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‘अर्थात्’ की आठवीं कड़ी : उदय प्रकाश के साथ आत्मीय संवाद

‘अर्थात्’ के सत्रों को चलते हुए लगभग एक साल होने को आया है। नए वक्ताओं, नए विषयों और कुछ नए तो कुछ पुराने जिज्ञासु विद्यार्थियों के बीच ‘अर्थात्’ की ऊर्जा कभी कम नहीं हुई। इस ऊर्जा के केंद्र में रहे लेखक, समय, यथार्थ और सत्य बरक़रार रहा।  इस बार—यानी ‘अर्थात्’ की आठवीं कड़ी में—वक्ता थे समादृत कवि-कथाकार उदय प्रकाश। इस गोष्ठी का शीर्षक अपने आप में बेहद आत्मीय और ऊष्मा से भरा रहा—‘सृजन का चूल्हा’।

कार्यक्रम की शुरुआत उदय प्रकाश की सुप्रसिद्ध कहानी ‘नेलकटर’ की नाट्य-प्रस्तुति से हुई। श्रेया सिंह, क्षमा द्विवेदी, नरेश और जितेंद्र ने मंचन को इतना सघन और जीवंत बना दिया था कि कमरे में मौजूद हर व्यक्ति को अनायास महसूस हुआ कि उसकी आँखों के कोरों पर हल्की-सी नमी तैर आई है। यह नमी महज़ एक कहानी का प्रभाव नहीं थी; बल्कि हमारे समय में लुप्त होती जा रही करुणा की दस्तक थी, जिसे उदय प्रकाश अपनी रचनाओं में निरंतर सहेजते आए हैं।

‘नेलकटर’ के संदर्भ में उदय प्रकाश ने बताया कि यह कोई काल्पनिक प्रयोग नहीं था; बल्कि उनके अपने जीवन के सीधे, भोगे हुए और मर्मभेदी अनुभवों पर आधारित रचना थी। इसी क्रम में उन्होंने मुक्तिबोध के चर्चित निबंध-संग्रह ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में प्रतिपादित ‘तीसरे क्षण’ के सिद्धांत को रेखांकित किया। पहला क्षण जीवन-जगत् के प्रत्यक्ष अनुभव और आंतरिक अवगाहन का होता है। स्मृतियों के बिना किसी भी गंभीर रचना का जन्म संभव नहीं है। दूसरा क्षण वह है, जब लेखक अपने भीतर एकत्र अनुभव-पुंज को किसी विशिष्ट रूप (फ़ॉर्म) या विधा में ढालने का निर्णय लेता है। तीसरा क्षण वह है, जब अमूर्त संवेदनाएँ शब्दबद्ध होकर सार्वजनिक चेतना का हिस्सा बनती हैं।

अपने व्याख्यान के दौरान उदय प्रकाश ने सृजन-कर्म की अनिश्चितता और उसके जोखिम पर बेहद मौलिक टिप्पणी की। उन्होंने रचना-प्रक्रिया को एक तरह का जुआ (गैम्बल) क़रार दिया। उनका तर्क था कि जब कोई लेखक किसी कृति की रचना शुरू करता है, तो उसे स्वयं नहीं मालूम होता कि यह रचना उसे और उसके रचना-संसार को किस अज्ञात छोर तक ले जाएगी। उसे यह भी नहीं पता होता कि समकालीन समाज में कितने लोग वास्तव में उसकी संवेदना के सूक्ष्म मर्म को समझ पाएँगे। लेकिन इसी अनिश्चितता के भीतर लेखक की परम आस्था और जिजीविषा छिपी होती है।

इसी क्रम में उन्होंने भवभूति का उल्लेख किया। संभव है कि दुनिया के इस कोने में नहीं तो उस कोने में कोई-न-कोई ऐसा सहृदय पाठक ज़रूर होगा जो रचना के मर्म और उसकी पीड़ा को ठीक उसी तरह समझ सकेगा, जिस तरह रचनाकार ने उसे महसूस किया है।

उदय प्रकाश ने आगे कहा कि अपने निजी अनुभव को व्यापक समाज और दूसरों की कहानी में रूपांतरित कर देना ही एक सच्चे लेखक की वास्तविक कला और सिद्धि है। लेकिन सत्य बोलने की एक अनिवार्य क़ीमत भी चुकानी पड़ती है। लेखक को तमाम तरह के ‘वादों’, पूर्वग्रहों और स्थापित राजनीतिक विचारधाराओं के बंधनों से स्वयं को मुक्त रखना होता है। साहित्य यदि किसी विचारधारा के प्रत्यक्ष अनुकरण के बजाय स्वानुभूत यथार्थ से उपजता है, तो वह पाठक पर कहीं अधिक गहरा और स्थायी प्रभाव छोड़ सकता है। ‘कला की राजनीति’ (पॉलिटिक्स ऑफ़ आर्ट) और ‘राजनीतिक कला’ (पॉलिटिकल आर्ट) दो भिन्न अवधारणाएँ हैं। इनके बीच का अंतर मिटा देने से साहित्य अपनी संभावनाओं का सर्वोत्तम रूप हासिल करने से वंचित रह सकता है।

कवि या कथाकार केवल समाज के किसी एक वर्ग या धड़े का प्रतिनिधि बनकर नहीं लिख सकता। एक सच्चे सर्जक की चिंता संकीर्ण न होकर ‘कॉस्मिक’ होती है। वह समस्त पीड़ित मानवता, चर और अचर, यहाँ तक कि प्रकृति की हर शोषित सत्ता के प्रति संवेदनशील होता है। लेखक को अपने इर्द-गिर्द की धड़कती हुई दुनिया में उतरना पड़ता है। यह एक लुटेरा, अपराधी समय है—जो जितना लुटेरा है, उतना ही चमक रहा है और गूँज रहा है। हमारे पास सिर्फ़ अपनी आत्मा की आँच है और कुछ ऐसे शब्द हैं, जो अब भी जीवन में विश्वास बनाए रखते हैं।

उदय प्रकाश का मानना है कि अनुभवजन्य रचना अपनी जटिलताओं के बावजूद संप्रेषणीयता में सरल, आत्मीय और प्रासंगिक हो सकती है। इसी क्रम में उन्होंने अपनी चर्चित कृति ‘मोहन दास’ के पीछे की घटना का संस्मरण साझा किया। यह कहानी उनके पड़ोसी गाँव में घटी एक त्रासद घटना से उपजी थी। एक ऐसा व्यक्ति, जिसे व्यवस्था के निर्मम तंत्र के सामने जीवन भर यह सिद्ध करने के लिए संघर्ष करना पड़ा कि वह जीवित है और वही असली ‘मोहन दास’ है। आज का समय इतना क्रूर और विडंबनापूर्ण हो चुका है कि आदमी की हाड़-मांस की देह और उसका अस्तित्व बेमानी हो जाते हैं, जबकि दस्तावेज़ों और काग़ज़ों को ही अंतिम सत्य मान लिया जाता है।

उनका मानना था कि चीज़ें कभी स्थिर नहीं रहतीं; वे हमेशा गतिशील और परिवर्तनशील होती हैं। इतिहास इसका साक्षी है कि अनेक ऐसे देश और साम्राज्य, जो कभी दुनिया के नक़्शे पर सीना ताने खड़े थे, आज अपना अस्तित्व खो चुके हैं।

विज्ञान और साहित्य दो अलग-अलग या परस्पर विरोधी द्वीप नहीं हैं। दोनों के भीतर जगत् की गूढ़ताओं को जानने और सत्य की खोज करने की समान उत्कंठा होती है। इसी तरह कवि या कथाकार, आलोचक और अध्यापक की भूमिकाएँ भी एक-दूसरे से भिन्न और स्वायत्त हैं। कोई व्यक्ति एक साथ इन तीनों भूमिकाओं के साथ समान न्याय नहीं कर सकता। नए रचनाकारों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें चुनना होगा कि वे क्या बनना चाहते हैं, क्योंकि ये तीनों रास्ते एक साथ नहीं चलते।

उदय प्रकाश ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि किसी रचनाकार को अपने परिवेश में संपृक्त होना पड़ता है। पहली नज़र में यह भीड़ भले ही कुछ न लगे, लेकिन इसमें किसी एक व्यक्ति से परिचय हो जाने पर पता चलता है कि हर किसी की अपनी कहानी है। जिसे हम जनसंख्या कहते हैं, वह वास्तव में कथाओं का महाकोश है। उन्होंने महानगरों में आपसी ‘बॉन्ड’ के अभाव पर चिंता जताई और कहा कि सुदूर वन क्षेत्रों और गाँवों में यह आत्मीयता अब भी कुछ हद तक बची हुई है। रचनाकार को भी अपने आस-पास की चीज़ों और लोगों के निरंतर संपर्क में रहना चाहिए।

सौ से अधिक लोगों के सामने लगभग एक घंटे तक बोलते हुए भी उदय प्रकाश के उत्साह में कोई कमी नहीं आई। श्रोताओं का ध्यान भी उन पर लगातार बना रहा। व्याख्यान के बाद प्रश्नोत्तर-सत्र में उन्होंने कुछ और महत्त्वपूर्ण बातें कहीं।

आज के दौर में सम्मान और पुरस्कार लौटाने के राजनीतिक-सामाजिक संदर्भों पर उन्होंने कहा कि किसी सम्मान या पुरस्कार को वापस करना आत्मिक रूप से कितना कठिन और कष्टदायी होता होगा, इसे वही व्यक्ति महसूस कर सकता है जिसने उस व्यवस्था के विरोध में ऐसा क़दम उठाया हो।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सृजन की पूरी प्रक्रिया अंततः ‘नितांत अकेलेपन’ (ऐब्सोल्यूट सॉलिट्यूड) का परिणाम होती है। जब रचनाकार लिख रहा होता है, तब वह ब्रह्मांड में बिल्कुल अकेला होता है। लेकिन इसी अकेलेपन में एक वैश्विक उम्मीद भी छिपी होती है।

‘अर्थात्’ की यह गोष्ठी इस विचार के साथ संपन्न हुई कि हम अपने आस-पास जो कुछ भी देखते, भोगते और महसूस करते हैं; उसका सीधा प्रभाव हमारी रचना पर पड़ता है।

कुल-मिलाकर, ‘अर्थात्’ का यह आयोजन भी रुचिकर और रचनात्मक रहा। इसके शुरू होने से पहले ही कमरा विद्यार्थियों से खचाखच भर गया था। दो-ढाई घंटे के गहन संवाद के दौरान कोई उठकर जाने को तैयार नहीं था। सबके भीतर सुनने की भूख थी और सवालों के ज़रिये कुछ और जानने की उत्कंठा, ताकि वे अपने रचनात्मक विवेक को धार दे सकें।

‘अर्थात्’ इसी लक्ष्य के साथ शुरू हुआ था और कहना न होगा कि इसके सत्र लगातार उस लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे हैं। ‘सृजन का चूल्हा’ भी उसी रचनात्मक ताप का एक आत्मीय अनुभव रहा।

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