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दास्तानगोई : बिखरे फूलों का मज़मूँ

आज से क़रीब-क़रीब आठ बरस पहले जब साहित्य और अन्य किसी कला से मेरा शायद ही कोई नाता रहा हो, तो ऐसे में आजकल से ही किसी आम से दिन में मेरे मामा ने यूट्‌यूब पर एक वीडियो लगाया और कहा इसे देखो। वह वीडियो ख़ासी लंबी थी और जैसा मैंने ऊपर कहा कि मैं कला से थोड़ा दूर भी था, तो वीडियो उबाऊ भी जान पड़ी। पर कैसे-न-कैसे करके मैं बैठा रहा।

वीडियो शुरू हुई और मन रमता गया। वह महमूद फ़ारूक़ी और दारैन शाहिदी की ‘दास्तान-ए-चौबोली’ थी। फिर क्या था? ठाकुर सा नथ से तीर पे तीर निकालते गए—वह भी तब तक—जब तक छोटी राजकुमारी ने राजकुमारी चौबोली को जीत के लाने के लिए नहीं कहा। ठाकुर फन्ने ख़ाँ बन कर गए तो, लेकिन आख़िर में क़ैदख़ाने में उकड़ू बैठे घोड़े के चारे को पीसते मिले। (कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती आप इसे यूट्यूब पे देख सकते हैं।)

यह दास्तान जादुई यथार्थवाद (Magical Realism) से भरी एक शानदार कहानी लगी। मेरे लिए इस तरह का यह पहला अनुभव था। लगा कि इतनी बड़ी दास्तान कोई कैसे याद कर सकता है और फिर इतनी देर तक परफ़ॉर्म करना—किसी दूसरी दुनिया की बात जान पड़ी।

मामा ने बताया कि वह 2005 से ही ऐसी दास्ताने पेश कर रहे हैं। फ़न तो आते-आते ही आता है बशर्ते नियत सही हो। दास्तान के शुरू होने से पहले दिवंगत शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी मीर का एक शे’र कहते हैं :

“निय्यत पे सब बिना है याँ मस्जिद इक बड़ी थी
पीर-ए-मुग़ाँ मुआ सो उस का बना हज़ीरा”

तेरहवीं शताब्दी की एक Performative Art देखकर मैं हैरान तो था। अठारहवीं-उन्नीसवीं शती में अपने उरूज पर पहुँचने वाली यह कला 1928 में मीर बाकर अली के देहांत के साथ ही लुप्त हो गई। इस कलाकार की मौत भी लगभग हर कलाकार की ही तरह हुई। अपने ज़माने का एक मशहूर फ़नकार अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में पान बेचता था।

बीसवीं शती भारत के किए राजनीतिक उथल-पुथल का समय तो रहा ही, साथ ही लोगों की अभिरुचियाँ के बदलने का समय भी था। वह बदलाव आज की तरह इतना भी तेज़ नहीं रहा होगा। उस सदी की शुरुआत में ही कोलकाता में भारत का पहला सिनेमा हॉल खुलता है। ऐसे में लोगों के भीतर सदियों पुराने किसी फ़न में रुचि में कमी आना लाज़मी है।

इस दास्तान को सुनने के बाद दास्तानगोई को जान लेने की बड़ी तीव्र इच्छा हुई। उस समय जो भी आस-पास मौजूद था, टूटा-फूटा जान लिया। दास्तानगोई का फ़न का दुबारा से मुझ तक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी और महमूद फ़ारूक़ी की वजह से पहुँचा। फ़ारूक़ी ने 1980 के आगे कई साल इन दास्तानों को दुबारा से इकट्ठा करने में लगा दिए। रेख़्ता के मंच पर एक बार उन्होंने कहा था कि दास्तान कहने की कला कुछ ईरानी अपने वहाँ की कहते हैं और यूक्रेनी भी [यही दावा करते हैं]।

बक़ौल शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी यह कला है तो विदेशी लेकिन इसमे तिलिस्म और अय्यारी का रंग हमने भरा। इसे बेहतर से और बेहतर हमने बनाया है। यहाँ हमने से मतलब हम भारतीयों से है, जिन्होंने इस कला को सदियों तक सहेजा और निखारा है।

‘दास्तान-ए-अमीर हम्ज़ा’, ‘दास्तान-ए-होशरूबा’ और ‘फ़साना-ए-अजायब’ जैसी तमाम दास्तानें हिंदुस्तान की तारीख़ों में शुमार हैं। अठारहवीं और उन्नीसवीं शती में इसका बोलबाला इस हद तक था कि देवकीनंदन खत्री कृत ‘चंद्रकांता’ पर भी इसका प्रभाव देखा जा सकता है। इंशा अल्लाह खाँ कृत ‘रानी केतकी की कहानी’ को कई विद्वान एक दास्तान के ही ढब में लिखा मानते हैं।

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी दास्तान पर बोलते हुए कहते हैं कि कही हुई बात और लिखी हुई बात में बहुत अंतर है। वह आर्मेनिया के नॉवेल-निगार इस्माइल क़ादरी के हवाले से बात करते हुए कहते हैं, “ये किताब में लिखे हुए हर्फ़ क्या हैं? यह तो बोले हुए हर्फ़ की लाशें हैं।”

ठीक-ठीक कहूँ तो कहानी कहने की कला हर सभ्यता के इतिहास में मिलती है। कहानी कहना मानव जीवन का ही एक अहम हिस्सा रहा है। कुछ को कहानियाँ नानी-दादी के क़िस्सों से याद होंगी तो कुछ को किसी गप्प की तरह। हर इंसान के पास एक कहानी है और हर इंसान का अपना एक ढंग। हमारा देश अनेक प्रकार की पर्फ़ोमेटिव आर्ट्स से भरा पूरा है। हर समाज के अपने अलग लोकगीत हैं, अपने डांस फ़ॉर्म हैं और तो और अपनी अलग कहानियाँ हैं। जो एक क्षेत्र तक ही सिमट कर रह गई हैं।

कहानी कहने की परंपरा को आगे बढ़ाने में दास्तानगोई की एक अहम भूमिका रही है। एक ऐसा फ़न जो लोगों में ज़ेहन से ही ग़ायब हो चुका था उसे दोबारा से लोगों के बीच लाना एक कठिन काम तो था ही। उसके साथ ही साथ पुरानी दास्तानों का ढब बचाए रखते हुए उन्हें आज के मौज़ू के हिसाब से लिखना कि हाज़रीनों को वो हवा में महल बनाने जैसा ना लगे। यह दास्तानें शीशे की कारीगरी के ही मानिंद हैं। जो दास्तानें आज से सौ साल पहले प्रासंगिक और लोकप्रिय थी वे आज भी हों ऐसा ज़रूरी नहीं।

ऐसे में मीर का एक शे’र ज़ेहन में आता है :

“ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का”

आज इंसान ज़ेहनी तौर पर लगभग हर चीज़ को रेशनैलिटी से जोड़कर देखता है। हाँ, उसके पैमाने भले अलग हो लेकिन होते ज़रूर हैं। यह बात हम हाल की कई बॉलीवुड फ़िल्मों में देख चुके हैं, जहाँ तार्किकता कहीं दूर-दूर तक नहीं नज़र आई और अब लोगों ने एक हद तक अपनी देखने की चीज़ों को सीमित करने का प्रयास किया है।

ऐसे में दास्तानों के विषयों में भी बदलाव आया है। दास्तान सिर्फ़ किसी क़िस्से तक सीमित ना रहकर लोगों की ज़िंदगी पर आधारित भी हो चुकी हैं। जैसे ‘दास्तान-ए-गुरुदत’, ‘दास्तान-ए-राही’, ‘दास्तान-ए-राज कपूर’ ‘दास्तान-ए-मंटोइयत’।

‘दास्तान-ए-कर्ण अज़ महाभारत’ भी एक सफल दास्तान है। जहाँ जादुई यथार्थवाद और तिलिस्म का ख़ासा प्रयोग देखने को मिलता है, क्योंकि वहाँ पर इसकी गुंजाइश है। किसी इंसान के ऊपर लिखी दास्तान में इसकी संभावना कम हो जाती है। ऐसे में जादुई यथार्थवाद (magic realism), तिलिस्म और अय्यारी उतनी ही ठीक लगती है जितने में दर्शक मुस्कुराए और आगे बढ़ जाए।

‘दास्तान-ए-मंटो’, मंटो के किरदार को इस हद तक उकेरकर रख देती है कि जिसमें हर इंसान को ये यक़ीन हो जाए कि मंटो इसी फक्कड़ मिजाज़ी के रहे होंगे। कोई स्थिति कितनी हैप्टुलिटिक हो सकती है—किसी समाज के ऊपर हैप्टुलाइ‌ज़ेशन कितना असर डाल सकता है, यह उस दास्तान से पता चलता है। (हैप्टुलिटिक और हैप्टुलाइज़ेशन किसी दर्शन का कोई टर्म नहीं बल्कि मंटो का एक मज़ाहिया क़िस्सा था, जब वह हैब्टुल्लाह का नाम अख़बार में पढ़ते हैं और हैब्टुल्लाह का हैब्टुलाइज़ेशन हो जाता है।)

जैसा कि आगे लिखा था कि लिखे हुए शब्द बोले हुए शब्दों की लाशें होती हैं। ऐसे में आपको यह टर्म सुनकर हँसी नहीं आई होगी लेकिन मेरा यक़ीन मानिए यह सुनने के कितने महीनों बाद तक हम और हमारे साथी हैब्टुलाइज़ेशन के कितने पक्ष में थे।

किवदंतियों के भी प्रयोग इन दास्तानों में भरपूर देखने को मिलते हैं। ‘दास्तान-ए-कबीर’ में, गोरखनाथ और कबीर के मध्य संवाद और फिर दोनों का ही बारी-बारी से गंगा में कूद जाना और भेष बदल लेना। गोरखनाथ मेढक का रूप ले लेते हैं और कबीर नदी में कूदकर उन्हें पकड़ लेते हैं। जब कबीर नदी में कूदते हैं, तब गोरखनाथ उन्हें ढूँढ़ने में विफल रहते हैं। जब गोरख पूछते हैं कि तुमने किसका रूप लिया तो कबीर कहते हैं जल का। इतिहास के रूप में देखे तो ये दोनों ही एक समय के नहीं हैं लेकिन इस तरह की किवदंतियाँ प्रचलित हैं।

इसी तरह की अन्य दास्तानें हैं जो पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं।

‘दास्तान-ए-कर्ण अज़ महाभारत’ में इन सबका समावेश देखने को मिलता है। साथ ही साथ देश में चल रहे तमाम झंझावातों पर भी अप्रत्यक्ष रूप से ध्यान लाने का प्रयास किया जाता है। महमूद फ़ारूक़ी इस दास्तान की शुरुआत मंगलाचरण से करते हैं। यह श्लोक कालिदास कृत ‘रघुवंशम्’ का प्रथम श्लोक है :

वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥

ब्रह्मा का जन्म अंडे से बताते हैं और फिर उनके दस पुत्रों के जन्म को। फिर वह क्रमबद्ध तरह से आते-आते राजा पुरु और फिर भीष्म तक आकर इस दास्तान की शुरुआत करते हैं। इस दास्तान में उर्दू और फ़ारसी में लिखी महाभारत के भी संवादों को महमूद फ़ारूक़ी दास्तान का हिस्सा बनाते हैं। इस दास्तान में रामधारी सिंह दिनकर कृत ‘रश्मिरथी’ का भी ख़ासा प्रयोग देखने को मिलता है। यह दास्तान समावेशिता का एक जीवंत और महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। इसमें मालिक मुहम्मद जायसी भी आते हैं, मीर और ग़ालिब भी। रहीम के हवाले से भी बात होती है और अल्लामा इक़बाल के भी। इसमें हसरत मोहानी की कृष्ण पर लिखी नज़्में भी आती हैं और उनके क़िस्से भी। वह जब भी हज जाते थे तो लौटते हुए मथुरा और वृंदावन ज़रूर जाते थे।

‘हसरत’ की भी क़ुबूल हो मथुरा में हाज़िरी
सुनते हैं आशिक़ों पे तुम्हारा करम है आज

इस दास्तान का विषय तो बहुत पुराना है पर स्थिति आज भी वैसी ही है। जाति का दंश कर्ण ने तब भी झेला था और आज भी झेल रहा है। चीरहरण तब भी हो रहे थे और आज भी। द्वेष,कटुता और अलगाव आज और अधिक जान पड़ता है। वह लीक आज भी वैसी ही है जो अलग करती है लोगों को, धर्मों को। बस इन लीकों ने अब इंसानी जामा पहना हुआ है।

दास्तानगोई का यह फ़न सदियों से चली आ रहीं कहानी सुनाने की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। ऐसे दौर में जब कहने के माध्यम इतने हो चुके हैं कि लोगों ने सुनना बंद कर दिया है।

जब दास्तान अपने उरूज पे थी तो इसके क़दरदान अमीर-ए-शहर तो हुआ ही करते थे, साथ ही यह लोक-संस्कृति का भी एक अहम हिसा था। यह कला केवल भवनों और अभिजातवर्ग ही तक सीमित नहीं थी। दास्तानगोई के इस फ़न को पुनः स्थापित करते वक़्त महमूद फ़ारूक़ी और उनके साथियों ने जामा मस्जिद के ज़ीनों पर भी इस दास्तान को पेश किया है। वह स्थान जहाँ सदियों पहले दास्तान कहने की रवायत थी, फिर क्या वजह हो सकती है कि दास्तानगोई केवल शहरों के ऑडिटोरियम, बड़े साहित्यिक उत्सवों और एक ख़ास तबक़े तक महदूद हो कर रह गई है? ऐसा ना तो कोई कलाप्रेमी ही चाहेगा और ना ही कोई कलाकार।

आदि से लेकर अधुनातन समय तक चल रही कहानी कहने की बहुसंख्य कलाओं में से अधिकांश आज लुप्त होने को हैं। आज के दौर में हर चीज़ को बाज़ार से जोड़कर देखा जाने लगा है। दास्तानगोई की भाषा पहले की अपेक्षा अब सरल होती नज़र आती है। जहाँ उर्दू, अरबी और फ़ारसी के लंबे-लंबे वाक्य होते थे, उनकी जगह हिंदी और इन्हीं भाषाओं के कुछ सरल शब्दों ने जगह ले ली है। यह फ़न ऐसा है कि देखने वाले को शब्द ना भी समझ आए तो भाव तो समझ आता ही है। कुछ आलोचक इसे एक ह्रास की तरह देखते हैं, जहाँ वह भाषाई गंभीरता और भाषाई सौंदर्य में कमी की बात करते हैं। लेकिन शुद्ध से शुद्धतम होने की होड़ में बहुत-सी संस्कृतियों, भाषाओं, देशों, मनुष्यों और समाज को गर्त में जाता देखा जा चुका है, कितनी ही जाने को शेष हैं। जिनकी हालत ऐसी है कि अब गईं कि तब गईं।

यह कला न्यूनतम साधनों में एक प्रभावकारी छाप छोड़ने में सफल रही है। जहाँ एक या दो दास्तानगो सफ़ेद अंगरखा, सफ़ेद टोपी, सफ़ेद गद्दा और एक मसनद के साथ प्रस्तुत होते हैं। पानी पीने के लिए दो प्याले और कुछ मोमबत्ती। यह जितना ही सरल मालूम होता है, उतना ही अधिक सुंदर दिखाई पड़ता है। हाल के कुछ दास्तानों में स्टेज लाइट्स के साथ भी कुछ प्रयोग देखने को मिल रहे हैं।

अगर इसे मीर अनीस के एक शे’र के साथ ख़त्म करूँ तो कोई ख़राबी नहीं जान पड़ती।

गुल-दस्ता-ए-मअनी को नए ढंग से बाँधूँ
इक फूल का मज़मूँ हो तो सौ रंग से बाँधूँ

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