जर्जर भिक्षु आज ही और अभी पी जाएँगी। धुरहू प्रसाद जी ने ही बताया था कमलकांत त्रिपाठी बकचोंच की तरह, मतलब कि बगुले की तरह गर्दन उठाकर और चोंच निकालकर लेखिकाओं को ताड़ रहा था। उसे कुछ लेखिकाएँ हचबैक कार की तरह लग रही थीं, कुछ सेडान की तरह, तो कुछ लेखिकाएँ एसयूवी की तरह। कभी-कभी तो कमलकांत त्रिपाठी का दिल मिनी ट्रक पर भी आ जाता था। धुरहू प्रसाद जी ने यह भी बताया था कि कमलकांत त्रिपाठी लेखिकाओं की किताब नहीं, सिर्फ़ उन्हें देखकर रिव्यू लिखता था। एक बार तो उसने हिंदी के एक बस पर रिव्यू की जगह पूरा लेख ही लिख दिया था। असल में कमलकांत त्रिपाठी, हँसमुख वाजपेयी का भक्त था। भक्त तो वह जंकामंका का भी था। हँसमुख का मुख हँसता हुआ नूरानी चेहरा था, तो कमलकांत का बकचोंच की तरह। इसी कमलाकांत ने पहली बार हँसमुख पर बोलते हुए कहा था, जिसे बाद में अपने लेख के आरंभ में ही लिखा था—“हिंदी के प्रथम संस्कृति पुरुष हँसमुख वाजपेयी, दरअसल हिंदी के रवींद्रनाथ टैगोर हैं। हिंदी आलोचना में जो काम आचार्य शुक्ल भी नहीं कर सके, वह वाजपेयी जी ने किया है, आलोचना की बंजर धरती को कोड़ा है, नई इमारत खड़ी की है, कलाओं के लिए खिड़की नहीं, पूरा दरवाज़ा ही खोल दिया है, नवाचार किया है।” कमलकांत इस वक़्त भी लेखिकाओं के समूह में घूम-घूमकर हँस-हँसकर हँसमुख वाजपेयी की बड़ाई कर रहा था, उन्हें क्रिकेट के भगवान् की तरह हिंदी का भगवान कह रहा था। उसकी इन बातों से कई लेखिकाओं के मन में विचित्र साध होने लगी थीं, कुछ तो ख़ुद को तिलोत्तमा, मेनका वग़ैरा बनने का ख़्वाब देखने लगी थीं। इस समय जिस समूह की युवा और दो अधेड़ स्त्रियों के साथ हँसमुख हँस-हँसकर बातें कर रहे थे, उसमें से एक युवा लेखिका मनीषा माथुर, जो उनकी बेटी की उम्र की थी, उनकी आँखों में घुसी जा रही थी। लगातार घुसी जा रही थी। अब तो जवाब में हँसमुख को भी उसकी लाल-लाल डोरे वाली आँखों में घुसना लाज़िम हो गया था। मनीषा माथुर का प्याला ख़ाली हो चुका था, लेकिन वह भरी हुई थी। हँसमुख, उसकी आँखों में डूबकर जितना बेचैन हो रहे थे, उससे ज़्यादा उसके ख़ाली प्याले को देखकर हो रहे थे। इससे पहले कि कोई आता और युवा लेखिका का प्याला भरता, हँसमुख वाजपेयी ख़ुद उसके लिए दूसरा भरा प्याला लेकर हाज़िर हो गए थे। एक हाथ से प्याला पकड़ाया और दूसरा हाथ कंधे पर रखते हुए कहा था, “आप बहुत अच्छा लिखती हैं। आपका संग्रह आना चाहिए। युवा लेखिका की आँखों के डोरे और लाल हो गए थे...” उसने पूछा, “मैं आपको अपनी पांडुलिपि दिखा सकती हूँ? ब्लर्ब लिखवा सकती हूँ?” “हाँ-हाँ क्यों नहीं? आप जब चाहें आ जाएँ।” हँसमुख कह तो दिए कि जब चाहें आ जाएँ, लेकिन उनसे ग़लती हो गई थी, वह पछताने लगे थे। कहना चाहते थे कि अभी चलिए, लेकिन कह दिया कुछ और। तब तक एक अद्भुत बात हुई, मनीषा माथुर ने हँसमुख वाजपेयी के कान में मुँह सटाकर बहुत धीरे से पूछा, “सर क्या मैं आपके लिए करवा का व्रत रख सकती हूँ?” हँसमुख के गाल हो गए थे। उन्होंने भी मनीषा माथुर के कान में मुँह सटाकर कहा था, “हाँ-हाँ, क्यों नहीं, मुझे ख़ुशी होगी।” उस रात मनीषा माथुर हँसमुख वाजपेयी की चौदहवीं प्रेमिका बन चुकी थी। हँसमुख चाहते थे कि पार्टी आज रात ख़त्म ही न हो। हो भी यही रहा था।

कॉकटेल पार्टी पार्टी ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी। हँसमुख घूम-घूमकर लेखिकाओं से बातें कर रहे थे, उनके लाल-लाल डोरे और उनकी उन ख़ूबियों पर ग़ौर कर रहे थे, जिस वजह से कमलकांत त्रिपाठी उन्हें, हचबैक, सेडान, एसयूवी और मिनी ट्रक वग़ैरा कहता था। हँसमुख वाजपेयी घूमना बंद करके किसी कुर्सी पर बैठ जाते, तो लेखिकाएँ आकर उनकी कुर्सी को घेर लेतीं। एक अधिक तंदुरुस्त लेखिका सीमा कुमार, मदभरी आँखों से पिलाते-पिलाते हाथों से पिलाने लगती थी। वैसे इन सभी लेखिकाओं की दिलचस्पी बुड्ढे हँसमुख में क़तई नहीं थीं। वे तो उसे फ़ाउंडेशन समझती थीं, फ़ंड समझती थीं, विश्वप्रसिद्ध आयोजक समझती थीं, उसके साथ आयोजन में देश-विदेश में घूमने के लिए मरी जाती थीं, वरना उस थुलथुल पचासी साल के मीयाद हाइल बुड्ढे में क्या पातीं! 

युवा लेखिका मनीषा ने बहुत अधिक पी ली थी। शायद जानबूझकर अधिक पी ली थी, वह कंट्रोल में नहीं थी। शायद वह कंट्रोल में रहना ही नहीं चाहती थी। वह बार-बार हँसमुख से कह रही थी कि मेरी पांडुलिपि देखिए। हँसमुख को लगा कि झूमती हुई लेखिका कहीं सबके सामने उनके ऊपर ही न ढह जाए। उन्होंने उससे पूछा, “आपको घर छोड़ दें?” युवा लेखिका यही तो चाह रही थी कि हँसमुख वाजपेयी सर उसे छोड़ने के लिए उसके फ़्लैट तक ख़ुद चलें। धुरहू प्रसाद जी ने आगे बताया कि कार की अगली सीट पर बैठाने के बाद हँसमुख वाजपेयी, चलती हुई पार्टी छोड़कर उसे उसके फ़्लैट पर छोड़ने चले गए थे। लौटे कब किसी को पता नहीं था। धुरहू प्रसाद जी के श्रीमुख से पार्टी प्रसंग सुनने के बाद और सारे वायरल फ़ोटो देखने के बाद उदय ग़ुस्से में था। हिंदी विभाग के अपने कमरे में बैठकर हँसमुख पर गालियों की बौछार कर रहा था। कह रहा था कि बेटियों की उम्र की लेखिकाओं का जमावड़ा करता है, उन्हें शराब पिलाता है, अमेरिका और फ़्रांस लेकर मॉरीशस और नेपाल तक की सैर कराता हैं। आयोजनों की आड़ में यश और पुरस्कार के जाल में फँसी हुई लेखिकाओं का शोषण करता है। ये लड़कियाँ कैसी हैं, लेखिका बनने के लिए, मशहूर होने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। इनके माँ-बाप और भाई कैसे हैं, इन्हें रोकते क्यों नहीं? ये बच्चियाँ अपने शहर और गाँव-जवार का नाम डुबो रही हैं। तीन बच्चों की माँ वह मोटी थुलथुल लेखिका रीता कुमार और कृशकाय अलका कुमारी़, घर-बार छोड़कर मशहूर होने के लिए देश-विदेश में नाच रही थीं। हँसमुख के मुस्कुराने और उसके बूढ़े दिल को गुदगुदाने का सामान बन रही थीं। उदय ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बहुत पीड़ा से कहा था, “संटी, तुम जानते हो कि जब मेरी बेटी हाईस्कूल में पढ़ रही थी, तो उसे कविता लिखने से इसीलिए मना कर दिया था... कहा था कि पहले पढ़ाई करो। अस्ल में आज़ादी के बाद लेखकों में चारित्रिक पतन का दौर शुरू हो गया था। दूसरी पत्नी और दूसरी-तीसरी प्रेयसी का सिद्धांत चल निकला था। साहित्य में महिलाओं के लिए यह दुनिया पहले भी गंदी थी, आज तो और गंदी इसलिए भी है कि लड़कियाँ छपने और मशहूर होने के लिए मठाधीशों और उपमठाधीशों, संपादकों और आलोचकों को हर तरह से ख़ुद ही बढ़-चढ़कर ख़ुश करने में लगी हुई हैं। स्त्री-विमर्श का मतलब लेखिकाओं के लिए यौन-स्वच्छंदता हो गया है। बहुत बुरा समय है। पुरुष लेखक तो मंच पर, सड़क पर, कहीं भी, पतलून खोलकर लेट जाने के लिए तैयार हैं। क्या मशहूर सिंह, क्या हँसमुख वाजपेयी, सभी बूढ़ों ने कविता और आलोचना का युवा पुरस्कार शुरू करके कई पीढ़ियों को हिंदी का क्लीव लेखक बना दिया है। जिनके पास साहित्य की सत्ताओं के ख़िलाफ़ न तनी हुई गर्दन है, न भिंची हुई मुट्ठी, न उठे हुए हाथ, देह में सिर्फ़ कमर ही कमर है। जिसे जितना चाहो, घुमा लो, नचा लो, पकड़ लो। यही सब आज का हिंदी साहित्य है। पचासी की उम्र में भी हँसमुख की जवानी टस से मस नहीं हो रही थी और जंकामंका की तो जवानी अभी ठीक से शुरू ही नहीं हो पा रही थी। हालाँकि जंकामंका सर के दो-चार बाल तो तभी सफ़ेद थे जब वह पैदा हुए थे। बताते हैं कि शुरू से ही बूढ़े लगते थे। कोई छिपी हुई जवानी उनके पास रही हो, तो भी किसी ने कभी भी उन पर हँसमुख जैसी किसी जवानी को या उस तरह की आधी अधूरी जवानी को नहीं देखा था। हो सकता है कि अपनी जवानी को किसी गुप्त जगह पर रखते रहे हों। शायद खैनी के लिए जो चुनौटी साथ लेकर चलते थे, उसमें रखते रहे हों। उसमें तो कोई शक भी नहीं कर सकता था। वैसे एक बात हँसमुख और जंकामंका में समान थी, मशहूर सिंह के निस्तेज होने के बाद जंकामका ने अपना प्रभाव काफ़ी बढ़ा लिया था। हँसमुख ने अपने फ़ाउंडेशन के शामियाने को तमाम शहरों में फैला लिया था, तो जंकामका ने पवित्र गोबर का प्रभाव देशभर के हिंदी विभागों में बढ़ा लिया था। हँसमुख जहाँ लेखकों और लेखिकाओं के बीच लेखक बनकर घूमते थे, वहीं जंकामंका हिंदी के मास्टरों के बीच मास्टर बनकर विचरण करते थे। जबकि उनके विभाग का लेखक उदय उन्हें लेखक के रूप में बहुत औसत समझता था। कहता रहता था कि जंकामंका ने ऐसा क्या लिखा है, जिसे कहा जा सके कि पैदा नहीं हुए होते तो ऐसा लिखा नहीं गया होता।

यह समय हिंदी में औसत का स्वर्णकाल था। मुश्किल काम में कोई हाथ नहीं डालता था। नक़ल करो और छा जाओ, नाचो और छा जाओ, लेट जाओ और छा जाओ, इस दौर के प्रमुख मुहावरे थे। पहले के लेखक अच्छा काम करने में यक़ीन करते थे, इस समय के लेखक हर मंच पर दिखने, मशहूर होने और पुरस्कार लेने में यक़ीन करते थे। पहले के लेखक ज़्यादा समय अपने ठीहे पर होते थे, आज के लेखक ज़्यादा समय अपने-अपने शहर और गाँव से निकलकर दिल्ली में अपनी नृत्यकला का प्रदर्शन करने में लगाते थे। धरती पर धरती का गुरुत्वाकर्षण काम करता था, तो साहित्य की धरती पर दिल्ली का गुरुत्वाकर्षण। सभी लेखक खिंचे चले आते थे, दिल्ली में। जैसे असंख्य धर्मपरायण जनता, तीर्थों की ओर भागती है। दिल्ली में साहित्य के शक्तिकेंद्रों के उदय ने दिल्ली को इलाहाबाद, काशी, लखनऊ वग़ैरा से कहीं ज़्यादा ताक़तवर बना दिया था। साहित्य अकादेमी और ख़ासतौर से बड़े-बड़े प्रकाशन केंद्रों की वजह से दिल्ली की ओर भागना, हर लेखक की नियति बन गई थी। सारे मठाधीश वहीं थे, सारे लेखक संगठन, बड़ी पत्रिकाएँ वहीं थीं, बड़े प्रकाशक वहीं थे, चमकने और मशहूर होने के सारे इंतजाम वहीं थे। बीसवीं सदी की आख़िरी चौथाई तक आते-आते लेखक का पैर दिल्ली में होता था, वह उसे वहीं गाड़ देता था, दूसरा उसके साथ होता था। लेखक देश भर में एक पैर लेकर घूमता था। एक पैर लेकर ड्यूटी पर जाता था, एक पैर लेकर बीवी को सिनेमा दिखाने ले जाता था, एक पैर से स्कूटर पर बच्चों को स्कूल छोड़ने जाता था। दरअस्ल, एक पैर वाले लेखकों का यह स्वर्णकाल था। जिसके दोनों पैर उसके साथ थे, दोनों हाथ उसके साथ थे, जिसकी गर्दन उसके साथ थी, जिसका शीश उसके साथ था, जिसकी आज़ादी उसके साथ थी, वह हिंदी का सबसे अभागा लेखक था। सारे दुख उसके हिस्से में थे। कोई लेखक उसके साथ नहीं था। पहले उसके शहर के लेखकों ने चाहना शुरू किया कि उदय भी बाक़ी लेखकों की तरह जंकामंका गैंग के सामने नंग-धड़ंग लेट जाए। फिर यह बात देश भर के लेखकों को मालूम हुई कि गंज गोबरहवा में कोई लेखक ऐसा भी है, जो साहित्य की सत्ताओं के सामने पतलून नहीं खोलता है, तो देश भर के लेखक चाहने लगे कि उसके साथ भी वह सब होना अनिवार्य है, जो उन सबके साथ हुआ है। सब चाहते थे कि उदय की इज़्ज़त भी उसी तरह चली जाए, जैसे उन सबकी गई है। उसके मुँह पर, ख़ासतौर से उसके चूतड़ पर, साहित्य के राजाओं और ज़मीदारों का ठप्पा लग जाए। साहित्य की मुख्यधारा कोई पवित्र नदी नहीं रह गई थी। वह बहुत मैली हो गई थी, जिसमें हर लेखक की गंदगी शामिल थी। ज़ाहिर है, साहित्य की मुख्यधारा का हेड ऑफ़िस दिल्ली में ही था और उसका आतंक देश भर में था। जिनके लिए दिल्ली पहुँचना आसान था, जिनका एक पैर दिल्ली में था, दिल्ली उनके दोनों हाथ में थी, लड्डू की तरह, नहीं-नहीं, अलादीन के चराग़ की तरह और जो दिल्ली से दूर था, साहित्य के उजाले से दूर था। अँधेरे में था। उदय की मुश्किल यह थी कि जिसे हिंदी के लेखक साहित्य का उजाला कहते थे, उसे उदय साहित्य का अँधेरा कहता था, दासता कहता था, अपसंस्कृति कहता था। उसकी लड़ाई हिंदी के इसी अँधेरे से थी।

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जारी...

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