श्रीहित हरिवंश की शिष्य-परंपरा के कला-कुशल और साहित्य-मर्मज्ञ भक्त कवि।
अज सिव सिद्ध सुरेस मुख, जपत रहत निसिजाम।
बाधा जन की हरत है, राधा राधा नाम॥
कीरति कीरति कुँवरि की, कहि-कहि थके गनेस।
दस सत मुख बरनन करत, पार न पावत सेस॥
राधा राधा कहत हैं, जे नर आठौ जाम।
ते भवसिंधु उलंघि कै, बसत सदा ब्रजधाम॥
राधा राधा जे कहैं, ते न परैं भव-फंद।
जासु कन्ध पर कमलकर, धरे रहत ब्रजचंद॥
श्री बृषभानु-कुमारि के, पग बंदौ कर जोर।
जे निसिबासर उर धरै, ब्रज बसि नंद-किसोर॥
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