भारतीय रंग-संस्थाओं पर मँडराता मौन संकट
सौरभ अनंत
27 मार्च 2026
इतिहास की कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें लोग उसी समय पहचान लेते हैं। वे स्पष्ट होती हैं और उनका असर तुरत दिखाई देने लगता है। लेकिन कला और संस्कृति की दुनिया में बदलाव अक्सर इस तरह सामने नहीं आते। कई बार वे बहुत शांत तरीक़े से घटित होते हैं—किसी सरकारी दस्तावेज़ में दर्ज एक निर्णय के रूप में, किसी प्रशासनिक प्रक्रिया में हुए बदलाव के रूप में, या किसी वेबसाइट पर जारी एक सूचना के रूप में। उस समय यह सब साधारण लगता है, लेकिन बाद में समझ में आता है कि उसका असर बहुत व्यापक था।
विश्व रंगमंच दिवस 2026 की शुभकामनाएँ देते हुए, यह लिखना थोड़ा विडंबनापूर्ण लग सकता है। जब दुनिया भर में रंगमंच का उत्सव मनाया जा रहा है, उसी समय भारत में सक्रिय कई रंग-संस्थाओं और कलाकारों के बीच एक अचानक पैदा हुई चिंता महसूस की जा रही है। इस भावना की शुरुआत 23 मार्च 2026 की उस दुपहर से जुड़ी है, जो अपने साथ एक अप्रत्याशित स्थिति लेकर आई। देश अपने इतिहास के एक भावनात्मक अध्याय को स्मरण कर रहा था। भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत का दिन। स्मृति, सम्मान और इतिहास के उस वातावरण के बीच संस्कृति मंत्रालय की वेबसाइट पर दो संक्षिप्त पीडीएफ़ दस्तावेज़ अपलोड हुए। 23 मार्च 2026 को संस्कृति मंत्रालय द्वारा जारी मूल्यांकन समिति की कार्यवृत्त (Minutes) में गुरु-शिष्य परंपरा (Repertory Grant) योजना के अंतर्गत कई रंग-संस्थाओं के अनुदान को या तो अनुशंसित नहीं किया गया, या पाँच वर्ष पूर्ण होने पर उन्हें दो वर्ष की ‘कूलिंग-ऑफ़’ अवधि में रखा गया, जिससे 2024–25 और 2025–26 के लिए अपेक्षित सहायता प्रभावित हुई। इसके साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों में लंबे समय से काम कर रही अनेक रंग-संस्थाओं को, जिन्होंने वर्षों की मेहनत से इस योजना के अंतर्गत अपनी अनुदान पाने की पात्रता अर्जित की थी, पुनः प्रारंभिक स्तर से आवेदन करने के निर्देश दिए गए। यह सूची 23 मार्च 2026 को अचानक जारी की गई, बिना किसी पूर्व सूचना या व्यापक संवाद के, जबकि अनेक संस्थाएँ मंत्रालय के पूर्व दिशानिर्देशों और प्रोत्साहन के आधार पर 2024–2025 और 2025–2026 के लिए अपने प्रशिक्षण, प्रस्तुतियों और सांस्कृतिक गतिविधियों को अपने संसाधनों से जारी रख चुकी थीं। इस अर्थ में यह निर्णय उन दो वर्षों के संदर्भ में सामने आया, जिनमें संस्थाएँ पहले ही अपना कार्य पूरा कर चुकी थीं और अपेक्षित सहायता की प्रतीक्षा में थीं।
यह एक साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया भी हो सकती थी, जैसा कि किसी भी व्यवस्था में समय-समय पर होता है। लेकिन देश भर में सक्रिय कई रंग-संस्थाओं के लिए उन्हें पढ़ते हुए एक अलग तरह की अनुभूति सामने आई। मानो एक ऐसे परिदृश्य का संकेत, जिसकी दिशा अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। पिछले दो वर्षों से जिन योजनाओं, प्रशिक्षणों, प्रस्तुतियों और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं के साथ वे अपने काम को आगे बढ़ा रही थीं, उनके संदर्भ में एक नई स्थिति सामने आती प्रतीत हुई। इसका अंतिम अर्थ क्या होगा, यह कहना अभी भी जल्दबाज़ी होगी, पर उस क्षण अनेक संस्थाओं ने यह अवश्य महसूस किया कि जिस आधार पर वे काम कर रही थीं, उसके बारे में अब अधिक स्पष्टता की आवश्यकता है। इसीलिए यह प्रसंग केवल अनुदान या वित्तीय प्रावधान का विषय नहीं रह गया, बल्कि उस व्यापक सांस्कृतिक ताने-बाने पर विचार करने का अवसर बन गया जिस पर वर्षों से कलाकार और संस्थाएँ अपना संसार बनाती आई हैं।
कला और राज्य का संबंध हमेशा लिखित अनुबंधों में नहीं समाया करता। यह रिश्ता अक्सर धीरे-धीरे बनता है। परंपरा से, भरोसे से और इस स्वीकार से कि कला किसी भी समाज की आत्मा का एक अनिवार्य हिस्सा है। दुनिया के लगभग हर देश में, किसी न किसी रूप में यह समझ मौजूद रहती है कि कलाकार समाज की संवेदनशील स्मृति को जीवित रखते हैं। वे समय की परतों को खोलते हैं, अनुभवों को साझा करते हैं और कभी-कभी वे प्रश्न भी उठाते हैं जिनसे समाज ख़ुद को बेहतर समझ पाता है। भारत में रंगमंच की परंपरा विशेष रूप से इसी अदृश्य समझ पर टिकी रही है। यहाँ मंच केवल प्रस्तुति का स्थान नहीं रहा, यह संवाद का क्षेत्र रहा है। लोक-परंपराओं से लेकर आधुनिक प्रयोगों तक। प्राचीन नाट्य परंपराओं से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के दौर के नाटकों तक और फिर आधुनिक भारतीय रंगमंच के विकास तक, यह हमेशा देखा गया कि रंगमंच समाज की वैचारिक और भावनात्मक संरचना का हिस्सा रहा है। ऐसे में राज्य और रंगमंच का संबंध प्रायः नियंत्रण का नहीं, बल्कि सहअस्तित्व का रहा है। समय-समय पर दी जाने वाली सहायता या अनुदान केवल आर्थिक सहयोग नहीं होते, वे इस बात का संकेत भी होते हैं कि समाज और उसकी संस्थाएँ कला के श्रम और उसके महत्त्व को स्वीकार करती हैं। यह एक सांस्कृतिक मान्यता होती है। एक शांत परंतु महत्त्वपूर्ण संकेत कि यह काम, भले ही सीधे बाज़ार के नियमों से संचालित न हो, फिर भी राष्ट्र के बौद्धिक और मानवीय जीवन में आवश्यक है।
इसी स्वीकृति और भरोसे के आधार पर देश भर में असंख्य रंग-संस्थाएँ दशकों से काम करती रही हैं। कुछ महानगरों में अपने छोटे-छोटे थिएटर स्पेस बनाकर, कुछ छोटे शहरों में सीमित संसाधनों के बीच, कुछ विश्वविद्यालयों और विद्यालयों के साथ, और कुछ ऐसे दूरस्थ क्षेत्रों में जहाँ रंगमंच ही संवाद का एकमात्र जीवित माध्यम बन जाता है। वहाँ नाटक केवल मंचन नहीं होता—वह भाषा, समुदाय और स्मृति के बीच एक पुल बन जाता है। किसी छोटे शहर में जब एक नई नाट्य कार्यशाला शुरू होती है, तो वह केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं होता, वह कई युवाओं के लिए आत्म-अभिव्यक्ति का पहला अवसर बनता है। किसी क़स्बे में जब लगातार नाटक खेले जाते हैं, तो धीरे-धीरे दर्शकों का एक समुदाय बनता है, जो समय के साथ उस मंच से अपना संबंध महसूस करने लगता है। इसी तरह की प्रक्रियाओं ने भारतीय रंगमंच को जीवित रखा है। कई बार बिना किसी बड़े संसाधन के, केवल निरंतरता और समर्पण के बल पर।
फिर भी इस पूरे ढाँचे की एक सच्चाई है कि यह अत्यंत नाज़ुक है। भारत में अधिकांश रंग-संस्थाएँ किसी स्थायी आर्थिक मॉडल पर नहीं चलतीं। उनका आधार छोटे-छोटे अनुदान, सीमित टिकट आय, कार्यशालाएँ और उससे भी अधिक कलाकारों का व्यक्तिगत त्याग होता है। अनेक कलाकार अपनी कमाई का हिस्सा फिर से मंच में लगा देते हैं, केवल इसलिए कि रिहर्सल जारी रह सके, कि नई पीढ़ी सीखती रहे, कि मंच की रोशनी बुझने न पाए। यह स्थिति केवल भारत में ही नहीं है, विश्व भर में रंगमंच अक्सर इसी तरह की नाज़ुक संरचना पर टिका रहता है। यूरोप, लैटिन अमेरिका, अफ़्रीका और एशिया के कई देशों में छोटे थिएटर समूहों ने इसी तरह सांस्कृतिक जीवन को जीवित रखा है। जहाँ कला का मूल्य केवल आर्थिक गणना से नहीं मापा जाता, बल्कि सामाजिक प्रभाव से समझा जाता है।
पिछले दो वर्षों में देश की अनेक संस्थाओं ने इसी विश्वास के साथ अपना काम जारी रखा। उन्हें पता था कि प्रक्रियाएँ कभी धीमी हो सकती हैं, व्यवस्थाएँ समय ले सकती हैं। कला-जगत यह समझता भी है, क्योंकि वह स्वयं समय के साथ काम करता है। लेकिन इस समझ के साथ एक भरोसा भी जुड़ा रहता है कि अंततः कलाकारों के श्रम और उनकी प्रतिबद्धता को देखा और समझा जाएगा। जब कभी यह व्यवस्था अचानक अस्पष्ट या अनिश्चित दिखाई देने लगती है, तो उसका असर केवल संस्थागत ढाँचे पर नहीं पड़ता। उसका असर मनोबल पर पड़ता है। उस अदृश्य अनुबंध पर, जो वर्षों में बना था। यह वही अनुबंध है जो किसी कलाकार को सीमित साधनों के बावजूद मंच पर बने रहने की शक्ति देता है।
बहुत से लोग आज भी रंगमंच को केवल एक कला रूप या मनोरंजन का माध्यम मानते हैं, पर वास्तव में एक रंग-संस्था एक जीवित सामाजिक इकाई होती है। एक संस्था से सीधे तौर पर बीस से तीस कलाकार जुड़े होते हैं। अभिनेता, निर्देशक, संगीतकार, तकनीशियन, लेखक, डिज़ाइनर। उनके आस-पास एक और वृत्त होता है—विद्यार्थियों का, सहयोगियों का, परिवारों का। और फिर एक तीसरा वृत्त दर्शकों का, जो धीरे-धीरे बनता है, वर्षों में, विश्वास से। जब कोई रंग-संस्था कमज़ोर होती है या समाप्त हो जाती है, तो केवल एक मंच या एक नाटक नहीं खोता, दरअस्ल एक संवाद समाप्त होता है। एक सामूहिक कल्पना कमज़ोर पड़ती है। एक सांस्कृतिक स्मृति टूटती है। रंगमंच वह स्थान है, जहाँ समाज स्वयं को देखने की क्षमता विकसित करता है, जहाँ प्रश्न पूछे जाते हैं, जहाँ संवेदना का अभ्यास होता है, और जहाँ इतिहास और वर्तमान एक साथ उपस्थित रहते हैं। यदि यह स्थान धीरे-धीरे लुप्त होने लगे, तो समाज की आंतरिक चेतना भी अनजाने में मद्धिम पड़ने लगती है।
इस स्थिति का सबसे गहरा असर शायद उन शहरों और क़स्बों पर पड़ता है, जहाँ रंगमंच सचमुच अपने जुनून पर जीवित है। बड़े शहरों में संसाधन अपेक्षाकृत अधिक होते हैं। संस्थागत सहयोग, प्रायोजन, सांस्कृतिक नेटवर्क। लेकिन भारत की रंग-ऊर्जा का बड़ा हिस्सा उन जगहों में है, जहाँ कलाकार सीमित साधनों में असाधारण काम करते हैं। वहाँ रिहर्सल कई बार उधार के हॉल में होती है, लाइट और ध्वनि उपकरण साझा किए जाते हैं, और कलाकार कई भूमिकाएँ निभाते हैं। अभिनेता भी, आयोजक भी, तकनीशियन भी। और फिर भी, अक्सर वहीं रंगमंच सबसे गहरा प्रभाव पैदा करता है, क्योंकि वह समुदाय के भीतर से जन्म लेता है। ऐसे ही अनेक समूहों ने वर्षों में छोटे शहरों में सांस्कृतिक समुदाय तैयार किए हैं, युवाओं को मंच दिया है और समाज में संवाद के नए रास्ते खोले हैं। आज जब अनिश्चितता का माहौल बनता है, तो उसका असर सबसे पहले उन्हीं जगहों पर दिखाई देता है जहाँ यह काम सबसे नाज़ुक संतुलन पर टिका होता है।
इसी संदर्भ में आज का भारत एक दिलचस्प विरोधाभास भी प्रस्तुत करता है। एक ओर देश विश्व मंच पर अपनी सांस्कृतिक उपस्थिति को पहले से अधिक दृढ़ता से प्रस्तुत कर रहा है, अंतरराष्ट्रीय आयोजन, बड़े सांस्कृतिक उत्सव, विरासत परियोजनाएँ और वैश्विक संवाद। यह एक उभरते राष्ट्र की स्वाभाविक आकांक्षा भी है, और इस पर गर्व भी किया जा सकता है। लेकिन इसी परिदृश्य के भीतर एक शांत प्रश्न भी उभरता है, यदि बड़े सांस्कृतिक आयोजनों के लिए संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं, तो उन छोटे संस्थानों के लिए न्यूनतम निरंतर सहयोग कैसे सुनिश्चित किया जाए जो वास्तव में सांस्कृतिक जीवन को ज़मीनी स्तर पर जीवित रखते हैं। यह प्रश्न आरोप का नहीं, बल्कि संतुलन का है। क्योंकि किसी भी सांस्कृतिक व्यवस्था की शक्ति केवल उसके बड़े आयोजनों से नहीं, बल्कि उसके दैनिक, सतत और स्थानीय प्रयासों से भी बनती है।
वर्तमान परिस्थिति की सबसे बड़ी चिंता शायद यह नहीं है कि सहायता रुकी है या प्रक्रियाएँ बदली हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि कलाकारों के बीच यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में स्थिति क्या है। क्या यह एक अस्थायी प्रशासनिक बदलाव है? क्या नीति में कोई नया ढाँचा आने वाला है? क्या आगे किसी अलग प्रक्रिया के तहत संस्थाओं को काम करना होगा? जब इन प्रश्नों का उत्तर स्पष्ट रूप से सामने नहीं आता, तब अनिश्चितता धीरे-धीरे एक मानसिक दबाव में बदलने लगती है। और किसी भी सांस्कृतिक व्यवस्था के लिए संवाद का अभाव सबसे कठिन स्थिति होती है, क्योंकि कला का संसार भरोसे और निरंतरता पर ही टिकता है।
इतिहास में कई बार कला ऐसे मोड़ों से गुज़री है, जब उसका भविष्य अनिश्चित दिखाई दिया। हर बार यह केवल कलाकारों का संघर्ष नहीं रहा, समाज के अनेक हिस्सों ने मिलकर उसे सँभाला है। वरिष्ठ कलाकारों ने, चिंतकों ने, शिक्षाविदों ने, सांस्कृतिक संस्थानों ने और दर्शकों ने भी। क्योंकि अंततः कला का अस्तित्व केवल प्रतिभा पर नहीं, बल्कि सामूहिक विश्वास पर टिका होता है। भारतीय रंगमंच का इतिहास भी ऐसे अनेक क्षणों से भरा हुआ है, जब कठिन परिस्थितियों में भी नए रास्ते खोजे गए। संभव है कि आज का समय भी उसी तरह के एक नए संवाद का अवसर बन सकता है।
यदि इस स्थिति को एक दीर्घकालिक संकट बनने से रोका जाना है, तो कुछ बुनियादी कदम स्वाभाविक रूप से सामने आते हैं। लंबित प्रक्रियाओं या अनुदानों की स्थिति पर स्पष्ट सार्वजनिक जानकारी, संस्थाओं और प्रशासन के बीच खुला और नियमित संवाद, और भविष्य की योजनाओं के लिए पारदर्शी रूपरेखा। ये केवल प्रशासनिक उपाय नहीं हैं, ये उस विश्वास को बनाए रखने के तरीक़े हैं जिस पर पूरी सांस्कृतिक संरचना खड़ी रहती है।
अंततः कलाकार अक्सर सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि अर्थ के लिए काम करते हैं। वे मंच तक पहुँचने के लिए अनेक संघर्षों से गुज़रते हैं। आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत। फिर भी वे बने रहते हैं, क्योंकि उन्हें विश्वास होता है कि उनका काम समाज के लिए आवश्यक है। ऐसे क्षण उस विश्वास की परीक्षा लेते हैं। संभव है कि आने वाले वर्षों में 23 मार्च 2026 को अलग-अलग तरह से याद किया जाए, शायद यह केवल एक प्रशासनिक घटना के रूप में दर्ज हो, या शायद इसे उस क्षण के रूप में देखा जाए, जब भारतीय रंगमंच ने अपने अस्तित्व और अपने भविष्य को लेकर एक नई बातचीत शुरू की। इतिहास अक्सर बहुत सरल प्रश्न पूछता है। जब कला असमंजस में खड़ी थी, तब किसने उसे देखा, किसने उसकी धड़कन को सुना, और किसने यह समझा कि मंच पर जलती एक छोटी-सी रोशनी भी किसी समाज की आत्मा को उजाला देती है।
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