धारावाहिक उपन्यास : जंकामंका गैंग : अब पद नहीं, कुपद चलता है
गणेश पाण्डेय
18 अगस्त 2026
गताध्याय से आगे...
आठ
उदय के बड़े-बुज़ुर्गों ने उदय से कभी पूछा ही नहीं कि तुम्हें हुआ क्या है, तुम क्यों दुखी रहते हो, आओ मेरे पास बैठो, मुझे बताओ, क्यों तुम ज़माने से ख़फ़ा हो? साहित्य की दुनिया में उदय बिल्कुल अकेला हो गया था, बल्कि कहना चाहिए कि कर दिया गया था। हिंदी विभाग के अपने कमरे में घंटों गुमसुम बैठा रहता। कभी बाहर हिंदी विभाग के कैंपस में लगे सीता अशोक के वृक्ष के नीचे आकर, उसके तने से पीठ टिकाकर बैठ जाता। हिंदी के मनुष्यों ने उसे बहुत निराश किया था। वह पशु-पक्षी, वृक्षों और वनस्पतियों में अपनत्व ढूँढ़ता था। अनुभव करता कि यह मनुष्येतर दुनिया बहुत पवित्र है, बहुत आत्मीय है, बहुत मानवीय भी है, यह उसके साथ छल नहीं करेगी, उसे धोखा नहीं देगी, उसकी पीठ में छुरा नहीं घोपेगी, उसे प्यार देगी, भरोसा देगी। वह उनके बीच अपना दुख, अपनी निराशा, अपने अकेलेपन को भूल जाता था। सीता अशोक का वृक्ष उसके सखा की तरह उसके आँसुओं को पोंछ देता था। हिंदी विभाग ही नहीं, पूरी हिंदी की दुनिया उससे ख़फ़ा थी। दिल्ली के लेखक, आलोचक, संपादक सब ख़फा थे कि वह अपने लेखों में, अपनी टिप्पणियों में साहित्य की सत्ताओं के ख़िलाफ़ आग क्यों उगलता है? साहित्य के सभी शक्तिकेंद्रों के विरुद्ध क्यों लिखता था, साहित्य की मुख्यधारा को मैली क्यों कहता था? साहित्य अकादेमी, भारतभवन जैसी सभी सरकारी और ग़ैर-सरकारी संस्थाओं में मुहल्लाछाप लेखकों और चापलूसों की जुटान पर ख़फ़ा क्यों रहता था? वह साहित्य में शुचिता की बात क्यों करता था? मुख्यधारा के लेखकों को बेईमान क्यों कहता था? बेईमान और नाम-इनाम के पीछे भागने वाले लेखकों को, ईमानदार लेखक, स्वाभिमानी लेखक, कबीर और निराला वगैरा का साहित्यिक वंशज क्यों नहीं मानता था? साहित्य में जो काला था, उसे सफ़ेद क्यों नहीं कहता था? गंज गोबरहवा के गैंग और दिल्ली के गैंग की अधीनता क्यों नहीं स्वीकार करता था? दिल्ली की तोपों से ज़्यादा ख़फ़ा दिल्ली की छोटी तोपें थीं। मठाधीशों और साहित्य के नये शक्तिकेंद्रों के युवा कारकुन उसका नाम आते ही पाजामे से बाहर हो जाते थे, गंज गोबरहवा का कोई शख़्स पूरी मुख्यधारा को, मुख्यधारा के पुरस्कारों के खेल को साहित्य की अपसंस्कृति कैसे कह सकता है? कैसे कह सकता है कि जब अन्न खाने का तर्क है, शौच न खाने का तर्क है, तो पुरस्कार लेने का क्या तर्क है, अन्नदाता को, मनुष्यों को जन्म देने वाली माता को, जीवन बचाने वाले चिकित्सकों को और ऐसे दूसरे लोगों के लिए पुरस्कार की ज़रूरत नहीं है, तो किताब लिखने के लिए पुरस्कार की ज़रूरत क्यों है? बड़े प्रकाशन संस्थानों पर उँगली कैसे उठा सकता है? उनके प्रिय कवियों की कमज़ोर कविताओं की धज्जियाँ कैसे उड़ा सकता है? वह अपने लेखों में, टिप्पणियों में साहित्य के अँधेरे के ख़िलाफ़ आग क्यों उगल रहा था? उसे इस विद्रोह की क़ीमत चुकानी पड़ रही थी। उसकी किताबें नहीं छप रही थीं, नए-नए युवा, जो उसके बच्चों की उम्र के थे और प्रकाशन गृहों के उससे बीस-पच्चीस साल छोटे संपादक थे, उसे दुरुस्त करना चाहते थे, उसके स्वाभिमान और विद्रोह को कुचल देना चाहते थे, लेकिन अपनी प्रतिभा से नहीं, प्रकाशन के लिए किताबों के चुनाव के अपने अधिकार से। इन्हीं दिनों जब जिन संस्थानों से उसकी किताबें छपती रही हैं, उन्होंने उसकी किताबों को छापने से इंकार किया तो उसे दूसरे प्रकाशक को छपने के लिए अपना संग्रह देना पड़ा। सोशल मीडिया पर वह कह रहा था कि संग्रह कहीं से भी छपे, कविताएँ बदल नहीं जाती है। बड़े प्रकाशन से छपने वाले सभी संग्रह अच्छे नहीं होते, कुछ में तो नक़ली कविताएँ भरी होती हैं। छोटे प्रकाशकों के यहाँ से भी अच्छे संग्रह छपते हैं। वह दहाड़कर कहता था किसी प्रकाशक के बड़े प्रकाशन गृह होने का क्या मतलब, अगर वह मुहल्लास्तर के कवियों को, नक़ली कवियों के संग्रह छापता है, आख़िर वह अपने समय की कविता में हस्तक्षेप करने वाले कवियों को क्यों नहीं छापता है; क्या इसलिए कि ऐसे कवि, भ्रष्ट लेखक संगठनों और मठाधीशों की अधीनता स्वीकार नहीं करते हैं? आख़िर ये नए संपादक अपने पिता की उम्र के कवियों का शीश अपने सामने झुका हुआ क्यों देखना चाहते हैं? बहुत स्वाभिमानी और साहसी कवियों के संग्रह और उनकी गद्य की किताबें क्यों नहीं छापना चाहते थे? किसी लेखक के लिए दिल्ली जाकर साष्टांग दंडवत् होकर नाक रगड़ना क्यों ज़रूरी हो गया था? नए संपादक जिन्होंने अपनी यात्रा अभी-अभी शुरू ही की थी वे भी चाहते थे कि उदय शंकर शुक्ल को अस्त शंकर शुक्ल बना दिया जाय। उदय था कि मानता ही नहीं था। कैसे मानता भला, जब उसने मशहूर सिंह के गैंग को, हँसमुख वाजपेयी के गैंग को, सुकुमार सिंह के गैंग को, जंकामंका सर के गैंग को बाल बराबर भी नहीं समझता था, तो उनके सामने किताब छपवाने के लिए, बच्चा संपादकों को अपना बाप कैसे मान लेता? इन्हीं दिनों जब एक इंटरव्यू शृंखला की ख़ूब चर्चा थी, जंकामंका शास्त्री जैसे परम धूर्त लेखक भी इंटरव्यू दे आए थे, तमाम उदय से छोटे लेखक दे आए थे, फिर वह क्यों अपने भीतर किसी ऐसी एषणा को रखता? उसकी लड़ाई ही काले को सफ़ेद बनाने की इस हरामज़दगी के ख़िलाफ़ थी। वैसे भी उसने पुरस्कारों के सिरे से विरोध के साथ मंच माइक माला की अपसंस्कृति के खि़लाफ़ भी सोशल मीडिया पर अभियान चला रखा था। पत्रिकाओं में लिख रहा था। गंज गोबरहवा का कोई लेखक उसके साथ नहीं था, लेकिन बाहर के कुछेक लोग, पुरस्कार के विरोध में चलाए जा रहे उसके अभियान के साथ आ रहे थे। लेकिन बच्चे संपादक तो बच्चे भी थे और वज्र अहंकारी भी, वे उसके ख़िलाफ़ इस हद तक थे कि उसका ख़ून भी कर देना चाहते थे। किसी बाण से नहीं, किसी पिस्तौल से नहीं, उसे अप्रकाशित करके। उसके नाम को छिपाकर उसे मिटा देना चाहते थे। उदय को छपने न छपने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला था। उसका काम लिखना था और वह साहित्य के मैदान में एक हाथ से हिंदी के शत्रुओं से लड़ रहा था और दूसरे हाथ से धुआँधार लिख रहा था। उसके पास न दिल्ली जाने का समय था, न दिल्ली को मनाने का, लेकिन वह यह ज़रूर चाहता था कि बाद की पीढ़ी महत्त्व न दे, मंज़ूर है, लेकिन साहित्य के अँधेरे से दूर रहे, साहित्य में अपने विवेक और ईमान को जीवित करे, वह समझे कि उसे क्या करना चाहिए, क्या नहीं, वे साहित्य के अच्छे बच्चे बने। हिंदी के प्रकाशन गृह ‘शीशमहल पब्लिकेशन के प्रमुख संपादक को, वह ज़रूर समझाना चाहता था कि कविता क्या है, कवि होने का क्या अर्थ है, संपादक के विवेक का क्या मतलब है, यह भी बताना चाहता था कि बड़ा संपादक होने के लिए अच्छी रचना का मित्र बनना ज़रूरी होता है, चाहे उसे लिखने वाला उसका शत्रु ही क्यो न हो, जब हम दुश्मन लेखक की अच्छी और मज़बूत रचना या पांडुलिपि को देखकर यह कह सकें कि कमबख़्त लिखता ख़ूब है, तब समझो कि संपादक के रूप में पास हुए।
उदय ने सोशल मीडिया पर कई बार उस युवा संपादक को समझाना चाहा, लेकिन वह समझना ही नहीं चाहता था। सब उदय को हिंदी का एलियन समझते थे। सब उसे नरभक्षी बाघ जैसा कोई लेखक समझते और कहते थे, डरते थे चीर-फाड़ डालेगा, इसलिए उसके निकट नहीं आते थे, सामने से तो उसे कुछ भी नहीं कहते थे, देखते ही हवा टाइट हो जाती थी। डरते थे कि हिंदी साहित्य की कक्षा में खींचकर बैठा देगा, कविता पढ़ाना शुरू कर देगा। यह उदय की बेवक़ूफ़ी थी, मैंने उसे समझाया भी छोड़ो, युवा लेखकों को। उन्हें वयस्क नहीं होना है, तो जाने दो। अपना काम करो। उदय अधिकारप्राप्त युवा संपादकों की जिस पीढ़ी को देख रहा था, वह अपने अधिकार के नशे में यह भूल गई थी कि न उसके पास कोई ढंग का लेख है, न कविता, न कोई कुछ और। प्रकाशन गृह को बाज़ारू और बाहर कूड़ा-करकट छापकर आर्थिक लाभ पहुँचाने की योग्यताओं के आधार पर वह ख़ुद को इतना अधिक शक्तिशाली समझने लगी थी कि उदय तो उदय, उदय के पुरखे लेखकों को भी झिड़क सकती थी कि जाओ बाबा कबीर जाओ अपना रास्ता नापो, कुडलिनी-फुंडलिनी लेकर जाओ, पद-सद अपने झोले में रखो। आज पद नहीं, कुपद चलता है। कविता की जलती हुई लुकाठी हटाओ, बहुत धुआँ हो रहा है, बाबा! जाओ यहाँ से। इतना ही नहीं, कविता के बादशाह कबीर को कविता का भिखारी समझकर जेब से चवन्नी निकालकर उसके मुँह पर ऐसा मारते कि बुज़ुर्गवार कबीर की नाक चोटिल हो जाती, सीधे कहूँ तो नाक ही कट जाती। व्याख्या करूँ तो कविता की नाक कट जाती। जाओ बाबा, यह लुकाठी लेकर चलने वाले, डाँटने-फटकारने वाले बेवक़ूफ़ कवियों का ज़माना नहीं है, मठाधीशों और उनकी पालकी ढोने वालों की पालकी ढोने वाले कवियों का ज़माना है। उनका चूतड़ धुलने वाले कवियों का ज़माना है। मशहूर सिंह की दिल्ली की मशहूर हवेली में नाचने-गाने वाले नचनिया कवियों का ज़माना है। घुटने तक धोती-धोती पहनने वाले कवियों का समय नहीं है। आगे और पीछे चेन लगा हुआ पतनून पहनने वाले कवियों का समय है। इंदौर, दिल्ली, बस्ती, भोपाल और बिहार के चापलूस कवियों का ज़माना है। चूतड़ उठाकर सुगंधित पाद पादने वाले कवियों का ज़माना है, तुम्हारी तरह बात-बात पर ज़हरीली गैस छोड़ने वाले मीयाद हायल कवियों का ज़माना नहीं है। जाओ मगहर में मरो, चाहे लच्छीपुर ख़ास में अपने पागल पड़पोते के साथ मरो, लेकिन यहाँ से जाओ बाबा! बेचारे कबीर अपना पिटा हुआ मुँह लेकर इसलिए लौट आते कि मशहूर सिंह उसकी कविता को ख़राब समझते तो उन्हें जमकर धोते, रगड़-रगड़कर धोते, जलते हुए चैले से उनका चूतड़ दाग़ देते, उनके गुरु हजारीप्रसाद को समझाते, लेकिन अज्ञातकुलशील संपादकों को न समझाने का कोई फ़ायदा नहीं था, न कान उमेठने का। इसलिए कि ये उम्र में उनसे बहुत छोटे थे। बच्चों की उम्र के थे। खेलने-कूदने और सीखने की उम्र में साहित्य का उस्तरा पा गए थे। ग़ुस्सा तो उदय को भी बहुत आता था, लेकिन कम उम्र संपादकों को डाँटना ठीक नहीं समझता था। मशहूर सिंह सामने होते, हँसमुख वाजपेयी होते, जंकामंका शास्त्री होते तो मुँह तोड़ देता। कहता भी कि कोई मेरी उम्र का होता और स्त्रैण कवियों का मजमा लगाता, तो उसका शामियाना फाड़ देता, बिजली की झालर निकालकर फेंक देता, उसे उलटा लटका देता। कविता के लिए जान देने वाले कवियों की कुर्सी पर नचनिया कवियों को बैठाओगे तो उदय तुम्हें छोड़ देगा क्या? कविता तुम्हारा सौ बीघा पोदीने का खेत नहीं है, बच्चू। क़लम पकड़ने की तमीज़ नहीं है और चले हैं कविता का बादशाह बनने। ख़ैर मनाओ कि तुम सब उदय की पीढ़ी के कमलकांत त्रिपाठी नहीं हो, नहीं तो उदय तुम लोगों को उसी दिल्ली में दौड़ाकर पीटता, कपड़े फाड़ देता, मारता ही जाता। भागते-भागते तुम्हें पतलून पहनने के लिए रुकने का भी समय नहीं मिलता। अच्छा हुआ कि उदय के बच्चों की उम्र के हो। उदय तुमको बाप, ताऊ और चाचा की नज़र से देखता है। उसने कविता के लिए, हिंदी के लिए लड़ाइयाँ लड़ी हैं, साहित्य में गाँड़ नहीं मराया है, तुम लोगों ने तो अभी बेंत की झाड़ू से एक सींक निकालकर भी हिंदी के लिए कोई लड़ाई नहीं की होगी। उदय शीशमहल पब्लिकेशन से इसलिए नहीं कविता-संग्रह छपाना चाहता था कि इससे अमर हो जाएगा, बल्कि उसकी लड़ाई यह थी कि अगर कोई प्रकाशक सबसे बड़ा है, तो वह सबसे मज़बूत कविता, अपने समय की मुख्यधारा में हस्तक्षेप करने वाली कविता क्यों नहीं छापेगा, वह मर्द कवियों को क्यों नहीं छापेगा, नामर्द कवियों को क्यों छापेगा? उदय का असल सवाल यह था कि कोई भी किताब, किसी की भी किताब, मेरिट पर क्यों नहीं छापोगे, इतर कारणों से क्यों छापोगे?
कोई लेखक बिहार का नहीं है, कोई लेखक कोमलांगी स्त्री नहीं है, कोई लेखक तुम्हारे संपादक को अपना सर्वस्व न्यौछावर नहीं कर सकता है, किसी लेखक-संगठन में नहीं है, किसी गैंग में नहीं है, फटकारकर हिंदी साहित्य का सच बोलेगा, हिंदी के भड़ुवों को जूता निकालकर दौड़ा लेगा, तो तुम उसकी किताब नहीं छापोगे? तुम्हारा प्रकाशन साहित्य का मंदिर नहीं है, तुम उसे कोठा बना दोगे, तो उदय तुम्हें छोड़ेगा? चूतड़ लाल कर देगा।
उदय के संघर्ष को मैंने देखा है। उदय को तीन बार स्कूटर-दुर्घटना में मरने से बचते हुए मैंने देखा है, मर गया होता तो उसके बच्चों का क्या होता, हिंदी के राक्षसों से की जाने वाली लड़ाई और हरदम भयंकर तनाव में रहते हुए उसे देखा है। तुम लोग अपनी वेबसाइट पर उसकी कविताएँ नहीं लगाओगे, उसकी किताबें नहीं छापोगे तो मर जाएगा क्या, लिखना बंद कर देगा क्या? नोट कर लो, उदय आग उगलना कभी बंद नहीं करेगा, चाहे ज़माना हिंदी की चमचम की थाल सजाकर उसके सामने रख दे, चाहे सोने का मुकुट और छत्र उसके सिर पर सजा दे, चाहे उसे बंदूक़ की गोलियों से भून दे, उसके मुँह पर कालिख पोत दे, कुछ भी कर दे, वह साहित्य का सच कहना बंद नहीं करेगा। लेखकों के अधोवस्त्र के द़ाग दिखाना हरगिज़-हरगिज़ बंद नहीं करेगा।
इतना तो जानता हूँ कि इतिहास प्राइवेट ही सही, टूटा-फूटा ही सही, लिखने वाले को तटस्थ होना चाहिए। उन लेखकों पर भी सहानुभूतिपूर्वक विचार करना चाहिए जिन्होंने माँ की कोख से जन्म नहीं लिया है। कहीं और से पैदा हुए है। उनकी इस साहित्यिक कमी पर, उन्हें छूट मिलनी ही चाहिए। वे हिंदी के कमज़ोर बच्चे हुए तो क्या, हिंदी के बच्चे हैं, उन्हें बड़ा होने के लिए हज़ार मौक़े मिलने चाहिए। कहते हैं कि बंदर के हाथ में उस्तरा नहीं देना चाहिए, लेकिन साहित्य में इस मुहावरे में सुधार करना चाहिए, ये बंदर थोड़े हैं कि बच्चों के हाथ में उस्तरा नहीं देना चाहिए। उदय तो इससे भी आगे जाता है, कहता है कि वक़्त ने इन बच्चों के हाथ में उस्तरा दे ही दिया है, तो आओ बच्चों मेरी दाढ़ी से सीखो। चाहे मेरी गर्दन ही साफ़ कर दो, लेकिन प्यार से कहो तों कि ताऊ या चाचा, सीखने दो न! मैं कहूँगा कि बच्चों तुम्हारे सीखने के लिए मेरी सौ ज़िंदगियाँ क़ुर्बान हैं, आओ सीख लो। ताऊ की गर्दन का फ़ैसला करना चाहो तो कर लो, लेकिन हिंदी की गर्दन का फ़ैसला मत करो, हिंदी के भविष्य का फ़ैसला मत करो, अभी सिर्फ़ सीखो। मुझे हिंदी में काम करने के लिए तख़्त और ताज नहीं चाहिए, सिर्फ़ प्यार चाहिए। अपने बच्चों का प्यार। जैसा अथाह प्यार, जब भी उदय की नातिन गंज गोबरहवा आती है, भले ही साल में दो बार आए, हम लोगों के लिए लेकर आती है।
—संटी नानू, मेरा स्वागत नहीं करोगे?
स्टडी के कमरे के दरवाज़े को थपथपाकर एक बच्ची हज़ारवीं बार मुझसे पूछती है, बल्कि कहना चाहिए कि कहती है, नहीं-नहीं, लिखना चाहिए कि सूचित करती है कि इस घर की और हमारी बॉस आ गई है। उदय कुछ कहे, उससे पहले मैं कह देता हूँ, आओ नानू जी लोगों की जानू, तुम्हारे तीन-तीन नाना बैठे, तुम्हारा ही तो इंतज़ार कर रहे हैं। उदय, मैं और झंकार, तीनों अपनी बाँहें फैला देते हैं और दौहित्री बारी-बारी से सबके सीने से लग जाती है। झंकार कहता है, “बाबू मेरे गाँव चलोगी?” दौहित्री, झंकार की ओर देखकर पूछती है, “झंकार नानू आपके गाँव में एयरपोर्ट है?” झंकार कहता है, “बाबू गाँव तक न एयरोप्लेन जाती है, न रेलगाड़ी, बैलगाड़ी जाती है, बैलगाड़ी पर बैठोगी?” नातिन अचरज से उदय को देखकर पूछती है, “नानू, बैलगाड़ी एयरोप्लेन से बड़ी होती है?” उदय कहता है, “बेटा झंकार नानू के घर न एयरोप्लेन से चलेंगे, न बैलगाड़ी से, सामने कार खड़ी है, उससे चलेंगे। पहले झंकार नाना के घर चलेंगे, फिर बग़ल के गाँव में मेरी नानी के घर चलेंगे। सोचो तो, नानू के नानी के घर!”
उदय अपनी नातिन, बेटी और दामाद के पास बैंगलोर में था और मैं उसके घर की रखवाली कर रहा था। झंकार भी आ गया था। बीदास भी कभी-कभी आ जाता था। कभी-कभी हम उसके रेलवे के बड़े से बँगले पर चले जाते थे। वहाँ कई तरह की सुविधा थी। दृश्य मनोरम था। नौकर-चाकर थे। श्रीमती जी चाय बहुत बढ़िया बनाती थीं, खाना तो इतना अच्छा बनाती थी कि उँगलियाँ चाटते रह जाओ। बँगले के सामने रेलवे का म्यूजियम था, बहुत-सी चीज़ें उसमें थीं। ख़ासतौर से रेल का इंजन देखकर बच्चों का दिल मचल जाता था। लगता था कि बस अभी छुक-छुक करते हुए दौड़ने लगेगा। बच्चे उसे छूते, उसे चूमते, उस पर चढ़ जाते। एक बार की बात है। बीदास के बँगले पर ऐसे ही सब खाने पर गए थे, लेकिन आज की तरह दोपहर के खाने पर नहीं। रात के खाने पर। खाना लगने में आधे घंटे का समय था। बीदास ने मुझे और झंकार को लान में रखी कुर्सियों से उठाया, रात में जब वह कुछ पी-वी लेता था, तो उसके पास बहुत बल हो जाता था। हम उठे। हमने पी नहीं थी, हम पीते ही नहीं थे। बीदास हमे लेकर रेल के म्यूजियम में आ गया था। चाँदनी रात में भी रेलवे की तरफ़ से रोशनी इतनी थी कि चाँद बेचारे को बहुत शर्म आ रही थी। बीदास हमारा हाथ पकड़कर सीधे रेल के इंजन के पास ले गया और इंजन पर चढ़ने लगा था। चढ़ नहीं पा रहा था, तो हमने धक्का देकर उसे चढ़ाया। उसके चढ़ते ही इंजन आप से आप चालू हो गया। इंजन आप से आप आसमान में धुआँ फेंकने लगा था। आगे की लाइट आप से आप जल गई थी। बीदास अपनी जेब से बिना डंडी की हरी झंडी निकालकर एक हाथ से लहराने लगा था। बीदास चढ़ने के बाद बिल्कुल फ़िल्म के हीरो के माफ़िक़ झूमने लगा था, हम तो डर गए कि कहीं बीदास गिर न पड़े। झंकार ने कहा भी कि उतर आओ बीदास गिर पड़ोगे। बीदास के सिर पर हीरो सवार था, वह वहीं से चिल्लाया, “संटी और झंकार सुन लो, मैं हिंदी के हरामज़ादों को छोड़ूँगा नहीं। क्या समझ लिया है, सालो ने। हमारे दोस्त उदै को अकेला समझ लिया है। अभी इंजन दौड़ाऊँगा और हिंदी विभाग की बिल्डिंग पर चढ़ा दूँगा। बल्ली और हौदा और जंकामंका के धर पर चढ़ा दूँगा। दिल्ली लेकर पहुँचूँगा। किसी स्टेशन पर नहीं रुकेगा मेरा इंजन, सीधे जेएनयू ले जाऊँगा, मशहूर सिंह के घर पर चढ़ा दूँगा। दरियागंज के प्रकाशकों की दुकान को रौंद दूँगा। हँसमुख वाजपेयी के फ़ाउंडेशन पर चढ़ा दूँगा। साले सब हमारे दोस्त को अकेला समझते हैं। उदै अकेला नहीं है। उसके साथ संटी है, झंकार है, बीदास है, और यह रेल का इंजन भी उसके साथ है।” मैं डर रहा था कि बीदास ने अधिक पी ली है, कहीं गिर न पड़े। यह तो अच्छा हुआ कि झंकार इंजन पर चढ़ गया और उसका हाथ पकड़ लिया। उसे रोका और किसी तरह उसे लेकर नीचे उतरा। वह उतरने के बाद अपने बँगले की ओर आते समय भी ख़ुद को रेल के इंजन पर चढा हुआ ही महसूस कर रहा था और बार-बार हिंदी के हरामज़ादों पर रेल का इंजन चढ़ा देने की बात कर रहा था।
दिल्ली एक नहीं थी। एक थी भी तो उसके पैर हज़ार थे, हाथ हज़ार थे, सिर भी एक-दो-दस नहीं, हज़ार थे, सब एक-एक शहर में उदय के ख़िलाफ़ ज़हर फैला रहे थे। सबको भयभीत कर रहे थे। हिंदी के लेखक दोहरे डर में जी रहे थे। जंकामंका गैंग का डर एक तरफ़ था तो दूसरी तरफ़ दिल्ली के गैंगों का डर अलग था। लेखक संगठन ख़िलाफ़ थे। संपादक ख़िलाफ़ थे। शीशमहल पब्लिकेशन का संपादक अपने समूह से उसका संग्रह नहीं आने दे रहा था। सब उदय को हिंदी का कुख्यात लेखक बनाने पर तुले हुए थे। उसे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। फिर भी ग़ुस्सा इस बात का था कि ये संपादक चूतिए और नक़ली कवियों की कविताओं के संग्रह धड़ाधड़ छाप रहे थे। भारत भवन के पदाधिकारियों का चूतड़ सार्वजनिक रूप से धुलने वाले कवि का संग्रह छाप रहे थे, जो कविता में कुमार शुक्ल का लटक है। उसके पास अपना कोई सामान तो है ही नहीं। ये संपादक, कविता का युवा पुरस्कार पाने वाले बच्चा कवियों का संग्रह छापकर महावीर प्रसाद द्विवेदी बनना चाह रहे थे। कविता में निवर्तमान पीढ़ी की नक़ल और चौंकाने वाले अस्पष्ट बिंबों और आशयों के जाल में फँसाकर हिंदी कविता का टेंटुआ दबा रहे थे। तमाम प्रकाशन संस्थान पाठकों के हितैषी नहीं थे, बल्कि उनकी आँखों में धूल झोंक रहे थे। उदय के सामने एक ओर लेखकों और प्राफ़ेसरों की नीचता से लड़ना था, तो दूसरी ओर साहित्य के शक्तिकेंद्रों से, हत्यारों से दलालों से। विश्वविद्यालय की लड़ाई चरम पर थी, तो दूसरी ओर साहित्य की। विश्वविद्यालय में तो कुछ तो जो उसके साथ थे, चाहे उनके कुछ छिपे हुए मक़सद भी उनके साथ रहे हों, लेकिन साथ थे। साहित्य में तो बिल्कुल अकेला था। रातों में उसे नींद नहीं आती थी। सिर दर्द से फटा जाता था। कोई सूरत नज़र नहीं आती थी। दिन में भी हर तरफ़ अँधेरा ही अँधेरा दिखता था। रातें तो काली थीं ही।
आधी रात हो गई थी। एक बजने को था। बाहर हवा साँय साँय चल रही थी। कहीं दूर से एक कुत्ते के रोने की आवाज़ रह-रह कर आ रही थी। वह रुक-रुककर रोए जा रहा था। शायद कोई पीड़ा थी उसे। किसी से कुछ कहना चाह रहा था। कोई उसकी बात नहीं सुन रहा था, सिवाय उदय के। उदय को नींद नहीं आ रही थी। कोई पीड़ा थी। काफ़ी देर से चाह रहा था कि थोड़ी-सी नींद उसे भी आ जाए। उदासी पूरे कमरे में, बिस्तर पर पसरी हुई थी। उसका भी मन बहुत अशांत था। कोई उसकी पीड़ा को जानना नहीं चाह रहा था, किसी के पास उससे पूछने का वक़्त नहीं था कि इन दिनों तुम्हें हुआ क्या है, इतने उदास क्यों हो, तुम्हारी आँखों में कहाँ से आँसुओं के इतने बादल आ गए हैं और अब-तब में बरसने को हो रहे हैं। बता भी दो उदय शंकर शुक्ल। उदय उससे चिपटकर रोना शुरू कर दे। साहित्य की दुनिया में किसी को उसकी फ़िक्र नहीं है। इस समय मैं झंकार के गाँव में उसकी बैठक में तख़्त पर गहरी नींद में सो रहा था। मैं, झंकार और बीदास, कोई उसके पास नहीं था। उसके आस-पास कोई था, तो कहीं दूर रोते हुए एक कुत्ते की आवाज़ थी। एक बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी। उदय को भी रुलाई आ रही थी। उसका जी कर रहा था कि दौड़कर उस कुत्ते के पास पहुँचकर उससे लिपट जाए। उससे पूछे क्या दुख है तुम्हें! पूरी रात उसके साथ रोता रहे और सुबह होते ही मुझसे बात करे। झंकार से बात करे। बीदास से बात करे। अब सब उसके लिए बर्दाश्त से बाहर हो गया था। वह लेखक समाज की बेहतरी के लिए उन्हीं लेखकों से लड़ रहा था। उसके लिए हिंदी की इस बुरी दुनिया में एक मिनट के लिए भी बने रहना मुश्किल हो गया था। वह ख़ुद को लेखकों की इस दुनिया में मिसफ़िट पाता था। उसे लेखकों से ही नहीं, अपने समय के ग़लीज़ साहित्य से भी वितृष्णा हो गई थी। उसने तो साहित्य से संन्यास जैसा बड़ा क़दम उठाने का निश्चय कर लिया था; लेकिन मैंने, झंकार ने और बीदास ने उसे दौड़ा लिया था। यही तुम कबीर निराला वग़ैरा का साहित्यिक वंशज बनते हो? साहित्यिक वंशज होने का यही मतलब है कि लड़ाई के मैदान से भाग जाओ? पुरखों के मान-सम्मान के लिए तुम नहीं खड्ग उठाओगे तो क्या ये कबीर और निराला का वंश डुबोने वाले लड़ेंगे? उदय को लड़ना ही होगा। लड़ते ही रहना होगा। उसके पास लड़ने के अलाव कोई विकल्प नहीं हैं। रोकर लड़े, चाहे हँसकर। उसे निराला की पंक्ति याद आती है, वह एक और मन रहा राम का जो न थका, जो नहीं जानता दैन्य नहीं जानता विनय। उसे साहित्य के अँधेरे के ख़िलाफ़ लड़ना ही होगा।
राजभवन में, जब शिक्षक संघ को लेकर पत्र पर पत्र पहुँचने लगे, तो हरकत हुई। कुलपति ने बल्ली सर को, आवास आवंटन समिति की बैठक में बुलाया ही नहीं। कर्मचारी संघ के प्रतिनिधि तो बुलाए गए, लेकिन बल्ली सर अवैध अध्यक्ष होने की वजह से बाहर रह गए। उधर मैडम मल्लिका प्रोफ़ेसर कॉलोनी में आवास पाने का ख़्वाब चकनाचूर होते ही, आधी रात को बल्ली सर को फ़ोन मिलाईं और लगीं रोने, बल्ली चुप कराएँ, तो चुप ही न हों, और तेज़ रोने लगें। बल्ली सर से रहा नहीं गया, तुरत गाड़ी निकाले और हुमचकर ड्राइविंग सीट पर बैठ गए। चाभी लगाएँ, तो चाभी लगे ही नहीं। एक बार, दो बार, तीन बार, बार-बार चाभी छेद में जाए ही नहीं। असल में अँधेरे में छेद देख ही नहीं पा रहे थे, अंदाज़ से लगा रहे थे, बहरहाल उँगलियों से छेद ढूँढ़कर चाभी उसके अंदर डाले और कसके घुमाए, घर्र से एक ही बार में गाड़ी स्टार्ट हो गई। नशे में तो थे, लेकिन रात के एक से ऊपर हो रहा था, नशा कुछ कम होने लगा था, मैडम मल्लिका के फ़्लैट के सामने ग्राउंड फ़्लोर पर पहुँचकर ज़ोर-ज़ोर से घंटी बजाने लगे, जैसे घंटी नहीं ट्रक का भोंपू बजा रहे हों। मल्लिका मणि मुजुला दौड़ी-दौड़ी आईं, बल्ली सर का हाथ पकड़ा और उदय सर को अंदर ले गईं। इस बीच मल्लिका का रोना-धोना कम नहीं हुआ था, बल्कि अब तो और तेज़ हो गया था।
बल्ली सर मैडम मल्लिका को छनवाधार रोते देखकर भीतर और बाहर से हिल गए थे। दिमाग़ उल्टा काम करने लगा था। वह मैडम की छींटदार मैक्सी का निचला किनारा उठाकर उनकी आँख पोंछने जा रहे थे। तब तक मैडम के पति ने बल्ली सर के कुर्ते का निचला किनारा उनके हाथ में पकड़ा दिया। मैडम के पति ने यह ज़रूरी क़दम न उठाया होता, तो बल्ली सर नशे की झोंक में उल्टी हरकत कर सकते थे। सकते क्या थे, करने ही जा रहे थे। कई बार इसी तरह मैडम के पति ने बल्ली सर को उल्टा-सीधा काम करने से बचाया था। असल में उन्हें पता था कि बल्ली सर पीने के बाद कुर्सी की जगह मेज़ पर बैठ जाते थे, पानी की जगह मेज़ पर रखी हुई खाँसी की सिरप पी जाते थे। पकौड़ी खाने की जगह मेज़ पर रखी हुई लिपिस्टिक, फ़ाउंटेननपेन वग़ैरा मुँह में डाल लेते थे। असल में बल्ली सर हो या हौदा सर, नशे में हों या बिना नशे के, सोने में हों या जागने में, इनका जीवन ही तर्कातीत था। इसीलिए जब भी बल्ली सर नशे में मल्लिका मणि मंजुला के घर आते थे, तो मैडम के वति, जिन्हें बल्ली सर मल्लिकापति कहते थे, उनकी मदद के लिए उनके पास मौजूद रहते थे। इस समय भी उनके पास ही खड़े थे। बल्ली सर अपने कुर्ते का निचला किनारा हाथ में लेकर मैडम की आँख पोंछने लगे थे। कुर्ता उठ जाने और बनियान न पहनने की वजह से बल्ली सर का पेट और आधी छाती और बालों का गुच्छा और पाजामे का नाड़ा वग़ैरा दिखने लगा था। जिसे मैडम मल्लिका के पति टुकुर-टुकुर देख रहे थे। बल्ली सर मैडम की आँखों पर, गालों पर कुर्ते में छिपा हुआ हाथ फेर रहे थे। बल्ली ने मैडम के पति से कहा, मल्लिकापति जी एक गिलास पानी लाइए। असल में मल्लिका जब भी इस तरह रोने लगती थीं, तो मल्लिकापति को उन्हें चुप कराने के लिए बल्ली सर को बुलाना पड़ता था। कई बार तो मल्लिकापति भ्रम में पड़ जाते थे कि मल्लिका को रोने का दौरा पड़ा है या बल्ली सर को बुलाने का। असल में हर मुश्किल में बल्ली सर की ज़रूरत पड़ती थी। मल्लिकापति को काम के सिलसिले में अक्सर बाहर रहना होता था। इसीलिए मैडम मल्लिका प्रोफ़ेसर कॉलोनी का आवास चाहती थीं। वैसे तो वे बल्ली सर के ठीक बग़ल का मकान चाहतीं थीं, लेकिन उनके पति शुरू में ही सुरक्षा गार्ड के लिए जो बूथ बना हुआ है, उसके बग़ल का मकान चाहते थे। मल्लिकापति को बाहर रहने पर मल्लिका की अधिक चिंता होती थी। सुरक्षा बूथ के पास रहने पर अधिक सुरक्षा होगी। कितने भोले थे मल्लिकापति, नहीं जानते थे कि मल्लिका कहीं भी रहेंगी, यहाँ तक कि पाताल में भी रहेंगी तो बल्ली सर की निजी सुरक्षा में रहेंगी। बल्ली सर मैडम मल्लिका के लिए कोई भी क़दम उठा सकते थे। उन्होंने तय कर लिया था कि मल्लिका को प्रोफ़ेसर कॉलोनी का मकान दिलाकर रहेंगे, इसके लिए कुछ भी करना पड़े। बल्ली सर ने वहीं मैडम मल्लिका के आँसुओं की क़सम खाते हुए कहा था, इसी महीने शिक्षक संघ का चुनाव होगा। फिर देखता हूँ कि कुलपति कैसे आवास आवंटन में मनमानी करता है। मैं जिस कमेटी में होता हूँ, घिग्घी बँध जाती है वीसी की। मल्लिकापति अच्छी तरह जानते थे कि बल्ली सर रोज़ रात को हज़ारवीं बार जर्जर भिक्षु की बोतल में विश्वद्यिाललय का एक्ट, सटेच्यूट, ऑर्डिनेंस एक साथ मिलाकर पी जाते है। मल्ल्किापति प्रोफ़ेसर कॉलोनी का मकान मिलने के पहले ही कभी-कभी सोचने लगते थे कि दिन भर विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर बल्ली सर का डंका तो बजता ही रहता है, रात में भी उनके आवास के बग़ल में बने सुरक्षा बूथ में सुरक्षा गार्ड की वर्दी पहनकर मल्लिका की सुरक्षा के लिए खड़े रहते हैं। कभी-कभी तो सोचते कि प्रोफ़ेसर बल्ली सर नहीं होते, तो विश्वविद्यालय का क्या होता, उनका क्या होता, मल्लिका का क्या होता।
आवास आवंटन समिति की बैठक में बैठना बल्ली सर के लिए अब तो जीवन-मरण का प्रश्न हो गया था। इसके लिए वह किसी भी सीमा तक जा सकते थे। हाँ, वह कुछ भी कर सकते थे। किसी को भी छुरा भोंक सकते थे। मल्लिका के लिए तो किसी का ख़ून भी कर सकते थे। गंज गोबरहवा विश्वविद्यालय शिक्षक संघ का चुनाव कराएँगे और जीतकर आएँगे, मल्लिका मणि मंजुला से कह तो दिया बल्ली सर ने, लेकिन जीतेंगे कैसे? यह सवाल उन्हें परेशान करने लगा था, जब वह परेशान होते थे, तो अपनी गर्दन को बाईं तरफ़ हल्का-सा झटका देते थे और दिमाग़ के भीतर पूँछ लहराते हुए हट्टे-कट्ठे घोड़े दौड़ने लगते थे। देखते-देखते मुश्किल आसान हो जाती थी। मुश्किलों का तोड़ निकल आता था। असल में बल्ली सर के दिमाग़ के घोड़े असाधारण थे, जब तक काम नहीं हो जाता, आगे-पीछे, बाएँ-दाएँ, ऊपर-नीचे, कहीं भी दौड़ते ही रहते थे और दूर की कौड़ी तक पहुँचकर ही रुकते थे। रुकते तो वह ख़ैर नींद में भी नहीं थे। बल्ली सर सोते रहते थे और उनके दिमाग़ के घोड़े अपना काम करते रहते थे। दिमाग़ तो उनका उस समय भी अपना काम रहता, जब वह मल्लिका मैडम से दिल लगा रहे होते थे, दिल निकालकर उनके सामने रख रहे होते थे। दिल कुछ और काम कर रहा होता था और दिमाग़ कुछ और।
शिक्षक संघ के चुनाव का बिगुल अख़बारों में बज चुका था। उदय तो इस घोषणा से हैरान भी हुआ था, लेकिन उसे समझते देर नहीं लगी कि बल्ली सर के दिल पर चोट लगी है और बल्ली सर अपने दिल और जाँ के लिए कुछ भी करेंगे। उदय ने अपने साथियों के साथ अगले दिन से ही बल्ली सर के ख़िलाफ़ धुआँधार प्रचार अभियान शुरू कर दिया था। विश्वविद्यालय में भी देश की राजनीति की तरह जातिवाद का कीड़ा मौजूद था। कहना चाहिए कि यह कीड़ा विश्वविद्यालय को खा रहा था। ओबीसी और एससी के लोग आधे से कम थे, वह पूरी तरह बल्ली सर के ख़िलाफ़ थे, जंकामंका गैंग के ख़िलाफ़ थे, बल्कि कहिए कि ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ थे और उनके इस ब्राह्मणवाद को मारने के लिए जिस शख़्स की ज़रूरत थी, वह उदय था। उदय ने बल्ली सर की नाक में दम कर दिया था। अख़बारों में उदय की बातों को उसके तर्क, शिक्षक हित और और विश्वविद्यालय लोकतंत्र के लिए किए जा रहे उसके संघर्ष को प्रमुखता से छापते थे। माहौल उदय के पक्ष में और बल्ली सर के ख़िलाफ़ था। माहौल ख़राब था, लेकिन बल्ली सर के दिमाग़ के घोड़े न हार मानने को तैयार थे, न रुकने के लिए। ज्योग्राफ़ी और इकोनामिक्स डिपार्टमेंट के पीसी सिंह और केएन सुकुल, उदय के आगे-पीछे लगे हुए थे, उसके साथ शिक्षक आवासों और विभागों में दौड़ रहे थे। केमिस्ट्री का अभय कुमार गुप्ता अलग से अध्यक्ष बनने के मंसूबे बाँध रहा था। अलबत्ता गुप्ता के पक्ष में ओबीसी और एससी वर्ग के लोगों में आम राय बहुत ठीक नहीं थी। उदय, बल्ली सर को इस बार हटाने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ था। अख़बार वालों को लग भी रहा था कि उदय सर इस बार बल्ली सर को धूल चटा देंगे।
विज्ञान संकाय का लेक्चर थिएटर नंबर एक सौ तेरह खचाखच भरा हुआ था। लंबे-लंबे दरवाज़ों ओर लंबी-लंबी खिड़कियों पर हरे-हरे रंग के पर्दे लटक रहे थे, हवा से हिल-डुल रहे थे, लोग दरवाज़ों के पर्दे हटाकर आ-जा रहे थे। बहुत गहमागहमी थी। आवाज़ें और तरह-तरह की ख़ु़शएँ थिएटर के अंदर और बाहर तैर रही थीं। उदय पीसी सिंह की गाड़ी में केएन सुकुल के साथ पहुँचा तो उसे सब कुछ अनुकूल लग रहा था। जैसे ही उदय लेक्चर थियेटर में घुसने को हुआ, पीछे से पीसी सिंह ने कंधे पर हाथ रखकर उसे रोक लिया और पीछे की ओर गणित विभाग के स्टाफ़रूम में ले गया। वहाँ गणित विभाग का कोई प्रोफ़ेसर नहीं था। केएन सुकुल और अभय कुमार गुप्ता मौजूद थे। उदय और पीसी सिंह को देखते ही दोनों खड़े हो गए। उदय कुछ समझ पाता इससे पहले अभय कुमार गुप्ता ने उदय के चरणों को साष्टांग दंडवत् होकर दोनों हाथ से पकड़ लिया। उदय के लिए यह अप्रत्याशित तो था ही, तकलीफ़देह भी। ओह, यह क्या हो रहा है, उदय के मुँह से निकलते ही पीसी सिंह ने कहा कि अभय कुमार जी का रिटायरमेंट नज़दीक है, इस बार इन्हें लड़ लेने दीजिए, अगले साल आप अध्यक्ष हो जाइएगा। उदय के लिए यह दृश्य, यह क्षण, अभूतपूर्व था। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा भी कुछ होगा। कोई उसके पैर पकड़ रहा है, उसके पैर पर अपना सिर रख दे रहा है, आँख नम कर ले रहा है, यह सब उदय की समझ के बाहर था।
राजनीति में ऐसे भी क्षण आते हैं, उसकी कल्पना में भी नहीं था, यह सब। वह हतप्रभ था। किंकर्त्तव्यविमूढ़ था। समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे! पीसी सिंह ने ही दोबारा कहा, “इस बार इन्हें लड़ने दीजिए।” उदय ने अपने चरणों में गिरे हुए प्रोफ़ेसर अभय कुमार गुप्ता को उठाया, कंधे पर हाथ रखा और कहा कि ठीक है और इस तरह लेक्चर थिएटर का पर्दा हटाकर थिएटर में अभय कुमार गुप्ता ने प्रवेश किया और पीसी सिंह उदय को अपनी गाड़ी में बैठाकर गोलघर ले गए। रास्ते में उदय सोचता रहा कि वह और अभय, दोनों लड़ते तो बल्ली का गैंग जीत जाता। फिर यह भी सोचा कि सवर्ण बहुल मतदाताओं के बीच क्या अभय कुमार गुप्ता जीत पाएगा?
राजनीति भावुकता का नहीं, निर्ममता का विषय है। कवियों-ववियों के लिए राजनीति नहीं है। राजनीति कला नहीं है, तिकड़म है, छल है। कला का बाप है। उदय को अफ़सोस हो रहा था। उसे हर हाल में चुनाव लड़ना चाहिए था। राजनीति में हमेशा आँसू और शरणागत होना नक़ली होता है। जो दृश्य पर होता है, सब छल होता है। जो दिखता नहीं, वह असल होता है। हुआ वही, जिसका डर था। बल्ली जीत गया था। उसका गैंग जीत गया था। यह अभय कुमार गुप्ता की बेज़ा महत्त्वाकांक्षा थी। बल्ली को हटाना उसका मक़सद नहीं था, अध्यक्ष बनना उसका उद्देश्य था। यह व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा थी। अभय कुमार गुप्ता ने संगठन को बचाने के लिए कोई काम नहीं किया था। विश्वविद्यालय में लोकतंत्र को बचाने के लिए कोई लड़ाई नहीं लड़ी थी। शिक्षक हित के लिए कभी कुछ नहीं सोचा था। सोचने के नाम पर अपने कुछ काम अध्यक्ष होकर कराए, ऐसा सोचा था। विभाग में अपनी वरिष्ठता का विवाद कैसे अपने पक्ष में कराए, यह सोचा था। संघ की बैठकों में और बाहर एक अगंभीर प्रोफ़ेसर की छवि थी, फिर भी कई साल से शिक्षक संघ का अध्यक्ष बनने की उसकी तीव्र महत्त्वाकांक्षा, विकल्प के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा थी। ऐसे समय में और क्या किया जा सकता था। लोकतंत्र में काम नहीं जाति सबसे बड़ी योग्यता थी। लोकतंत्र को साफ़-सुथरा और मज़बूत बनाने के रास्ते में व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाएँ सबसे बड़ी बाधा थीं। उदय के सामने उसका पैर पकड़कर रोना-धोना, उसके दिमाग़ की उपज नहीं थी। पूरी स्क्रिप्ट बल्ली की टीम ने लिखी थी। पीसी सिंह और केएन सुकुल जैसे प्रोफ़ेसर, बल्ली की टीम का हिस्सा थे, लेकिन उदय के सामने बल्ली को ऐसी धुआँधार गालियाँ देते, उसकी ऐसी ज़बरदस्त आलोचना करते कि पूछिए मत! उसे लोकतंत्र का हत्यारा कहते। मल्लिका-प्रसंग उछालते। उनको देखकर बल्ली-विरोधी न समझने का कोई आधार नहीं था। असल में राजनीति समझ की माया रचने का खेल है, जो समझते हैं, वह होता नहीं और जो होता है, उसे समझ नहीं पाते। उदय जैसे बात-बात पर बड़ी सहजता से सौ बार धोखा खाने वाले लोगों के लिए राजनीति नहीं है। राजनीति सदिच्छा से नहीं पर्याप्त हरमज़दगी से चलती है। बावजूद इस तल्ख़ सच्चाई के उदय जैसे निश्छल लोग बदलाव के लिए अपने को होम कर देते हैं। परिवर्तन के लिए जी-जान से लग जाते है। उन्हें पद नहीं परिणाम चाहिए होता है। परिसर बदल जाए, दुनिया बदल जाए, साहित्य की दुनिया बदल जाए, इसके लिए वे कोई भी नुक़सान उठाने को तैयार होते हैं।
चुनाव-परिणाम से ओबीसी-एससी समुदाय सदमे में था, उदय ने अवसर दिया था कि जाओ भाई अपने वर्ग का अध्यक्ष चुन लो। मैं तो ब्राह्मण हूँ और ब्राह्मण नहीं हूँ। ब्राह्मणों में अछूत हूँ। उदय ने लोकतंत्र के लिए लंबी लड़ाई की थी, लेकिन जब चुनाव आया, तो उसके साथ जो राजनीति की गई, उसका उसे कोई अनुभव नहीं था। बल्ली राजनीति में ही नहीं, जीवन में भी हरमज़दगी का सिरमौर था। हरमज़दगी, उसके आगे-पीछे के हर अंग से टपकती थी। सिर से लेकर पैर तक, वह केवल हाड़-मांस से नहीं पर्याप्त हरमज़दगी के मिश्रण से बना हुआ था।
चुनाव के दूसरे दिन विभाग में फूल-मालाओं से लदा हुआ पहुँचा, तो एक पल के लिए उदय उसे पहचान ही नहीं पाया, फिर देखा, फूल-मालाओं के बीच से बल्ली का एक चौथाई चेहरा झाँक रहा था। मल्लिका मणि मंजुला दौड़कर, हाथों में ली हुई स्टील की छोटी प्लेट से रोली और अक्षत निकालकर बल्ली के ललाट पर लगाने लगीं, जैसे उनके घर उनके बल्ली राजा विश्वविजय करके लौटे हों। सब जय हो, बधाई हो के नारों से जैसे विभाग की एक-एक ईंट बजा रहे थे। शोर इतना तेज़ था कि जैसे बरामदे में बैठे उदय के कान फट जाएँगे। बल्ली ने उदय को देखकर अपने समर्थकों को डाँटते हुए कहा, “चुप रहिए, चुप रहिए, विभाग है। यहाँ शोर मत कीजिए। शोर करने के लिए पूरा विश्वविद्यालय पड़ा हुआ हैं।” बल्ली, उदय के पास आकर हाथ मिलाने लगा। जो लोग लड्डू लिए चल रहे थे, उनसे डिब्बा अपने हाथ में लेकर, उदय कुछ समझ पाता, इससे पहले एक लड्डू उसके मुँह में ज़बरदस्ती ठूँस दिया। उदय को ग़ुस्सा तो बहुत आया, सोचा भी कि इसके मुँह पर इसका लड्डू थूक दूँ, लेकिल लोग क्या कहेंगे, ख़ासतौर से विद्यार्थी, यह सोचकर उसके मुँह पर तो नहीं, लेकिन स्टाफ़रूम में जाकर वाशबेसिन में थूका। थूकने के बाद अच्छी तरह कुल्ला करके मुँह को साफ़ कर किया और जाकर अपने कमरे में बैठ गया था। हालाँकि छल से हासिल की गई इस जीत को बल्ली ज़्यादा से ज़्यादा उदय के साथ सेलिब्रेट करना चाह रहा था, बल्कि कहना चाहिए कि उदय के सिर पर सेलिब्रेट करना चाह रहा था।
विभाग में कुछ नया हो गया था। दीवारें वही थीं, छत वही, कमरे वही, फूल-पत्तियाँ वही, ख़ुशबू वही, हवा वही, लोग वही, वही कीट-पतंग, वही साथी-हाथी, वही असीम सर वही लाल सर, विद्यार्थी वही, सब कुछ वही था, लेकिन फिर भी कुछ नया लग रहा था। मल्लिका मणि मंजुला पहले विभाग में कभी अँगडाई नहीं लेती थी, अब लेने लगी थीं। विद्यार्थी पहले छत पर कबूतर देखते थे, अब तोता-मैना भी देखने लगे थे। विभाग के बरामदे के सामने की फुलवारी में फूल पहले भी खिलते थे, अब ज़्यादा खिलने लगे थे। असीम सर खैनी ज़्यादा खाने लगे थे, लाल सर चाय ज़्यादा पीने लगे थे। हौदा सर पादते पहले भी ठीक-ठाक थे, अब बहुत अधिक पादने लगे थे और बल्ली सर की चाल बिल्कुल बदल गई थी। नया चमचमाता जूता पहनकर आने लगे थे। नए जूते की आवाज़ बिल्कुल नई थी, ऐसा जूतों की आवाज़ नहीं हुआ करती थी, जूता और उसकी आवाज़ दोनों बिल्कुल नए थे, इतना नए थे कि आँखों और कानों को बहुत अजीब लग रहा था। चमचमाते और मचमचाते हुए जूते पहनकर बल्ली विभाग के बरामदे में चलता था, तो उदय सर को ‘राम की शक्तिपूजा’ की ‘रावण पदतल पृथ्वी टलमल, बिंध महोल्लास से बार-बार आकाश विकल...’ पंक्ति बहुत विकल करने लगती। उसे लगता कि यह जूता चमड़े का जूता नहीं है, लोहे का भारी-भरकम कँटीला जूता है, जिसे पहनकर बल्ली विभाग की छाती पर चल रहा है और हिंदी की छाती लहूलुहान हो रही है। उदय को बल्ली के सिर पर रावण के दस सिर नज़र आ रहे थे, उसका अट्टहास सुनाई पड़ रहा था, उसका एक-एक शब्द बर्छी की तरह लग रहा था। मल्लिका मणि मंजुला को बल्ली में घर आया सलोना साजन दिख रहा था, विवाह में चुराया गया जूता याद आ रहा था, बल्ली सर की आँखों में उनके लिए वासना का समुद्र दिखाई दे रहा था। बल्ली की आँखों में कोई जादू हो गया था, उसे एक मल्लिका में दस मल्लिकाएँ दिखने लगी थीं। कोई गुलाबी शिफ़ॉन साड़ी और मोतियों की माला में, कोई क्रेप फ़िरोज़ी साड़ी और शांतिनिकेतन की माला में, कोई कोटा की साड़ी और पुण्डुचेरी माला में, कोई बिना माले के आरगैंडी हैंड प्रिंटेट साड़ी में, कोई बंगाल की गमछा प्रिंट साड़ी में, कोई काँजीवरम की साड़ी और मूँगा की माला में, कोई रा सिल्क की साड़ी और कुंदन की माला में, कोई टिशू आरगैंजा साड़ी और पिंक माला में, कोई लिनेन साड़ी और मूँग की माला में, प्योर जार्जेट बाघ प्रिंट और पन्ना माला में। वह अपने होशो-हवास खो बैठा था, ओह इतनी मल्लिकाएँ, इसी एक जन्म में, इसी धरती पर, इसी विभाग में! भाड़ में जाएँ जन्नत की बहत्तर हूरे। बल्ली को तो एक-एक मल्लिका में बहत्तर हूरें दिख रही थीं। दस गुणे बहत्तर बराबर सात सौ बीस हूरें देख रहा था। उसने तय कर लिया कि अब हूरों के लिए मर कर कहीं और जाने की ज़रूरत नहीं है, यहीं रहना है। इसी हिंदी विभाग में रहना है। उसके लिए अब यह विभाग हिंदी का विभाग नहीं रह गया था, मल्लिका का विभाग हो गया था।
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जारी...
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