प्रसादोत्तर नाट्य-साहित्य की प्रवृत्तियाँ
प्राय आलोचकों की यह धारणा है कि भारतेंदु और प्रसाद के अनंतर हिंदी नाट्य-साहित्य ने कोई महत्वपूर्ण कृतिकार नहीं प्रस्तुत किया। इसे वे गतिरोध की स्थिति मानते हैं और भारतेंदु तथा प्रसाद को हिंदी नाटक के चरम-बिंदु घोषित करते हैं। प्रत्येक देश और साहित्य