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भारतीय बाबूतंत्र का सुख

कुछ साल पहले सर्दियों में मैंने विंध्यदेश के खंडरों में भटकने का सिलसिला शुरू किया था—किया क्या था, बस हो गया था। यह भटकने का सिलसिला किसी अवसाद से मुक्त होने की कामना के अधीन या किसी शौक़ को संतुष्ट करने के लिए था? इसका जवाब मालूम नहीं। पर तब से अब तक उत्तरी मध्यप्रदेश के कई ऐसे गाँवों तक जा चुका हूँ जो आज भले ही बेनामी के अँधेरे में धकेले हुए प्रतीत होते हैं, पर एक समय वे सभ्यता और संस्कृति के प्रतीक चिह्न रहे होंगे। अर्थ, धर्म और काम को संतुलित करते हुए। विंध्यक्षेत्र में अनगिनत ऐसे ग्राम हैं।

साल 2024 के अक्टूबर की दूसरी तारीख़ को मध्यप्रदेश के अशोक नगर और शिवपुरी ज़िलों की सीमाओं पर बसे कुछ गाँवों में जाने की योजना सुनिश्चित हुई। व्यवस्थित बनाई गई यात्राओं की योजनाओं के असफल होने की प्रायिकता अधिक होती है। सो यह यात्रा भी कुल दस मिनट की सुनिश्चितता पर ही आधारित थी। गांधी जयंती थी। सरकारी छुट्टी। उस समय एक निजी विद्यालय में हिंदी पढ़ाया करता था। अवकाश का समुचित लाभ लेने के उद्देश्य से मैं एक सहयात्री के साथ निकल पड़ा।

गाँव से क़रीबन एक सौ तीस किलोमीटर की दूरी तय कर हम अशोक नगर ज़िले में मौजूद कदवाया गाँव जा पहुँचे। गंतव्य की तो बाद की बात, पहले तो यात्रा ही सुखद थी। अशोक नगर और शिवपुरी ज़िले भौगोलिक दृष्टि से संक्रांति क्षेत्र हैं, ट्रांजिशनल ज़ोन। कुछ भाग बुंदेलखंड के पठार में पड़ता है तो बाक़ी का भाग मालवा के पठार में, जिन्हें विंध्याचल की ऊँची-नीची पहाड़ियाँ बाँटती हैं। इन पहाड़ियों को काटकर बनाए गए जलेबी से रास्तों पर मोटरसाइकिल चलाते हुए जाना एक अलग ही तरह का अलौकिक सुख होता है। पिछड़े इलाक़ों में प्राकृतिक सौंदर्य प्रचुर होता है सो यहाँ भी दृष्टिगोचर है। इस देश में बिना आत्मप्रताड़ना के यात्रा के लिए बस नवंबर से फरवरी तक के चार मास ही उचित हैं। अधिक से अधिक इन्हें खींचकर अक्टूबर से मार्च किया जा सकता है। सो वही समय था।

बहरहाल हम कदवाया गाँव जा पहुँचे। मध्य काल में उत्तर भारत से दक्षिण की ओर जाने वाले रास्ते पर पड़ने वाला यह ग्राम कदम्बगुहा नाम से जाना जाता रहा। शैव धर्म के मत्तमयूर सम्प्रदाय का प्रमुख स्थान। वर्तमान में इस ग्राम में भिन्न-भिन्न स्थानों पर दस से अधिक मंदिर और एक विशालकाय मठ शेष है। यह जानकारी यात्रा पूर्व ही ज्ञात थी। अज्ञात था तो ग्राम की दशा। हालाँकि अप्रत्याशित वो भी न थी।

ग्राम में प्रवेश करते ही हमारा स्वागत एक निहायत कच्चे रास्ते से हुआ, जो रास्ता कम और दलदल अधिक था। बिल्कुल बग़ल में एक मंदिर दिखाई दिया। उसी दलदल में गाड़ी उतारकर जब मंदिर की चाहरदीवारी के बाहर गाड़ी लगाई तो उसके लोहे के दरवाज़े पर ताला लगा मिला। घर से बिना बताए एक सौ तीस किलोमीटर की बाइक पर यात्रा कर के यहाँ पहुँचे हम जब इस विडंबना को देखे तो ज़ोर से हँसी छूट गई। सहयात्री राहुल ने दलदल और मंदिर के शिखर की ओर इशारा करते हुए कहा, “ये भारत का इतिहास है और ये सामने भारत का वर्तमान।”

थोड़ी देर वहाँ किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े हम-दोनों को एक ग्रामीण सज्जन उसी दलदली रास्ते के बग़ल से आते दिखाई दिए। उनसे जब विनम्रतापूर्वक जानना चाहा कि यह दरवाज़ा कब खुलता है? इस मंदिर के अतिरिक्त ग्राम में और किस ओर मंदिर हैं? तो उनके प्रतिउत्तर से प्रतीत हुआ कि अपराह्न की बेला के पूर्व ही श्रीमान् मदिरापान कर आत्मानंद में डूबे थे। उनके उत्तर में हमारे प्रश्न का उत्तर नहीं अपितु एक कर्कशता से सराबोर जिज्ञासा व्याप्त थी कि हम वह मंदिर क्यों देखना चाहते हैं? हमें क्या लाभ है? क्या हमारे उस लाभ में वो सज्जन भी सहभागिता प्राप्त करेंगे। सौभाग्य से परमात्मा ने मुझे भी इसी विंध्यदेश में जन्म दिया सो मेरे लिए उनका मनोयोग आश्चर्यजनक न था। ऐसा अनुभव पहली बार नहीं हुआ, न आख़िरी बार होना था। एक बार ललितपुर ज़िले में ऐसी ही एक यात्रा पर भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के कर्मचारियों ने केवल इसीलिए रोक लिया था कि उन्हें मैं धनखुदना (प्राचीन मंदिरों और जंगलों में गढ़े धन को खोदकर निकालने वाला) जान पड़ा था। ख़ैर उस यात्रा पर फिर कभी। मैं वहाँ क्यों था, इसका उत्तर मैं उन सज्जन को नहीं दे सकता था। उन्हें कला और सौंदर्य की सारगर्भिता समझाने का सामर्थ्य मेरे पास न था। मैं उनसे न उलझा।

ख़ैर! कुछ देर बाद एक भद्र महिला आईं। जब उनसे यही जिज्ञासा प्रकट की तो उन्होंने भीतर गाँव में कुछ मंदिर होने की बात कही और बताया कि बीच गाँव में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण का एक कार्यालयनुमा कमरा है। वहाँ कोई होगा जो आपको जानकारी दे देगा। हम भीतर बढ़े। एक और मंदिर दिखाई दिया। उसकी चाहरदीवारी पर देखा तो वही हाल। ताला डला हुआ। मेरी निराशा और बढ़ गई। मैं निराशा में वहीं उसके दरवाज़े पर बैठ गया। कुछ देर बाद उठकर उस कमरे को तलाशा जिसमें एएसआई के कर्मचारी रहते हैं। जब हम उस कमरे पर पहुँचे तो मेरी निराशा क्रोध में बदल गई। उसके दरवाज़े पर भी ताला लटक रहा था।

बग़ल में ही बीजासेन माता का एक मंदिर है। प्रतीत हो रहा था कि गाँव का मुख्य मंदिर यही है। मंदिर के बाहर लकड़ी के पलँगों पर पूजा सामग्री रखकर बनाई गई कुछ दुकानें सजी हुई थीं। एक दुकान के बाहर रुककर गाड़ी पर बैठे-बैठे ही मैंने एएसआई के कार्यालय के खुलने की जानकारी माँगी। तो दुकानदार ने कहा कि लोग यहीं कहीं होंगे। जब मैंने अन्य इमारतों के खुलने और ताले लगे होनी की प्रायिकता के विषय में पूछा तो भी वही उत्तर था कि खुल जाएँगे। आस-पास ही होंगे लोग। इस पर मैंने क्रोध, निराशा और थकान के सम्मिलित ऊँचे स्वर में पूछा, “खुलती भी हैं ये सब या ताले ही डले रहते हैं? कोई आता भी है या आता ही नहीं?”

मेरे इस प्रश्न के बाद दुकानदार ने मुझे ऊपर से नीचे तक ग़ौर से देखा। फिर धीरे से दयनीय-सा चेहरा बनाकर बोला, “साहब मुझे नहीं मालूम। आप कहीं और पूछ लो।” मैं उसका उत्तर समझ नहीं पाया। मैं भ्रम की मुद्रा में था ही कि गाड़ी के पीछे बैठे सहयात्री राहुल ने कहा, “गुरु ये आपको कोई अधिकारी समझ रहा है।”

मैं एक क्षण के लिए झेंपा। फिर दूसरे ही क्षण मैंने हम लोगों की ओर देखा। मैं चमचमाती रॉयल एनफ़िल्ड पर बैठा हुआ था। मैंने सफ़ेद चमचमाती शर्ट, गहरी नीली जीन्स, सफ़ेद जूते पहन रखे थे। मेरे चेहरे पर काला चश्मा लगा हुआ था। राहुल ने भी ऐसी ही वेशभूषा धारण की हुई थी। मेरा स्थूल देह और मेरी प्राकृतिक रूप से कर्कश वाणी बोनस के जैसे थी। उस दोपहर में उस सुदूर ग्राम के मध्य में हम दोनों खड़े वहाँ सच में किसी परदेसी अफ़सर के जैसे लग रहे थे।

मैंने बिना एक भी क्षण गँवाए अपने लहज़े में बदलाव किया। बुलेट के हैंडल पर अपनी पकड़ को और मज़बूत करते हुए मैं थोड़ा और अकड़ के बैठ गया। अपनी वाणी में थोड़ा और ज़ोर लाते हुए मैंने दुकानदार की ओर देखकर कहा, “मैं अगले मंदिरों की ओर जा रहा हूँ। मैं यहाँ चक्कर काट के फिर आऊँगा। जो भी आए उसे सूचित कर दीजिएगा। मैं चाहूँगा कि ये लटके हुए ताले और ये कमरा मुझे खुला हुआ मिले।” इतना कहकर मैंने गाड़ी चालू कर के गड़गड़ाते हुए वहाँ से रवाना कर दी।

थोड़े आगे जाते ही हम-दोनों अट्टहास में फूट पड़े। हम दोनों इस सहमति पर आए कि आख़िर तक आते-आते दुकानदार हमें सच में जाँच पर आए हुए बाहरी अधिकारी मान चुका था। ख़ैर हम अगले मंदिर की ओर पहुँचे तो पुनः वही हाल। ताला लटका हुआ। हम उसी निराशा के साथ अब आख़िरी मंदिर की ओर बढ़ चले कि अब बस वापसी की जाएगी। पर दिन उस रोज़ कुछ और ही रोचकता की ओर जाने को था। जैसे ही हम उस अंतिम मंदिर प्राँगण के दरवाज़े की ओर पहुँचे, हमारी आशा के विपरीत एक चौकीदार दरवाज़ा खोलकर हमारा आतिथ्य-सा करते हुए दिखाई दिया। मेरी आँखों में ख़ुराफ़ात तैर गई। राहुल उस ख़ुराफ़ात को भाँप गया।

मंदिर के दरवाजे तक आते-आते मैं स्वयं को भारत गणराज्य के संस्कृति मंत्रालय के किसी अधिकारी के रूप में स्वीकार कर चुका था। जैसे ही मंदिर परिसर में प्रवेश किया चौकीदार ने मुझे आँखों ही आँखों में सकुचा के नमस्कार किया। उसी तरह मैंने उस नमस्कार का प्रतिउत्तर देते हुए कहा, “क्या नाम है आपका?”

“फलाने!” जवाब आया।

“फलाने जी, आप यहीं रहते हैं?”

“हाँ साब!”

“अभी खोल लिए हैं ये मंदिर या रोज़ खोलते हैं? बाक़ी सब जगह ताले हैं। कहाँ हैं सब?”

“साहब मैं रोज़ खोलता हूँ। सुबह से। किसी से भी पूछ लीजिए। औरों का साहब और जाने। मैं नियम से खोलता हूँ।”

“अच्छा! कोई आने-जानेवालों का हिसाब रखने वाला का रजिस्टर नहीं है आपके पास?”

“हाँ साहब! दिखाएँ?”

“न! न! बाक़ी सब का नंबर आपके पास होगा? उनसे संपर्क करिए। पता लगाइए बाक़ी ताले कब खुलेंगे?”

इतनी चर्चा के बाद हम लोग मंदिर की ओर बढ़े। हम लोग आए तो तस्वीरें ही लेने थे। सो हम लोग अब अपने काम पर केंद्रित हुए। गुर्जर-प्रतिहारों और कच्छपघातों के अलौकिक अलंकरण से सुसज्जित मंदिर। अद्भुत! मैं आश्चर्य से भर उठा। उत्सुकता से मेरे चेहरे की भंगिमाएँ बदल गईं। पर उसी क्षण मुझे याद आया कि नहीं! मैं उत्सुक नहीं हो सकता। भारत का बाबू उत्सुकता से च्युत होता है। उसे कोई चीज़ आकर्षित नहीं करती। कोई चीज़ रोचक नहीं लगती। वह या तो साम्य को प्राप्त किया बैठा होता है या फिर नीरसता उसे निगल चुकी होती है। सरकारी बाबू के पद की ऊँचाई उसके सहज उत्साह के व्युत्क्रमानुपाती होती है। जितना बड़ा अधिकारी उतनी कम रोचकता। चौकीदार फलाने हमारे आस-पास परंतु एक अफ़सर-अनुरूप दूरी बना के डोल रहे थे। किसी बेचैनी के साथ। सो अब मुझे अपने किरदार में बने रहना अनिवार्य था।

मैं शांत चित्त होकर अपनी नैसर्गिक जिज्ञासा मिश्रित प्रसन्नता को छुपाकर तस्वीरें लेने लगा। जैसे मुझे उन शिखरों के अलंकरण को देखकर बस किसी सरकारी फ़ाइल में दर्ज़ करना हो। राहुल भी तब तक किरदार में ढल चुका था। हम लोग बुंदेलखंडी से हिंदी में आ चुके थे। बीच-बीच में अँग्रेज़ी के वाक्यांश भी प्रकट हो रहे थे। कभी राहुल “सर लुक एट दिस पैनल। इसको डॉक्यूमेंट कर लेना ठीक होगा।” जैसे गहरे वाक्य कह देता। तो कभी मैं “मिस्टर राहुल, ये सारे पिक्चर्स मुझे फ़ाइल बना के मेल कर दीजिएगा।” जैसे गरिमामयी वाक्य उगल देता। चौकीदार फलाने को देखकर समझ आ रहा था कि वो सज्जन सारे देवताओं को याद कर के धन्यवाद दे रहा था कि आज वो ताला खोल के मंदिर में मौजूद था।

थोड़ी देर में चौकीदार फलाने हमारे पास आकर पूछे कि हम लोग यहाँ से किस ओर जाएँगे? भोपाल, चंदेरी या क्षेत्र के अन्य पुरातात्विक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण ग्रामों की ओर जाएँगे? मैंने कहा कहीं भी जा सकते हैं। चौकीदार फलाने को लगा जैसे उसके सहकर्मियों की शामत आ सकती है। तो उस सज्जन ने हमें बताया कि कदवाया के अन्य मंदिर खुल चुके हैं। वो सब आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसीलिए ऐसा प्रश्न किया गया है। हमें बड़ी प्रसन्नता हुई। अफ़सरी नीरसता को बरकरार रखते हुए हम चौकीदार फलाने को धन्यवाद देकर वहाँ से विदा हुए।

अगले मंदिर प्राँगण में पहुँचने पर, जहाँ से हम कुछ देर पहले निराश होकर लौटे थे, वहाँ का ताला खुला हुआ मिला। एक बुज़ुर्ग चौकीदार ने हमारे पहुँचते ही बिना किसी भूमिका के कहा, “साहब मैं तो खाना खाने गया था।”

मैंने संतोष रखने को कहा। उन बुज़ुर्ग सज्जन ने हमारी आगे बढ़कर तस्वीरें खींचने की बात कही। इसी प्रकार लगभग हर जगह हमें ताला खुला हुआ मिला। मठ में हमें भीतरी प्राँगण का ताला खोलकर वहाँ प्रवेश कराया गया। इस प्रकार घूमते हुए हम उस मंदिर में पहुँचे जहाँ से यह यात्रा शुरू हुई थी। पहुँचे तो देखते हैं कि एक चौकीदार न केवल परिसर में उपस्थित है बल्कि बड़ा हँसिया लेकर मंदिर के आस-पास के पेड़ों की मंदिर पर पड़ने वाली डालों को काट रहा है। उससे भी वही सारे प्रश्न कर के—नाम, रजिस्टर, खुलने और बंद होने का समय आदि पूछकर, मैंने जब कहा कि सुबह तो यह बंद था और अब भरी दुपहरिया में आप ये कटाई-छंटाई कर रहे? तो बड़े सहज अंदाज़ में उसने उत्तर दिया, “साहब आज गांधी जयंती है न। तो सोचा साफ़-सफ़ाई कर लूँ।” मुझे बड़ी ज़ोर से हँसी आई। पर मेरे नीरस होना अनिवार्य था। सो मैंने जाने दिया।

कदवाया के मंदिर देखकर हम बग़ल के दो गाँव, तेरही और महुआ के मंदिरों को देखने और गए। वहाँ भी यह किरदार बरकरार रहा। हालाँकि आख़िर तक आते-आते ये सब बोझिल भी लगने लगा था। पर तब भी अभिनय निरंतर बनाए रखा। लौटते समय एक चरवाहे के परामर्श पर एक विशालकाय तालाब के किनारे से होते हुए देहातों के बीच से जाने वाले एक रास्ते को शीघ्रता हेतु पकड़ लिया। फलस्वरूप कीचड़ में एक जगह बुलेट फँस गई। उस छोटे हाथी को निकालने में उस रोज़ न जाने कितने देवताओं की स्तुतियाँ गा ली होंगी, पता तक नहीं। येन-केन-प्रकारेण यह क्रांतिकारी यात्रा अब समापन की ओर थी।

सूर्य पश्चिम के आकाश में डूबने को था। विंध्य के लहराते रास्तों पर सरपट भागती हुई गाड़ी पर कुआँर की शीतल पवन मेरे चेहरे पर पड़ रही थी। बुंदेलखंड के सुदूर देहात अपना विशिष्ट सौंदर्य बिखेर रहे थे। दिन बड़ा रोचक रहा था। मैं दिन के पूरे प्रकरण को याद कर बार-बार मुस्कुराए जा रहा था। पर सत्यता और गंभीर थी। मैं रह-रह कर पूरे घटनाक्रम को उधेड़ कर देखने पर विवश हो रहा था।

मैंने ध्यान दिया कि दिनभर में भले ही कोई भी हमें कुछ भी समझ रहा हो, चाहे कोई अफ़सर चाहे कुछ और, पर हमने कहीं भी ऐसी कोई बात न कही, न चाही जो हमारे अधिकार क्षेत्र में न हो। हमने कहीं भी किसी को भी कोई आदेश नहीं दिया। हम सहज जिज्ञासा में पूछे जाने वाले प्रश्न कर रहे थे। बस हमारा लहज़ा भिन्न था। यही सोचते हुए मुझे अनुभव हुआ कि हम सच में एक बहुत पिछड़े देश के वाशिंदे हैं। मुझे उस दुकानदार और एएसआई के उन सभी कर्मचारियों की मनोस्थिति को सोचकर विचित्र लग रहा था। वे लोग कितने भोले हैं? या कितने मूर्ख? वे सब के सब भयाक्रांत थे। जैसे किसी अनहोनी को टालने के निमित्त किसी आध्यात्मिक कामना में डूबे हुए? मैं उनकी दृष्टि से देखने का प्रयास कर रहा था। क्या इस देश में सरकारी बाबू की, सरकारी अफ़सर को लेकर यही दृष्टि है? कि वो क्रूर है और परमात्मा के न्यायशास्त्र में दंड के विधान के रूप में ही प्रकट होता है? क्या वे किसी अधिकारी से डिग्निटी के साथ यह नहीं कह सकते कि वे भोजन करने गए थे? क्या एक अधिकारी और एक कर्मचारी में इतनी गहरी खाई है?

मैं रह-रह कर सोच रहा था, क्या इस देश में किसी बड़े अधिकारी के इतर किसी की कोई इज़्ज़त नहीं है? क्या हमें इतने सहजता से उन मंदिरों के ताले खुले मिलते? क्या केवल सामान्य आगंतुक के रूप में हमें वो सम्मान मिल सकता था? या शोधकर्ताओं के रूप में? या जिज्ञासुओं मात्र के रूप में? क्या एएसआई अपने चौकीदारों को कोई मूलभूत प्रशिक्षण देती है? जिसमें अधिकारियों के इतर भी आए हुए लोगों को सम्मान या सुविधा की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती हो? ये विचार कल्पना में सारगर्भित परंतु वास्तविकता में हास्यास्पद प्रतीत होते हैं। मैं भी किस सोच में पड़ गया था। पर सबसे बड़ी बात ये कि उस दुकानदार को मेरे समक्ष दयनीय होने की क्या आवश्यकता थी?

फिर एक और विचार मेरे मस्तिष्क में कौंधता है। कि सत्य ये भी है कि इस देश का आदमी इस देश के बाबुओं के भय में इसीलिए भी रहता है कि वो मक्कार भी है। वो जितना भोला है उतना ही अकर्मण्य भी। लगभग हर स्थान पर हमें ताला लगा मिला था। यदि आपस में किसी बाहरी के आने की कानाफूसी नहीं होती तो शायद हम बिना कुछ देखे हुए ही लौट रहे होते। और ऐसा पहली बार का अनुभव नहीं था। कई बार ऐसा हो चुका है। कई बार ऐसा आगे भी होगा।

सूरज पश्चिम के आकाश में समा गया था। पवन अब जोड़ो में बैठ रही थी। राष्ट्रीय राजमार्ग 27 पर गाड़ी तेज़ी से बढ़ी चली जा रही थी। सिलचर से पोरबंदर की ओर जाने वाला देश का दूसरा सबसे लंबा रास्ता। पोरबंदर से गांधी की याद हो आई। आज गांधी जयंती थी। न जाने गांधी के सपनों का भारत क्या था? मुझे नहीं मालूम। मैं गांधी का भक्त नहीं। पर ये सोचे जा रहा हूँ कि उस भारत में तर्क की उपस्थिति होती होगी या नहीं? क्योंकि जिस भारत में मैं रह रहा वो तर्क से उतना दूर है जितना इस देश के बाबू नैसर्गिक उत्सुकता से। मेरा गंतव्य आने को था। अब मुझे बहुत लंबा रास्ता तय नहीं करना था। पर इस देश को? इस देश को अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है। बहुत लंबा। काश वह रास्ता जल्द तय हो।

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आशीष कुमार शर्मा को और पढ़िए : पास्ट लाइव्स : जो था, जो है और जो रह जाएगा | प्रोपेगेंडा फ़िल्मों के ‘परफ़ेक्ट डेज़’ | झाँसी-प्रशस्ति : जब थक जाओ तो आ जाना | बारहमासी के फूल | विश्वविद्यालय के प्रेत | ‘गुनाहों का देवता’ से ‘रेत की मछली’ तक | जीवन को धुआँ-धुआँ करतीं रील्स | वसंत का प्रताप

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