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धारावाहिक उपन्यास : जंकामंका गैंग : बंधन प्रेम के रास्ते का रोड़ा है

गताध्याय से आगे...

दस 

बड़ी से बड़ी मुश्किलों में भी झंकार मिसिर को कभी इतना चुप और इतना उदास होते नहीं देखा था। चाहे जीवन में उसे कोई जीत न मिली हो, लेकिन उसे कभी हारते नहीं देखा था। उसे जब भी देखा, उत्साह के साथ जीवन की लड़ाई में देखा था। वही झंकार, बहुत चुप था, ऊपर छत देख रहा था। उसका हृदय भरा हुआ था। उदय के कंधे पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोना चाह रहा था। लग रहा था कि उसकी दुनिया उजड़ गई है। उसकी जीवन भर की पूँजी कोई लूट ले गया है। उदय की पत्नी के साथ अंदर झंकार की पत्नी अपना दुख साझा कर रही थीं। 

झंकार को पहली बार इतनी बड़ी ख़ुशी मिली थी, लग रहा था कि अब अच्छे दिन आ जाएँगे। बड़ा बेटा अभी इनकम टैक्स में अधिकारी हुआ ही था कि ज़िला-जवार में ख़बर फैल गई। बड़े-बड़े घरों से उसके लिए रिश्ते आने लगे थे। इसी बीच किसी की नज़र लग गई थी, किसी ने बान मार दिया था। दो-तीन महीने में ही किसी जादूगरनी ने उसे वश में कर लिया था। लोक में एक तो वैसे भी कोलकाता को बैरन शहर के रूप में देखते हैं। जहाँ बाहर से गए युवाओं को भेड़ बना लेने के क़िस्से आम है। उसी शहर की लड़की को किसी विवाह समारोह में देखकर झंकार का बेटा होश-हवास खो बैठा था। अजीब-अजीब बातें करने लगा था। अपनी माँ से कहता है कि किसी लड़की से उसे प्रेम हो गया है। माँ से कहता कि उसे देखोगी तो देखती रह जाओगी, उससे बात करोगी तो बात ही करती रह जाओगी। मैं शादी करूँगा तो सिर्फ उसी से, नहीं तो किसी से भी नहीं करूँगा। झंकार बहुत दुखी था। मुझे भी बहुत दुख हुआ था। उदय और भी दुखी था। उसे भी लग रहा था कि अब दोस्त के घर में ख़ुशियाँ आ जाएँगी, तभी सब उल्टा-पुल्टा हो गया। झंकार का बेटा कुछ और सुनने को तैयार ही नहीं था। माँ ने कितने जतन से, क्या-क्या दुख उठाकर उसे पाला-पोसा है, पढ़ाया-लिखाया है, सब याद दिलाती, लेकिन वह कुछ भी सुनने को तैयार ही नहीं था। झंकार सोचता था कि जवार के किसी प्रतिष्ठित परिवार में शादी हो जाएगी तो उसके परिवार का मान-सम्मान भी बढ़ेगा और सबसे बड़ी बात यह कि पास में रहेंगे तो बुरे वक़्त में काम आएँगे। छोटी बेटी की शादी भी ठीक-ठाक हो जाएगी, लेकिन बेटे ने उसकी उम्मीद के पंखों को नोच डाला था। माँ समझातीं कि वह बेरोज़गार लड़की तुम्हें नहीं, तुम्हारी नौकरी को प्यार करती है। नौकरी छोड़कर आ जाओ, फिर देखो कि वह तुम्हें कितना प्रेम करती है।

उदय बहुत आहत था। अपने मित्र के दुख से ढह गया था। ओह, हे, भगवान, ऐसा रूप किसी को भी न देना कि देखने वाला अंधा हो जए, उसे माँ-बाप के आँसू न दिखें, न उसके कान कुछ सुनें, न उसका दिमाग़ चल पाए। ऐसे बेटे को भी किसी का बेटा न बनाना। झंकार तो आख़िरी गाड़ी से गाँव चला गया, लेकिन उदय वहीं का वहीं बैठा रह गया। हम जिसे प्रेम कहते हैं, क्या यह वही प्रेम है? क्या शादी ही प्रेम है? शादी के बिना प्रेम जीवित नहीं रह सकता है? प्रेम के नाम पर, शादी वाले प्रेम के लिए पागल, कोई लड़का अपने माता-पिता के प्रति कितना क्रूर हो सकता है? नहीं-नहीं, यह प्रेम नहीं हो सकता हैं। मेरे लिए स्त्री-पुरुष का ऐसा प्रेम एक रहस्य है। इस रहस्य से पर्दा उठाने की कोशिश में पूरा पर्दा ही फट जाता है। युवाओं को प्रायः सुंदर युवतियों को देखते ही प्रेम क्यों हो जाता है? उन्हें किसी असुंदर लड़की से प्रेम क्यों नहीं होता है? किसी सफ़ेद दाग़ वाली लड़की से किसी को प्रेम होते देखा है? सुंदर देह की कामना ही प्रेम है? आख़िर प्रेम होने की वजह क्या है? यह प्रेम है क्या? यह सुंदर देह के प्रति आकर्षण है, उसे छूने, पाने की तीव्र इच्छा है या उसके लिए मर-मिटने का कोई सामाजिक और ख़ासतौर से नैतिक उपक्रम या किसी प्रकार का मानवीय दायित्वबोध? ज़ाहिर है, प्रेम की इस यौनिक दुनिया से इतर एक दूसरा संसार है। प्रेमी-प्रेमिका की देह-लीला से अलग माता-पिता, भाई-बहन, मित्र और पशु-पक्षियों से प्रेम का एक नैसर्गिक संसार है। यह प्रेम एक पवित्र भाव की कोख से उपजता है। एक मानवीय उपक्रम है। प्रेम का भाव असीम है, हम उसे देह तक सीमित नहीं कर सकते हैं। देश, समाज और साहित्य से प्रेम के अनेक उदाहरण हैं। प्रेमी-प्रेमिका के प्रेम का यथार्थ यह है कि एक समय के बाद इस देह-प्रेम की छाया भर रह जाती है। देह को पा लेते ही प्रेम का क्षरण होने लगता है। विवाह के बाद प्रेम एक कोने में दुबक जाता है, फुर्र हो जाता है और पति-पत्नी के बीच दाम्पत्य-संबंध और बच्चों की समस्याएँ प्रेम की निस्सारता के पिटारे को खोलकर रख देती है। दरअस्ल, प्रेम का घर मिट्टी और कांक्रीट का बना घर नहीं है, बल्कि स्मृतियों के घोंसले में प्रेम का पंछी रहता है। बंधन प्रेम के रास्ते का रोड़ा है। कई ऐसे अवसर आते हैं, जब प्रेमी और प्रेमिका, देह का गीत गा सकते हैं, लेकिन नहीं गाते, वे किसी शार्टकट से देह की मंज़िल तक नहीं पहुँचना चाहते हैं। वे सामाजिक मर्यादाओं के दायरे में आगे बढ़ना चाहते हैं। सामाजिक परिस्थितियाँ उन्हें उन पवित्र संस्कारों के बिना देह तक पहुँचने की अनुमति नहीं देतीं। ऐसे में संयमी प्रेमी स्मृतियों में जीवित रहते हैं, उनका प्रेम समय-समय पर जीवन की खिड़की से झाँकता रहता है। ऐसे भी मूर्ख प्रेमियों से संसार अटा पड़ा है, जिनके लिए प्रेमिका की देह ही सृष्टि का परम सत्य है, उसके लिए वे माँ-बाप सबको तज सकते हैं। वे न जानते हैं, न जानना चाहते हैं कि एक माँ किस तरह उन्हें नौ महीने अपने पेट में रखती है और प्रसव की किस पीड़ा से गुज़रकर किसी कथित प्रेमी को जन्म देती है, किस तरह एक पिता प्रचंड धूप में, पानी में, ठंड में परिश्रम करके उन्हें पालने-पोसने, पढ़ाने-लिखाने के लिए ख़ुद को मुश्किलों की आग में झोंक देता है। न जाने कितने अपमान सहता है, तब कहीं जाकर किसी बेटे या बेटी को किसी सम्मानजनक स्थिति में पहुँचा पाता है। वही बेटा किसी नौकरी में आते ही महान् प्रेमी बनने की डींग हाँकने लगता है। देह के आकर्षण को ही प्रेम के पवित्र भाव से जोड़ने लगता है। यह भूल जाता है कि लड़की को उससे नहीं, उसकी नौकरी से प्रेम है। फिर यह प्रेम कैसे हुआ? प्रेम का व्यापार हो गया। माता-पिता और दादा-दादी का अपने बच्चों और पोते-पोतियों के ब्याह के सपने देखना अपराध है? उनके जन्म से लेकर उनकी पढ़ाई-लिखाई तक, सबमें माता-पिता की भूमिका है, फिर ब्याह में उसकी कोई भूमिका क्यों न हो? माता-पिता को मान-सम्मान के साथ जीने का कोई हक़ नहीं है? अपने माँ-बाप को विस्मृत कर देगा, उदय को झंकार के बेटे से ऐसी उम्मीद नहीं थी। उसने बीदास को फोन पर बताया तो बीदास भी बहुत दुखी हुआ। बीदास ने कहा, जब झंकार का बेटा यह कह रहा है कि शादी करेगा तो उसी से करेगा, नहीं तो शादी ही नहीं करेगा, तो ऐसे में डर यह है कि इस उम्र के लड़के बहुत भावुक होते हैं, कहीं कुछ कर न बैठे, अपने को नुक़सान न पहुँचा ले? आजकल के लड़के क्या कर बैठेंगे कोई नहीं जानता। क्यों न झंकार मिसिर और उसकी पत्नी एक बार उस लड़की को देख लें, उसके परिवार से मिल लें, हो सकता है, लड़की सचमुच अच्छी हो, अच्छे संस्कारों वाली हो।

उदय ने कहा, तुम ठीक कहते हो। झंकार से बात करेंगे। बीदास ने पूछा, बड़ी बिटिया बोस्टन से कब आ रही है? उदय ने बताया अप्रैल में उसकी बच्ची का मुंडन है। ज़ाहिर है मुंडन यहीं होगा। अप्रैल में बेटा, बहू, छोटी और छोटा दामाद, बड़ा दामाद और बड़ी बेटी, सब जुटेंगे। बीदास ने कहा, चलो बहुत अच्छा रहेगा। किसी दिन आता हूँ, तुम्हारी तरफ़, संटी सुकुल आएँ, तो इधर भी भेजना। उदय ने कहा, हाँ, ज़़रूर, और फोन रख दिया था। 

विभाग के बरामदे में छात्रों और छात्राओं की शालीन मस्ती देखकर, उनकी आँखों और पैरों की गति से, उनके मुड़ने और ठहरने और ठहरकर बात करने के अंदाज़ से, हाव-भाव से उदय परिचित था। हर साल लड़कों और लड़कियों का झुंड ऐसे ही आधा-अधूरा प्रेम करता था। ज़्यादातर बच्चे तो सिर्फ़ देखते रह जाते थे, कह भी नहीं पाते थे कि प्रेम करता हूँ। प्रेम भी कहाँ था, प्रेम का पूर्वाभास था। आज भी उदय उन बच्चों को देख रहा था और झंकार की मुश्किल के बारे में सोच रहा था। उसे अपने पुराने दिन याद आ रहे थे। वह प्रेम याद आ रहा था। वह मिलना-बिछुड़ना याद आ रहा था।

राजकुमारी पद्मिनी प्रियदर्शिनी सिंह जब चाहती थीं, सबके सामने उदय का हाथ पकड़ लेती थीं। क्लास से खींचकर बाहर लेकर चली जाती थीं। तीसरी मंज़िल की छत पर ले जाकर, छत की ओर से सीढ़ी का दरवाजा बंद कर लेती थीं। हाथ पकड़ने के हज़ार बहाने थे, राजकुमारी के पास। कोई पूछे तब तो बताएँ। एचओडी जंकामंका शास्त्री की तो हिम्मत थी नहीं, फिर और कौन पूछता। कोई पूछता ही नहीं था। जो पूछता था, उदय ही पूछता कि क्या बात है, राजकुमारी? राजकुमारी बड़ी-बड़ी आँखों से एकटक देखतीं और उदय चुप हो जाता। जीवन में ऐसा समर्पण और किसके साथ था, उदय को कुछ याद नहीं। हिंदी विभाग में राजकुमारी ही उसके लिए सब कुछ थीं। जीवन की डोर राजकुमारी के हाथ में थी। उसका अतीत, वर्तमान और भविष्य सब राजकुमारी हो गई थीं। राजकुमारी कहतीं, चलो, तो उदय के पैर उससे पूछे बिना चल देते थे। वह अपने हाथ में उसका हाथ लेना चाहती, तो उदय के हाथ अब आपसे आप राजकुमारी के हाथ में चले जाते। राजकुमारी को उसे कुछ भी प्राइवेट में दिखाना होता, कुछ बताना होता, वह विशेष क्षण सिर्फ़ और सिर्फ उदय के साथ बिताना चाहती थीं। छत पर छोटी रेलिंग से पीठ टिकाकर राजकुमारी बैठ जातीं, उसे बैठने में थोड़ी-सी भी देर होती, तो उसे जल्दी से खींचकर अपने पास बैठा लेतीं। 

उदय के नंबर पहले साल में कम आए, तो राजकुमारी बहुत बेचैन हो गई थीं। उनकी सहेली पूनम सिंह ने बताया था कि राजकुमारी को जिस दिन पता चला, सेमिनार रूम में कमरा बंद करके देर तक रोती रहीं। रोती ही रहीं। विभाग बंद होने का समय हुआ तो निकलकर गईं। उस रात राजकुमारी ने अपने उदय के लिए कुछ नहीं खाया था। राजकुमारी को लगता था कि उसी की वजह से उदय का ध्यान भंग हुआ होगा। पूनम ने बताया था कि यह हद दर्जे का अपराधबोध था। राजकुमारी ने तय कर लिया था कि अपने प्रेम को उदय की कमज़ोरी नहीं बनने देंगी। ताक़त बनाएँगी। उदय क्या खा रहा है, पी रहा है, कितनी देर पढ़ रहा है, कब सो रहा है, कौन-सी किताब उसके पास नहीं है, जो किताब लाइब्रेरी में नहीं है, कहाँ मिलेगी,  शाहर में मिल जाएगी या बाहर से मँगवाना पड़ेगा। इतनी चिंता तो माँ और बुआ भी नहीं करतीं थीं। कभी-कभी तो उदय समझ नहीं पाता कि मेरे जीवन में सहसा यह कौन आ गया है, जिसने उसके जीवन को छाप लिया है। एक पल भी वह उसके बिना रहने की कल्पना नहीं कर सकता था। राजकुमारी उसके मन की चाबी थी। मन तनिक भी अनमना होता, राजकुमारी ताला खोल देती, मन आकाश में उड़ने लगता। कोई ऐसा दिन नहीं था, जिस दिन, राजकुमारी उसे असीम ऊर्जा से भर नहीं देती थीं। उसकी हर चीज़ के बारे में जानकारी रखती थीं। आज उदय का जन्मदिन था और उसे पता ही नहीं था। उस जैसे लोगों का जन्मदिन कभी ख़ास होता ही नहीं था। कभी कोई उत्सव, कोई मिठाई नहीं। उपहार तो जीवन में कभी मिला ही नहीं। उसे आज राजकुमारी के बैग में कुछ ख़ास दिख रहा था। लग रहा था कि उसमें कुछ है। पूछा तो उदय को पहले आँख बंद करने के लिए कहा। उसके बाद हौले से बैग से टेपरिकॉर्डर निकाला और कैसेट बजा दिया, उदय ने कहा, “यह तो शास्त्रीय गायन है।” राजकुमारी ने कहा, “हाँ, पिता जी के फ़ेवरेट हैं—ओह कितना अच्छा है, स्वर का आरोह-अवरोह, इस लय में बह जाने को जी करता है।” राजकुमारी ने आँखें तरेर कर पूछा, अकेले? उदय ने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा, राधा के साथ। कुमार गंधर्व का गान उड़ाए लिए जा रहा था, दोनों यूनिवर्सिटी की छत से उड़कर बहुत दूर जमुना के तटपर पहुँच गए थे... ‘साँवरे आई जाईयो ऽ जमुना ऽ जमुना ऽ जमुना किनारे मेरो गाँव ऽ साँवरे आई जाईयो ऽ मेरो गाँव ऽ साँवरे अई जईयो ऽ साँवरे ऽ साँवरे ऽ साँवरे अई जईयो ऽ जमुना किनारे मेरी ऊँची हवेली ऽ मैं ब्रजा की गोपिका नवेली ऽ राधा रंगीली मेरो नाव ऽ वंशी बजा के जईयो ऽ साँवरे अई जईयो ऽ पूजा करूँ संबह शाम ऽ माखन खा के जईयो ऽ साँवरे अई जईयो ऽ जमुना किनारे मेरो गाँव ऽ साँवरे अई जईयो ऽ...’ 

राजकुमारी और उदय को जमुना तट से लौटने मे देर हो गई थी। विभाग का चपरासी सीढ़ी का ऊपर का दरवाज़ा पीट रहा था। राजकुमारी को होश आया तो जल्दी-जल्दी उदय को लेकर भागीं। ड्राइवर परेशान होगा। गाड़ी तक उदय का हाथ नहीं छोड़ा था। उदय ने ही कहा, “हॉस्टल जाता हूँ।” 

वे दिन बहुत अच्छे दिन थे। फूल जैसे दिन थे। प्यार जैसे दिन थे। वे दिन अख़बार पढ़ने के दिन नहीं थे, प्रेमपत्र पढ़ने के दिन थे। प्रेमपत्र तकिये के नीचे रखकर सोने के दिन थे। चाँदनी जैसी रातें थीं। रातों में एक ओर किताबें थीं, दूसरी ओर किताबों में दिन के फूल थे, जिनकी महक रातों में भी दिन जैसी थी। सबसे सुंदर दिन थे, सबसे अच्छे दिन थे। न कोई दुख था, न कोई चिंता थी, न कोई रोग था, न कोई शोक। कितने ख़ुश-ख़ुश दिन थे। मुस्कुराते और खिलखिलाते हुए दिन थे। एक बहुत छोटे से वाक्य में कहता हूँ। वे दिन असीम ऊर्जा से भरे दिन थे। प्रेम के दिन थे। प्रेम की पतंग आसमान में और ऊपर और ऊपर उड़ाने के दिन थे। वे दिन चले जाते हैं, लेकिन जाकर भी कहाँ जा पाते है। हृदय के आकाश में बादलों की तरह उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। दिमाग़ के किसी हिस्से में बस जाते हैं। आँखों की बहुत पतली नसों में, पुतली के पीछे छिप जाते हैं। कोई डॉक्टर देह में रोग ढूँढ़ता है, प्रेम नहीं ढूँढ़ पाता है। प्रेम न तो रोग है, न उसे कोई रोग कभी होता है, न प्रेम कभी बूढ़ा होता है। प्रेम ही है, जो चिरयुवा होता है। प्रेम कभी मरता नहीं है। प्रेमी चले जाते हैं, प्रेम धरती पर रह जाता है। किसी और प्रेमी के लिए। किसी और दिन के लिए, किसी और चाँदनी रात के लिए।

डॉक्टर, बूढ़े उदय को इस मशीन से उस मशीन तक दौड़ाते थे और दिल और दिमाग़ की हज़ार जाँचों में भी उसके प्रेम को पकड़ नहीं पाते थे। देह के रोग को पकड़ते थे। दवाएँ उसकी पीठ पर लाद देते थे। ये-ये सुबह, ये-ये शाम को। दस-दस गोलियाँ रोज़। रिटायर होने के बाद उदय को बीमारियों की नई नौकरी मिल गई थी। शुगर और बीपी पहले से थी। इस्कीमिक अटैक, एंजाइना पेन, भयंकर एलर्जी, थायराइड। ग्लूकोमा के ऑपरेशन, पाइल्स का ऑपरेशन। प्रोस्टेट की समस्या। ये तमाम समस्याएँ मिलकर भी उदय के साहित्यिक सरोकारों को कम नहीं कर पाई थीं। अभी भी, बीमारियाँ एक तरफ़ थीं और साहित्य का मोर्चा दूसरी तरफ़। शायद साहित्य ने उसके जीवन को छाप लिया था, जिससे लाख चाहने के बावजूद वह निकल नहीं पा रहा था। स्मार्टफ़ोन पर बच्चों के बच्चे थोड़ी-थोड़ी देर के लिए आकर उसे अपनी ओर खींच लेते थे, भींच लेते थे, खेलते थे, प्यार करते थे। उसके बाद फिर वही हिंदी साहित्य। फिर वही राक्षसों की दुनिया। फिर वही, उनके दल पर टूट पड़ना। उदय का यही काम रह गया था। रह-रहकर उसे उसे लगता कि हिंदी की आबरू को वह नहीं बचाएगा, तो फिर कोई नहीं बचा पाएगा। साहित्य में उसकी सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि उसे एक हाथ से हिंदी के राक्षसों से लड़ना था, दूसरे हाथ से अपने समय का ज़रूरी साहित्य रचना था। यह उसके जीवन का सबसे मुश्किल काम था। सोशल मीडिया पर हिंदी साहित्य का एक बड़ा तबक़ा आ गया था। उनकी हरकतें, उनकी हरमज़दगियाँ, उनका दोग़लापन, सब यहाँ साफ़-साफ़ दिखता था। यहाँ मौजूद हिंदी का लेखक मुँह से ज़ोर-ज़ोर से प्रधानमंत्री को गालियाँ देता था और दूसरी तरफ़ दोनों हाथों से ज़ोर-ज़ोर से हँसमुख वाजपेयी का चूतड़ धुलता था। क्या मार्क्सवादी, क्या ग़ैर-मार्क्सवादी, क्या लेखक, क्या लेखिकाएँ, सब यहाँ अपना पाजामा, अपना जम्फर फाड़कर नाचते थे। उदय देख-देखकर ग़ुस्सा होता। सबको डाँटता-फटकारता रहता था। यही उसका जीवन था। दस साल से एक उपन्यास लिखना चाह रहा था। दरअस्ल, वह उसके शुरुआती छोटे उपन्यास का विस्तार होता, लेकिन लिखना शुरू नहीं कर पा रहा था। मुझसे कहता कि संटी तुम लिख दो। मैं पूछता कि मैं लेखक कहाँ से हूँ भाई? आज की तारीख़ में लेखक होने के लिए हँसमुख का धुलना पड़ता है, जंकामंका का धुलना पड़ता है। इस शहर के लेखक तो बल्ली और हौदा तक का, जो लेखक नहीं हैं, उनका भी कूद-कूदकर धुलते हैं। ये सब मुझसे नहीं पाएगा। अपना उपन्यास-फुपन्यास लिखने का आइडिया अपने पास रखो। लिखना हुआ ही तो पंडिज्जी के अख़बार के लिए हिंदी साहित्य का प्राइवेट इतिहास लिखूँगा, बस! तुम पैदाइशी लेखक हो, कविता, आलोचना, उपन्यास वग़ैरा लिखने-उखने का काम तुम ही करो। साहित्य में उदय की मुश्किलों का अंत नहीं था। कविता, आलोचना, कथा, कोई भी जगह ऐसी नहीं थी; जहाँ अँधेरा गरज न रहा हो, उसे लड़ने के लिए ललकार न रहा हो। जहाँ लेखक और लेखिकाएँ, उस अँधेरे में अपने शरीर का ही नहीं, अपनी आत्मा तक के वस्त्र न उतार रहे हों। वे विख्यात होने के लिए हर वह काम कर रहे थे, जो साहित्य के पुरखों ने नहीं किया था। यह साहित्य का सबसे काला समय था। इतनी कालिख तो राजनीति में नहीं थी। राजनीति में सब प्रकट था, साहित्य में सब भूमिगत। जनता सब देखती थी, पाठक देख नहीं पाता था कि लेखक किस प्रकार से अपने वस्त्र उतारकर मठाधीशों के दरबार में, शक्तिकेंद्रों के दफ़्तर में लेट जाता है। हिंदी साहित्य का यह विचित्र समय था। पुरुष लेखकों का एक स्त्रैण समाज था, स्त्रियाँ तो स्त्रियाँ थी हीं, कोई झाँसी की रानी थोड़े थीं। यहाँ न कोई कबीर था, न कुंभनदास, न मीरा, न निराला, न महादेवी वग़ैरा। इस दौर के लेखक महान् पुरखों के साहित्यिक वंशज नहीं थे। ये पता नहीं कहाँ से चले आए थे! हद तो यह कि जिन साहित्यिक पुरखों के जैविक वंशज बचे हुए थे, वे अपने पुरखों के नाम पर पुरस्कार बाँट रहे थे, हिंदी की दुनिया में अपने पुरखों के नाम पर अँधेरा छोड़ रहे थे। साहित्य की भ्रष्ट सत्ता और अपसंस्कृति से लड़ने का जज़्बा विरल था। उदय जैसे लोग अपने को इस आग में होम कर रहे थे। उन्हें लिखने का जितना काम करना चाहिए था, उसका आधा कर पा रहे थे, आधा हिंदी के राक्षसों से लड़ने मे ख़र्च कर रहे थे। इस लड़ाई में उनके पास लिखने का आधा वक़्त तो था, लिखे हुए को छपाने का वक़्त नहीं था।

यह हिंदी का अंधकार युग था। नामी-गिरामी प्रकाशकों ने अपने प्रकाशन में नोट छापने वाली और अँधेरा उगलने वाली मशीनों को एक साथ लगा रखा था। इन मशीनों को प्रकाशन जगत में संपादकीय विभाग कहते थे और इन मशीनों के चलता पुर्ज़ा मशीनमैनों को संपादक और संपादकीय प्रमुख वग़ैरा कहते थे। हालाँकि इसमें आधा सही था, आधा ग़लत। प्रमुख तो सही था, संपादन सही नहीं था, सही पादन था। जो भी था ज़बरदस्त था। संपादकीय विभाग देश भर के छँटे हुए लटक कवियों के संग्रह छापने की जुगत करता था। जो हेलीमेली था, चाहे स्त्रैण कवि था, संपादकीय विभाग का प्यारा था। इंदौर का, भोपाल का, पटना वग़ैरा का। जो कवि संपादन प्रमुख को महावीर प्रसाद द्विवेदी से बड़ा कह दे, वही प्रिय था। जो कवि त्रिलोचन, केदार सीनियर और जूनियर, विनोद, विष्णु वग़ैरा की तरह कविता लिखकर दिखा दे, वही कवि था। जो अपनी तरह लिखे और कड़ा लिखे, वह कवि नहीं था। जो जगह-जगह नाचे वह कवि था, जो साहित्य अकादेमी, भारत भवन, आदि फ़ाउंडेशन और लेखक संगठनों के आयोजन में न नाचे, वह कवि नहीं था, जो साहित्य के लिए लंबी लड़ाई लड़े, वह तो हरगिज़-हरगिज़ कवि नहीं था। जो साहित्य के अँधेरे और साहित्य के पूँजीवाद का विरोध करे, वह कवि नहीं था। जिस कवि के पास रीढ़ की हड्डी न हो, वही कवि था। कवि ही नहीं, आलोचक होने की शर्तें भी बहुत कठिन थीं। जो प्रशंसामूलक-अतिप्रशंसामूलक आलोचक न हो, वह आलोचक नहीं था। जो रोज़ चार रिव्यू और पाँच कवियों पर धड़ाम से गिर जाने वाला ही सही, तारीफ़ के पुल न बनाए, आलोचक नहीं था। प्रशंसामूलक आलोचकों की भरमार थी। ज़िंदा या मुर्दा, किसी की भी प्रशंसा करा लो। इनके चूतड़ पर सटासट बेंत की छड़ी से पिटाई करने वाला कोई नहीं था। यह दौर बुज़ुर्ग महावीर प्रसाद द्विवेदी का नहीं, ज़्यादातर चालीस-पचास के अधेड़ और अधकचरे संपादकों का था। जिसकी उम्र चालीस-पचास की थी, बनते थे अस्सी-सौ का। इनके पास उम्र कम-ज़्यादा कर लेने की कोई बहुत छोटी मशीन थी, जिसे ये जेब में लेकर घूमते थे और जब जैसी ज़रूरत होती थी, बटन दबा देते थे। जब चाहते चालीस का दिखते, पचास का दिखते। मेज़ पर सामने बैठी जवान लेखिका के सामने दिल निकालकर रख देते थे और उम्रदराज़ लेखकों के सामने जब अस्सी का दिखना होता था तो बालों में सफ़ेद रंग स्प्रे कर लेते थे। उदय के सामने तो सोशल मीडिया पर सब हद ही कर देते थे। वे थे उसके बच्चों की उम्र के और बनने लगते थे सौ के। ये बच्चे सोशल मीडिया पर कविता पढ़ाने लगते थे, अच्छी कविता क्या है, बताने लगते थे। आलोचना क्या है, सिखाने लगते थे। प्रकाशक को साहित्य से नहीं, पैसे से मतलब था, जो बिकता था, वही उसके लिए महान् लेखक था। जिस लेखक को साहित्य अकादेमी मिल गया, वह गधा चाहे गधी भी हो, निराला और महादेवी की कोटि का लेखक हो जाता था। स्त्री-विमर्श पर किसी चूहे या चुहिया की पोथी हो, तो मौलिक ग्रंथ की तरह छापता था। यह बहुत बुरा समय था, इस देश के लिए लज्जाजनक था, स्त्री ही नहीं, स्त्री विमर्श भी बिकने की चीज़ थी। रंडी के दलाल जैसे पैसे कमाते थे, प्रकाशक स्त्री-विमर्श का कोठा सजाकर माल बनाते थे। पुरस्कृत लेखकों की नुमाइश करते थे, पुरस्कार की धूल पाठकों की आँखों में झोंककर उसे लूटते थे, उसकी गठरी लेकर भाग जाते थे। ये साहित्य के अपराधी भी थे, पूँजीवादी भी। हिंदी के लेखक संगठनों के बड़े-बड़े क्रांतिकारी पदाधिकारी वग़ैरा, देश के पूँजीपतियों का नाश चाहते थे और हिंदी के पूँजीपतियों के सामने पतलून उतारकर लेट जाते थे। जो लेखक साहित्य की इस मुख्यधारा में डुबकी नहीं लगाता था, उसके साथ ये क्रूरता की हद पार कर जाना चाहते थे, ये सब उसकी खाल उतारकर भूसा भर देना चाहते थे, उसके मुँह पर कालिख पोतकर देश भर में गधे की पीठ पर बैठाकर घुमाना चाहते थे। इसीलिए उदय उनकी आँख में किरकिरी की तरह नहीं, बड़े कंकड़ की तरह गड़ता था। ये उसे बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। उसके साथ जो करना चाहते थे और कर नहीं पाते थे। उदय को एक ओर हिंदी के भ्रष्ट लेखकों से लडना था, तो दूसरी ओर देश भर के उन भ्रष्ट प्रोफ़ेसरों से जो हिंदी के साथ दुष्कर्म कर रहे थे। 

मार्च से पहले विश्वविद्यालयों में कुछ फ़ंड का इस्तेमाल कर लेना ज़रूरी होता था। विश्वविद्यालय के सभी विभाग फ़ंड को ध्यान में रखकर और अपने हेलीमेली प्रोफ़ेसरों और मैडम प्रोफ़ेसरों को उपकृत करने के लिए आयोजन करते थे। गंज गोबरहवा विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग भी इस काम में पीछे नहीं रहता था। कहना चाहिए कि कूद-कूदकर आयोजन करता था। रिफ़्रेशर कोर्स में बोलने के लिए जो विषय तय होता था, वक्ता उस पर नहीं बोलता था, जो वह जानता था, वह बोलता था। वह भाषाविज्ञान जानता था, बीस साल से सूरदास पढ़ा रहा था, तो बीसवीं शताब्दी के साहित्यिक आंदोलनों पर बोलते समय भाषाविज्ञान और सूरदास पर बोलता था, वह किसी भी विषय को खींचकर वहीं लाता था, जहाँ उसकी नाल गड़ी होती थी। कोलकाता का मीडिया विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर जगदीशचंद्र जिझौतिया, जिसे उसके विद्यार्थी जगदीशचंद्र जहजुतिया कहते थे, आलोचना पर बोलते हुए कहता था कि समाजविज्ञानविषयक विमर्श ही आज हिंदी आलोचना है। काव्यालोचना आचार्य शुक्ल के साथ ही दफ़्न हो गई। अपने गुरु मशहूर सिंह को कहता कि वह हमारे समय में अप्रासंगिक हैं। कहता कि जिस विषय पर उसने लिखा है, उस पर उसके गुरु मशहूर सिंह ने कोई काम नहीं किया है। रामचंद्र शुक्ल तक उस विषय पर लिखने की हिम्मत नहीं कर सके थे। असल में जगदीशचंद्र जहजुतिया के दुख का कारण यह नहीं था कि वह चला था अपने समय का सबसे बड़ा आलोचक बनने और काव्यालोचना पर काम करने की जगह मीडिया पर लिखते-लिखते मीडिया विशेषज्ञ बन गया था। उसके दुख का कारण यह भी नहीं था कि मशहूर सिंह ने क्या लिखा था, क्या नहीं लिखा था। वैसे भी मशहूर सिंह ने लिखा बहुत कम था, जो कुछ लिखा था, हवा-हवाई था, लेकिन जगदीशचंद्र जहजुतिया का असल दुख यह था कि उसे भी विष्णुकांत टीबड़ेवाल की तरह जेएनयू में प्रोफ़ेसर क्यों नहीं बनाया था। आख़िर वह भी आलोचना में कुछ करने की जगह, टीबड़ेवाल की तरह गांधी और नेहरू पर धाराप्रवाह बोल सकता था, लिख सकता था, राजनीति और समाजविज्ञान के विषयों का विशेषज्ञ बन सकता था। काव्यालोचना पर बात करने की जगह मार्क्सवाद की ढोल बजा सकता था, घंटों फ़ाशिस्टों को गालियाँ दे सकता था। प्रोफ़सर भरत अग्रवाल की तरह हिंदी की नींव खोदने का काम कर सकता था। जगदीशचंद्र जहजुतिया के लिए साहित्य की क़ब्र खोदने का काम कौन-सा मुश्किल काम था, वह तो कर ही रहा था। डंके की चोट पर कहता भी था कि अब तक जो किया है, उन लोगों से ख़राब काम नहीं किया है। जेएनयू में न हो पाने का जगदीशचंद्र जहजुतिया का दुख कमलाकांत त्रिपाठी के गंज गोबरहवा विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर न हो पाने के दुख से थोड़ा ही कम था। कमलाकांत त्रिपाठी तो उदय के प्रोफ़ेसर होने के बाद से दिन और रात एक किए हुए था। जगदीशचंद्र जहजुतिया को न धोती पहनना आता था, न फींचना। मशहूर सिंह पर आरोप लगाता कि उन्होंने विष्णुकांत टीबड़ेवाल की हिंदी सेवा से नहीं, धोती-सेवा से प्रभावित होकर प्रोफ़ेसर बनाया है। वह तो दावे के साथ कहता था कि मशहूर सिंह अगर धोती की जगह पतलून पहनते तो वह विष्णुकांत टीबड़ेवाल से अच्छी तरह पतलून साफ़ करके दिखा सकता था। जीवन में इस तरह के दुख से दुखी अतृप्त आत्माएँ देश भर के हिंदी-विभागों में विचरण करती रहती थीं। जगदीशचंद्र जहजुतिया हिंदी साहित्य की दुनिया में मीडिया का ही नहीं, बिबलियोग्राफ़ी का भी विशेषज्ञ था। उदय ने अपनी लाल डायरी में ऐसे आचायों के बारे में लिखा रखा है :

“हिंदी में चूतिये आचार्यों की कोई कमी नहीं है, ढूँढ़ो एक, मिलते हैं हज़ार। आज की तारीख़ में हिंदी का सबसे बड़ा चूतिया प्रोफ़ेसर जगदीशचंद्र जहजुतिया है, जिसके लिए हिंदी की भलाई उन्नत आलोचना में नहीं, मौलिक रचना मे नहीं, शोधप्रबंधों की बिबलियोग्राफी में निहित हैं। अरे भाई हिंदी के आँगन में बिबलियोग्राफी का क्या और कितना काम है? तुम्हारा मित्र बिबलियोग्राफीबाज़ कोलकाता का प्रोफ़ेसर जयनाथ चौबे कितना बड़ा आलोचक है, कोई लेख है उसके पास क्या? आलोचना की भाषा है, उसके पास? उसे भी यह पता नहीं है कि बिबलियोग्राफी विद्यार्थियों के लिए खेलने की चीज़ है, आलोचक बनने की सीढ़ी नहीं। मैं पूछना चाहूँगा कि तुम बिबलियोग्राफी-विशेषज्ञ हो, तो आचार्य शुक्ल हो गए क्या? आचार्य शुक्ल बिबलियोग्राफी से आचार्य शुक्ल हुए हैं क्या? आचार्य शुक्ल ने कितनी बिबलियोग्राफी की है? उन्हें छोड़ो। अपने गुरु के समकक्ष हो गए क्या? तुम्हारा कौन-सा ऐसा मौलिक लेख है जिसे कहा जा सके कि तुम पैदा नहीं हुए होते, तो यह लेख लिखा ही नहीं गया होता? हिंदी का प्रोफ़ेसर होकर जो तुमने लिखा है, वह समाजविज्ञान के प्रोफ़ेसर नहीं लिख सकते हैं या नहीं लिखा है क्या? सच तो यह कि यह हिंदी आलोचना का अमौलिक युग है। हिंदी आज टूटे-फूटे आचार्यों के भरोसे है।”

ठीक ऐसे ही देश के हिंदी विभागों को प्रोफ़ेसर जंकामंका, प्रोफ़ेसर बल्ली, प्रोफ़ेसर हौदा जैसे टूटे-फूटे आचार्य चला रहे थे। हमारे समय में जितना ध्यान हिंदुओं के स्वाभिमान पर दिया गया, यदि हिंदी के स्वाभिमान पर दिया गया होता तो आज हिंदी के चोट्टे विश्वविद्यालयों और साहित्य अकादेमियों और संस्थानों और देश के बड़े-बड़े प्रकाशन-गृहों में नहीं होते। हिंदी के ये विषधर हिंदी का सारा सारा दूध पी ही नहीं जा रहे थे, उसमें दूसरों के लिए विष भी घोल रहे थे। 

तीक्ष्णकंटक धाम धर्म में प्रकाश का पक्षधर था और साहित्य में अँधेरे का। तीक्ष्णकंटक धाम को हिंदुओं के उत्थान और कल्याण की जितनी चिंता रहती थी, हिंदी की उन्नति के लिए उसका हज़़ारवाँ हिस्सा भी उसे फ़िक्र नहीं थी। हिंदी जी रही है कि मर रही है, तीक्ष्णकंटक बाबा के सुयोग्य उत्तराधिकारी का ध्यान इस ओर नहीं था। चिन्मयानंद महाराज जिस भाषा में अपनी बात अपने भक्तों से कहते हैं, उसकी भलाई के लिए कुछ नहीं करते थे। वे तो उल्टे किसी को भी हिंदी संस्थान का प्रमुख बनवा देते थे, भाषा-संस्थान का अध्यक्ष किसी भी बाँगड़ू को बनवा देते थे। जिनके पास हिंदी को लेकर न कोई स्वप्न होता था, न कोई विचार, न कल्पनाशीलता। शायद चिन्मयानंद महाराज का ध्यान हिंदी की उन्नति की ओर इसलिए नहीं जा सका और न उनके दरबार के हिंदी के प्रोफे़सरों ने ध्यान दिलाया, क्योंकि देश भर की हिंदी की संस्थाओं का यही हाल था। देश की सबसे बड़ी साहित्य अकादेमी ख़ुद पतनोन्मुख थी। कोई भी उसका अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, संयोजक हो जा रहा था, हिंदी में किसी भरी अंट-शंट को अकादेमी पुरस्कार दे दिया जा रहा था। हिंदी को लेकर कोई गंभीरता, सरकार में, देश में, समाज में, कहीं भी नहीं थी। इससे बुरा कोई समय किसी भाषा और साहित्य के लिए हो सकता है, यह कह पाना मुश्किल था। इस अँधेरे में इससे टकराने के लिए उदय अभिशप्त था। बाकियों की मौज थी। दिल्ली में रहने और दिल्ली जाने वालों की धड़ाधड़ किताबें छप रही थीं। उदय को अँधेरे में रहना मंज़ूर था, लेकिन साहित्य के अँधेरे के ख़िलाफ़ लड़ाई को धीमा करना या रोकना मंज़ूर नहीं था। उदय की लड़ाई और उसके जीवन के दुख की कथा मैं नहीं कहता तो कोई उसका नाम लेने वाला इस धरती पर कोई नहीं था। सारे लेखक एक-दूसरे के मुँह पर चंदन पोतने के काम में लगे हुए थे। यहाँ तक कि हिंदी की संस्थाओं की ओर से हिंदी के वैशाखनंदनों को तिलकित किया जा रहा था, उनके मुँह पर चंदन पोता जा रहा था।

उदय को अपने जीवन में भी लड़ना था और साहित्य के जीवन मे भी। जैसे साहित्य में सब उसके हिस्से की ज़मीन हड़प ले रहे थे, उसका मोढ़ा हड़प ले रहे थे, उसी तरह जीवन में भी जिसे देखो उसके पराभव की कामना करता था। सब उसकी हार चाहते थे। गाँववालों को इस बात से ईर्ष्या थी कि प्रोफ़ेसर क्यों हो गया? पट्टीदारों के ख़िलाफ़ अदालत की अंतिम डिक्री लेकर घूमता था। डीएम, एसपी से मिलता, पुलिस इंस्पेक्टर के पास जाता, कोर्ट का फ़ैसला दिखाता। इंस्पेक्टर राजनीतिक दबाव में आ जाता। मदद करना चाहता, कर नहीं पाता। पट्टीदार अपने संबधियों से फ़ोन पर धमकी दिलाते। कोई कहता गंज गोबरहवा में रहना नहीं है क्या, कोई कहता ज़िंदा रहना है कि नहीं? उदय को जान जाने की कोई चिंता नहीं थी। बिस्तर पर आराम करते हुए जाने से अच्छा है, जीवन में संघर्ष करते हुए जाए। उसे डर सिर्फ़ एक बात का रहता था कि इस बीच उसे कुछ हो गया, तो लिखी जा रही किताब का क्या होगा! किताब अंतिम दौर में थी। उदय पूछता कि संटी, मैं न रहूँ, तो तुम मेरी किताब पूरी कर दोगे? मैं उसे देखता, उसका क्लांत मुख देखता। मेरी आँख नम हो जाती। एक लेखक के जीवन की इससे बड़ी त्रासदी और क्या होगी।

अँधेरा बड़ा था, जीवन छोटा। इसी जीवन में अंदेशे भी थे, धमकियाँ भी थीं और जीना भी था। न जीना छोड़ सकते थे, न वक़्त की गाड़ी को किसी स्टेशन पर रोक सकते थे। ऋतुओं और पर्वों की आवाजाही को रोकना हमारे हाथ में नहीं था। भीतर और बाहर अँधेरा जितना भी हो, प्रकाश की कामना न तो ख़त्म होती है, न हाथ कोई दीया जलाने के काम से पीछे हटते हैं। समय का एक पैर अक्टूबर में था, दूसरा नवंबर में। इसी बीच दीपावली आ गई थी। मैंने उदय से पूछा था कि इस दीपावली में बच्चे आएँगे या बच्चों के पास जाओगे? उदय ने कहा था, “दोनों में से कोई भी नहीं हो पाएगा। मैं हूँ और श्रीमती जी हैं। अँधेरा है और यह प्रकाशपर्व है। अड़ोस-पड़ोस है।” उदय चाहता तो था कि उड़कर बच्चों के पास पहुँच जाए, लेकिन हाथ में कोर्ट का अंतिम फैसला था, वही उसके पैरों को बच्चों के पास जाने से रोक रहा था। दीपावली के बाद डीएम से मिलना था, एसडीएम से मिलना था, रेवेन्यू की टीम का गठन कराने के बाद फ़ोर्स को साथ लेकर अपने हिस्से की पैमाइश कराकर उस पर निर्माण का काम कराना था। यह काम उसके लिए आसान नहीं था। इस व्यवस्था में लेखक नाम के आदमी के लिए कोई जगह नहीं थी। एक हाईस्कूल फ़ेल वार्ड मेंबर बहुत बडी चीज़ था। एमएलए उसकी मुट्ठी में था। एमएलए अपने क्षेत्र की सरकार था। सब चाहते थे कि उदय अपनी जन्मभूमि, अपना मकान, अपनी यादें, अपना सब कुछ यहाँ छोड़कर, उच्छिन्न हो जाए। इस कठिन संघर्ष और चिंता के बीच दीपावली जैसी भी थी, उसे भी, जैसे सब मना रहे थे, मनाना था।

गाँव-जवार और देश-दुनिया के जो हालात थे, उसमें अज्ञेय की तरह यह कह पाना मुश्किल था कि ’यह दीप अकेला स्नेह भरा...’ बल्कि सच तो यह था कि ‘यह दीप अकेला दर्द भरा...’ था। सिर पर दीपावली खड़ी थी और शहर, क़स्बा और गाँव का सिर दर्द से फटा जा रहा है। हारी-बीमारी का दर्द। इस दीपावली में उन घरों में क्या बीत रही थी, जिनके कुलदीप नई-नई बीमारी की आँधी में बुझ गए थे। कश्मीर और पाकिस्तान में धरती के डोलने से कितना अँधेरा छा गया था। मऊ के दंगे में कई मौत के घाट उतार दिए गए थे। मौत के अँधेरे से बड़ा कोई अँधेरा होता है क्या? फिर भी अँधेरा चाहे कितना बड़ा हो, जलता हुआ एक दीप चाहे जितना छोटा हो अपना काम कर जाता है। मौत के ख़िलाफ़ जीवन का हस्तक्षेप। जैसे अख़बार हर मुश्किल में छपता रहता था, जैसे देश में लोकसभा, विधानसभा, प्रधानी और ज़िला और क्षेत्र पंचायत का चुनाव चलता रहता था। जैसे आँसू और यथार्थ की पटरियों पर ज़िंदगी की गाड़ी दौड़ती रहती थी। 

सोचता था इस दीपावली में दीपों की एक क़तार लेकर झंकार के साथ निकलूँ और जहाँ-जहाँ दुख है, अँधेरा है, एक-एक दीप रखता चलूँ। समाज के हर कोने-अँतरे में। एक दीप राजनीति के लिए तो एक साहित्य के लिए। एक दीप धर्म के लिए तो एक प्रशासन के लिए। एक दीप उनके लिए, जिनके लिए दीपावली इस साल भी करोड़ों और लाखों वाली रही और जिन्हें इसके लिए किसी भी लूट-मार, धोखाधड़ी और हत्या से गुरेज़ नहीं। दरअस्ल, हर साल जगह-जगह रावणों को ख़त्म करने की कल्पना के पीछे भाव यह होता है कि ये हर दौर में राजनीति, व्यापार, धर्म, शिक्षा और साहित्य, कला, खेल हर जगह मौजूद होते हैं। ख़त्म होकर भी ख़त्म नहीं होते। एक दीप इनके लिए इसलिए कि इन्हें ख़त्म करने वाले बिजली की क़िल्लत की वजह से अमावस्या की काली रात में चूक न जाएँ। इनके चेहरे को मछली की आँख की तरह ठीक से देख सकें। हर जगह की राजनीति में धर्म, जाति और बाहुबल के साथ रुपयों की चकाचौंध से पैदा किया जाने वाला अँधेरा है, जो किसी भी क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास में अवरोध उत्पन्न करके उस क्षेत्र को भूख, बेरोज़गारी, निर्धनता और महामारी के हवाले करता रहता है। जब अधिकांश विद्या के मंदिरों का चिराग़ गुल है, फिर वे भला समाज के लिए उजाला कैसे करेंगे? बड़े उच्च शिक्षा संस्थान जब ख़ुद ही अँधेरा उगलने वाले कारख़ाने में बदल गए हों और उनके मुखिया रोशनी करना तो दूर, चीज़ों को और आस-पास के चापलूसों और मीडियाकरों को ठीक से देख न पा रहे हों और छोटे-छोटे ग़ुंडों और अराजक तत्त्वों के आगे पानी भरने लग रहे हों तो ऐसे में वे युवाओं को ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, साहस और जीवन और समाज में उजाला करने का पाठ क्या ख़ाक पढ़ाएँगे? उच्च शिक्षा संस्थानों का प्रतिभा और ज्ञान लुटाने की जगह ख़ुद लूट-मार का अड्डा बन जाना, हमारे समय का एक बड़ा अँधेरा है, रावण से एक इंच बड़ा। इन संस्थानों के मुखिया के लिए मिट्टी का दीपक भला कितना उजाला करेगा? कभी-कभी लगता था कि ऐसे विश्वविद्यालयों और गुरुओं को देखकर ही कबीर ने कहा होगा, ‘जाका गुरु है आंधरा, चेला है जाचंध / अंधे अंधा ठेलिया दोन्यो कूप परंत...’ ऐसे पत्थर गुरुओं के बीच उदय को अपने विद्यार्थियों को गुरुओं का सच बताना था। साहित्य का सच बताना था। दीपावली की सफ़ाई में उदय का पुराना अंतर्देशीय पत्र मिल गया था। वक़्त की धूल झाड़कर पढ़ने लगा था :

“प्रिय मित्र संटी, 

आज हिंदी में कविता की कहीं कोई लड़ाई नहीं है, आज किसी कवि की हैसियत नहीं है कि कविता की या कविता के लिए लड़ाई करे। वह तो अपनी क्षुद्र यशेषणाओं और महत्त्वाकांक्षाओं के लिए हाथ-पैर चला रहा है, दौड़ रहा है, छलाँग लगा रहा है, दीवार से सिर टकरा रहा है। वह कविता के लिए संघर्ष थोड़े कर रहा है। कविता तो साधन है, साध्य तो अपने समय में कबीर, निराला, मुक्तिबोध बन जाने की प्रचंड साहित्यिक मूर्खता है। कवि मूर्खताप्रिय हो सकता है, कविता नहीं। बहादुर कविता रास्ते की छेड़ख़ानियों और बदतमीज़ियों से घबराकर कहीं रुकेगी नहीं, उसे कोई रोक नहीं पाएगा, वह जाएगी अपने अनन्य प्रेमी और साधक के पास; दिल्ली से दूर, लेखक संगठनों से दूर, मंचों और प्रकाशनगृहों से दूर, आलोचकों और संपादकों से दूर, जनखे और लंपट कवियों से दूर, पुरस्कार की टट्टी खाने वाले सूअरों से दूर, कविता के नाम की धूनी रमाकर अपने स्थान पर ध्यानमग्न और स्वाभिमानमग्न कवि की कुटिया में। वह दिल्ली जाने वाली ट्रेन में नहीं, मठाधीशों और उपमठाधीशों की पालकी में नहीं, तमाम इनामी कवियों की प्रतिनिधि कविताओं की शृंखला में नहीं, किसी पब्लिकेशन की चयनित कविताओं की सबसे रद्दी और फिसड्डी शृंखला में नहीं, आज की सच्ची कविता, ज़रूरी कविता, किसी अतिशय अक्खड़ और कविता के लिए सचमुच मर-मिटने वाले कवि की अप्रकाशित पांडुलिपियों में मिलेगी। हिंदी के कापुरुषों, वह तुम्हें मिलेगी ही नहीं। तुम तो कविता की छाया के भी हक़दार नहीं। जाओ दिल्ली की ट्रेन या जहाज़ पकड़ो, कविता का भगत सिंह बनने की मशीन ढूँढ़ो और ढूँढ़ते-ढूँढ़ते और भौंकते-भौंकते वहीं साहित्य की मंडी में, उसके कोठे पर डूब मरो। कौन आज कविता की लड़ाई लड़ता है? दो पैसे की अमरता का लेमनचूस चूसने वाले गधे कवियों का समय है। कविता के लिए काम करना और अमरता के लिए जगह-जगह नाक रगड़ते रहना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। एक कवि की ड्यूटी का रास्ता है, दूसरा कवि की प्रचंड मूर्खता या ख़ुदकुशी का।

आज धर्म की दुनिया में सच्चे साधु कितने होंगे, सब होंगे? राजनीति की दुनिया में ईमानदार राजनेता कितने होंगे, सब होंगे? तो कोई मूर्ख ही ऐसा सोच सकता है कि साहित्य में ईमानदार, स्वाभिमानी और साहसी लेखक बहुत अधिक होंगे और बेईमान, पालकी ढोने वाले, साहसच्युत लेखक बहुत कम होंगे। अरे भाई साहित्य में भी अच्छे और बुरे का प्रतिशत राजनीति और धर्म जैसा ही है। ऐसा नहीं है कि साहित्य की गंगा में, जो भी डुबकी लगा लेगा, पवित्र हो जाएगा। हिंदी की दुर्दशा देखकर सिर फटा जा रहा है। कोई लेखक सुधरने के लिए तैयार नहीं है। कोई लेखिका, लेखक के पीछे-पीछे चलना, छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। ये अपने स्त्री-विमर्श का झंडा, पुरुष लेखकों के डंडे में लगाकर फहराना बंद नहीं करेंगी। विचार की दुनिया में, साहित्य की दुनिया में ये हँसमुख वाजपेयी से लेकर विमल बिहारी तक के कंधे पर अपना सिर क्यों टिकाती हैं। लेखिका, पुरुष लेखकों की ग़ुलामी में क्यों जीना चाहती है। बहुत अँधेरा है, संटी। जी करता है, इक्कीसवीं सदी के हिंदी साहित्य के इस देश पर परमाणु बम गिरा दूँ!

दीपावली की शुभकामनाओं सहित, 
तुम्हारा अभिन्न
उदय”

झंकार, बीदास और मैं, तीनों उदय के साथ, उसके घर में बैठे हुए थे। चाय का प्याला हाथों में था और ग़ुस्से में हाथ ऊपर उठना चाह रहे थे। हालाँकि उदय का घर ग़ुस्से करने की जगह नहीं था। ग़ुस्सा तो चलकर शीशमहल पब्लिकेशन ग्रुप, रंगमहल पब्लिकेशन ग्रुप, ताजमहल पब्लिकेशन ग्रुप, न्यू पब्लिकेशन ग्रुप, संसारचंद एंड संज वग़ैरा के दफ़्तर में होना चाहिए था। शीशमहल पब्लिकेशन ग्रुप को एसपीजी भी कहते थे। एसपीजी देश का ऐसा पब्लिकेशन ग्रुप था, जो अभी-अभी पैदा हुए कवियों के संग्रह छापता था, वह कविता को नहीं, पुरस्कार को श्रेष्ठता का प्रमाण मानता था। पाँच सौ रुपये का पुरस्कार पाने वाले कवि का संग्रह धड़ाक से छापता था। मुक्तिबोध का पहला संग्रह विदा की बेला में आया और शमशेर का अधेड़ होने पर, वह भी शीशमहल पब्लिकेशन से नहीं। क्या मजाल कि कोई लेखक उसके ख़िलाफ़ चूँ-चपड़ कर दे। मालिक तो मालिक, मालिक का कारिंदा भी मालिक से कम नहीं था। एडिटर कुमार आनंद उर्फ़ राजा जी का रुतबा मालिक से ज़्यादा था। लेखकों और लेखिकाओं पर पूरा ख़ौफ़ था। लेखक और लेखिकाएँ उसके हुक्म के पाबंद थे। लेखक उसके केबिन में बाक़ायदा कोर्निश करते हुए घुसते थे। हालाँकि उस जादुई केबिन में घुसना आसान नहीं था। कोई हेली-मेली, कोई पूर्व परिचित-सुपरिचित, बहुपुरस्कृत-बहुप्रशंसित लेखक ही, मामूली इंतज़ार के बाद उसके केबिन में प्रवेश पा सकता था। किसी अप्रसिद्ध, अचर्चित के लिए उस जादुई केबिन तक पहुँच पाना मुश्किल था, अलबत्ता लड़कियाँ इस मामले में सौ प्रतिशत छूट की हक़दार थीं। उन्हें वह सीसीटीवी में देखते ही तुरत बुला लेता था। असल में जब उसके सामने कोई लेखक दीन-हीन जैसा बैठा होता था, तो उसके भीतर महावीर प्रसाद द्विवेदी की आत्मा प्रवेश कर जाती थी। वह जेफ्री चासर से लेकर एमिली डिकिंसन तक की आत्मा का आवाहन करके उन्हें अपनी मेज़ पर बैठा देता था। किसी ने बताया कि एक बार तो शेक्सपियर की आत्मा उसकी मेज़ से सटकर कोने में सात दिन तक खड़ी थी और सालों प्रेमचंद उसकी कुर्सी के पीछे से आगे आ पाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। असल में प्रेमचंद के अनुवाद को बुकर नहीं मिला था और सामने कभी कोई बुकर प्राप्त बैठी हुई होती थी, तो अकादेमी प्राप्त। निराला महाराज काफ़ी देर तक स्वागत-कक्ष में बैठे-बैठे ग़ुस्से से कालाबत्तू हो गए थे और उसके केबिन के दरवाज़े तक दरेरा देकर पहुँच भी गए थे, लेकिन अंदर जाने की जगह उसके केबिन के दरवाज़े पर थूककर वहीं से लौट गए थे। हालाँकि अपने स्वभाव के हिसाब से वह दरवाज़े पर करना तो कुछ और चाह रहे थे, लेकिन किया नहीं। बच्चा समझकर माफ़ कर दिया था, चूँकि उदय कभी दिल्ली के इन पूँजीपतियों की चौखट पर गया ही नहीं था। इसलिए सुनी-सुनाई और सोशल मीडिया पर देखी-दिखाई बातों के आधार पर राय क़ायम कर रहा था। वह हिंदी की दुनिया के उस इकलौते जादुई केबिन में घुसना तो दूर, उसे बाहर से भी देखना नहीं चाह रहा था। डर रहा था कि कहीं चुंबक न लगा रखा हो कि सामने दिखते ही अंदर से ज़ोर से खींच ले और उठाकर उसकी मेज़ पर पटक दे। वैसे भी इस उम्र में हड्डियाँ कमज़ोर हो जाती हैं। फ़्रैक्चर हो-हवा गया, तो महीना-दो महीना तो ठीक होने में लग जाएगा। उदय ने फ़ोन से संपर्क करने की लाख कोशिश की, लेकिन बंदा टस से मस नहीं होता था। बात ही नहीं करता था। इतना अपमान, उसे उठाकर पटक देने के लिए काफ़ी था। अहंकार इतना कि किसी भी लेखक को अपने सामने झुकाए बिना उसकी आँख उस पर उठती ही नहीं थी, ज़ुबान ही नहीं खुलती थीं। असल में पुरुष लेखक हो या महिला, सबको उसके सामने नतशीश, नतग्रीवा, नतकटि, नतनितंब होना ही होना पड़ता था। भला उदय, हिंदी के ऐसे संपादकों को महान् क्यों समझने लगता? उनके सामने झुकने क्यों लगता? झुका तो मशहूर सिंह के आगे नहीं, हँसमुख के आगे नहीं, जंकामंका के आगे नहीं। फिर इन छोटे संपादकों के आगे क्यों झुकता?

उदय ने चाहे हिंदी के बड़े कवियों की तरह कुछ भी महान् न रचा हो, लेकिन कुछ बहुत ज़रूरी ज़रूर रचा था। साहित्य की दासता और अपसंस्कृति के ख़िलाफ़ एक लंबी लड़ाई लड़ी थी। सबसे बड़ी बात यह कि साहित्य में अपने समय में लेखक के रूप में एक शानदार जीवन जिया था। कोई लेखक कारगिल-युद्ध में अग्रिम मोर्चे पर एक हाथ से लड़ भी रहा हो और कविता और आलोचना में दूसरे हाथ से लिख भी रहा हो, यह अचंभा मुझे, हमारे समय में सिर्फ़ उदय जैसे लेखक में दिखता था। उदय को क्यों करना पड़ा यह सब? किस-किस ने उसे हिंदी की लड़ाई करने के लिए मजबूर किया? यह सब जानना मुश्किल नहीं था। क्योंकि उसके जीवन में कुछ ढका-छिपा था ही नहीं। जिसने साहित्य में उजली-धुली साफ़-सुथरी ज़िंदगी जी, उसे कोई पुस्तक-संपादक अपने पैरों से रौंद कैसे सकता है, उसे दाग़दार कैसे बना सकता है? उदय ने किसी समय झंकार की मौजूदगी में कहा था कि संटी! मेरी किताबें छपें या न छपें, मेरा संग्रह शीशमहल छापे या न छापे, उसके संपादक से अपनी माँ नहीं चु*** सकता। इन लौंडे-लफाड़ियों का दिमाग़ ख़राब हो गया है। ये कबीर, सूर, तुलसी और जायसी वग़ैरा का संग्रह छापने के पहले उनसे भी निर्वस्त्र होकर लेट जाने के लिए कह सकते थे। संटी, मैं भी वही करूँ क्या, ऐसी किसी डिमांड को निराला पूरा करते या हाथ में जूता उठा लेते? दिल्ली जाकर, उसके केबिन में उसकी औक़ात बताऊँ? कितना बड़ा संपादक हो गया है? शीशमहल पब्लिकेशन ग्रुप के मालिक से पूछूँ कि रुपया कमाने के लिए हिंदी को वेश्या बना दोगे? तुमने संपादकों को नौकरी पर लेखकों और लेखिकाओं के साथ ज़िना करने के लिए रखा है? उदय कहता, ऐसे पब्लिकेशन से छपने की लालसा मुझे नहीं है, लेकिन अपने समय की ज़रूरी कविताओं और आलोचना का हक़ है कि ये प्रथम पंक्ति के प्रकाशक हैं, तो एक नंबर की कविता और आलोचना छापें, नक़ली नहीं। भक्तिकाल से छायावाद और प्रेमचंद के समय तक में ये शीशमहल, रंगमहल, ताजमहल वग़ैरा पब्लिकेशन हाउस नहीं थे। इसे इस बात को समझना चाहिए। कोई औसत कृति किसी बड़े पब्लिकेशन से छपने से महान् नहीं होती। ऐसा होता तो उदय की पीढ़ी के और बाद की पीढ़ी के जिन कवियों को इन्होंने छापा, महाकवि हो गए होते। उदय इस जन्नत की हक़ीक़त जानता था। आज तक इन्होंने किसी महाकवि को पहली बार नहीं छपा था। कुमार आनंद उर्फ राजा जी ने तो शीशमहल पब्लिकेशन ग्रुप को लिजलिजे कवियों के लिए स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप बना दिया था। यह सब देखकर उदय को घिन आती थी।

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जारी...

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