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बिंदुघाटी 2.0 : जीटी रोड पर सावन आ गया है

• बिंदुघाटी के पिछले अंकों में भारत की राजनीति के संदर्भ में अगले कुछ वर्षों के लिए दबाव-समूह की महत्ता को रेखांकित किया गया था और इसमें कॉकरोच जनता पार्टी [सीजेपी] की महती भूमिका की अपेक्षा भी की गई थी। अभी चार दिन पहले ही सीजेपी-संस्थापक अभिजीत दीपके ने सीजेपी को राजनीतिक दल बनाने के बजाय उसके एक दबाव-समूह के रूप में काम करने की बात कही है। अगर उनकी टीम द्वारा संचालित दबाव-समूह चिरपरिचित एनजीओवादी पैटर्न पर न चलकर अपने लक्ष्यों को बड़ा करें और राज्य बनाम व्यक्ति के द्वैध में क़ानून को व्यक्ति की तरफ़ खड़ा कर पाएँ तो लोकतंत्र अपने अभिप्रायों के बिल्कुल पास दिखने लगेगा। 

• सावन आ गया है—आधा जीटी रोड लिए हुए... आधे पर लड़ती-भिड़ती-दहलती-मचलती और इंतिज़ार में उबलती जनता चलती है... बाक़ी आधे में सिर्फ़ सावन चलता है। यह तब तक चलेगा, जब तक काँवड़िए चलना बंद नहीं करेंगे। इस तरह ‘जीटी रोड पर सावन’ नाम से एक लघु-स्मारिका या व्यंग्यचित्र या लंबी कविता या लंबी गाली या प्रार्थना लिखी जा सकती है। आधे रोड के दूसरे आधे रोड से बिछोह पर एक भक्तियुगीन विरहपद भी लिखा जा सकता है। जिसमें सड़क-देह का एक हिस्सा दूसरे के लिए सुन्न पड़ गया है।

• यह शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप को अलगाने जैसा है। लेकिन एक दूजा शिवत्व तो घट ही रहा है। एक ही दिशा में जाने को अभ्यस्त लोग अचानक से एक ही तरफ़ मुखामुखी कर रहे हैं। इसे यों भी कहा जा सकता है कि यह साहिबाबाद से गुज़रती जीटी रोड जो प्रायः धूल और कंकड़ों से तबाह रहती ही है, अब दिशाकुचल भी हो गई है। 

जीटी रोड के संदर्भ में मौसमों-महीनों के बीच सावन से अधिक भौकाल किसी का नहीं है; वह अकेले ही आधी सड़क पर चलता है, कु-चलता है।

लघुकथा 

|| ऑफ़ द रिकॉर्ड || 

मैं : ऐसे समय में जब हर ओर आवाज़ों को दबाया जा रहा है। किसी को बोलने नहीं दिया जा रहा है। प्रतिबंध हैं, जेल हैं, मुक़दमे हैं। अपने विचार व्यक्त करना भी मुश्किल हो गया है। सत्ता की हर किसी पर नज़र है। ऐसे समय में कला और साहित्य की क्या भूमिका होनी चाहिए?

वह : ‘ऐसे समय में...’ से शुरू होने वाले हर वाक्य पर मैं बेहद चौंक जाता हूँ। बोलने वाले पर ही बरबस ही मेरी निगाह जाती है। आपने यह जो ऑन कंपनी का जूता पहना है कितने का होगा! मेरी अनुमान है कि पच्चीस, तीस या... शायद बीस से तो ऊपर का ही होगा!

मैं : [थोड़ा झेंपते हुए] बाईस हज़ार का लिया था, सेल में। लेकिन सर! यह तो मेरे प्रश्न का जवाब नहीं हुआ! आप डेरोगेट कर रहे हैं। 

वह : देखिए! बहुत से सवाल जवाब के क़ाबिल नहीं होते, क्योंकि उनकी शुरुआत ही ग़लत होती है। बहरहाल, मेरी उम्र लगभग ढाई हज़ार साल है और मैं नहीं समझता हूँ कि इतना आरामदायक जूता या इतना सूक्ष्म [अँगूठे जितना बड़ा] माइक मैंने कभी देखा होगा! 

मैं : [थोड़ा एडजस्ट करते हुए] सर, यह बात तो सही कही आपने! अभी सब कुछ मिनी और माइक्रो है। कंफ़र्टेबल है। सर, आपको किस ब्रांड का जूता पसंद है? 

वह : देखिए! ‘यह समय ऐसा है...’ कि किसी भी प्रश्न को कभी भी डाइवर्ट किया जा सकता है, बशर्ते...

मैं : सर! आप कहना क्या चाहते हैं? आप कुछ आगे भी कहते-कहते रुक गए। 

वह : तुम जिससे प्रश्न करते हो, उसे वैलिडेट करते हो। जैसे तुम प्रश्न करते हो, वैसे ही वह जवाब नहीं देता है। दोनों अपने हक़ पर हैं। सेल्फ़ इन्क्रिमिनेशन के बारे में जानते हो!

मैं : [गूगल करते हुए] सर, यह सही बात है! आप क्या सोचते हैं कि अपने ख़िलाफ़ कोई बात कहने के लिए बाध्य किया जाना अच्छी बात है? सर! मानवाधिकार...

वह : देखिए! यह ऐसा समय है कि यहाँ मानवाधिकार की कोई भी परिभाषा नाकाफ़ी है। तुम्हारा एडिटर क्या कहता है?

मैं : सही कह रहे हैं सर! मानवाधिकार सतत समीक्षित और संपादित रहने वाला विषय है। रही बात मेरे एडिटर की, तो वह भी ठीक-ठाक एम्बिशस साहित्यकार है। हिंदी में लिखता है। इसके पहले अँग्रेज़ी में जॉब करता था। उसका मानना है कि अब साहित्य में टिके रहना है तो ताकत ज़रूरी है। वह इसीलिए एडिटर हो गया। [ऑफ़ द रिकॉर्ड बोल रहा हूँ सर!] 

वह : हा-हा-हा... सारी दुनिया ऑफ़ द रिकॉर्ड ही है प्यारे! ऑन रिकॉर्ड जो दिखता है, उसके कारण ही मायावाद का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ। ऑफ़ द रिकॉर्ड ही ब्रह्म है और ऑन रिकॉर्ड है उसकी प्रपत्ति। देखो, तुम चाहो तो अब हम ऑफ़ द रिकॉर्ड ही बात करते हैं। हम अधिक सहज हो सकेंगे। जीवन में सहजता से बढ़कर कुछ नहीं है। 

मैं : क्या बात कही सर! मेरा संपादक बिल्कुल सहज आदमी नहीं है। उसने कई सारे समकालीन की-वर्ड्स का धड़ल्ले से प्रयोग करना सीख लिया है। यह वैसे ही है जैसे डेटा ट्रांसफ़र के लिए यूएसबी का प्रयोग किया जाता है। इसके प्रयोग से वह विभिन्न इलाक़ों से रचनाएँ मँगवाने और उनकी नज़र में ख़ुद को ‘मनुष्य’ साबित करने में दिन भर तुला रहता है। एक दिन वह अपने पाँच वर्षीय बेटे को बहुत ‘मनुष्यपरक’ मुखमुद्रा बनाते हुए बोला, “तुम स्त्रीद्वेषी हो...” उसका बेटा अपनी माँ की पीठ में बार-बार दाँत धँसाकर भाग रहा था और माँ के उईई... करने पर हँस रहा था। 

वह : हा-हा-हा... तुम मनोविश्लेषणों या कहें मन की अँधेरी खोहों पर कुछ सोचते हो? कुछ ऑब्जर्व करते हो?

मैं : छह साल के बच्चे के लिए कौन-सा फ़्रायडियन चूतियापा करूँ मैं! माफ़ कीजिएगा सर, कभी-कभी झुँझलाहट में कुछ ग़लत शब्द निकल जाते हैं। मेरा संपादक सोबर होने के चक्कर में सुअर हो गया है, बस और कुछ नहीं। 

वह : [हँसते हुए] कोई बात नहीं है। तुम्हारा संपादक समकालीनता का ‘बड़े भाई’ होना चाहता है, बस और कुछ नहीं। परेशान न होओ। 

तुम ‘ऐसे समय...’ पर कुछ पूछना चाहते थे!

मैं : माफ़ कीजिएगा, साक्षात्कार से बड़ा धत् कर्म कुछ नहीं हैं, विशेषकर जहाँ कुछ भी स्फूर्त नहीं होता। अब मैं ‘ऐसे समय में...’ जैसी रटी-रटाई फ़ॉरमूलेबाज़ी नहीं करूँगा। कुछ सचमुच का करूँगा।  

वह : ‘ऐसे समय में’ तुम कुछ भी सचमुच का नहीं कर सकोगे। यह धंधा छोड़ दो, यहाँ हरामियों ने अपने लिए सबसे अच्छे प्रतिस्थापन पाल रखे हैं—बॉडी डबल टाइप... इसी तरह वे सर्वाइव कर रहे हैं। 

मैं : [उलझन में] सर, अब चलूँगा! 

वह : ठीक है, धन्यवाद! ऑफ़ द रिकॉर्ड मिलते रहना। 

मैं : जी सर! बिल्कुल सर, ख़याल रखिए... समय देने के लिए शुक्रिया!

• उपरोक्त बिंदु में आई लघुकथा भटक गई है या यों कहें कि वह भटककर लघुकथा हो गई है। ‘वह’ नाम के पात्र ने पिछले बीस वर्षों के दौरान यानी ‘ऐसे समय में...’ इतने साक्षात्कार देख और पढ़ लिए कि उसके दिमाग़ में हज़ारों आत्मकथात्मक मैं-मैं यूँ ही गूँजती रहती है। इसीलिए वह अब अपने समयबोध को लेकर भी बेहद संदिग्ध है। उसके लिए संसार की सारी हलचलें प्रायोजित हैं। 

• ‘पक्षधर’ पत्रिका का चालीसवाँ अंक प्राप्त हुआ। विनोद तिवारी इसके संपादक हैं। इस अंक को आवरण पर ही ‘नामवर विशेष’ कहा गया है। ग़ौरतलब है कि इस समय हिंदी-साहित्य-जगत नामवर सिंह [1926-2019] की जन्मशती मना रहा है। नामवर सिंह के कृतित्व और जीवन पर इसमें पाँच आलेख शामिल हैं; जिनमें उनकी कविता-आलोचना, कथा-आलोचना और सांस्कृतिक विचारों पर टीप के साथ ही संस्मरणात्मक छींटें भी हैं। लेकिन सबसे मज़ेदार विनोद तिवारी का लिखा हुआ संपादकीय है, विशेषकर नामवर सिंह के शिष्यों में आचार्य पिंगल के बनारस में उदय एवं विकास का प्रसंग। 

• यह आचार्य पिंगल श्रीप्रकाश शुक्ल प्रतीत होते हैं; क्योंकि उनके संदर्भ में जिस पुलिया-प्रसंग का विनोद तिवारी के आलेख में चुटीले अंदाज़ में ज़िक्र हुआ है, उससे लेकर साहित्य के नाम पर प्रायः ही साहित्येतर हरकतों के लिए आचार्य और उनका चेला-वृत्त जाना जाता रहा है। जब उनका फ़ोन बज रहा होता है तो उनके दोनों हाथों में लड्डू होता है... संभवतः इसीलिए उन्हें फ़ोन उठाने जैसे नित्यकर्म के लिए भी बहुत सारे हाथों की आवश्यकता ज़रूर पड़ती होगी। उनके पास ऐसे बहुत से हाथ हैं भी, जिसकी सूचना पुलिया-प्रसंग जैसे फ़ुल-पेज़ प्रकरणों के माध्यम से मिलती रहती है।

• ‘पक्षधर’ में नामवर सिंह पर पहला सुचिंतित आलेख सुपरिचित आलोचक संजीव कुमार का है—‘नई कहानी और नामवर सिंह’। यह आलेख नामवर सिंह की ‘कहानी : नई कहानी’ शीर्षक पुस्तक से एक संवाद करता है। इस आलेख में कुछ बातें संजीव कुमार के उस सूचनासंपन्न वृहत आलेख के क्रम में भी आती हैं, जिसे इक्कीसवीं सदी के कहानीकारों पर चर्चा करते हुए उन्होंने विगत दिनों ‘नया पथ’ पर प्रकाशित किया था। 

यों कहें तो यह आलेख नामवर सिंह की उक्त पुस्तक की प्रस्तावनाओं को भी साररूप में समझाता है और उन पर एक डिबेट भी बनाता है। इसमें कहानी के संदर्भ में परिणति-प्रक्रिया, संक्षेपीकरण और प्रकृतिभेद, कथावस्तु-कथासार, प्रस्तुतीकरण और प्लॉट जैसे पदबंधों पर बोध विकसित करने वाली चर्चा है। 

• नामवर सिंह को ‘नई कहानी के गढ़े हुए आलोचक’ बताते हुए संजीव कुमार उनकी शक्ति और सीमाओं को उजागर करते हैं और उनके कुछ असाधारण सूत्रीकरणों को सामने रखते हैं जो नई कहानी की पहचान में उन्होंने गढ़े, जैसे : ‘आधारभूत विचार का द्रवीभूत होकर पूरी कहानी के शरीर में भर उठना’ और ‘कहानी के लिए जीवन का एक क़तरा काटते समय उसके हर जीवंत रेशे को सुरक्षित रखने की कोशिश...’ यह आलेख अपनी सघनता के कारण बार-बार पढ़े जाने योग्य तो है ही; साथ ही इससे आधुनिक कहानी के लिए डिबेट के कुछ बिंदु भी मिलते हैं।

• किसी भाषा के शब्द को जब दूसरी भाषा में अपनाया जाता है तो पहले से खड़कने वाली ध्वनियाँ प्रायः बदल जाया करती हैं। बोलियाँ अगल-बग़ल विकसित होते हुए या तो पहले से अधिक नोकदार होती जाती हैं या तो पहले वाले से ज़्यादा ढलती हुईं। स्वयं मनुष्य से लेकर उसका सब कुछ अर्जित किया हुआ उसकी मिट्टी से निकला है। भाषा से लेकर मनुष्य की बनावट तक को एक सातत्य में देखें तो कमोबेश यही अंतर पाए जाते हैं। 

• भाषा और मनुष्य के सारे संदर्भ उसकी मिट्टी के संदर्भ हैं। गालियाँ भी संदर्भों में ही अपने आशय बदलती हैं। आशय मिटाकर मनुष्य ने मनुष्यों के साथ भी वही किया जो अब शब्दों के साथ कर रहा है। अछूतीकरण या कलंकीकरण से बाज़ आना चाहिए। यह समय तो मनुष्य और शब्दों के लिए अपने सही आशय पाने का है। 

• ओडिसियस जब ग्रीक से निकलकर रोमनों के पास गया तो लैटिन के प्रभाव में यूलिसेस हो गया। इसमें सबसे पहले ओडिसियस की ‘डकार’ लुप्त हुई फिर ‘ओss’ करते हुए फैला हुआ मुँह भी सिकुड़कर ‘यू’ हो गया और इस तरह मिली कवि टेनिसन की लिखी हुई कविता—‘यूलिसेस’। यहाँ ‘यूलिसेस’ यानी ओडिसियस युधिष्ठिर की तरह, बिल्कुल उसी तरह नहीं, लेकिन अपने उत्तर-जीवन की निःसारता महसूस करता है। 

• वह एक लगातार चलती हुई तलवार था, अब जंग खा रहा है। वह दुनिया भर में मक़बूल-ओ-मशहूर था—अपनी खोजों और ज्ञान-पिपासा के लिए, अब वह तुच्छ लोगों के बीच पड़ा हुआ, तुच्छ दुनियादारियों को देख-देखकर सड़ रहा है। वह जिससे गुज़रा, सबसे मिलकर बनता गया। उसकी हर रहगुज़र में उसकी छाप है। लेकिन अब वह कहीं से गुज़रता ही नहीं है। अब समय ही भाग रहा है, वह नहीं। 

• अरुंधति रॉय जितनी चर्चाप्रेमी हैं, उतनी ही सुघड़ लेखिका भी। वह इससे इनकार नहीं करेंगी, अगर उन्हें सफलता के सभी दाँव-पेचों को लेकर सचेत रहने वाली लेखिका माना जाए। यह होना ग़लत या कहीं से भी अतिमानवीय नहीं है। कुछ समय पहले अँग्रेज़ी में आई उनकी पुस्तक ‘मदर मेरी कम्स टू मी’ का प्रभात सिंह कृत हिंदी अनुवाद—‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ [राजकमल प्रकाशन] इन दिनों ख़ासा चर्चा में है और उसको ख़रीदने के लिए हिंदी-पाठकों को लाइन में लगते हुए भी देखा गया। इससे ही वह इतराहट पैदा होती है कि अरुंधति रॉय ने स्वयं लोगों को यूँ ही चर्चा बनाने के बजाय पुस्तक पढ़कर उस पर बात करने को कहा है। 

हालाँकि, अरुंधति के लेखन पर कोई ढंग की टिप्पणी पढ़ने को नहीं मिलती है; लोग उनके कुछ सस्ते भावुक वाक्य, उनके इंटरव्यूज़ में उनकी ही बात, उनका ऑरा और उनके साहित्येतर हस्तक्षेपों की बातें ही उद्धृत करते हैं... जबकि लेखक भले ही कल्ट में बदल जाए, लेकिन वह कभी तो यह चाहता ही होगा कि उसके टेक्स्ट पर ढंग से बात हो। एक अच्छा लेखक तात्कालिकता और काल-अखंडता से सर्वाधिक परिचित होता है। फ़ोमोग्रस्त तथाकथित पाठकों का क्या है, जेन-ज़ी की भाषा में कहें तो ऐसे पाठकों भी तो अपनी ‘ऑरा-फ़ॉर्मिंग’ करनी है। 

• ज़ाहिर है कि हर दृश्य का प्रत्याख्यान भी होता है, इसका भी है। हिंदी के जो लेखक सोशल मीडिया के इस अरुंधति-फ़ोमो पर प्रतिकूल प्रतिक्रियाएँ दे रहे हैं, उन्हें बुरा भला कहने के बजाय, उनके कम से कम एक पक्ष को तो सुनना और समझना ही होगा। हम यह जानते ही हैं कि हिंदी का पाठक हिंदी की पुस्तकों को लेकर कितनी जल्दी उफ़् करने लगता है। एक-दो संस्करण बिकने में ही लोहे में जंग लगने जैसी हालत हो जाती है, हालात हो जाते हैं। ख़ासकर, अगर उस पुस्तक पर विजुअल जगत के सेलिब्रिटियों की सिफ़ारिश न हुई हो तो। तथाकथित नई हिंदी के कई लेखकों ने भी इस मामले अपनी लुगदी को बिकवाने में ठीक-ठाक सफलता हासिल की है। इसके लिए वे सारे हथकंडे अपनाते हैं। वे तो ऑर्केस्टा में ज़बरदस्ती नाचने से मिली प्रसिद्धि को भी किताब की बिक्री में भुनाते हैं। वे यूफ़ोरिया क्रिएट करने वाले सारे काम करते हैं। यह यूफ़ोरिया अरुंधति की पुस्तक के मामले में भी दिख रहा है। इन सब बातों से गंभीर लेखन में मुब्तिला हिंदी-लेखकों में स्वाभाविक ही कुंठा उपजती है। वे आज भी अँग्रेज़ी के समक्ष ख़ुद को परास्त पाते हैं और आधुनिक बाज़ारू हथकंडों तक तो उनकी पहुँच कभी बनी ही नहीं। हिंदी-साहित्य-जगत में तमाम नैतिकताओं के साथ, अपना प्रचार न करने का भी एक नैतिक आग्रह रहा है। इसीलिए इस मामले में हिंदी के लेखक बहुत थोड़ी-सी ही टुच्चई करके शांत हो जाते हैं। 

• बहरहाल, जब पुस्तक बिक रही है और चर्चा हो रही है तो इससे कौन इनकार कर सकता है कि अरुंधति रॉय बहुत बड़ी लेखिका हैं। वह कम लिखती हैं और हर बार अँग्रेज़ी से आकर हिंदी में छा जाती हैं। इसमें हिंदी के स्त्री-पाठकों का भी बड़ा योगदान है; वे अरुंधति रॉय को अपनी अस्मिता के उस प्रतिनिधि की तरह भी देखती हैं, जिन्होंने लगातार पुरुष-महानताओं से भरे साहित्यिक समाज में अपना सिक्का जमाकर रखा। वह देश के लगभग सारे पॉपुलर डिस्कोर्सेज पर बोलती हैं, इससे उन्हें लेकर दो धड़े बनते हैं और यह बात उनकी लेखकीय सफलता में प्रतिफलित होती है। हालाँकि, वह सिर्फ़ बोलती नहीं हैं; बल्कि इन डिस्कोर्सेज पर रचनात्मक लेखन भी करती हैं। उनका लेखकीय क़द प्यार और नफ़रत के दो बड़े किनारों से बने एक सेलिब्रिटी का ही क़द है और वह इसे बनाए रखना भी चाहती हैं। 

• बाज़ार से गुज़रते हुए तो हर दृश्य की एक स्पॉन्सरशिप है। चाहे वह किसी लेखक का जीवन ही क्यों न हो, चाहे वह अपना जीवन ख़ुद ही स्पॉन्सर क्यों न कर रहा हो! इसीलिए, हे रहगुज़र! बाज़ार से ख़रीदार होकर, फ़रोशिंदा होकर, गुमाश्ता होकर या चोर होकर ही सही, लेकिन सही से गुज़र... गुज़र... गुज़र...

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इस स्तंभ का शीर्षक शमशेर बहादुर सिंह की कविता-पंक्तियों [देख अपने लीडरों को / शोक मत कर। / देश ये लीडर नहीं।] से निर्मित है। अन्य बिंदुघाटी : 2.0 यहाँ पढ़िए : लौट आया हूँ, कोई कुछ भी कह सकता है | मुझे पता है कि इस पोस्ट में आपकी दिलचस्पी है | बहुत फूँक-फूँककर सिर्फ़ साँप चलते हैं | शिक्षा मंत्री चला जाएगा, शिक्षा रह जाएगी | ‘देख अपने लीडरों को शोक मत कर... देश ये लीडर नहीं’

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