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क्षितिज

kshitij

सत्येन कुमार

सत्येन कुमार

क्षितिज

सत्येन कुमार

और अधिकसत्येन कुमार

    आँधी जब थक गई तो जाने कहाँ जाकर छुप गई। हमेशा की तरह मुँह फुलाकर। सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा उसे इस बात पर था कि आसमान उसे ढूँढ़ने भी नहीं निकलेगा। हमेशा यही होता था। क्यों होता था, यह वह आज तक नहीं समझ पाई थी। कोई इतना ख़ाली, ख़ामोश और अकेला होने के बावजूद अपने आपको इतना फैला सकता था कि हर शह को अपने में समेट ले—यह समझ पाना उसके लिए असंभव था। ख़ाली, ख़ामोश और अकेली तो वह भी बहती रहती थी। भटकती रहती थी किसी अभिशप्त आत्मा की तरह, बिना किसी आहट के—दिनों, हफ़्तों और कभी-कभी तो महीनों। जाने क्या ढूँढ़ती हुई। कितने ही लोगों के पास से तो वह इतने नामालूम ढंग से गुज़र जाती थी कि उन्हें अहसास तक नहीं होता था कि किसी ने उन्हें छुआ है। इस तरह से बेमतलब बहते हुए जीना उसने ज़मीन के लोगों से सीखा था। वहाँ ज़मीन पर यही होता था। टुनियादारी की कौन कहे, वहाँ तो अंतरंग से अंतरंग रिश्तों में बँधे लोग भी शाख से टूटे हुए जर्द पत्तों की तरह एक-दूसरे के पास पड़े रहते थे या बहते भी नज़र आते ज़िंदगी में, तो भी किसी दरिया में बहते लकड़ी के बेजान टुकड़ों की तरह जो ऊँचाई से देखने पर तिनकों की तरह नज़र आते थे। उसने पूछा भी था कि एक बार आसमान से—क्या ज़िंदगी का मतलब यह होता है? इस तरह से निर्जीव होकर बहना?

    सब मेरी तरह तो सिरफिरे नहीं होते वह मुस्कुराया था—अपनी वही मुस्कुराहट जिसे देखकर वह उलझन में पड़ जाती थी। उसके बाद उसके सवाल के जवाब में उसने उसे धीरे से चूमकर कहा था, ज़िंदगी का मतलब हर किसी के लिए कुछ और होता है। अगर ऐसा होता और तेरी तरह मुझे हर कोई परेशान करता रहता तो मैं मिट ही जाता अब तक!

    मैं तुम्हें परेशान करती हूँ? उसने तुनककर कहा था, या तुम मुझे?

    मेरी बात का तो तुझे यक़ीन होगा नहीं, किसी और से पूछकर देख! उसने उसे दुबारा लेकिन इस बार लाड़ से चूमते हुए कहा।

    उसके बदन में सिहरन-सी भर आई थी लेकिन फिर भी मुँह बनाकर बोली थी, तुम्हें तो सब जानते हैं...मुझे कौन जानता है! कोई नहीं। जो जानता है, वह हमेशा परेशान करता रहता है क्योंकि उसे मालूम है कि मैं कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती उसका!

    एक बात पूछूँ तुमसे? उसने उसकी आँखों में देखकर धीरे से कहा था।

    क्या? वह पलकें झुकाकर धीरे से बोली थी, क्योंकि एक बेवक़ूफ़ बदली जाने कहाँ से उन दोनों के बीच गई थी और एकटक आसमान की तरफ़ देखती खड़ी थी।

    आसमान ने बदली की तरफ़ एक औपचारिक-सी मुस्कान के साथ देखा और अपने बुज़ुर्गाना अंदाज़ में पूछा, क्यों बदली? अकेले कहाँ घूम रही है तू इस वक़्त?

    बदली के चेहरे का रंग गहरा गया और एक पल उन दोनों की तरफ़ देखकर वह चुपचाप आगे बढ़ गई। उसके जाने के बाद आसमान ने उसे अपनी आँखों में भरकर कहा, जो तुझे जानता है, वह तुझे भला क्यों परेशान करेगा? और फिर जो तुझे जानता है, तेरे पास तो एक वही बचा है न—कुछ बिगाड़ने के लिए? लेकिन अब क्या बिगाड़ेगी तू मेरा? है क्या अब मेरे पास? ये ख़ालीपन? पर इतनी ही ज़िद है तुझे तो चल बिगाड़ ले...जो तेरा मन चाहे!

    पता नहीं कैसी हो गई थी उसकी वह आवाज़ कि वह किसी आशंका से सहम-सी गई। आसमान ने भी यह देख लिया था, इसलिए किसी छोटी बच्ची की तरह उसका ध्यान बँटाने के लिए हँसकर बोला, “अच्छा जा, वह जो पीपल है नीचे, वह तुझे बहुत अच्छी तरह जानता है। बल्कि मुझे तो लगता है कि वह तेरे प्रेम में पागल है बेचारा! तुझे देखकर ही उसकी तो एक-एक पत्ती लहराने लगती है। जा फिर, उसी से पूछकर कि हम दोनों में कौन किसको परेशान करता है?

    वह कुछ क्षणों तक उसकी आँखों में आँखें डाले देखती रही थी। फिर सब कुछ भूलकर उससे चिपटकर उखड़ी-उखड़ी साँसों से बोली थी, तुम क्या सचमुच समझते हो कि मैं कुछ बिगाड़ना चाहती हूँ तुम्हारा? और बिगाड़ दिया तो... और उसके बाद उसकी साँसें अपने शब्दों को नहीं सँभाल पाईं—तो फिर मैं कहाँ रहूँगी किसके पास? कोई नहीं समझता मुझे तुम्हारी तरह! लेकिन तुम! दुनिया-भर के लिए सब कुछ कर सकते हो...बस एक मुझे प्यार नहीं कर सकते! ठीक है, बुला लो उस बदली की बच्ची को...या जिस किसी को भी तुम चाहते हो। मैं अब नहीं आऊँगी तुम्हारे पास! और उसकी बाँहों से निकलकर वह पूरी रफ़्तार से जाने किस तरफ़ दौड़ने लगी थी।

    ग़नीमत यही थी कि पीपल का वह पेड़ उस रास्ते में नहीं पड़ा वरना तो बेचारा जड़ से ही उखड़ जाता।

    आसमान पहले से भी ज़्यादा ख़ाली महसूस कर रहा था। कहीं ज़्यादा ख़ामोश भी था। उससे भी ज़्यादा ख़ामोश जितना कि आँधी आने से पहले अचानक हो गया था। उसे अच्छा नहीं लगता था यह सब। फिर अब उम्र भी ऐसी हो आई थी कि किसी से कुछ भी कहने-सुनने, उसके सच-झूठ को मानने या किसी और की ज़िंदगी में अपने कारण कुछ भी बदल लेने की तो कोई ज़रूरत बची थी और ही कोई इच्छा। वह अच्छी तरह देख और समझ चुका था कि हरेक का जीवन उसकी इच्छाओं और आकांक्षाओं का बंदी होता है। अलबत्ता इच्छाएँ आकांक्षाएँ अपने आप में नियतिबद्ध होती हैं। उन्हें अगर बदला जा सकता है तो सिर्फ़ किसी नए सच को खोजकर। वह हर किसी के बस का नहीं। लोग सच और झूठ को गमलों में उगाना चाहते हैं। उन्हें नहीं मालूम कि सच गमलों में नहीं उगते।

    उससे वह कब मिला था, अब उसे याद नहीं। बस इतना याद है कि बहुत पहले एक शाम जब सूरज ने अपने दहकते हुए रंगों से भर दिया था तो वह ठिठककर खड़ी हो गई थी—अजीब-सी आँखों से उसे देखती हुई। इसके पहले कि वह कुछ पूछ पाता, सूरज ज़मीन की ओट लेते हुए मुस्कुराया था—आज ये कुछ देर से आई है...लेकिन रोज़ाना आती हैं तुम्हें देखने। दीवानी है बिल्कुल!

    सूरज के जाते ही उसने उन सब रंगों को उतारकर, हलके अँधेरे में उससे पूछा था, क्या सूरज ठीक कह रहा था? पर कौन हो तुम?

    मैं...हवा... वह कुछ और नहीं कह पाई थी।

    सूरज ठीक कह रहा था?

    हाँआँआँ उसकी साँसें भारी हो गई थीं।

    तो कभी बताया क्यों नहीं मुझे कि इस रास्ते से गुज़रती हो तुम! उसने धीरे से मुस्कुराकर कहा था—रंगों को देखने आती हो? लेकिन वे मेरे नहीं हैं। सूरज के हैं!

    कुछ पलों तक वह एकटक उसे देखती रही थी। फिर नज़रें झुकाकर चलते हुए बोली थी, रंगों को नहीं, उनके फैलाव को।

    वह स्तब्ध-सा उसे दूर तक जाते हुए देखता रहा था। जब नज़रें वापिस लौटीं तो अँधेरा गहरा हो चला था। वह अमावस की रात थी। चाँद अपनी पलियों से मिलने गया हुआ था। जब वह प्रवास पर होता था तो तारे भी ज़्यादा शोरशराबा नहीं करते थे। वह देर रात तक उसके उन शब्दों के बारे में सोचता रहा था, 'रंगों को नहीं, उनके फैलाव को।'

    जब कोई ऐसी अलग-सी बात कहता या करता था तो उसे अमूमन पहले हँसी आती थी, फिर दया और उसके बाद ग़ुस्सा। दिन-रात वह नीचे, ज़मीन पर रहते लोगों को अपनी नादानी और झूठे ग़ुरूर में इस तरह की हिमाकतें करते देखता था। सदियाँ बीत गई थीं उसे यह तमाशा देखते हुए कि लोग—जो अपनी अंदरूनी और बाहरी ज़िंदगी को फ़ालतू बातों और ग़ैरज़रूरी सामान से इतना भर लेते थे कि ख़ुद उनकी साँसें घुटने लगती थीं—उस सबके बावजूद बेइंतहा फैलाव चाहते थे—अपनी कुंठाओं, कुरुचियों और उनसे भरे अर्थहीन जीवन का। उन्हें पता ही नहीं कि फैलाव के लिए बुनियादी ज़रूरत है—जगह। वे, जो अपने मकान या घर में भरा बेहिसाब कबाड़ अपने सीने से लगाए रहते हैं और जिनकी ज़िंदगी में दरअसल कुछ भी ऐसा नहीं बचा होता कि उस कबाड़ की तरह ही उसे अपने सीने से लगा सकें—उनकी फैलाव के लिए वह ललक तो उसे समझ में आती थी लेकिन वह उसे गहरी उदासी से भर देती थी। सबसे दयनीय स्थिति तब होती थी जब वह किसी को झूठ की सीढ़ियों के ज़रिए किसी ऐसे सच तक पहुँचने की कोशिश करते देखता था जिसके लिए उसकी ज़िंदगी में ज़रा-सी भी जगह नहीं होती थी।

    हवा की उस बात को वास्तव में गंभीरता से लेने की उसके पास कोई वजह नहीं थी। वह तो दुनिया-भर में बहती रहती थी। सब कुछ देखती-समझती होगी। सबसे बड़ी बात यह भी कि उसे मालूम ही नहीं था कि ख़ालीपन क्या होता है? हवा ख़ाली हो भी कैसे सकती थी? नीचे की दुनिया में हर चीज़ की अपनी एक अलग गंध होती है। जीवन की गंध, मृत्यु की, ख़ुशियों और आँसुओं की...लालसाओं और वासनाओं की—जैसी कि कभी-कभी उसकी देह से आती थी—जब वह आँधी बनकर उसके भीतर उतरती थी। अजीब दीवानापन सवार हो जाता था उसके ऊपर उस दौरान। और उस दिन तो कमाल ही हो गया था...

    ...हमेशा की तरह सूरज ने उसके ख़ालीपन में अपने सारे रंगों को भरने के बाद अपनी छेड़छाड़ शुरू ही की थी कि वह पागलों की तरह दौड़ती आई थी—हाँफती और सिसकती हुई और सूरज के भी सारे रंग एकबारगी तो मटमैले-से पड़ गए थे। किसी रूठी हुई बच्ची की तरह वह चीख़ती-चिल्लाती उसके भीतर इधर से उधर दौड़ती रही थी। और ज़िद ऐसी कि एक शब्द नहीं बोली। सूरज ने नामालूम से ढंग से एक बार उन दोनों को देखा था और फिर ज़मीन के पीछे छिप गया था। वह हैरतजदा-सा उसे देखता खड़ा रहा। उसे समझ में नहीं रहा था कि उसे अचानक ये क्या हो गया था। इस तरह सिसकते तो उसने उसे कभी नहीं देखा था। कुछ क्षणों बाद वह मुस्कुरा पड़ा—शायद उस पीपल से कुछ अनबन हो गई होगी! लेकिन इसके पहले कि वह कुछ कहता, वह चौंक पड़ा, उसकी देहगंध में आज बचपन का वह सोंधापन नहीं था। उसकी सिसकियों में भी एक दूसरी ही गंध थी—बारिश की गंध, औरत के आँसुओं की गंध। वह गंध उसे अच्छी नहीं लगती थी। सच तो यह था कि अब—बिल्कुल ही ख़ाली हो जाने के बाद भी, वह गंध उसके भीतर जाने किन-किन चीजों की, किन-किन क्षणों के रीत जाने की एक अनुगूँज उभार देती थी। वह स्तब्ध-सा खड़ा रहा था। भीतर के ख़ालीपन में वे सारे के सारे शब्द भटके हुए परिंदों की तरह चीख़ते रहे थे।

    ग़नीमत यही थी कि उनकी आवाज़ उस आँधी के कानों तक नहीं पहुँच पाई। जब हमारे भीतर शोर भरा होता है तो कोई भी आवाज़, यहाँ तक कि कोई चीख़ भी हम तक नहीं पहुँच पाती।

    रात काफ़ी बीत चुकी थी। वे दोनों जाग रहे थे।

    हवा दबे पाँव आसमान के ख़ालीपन के बीच, अनमनी-सी टहल रही थी। वह सोच रही थी कि क्या एक पूरी उम्र जी लेना अपने आपमें काफ़ी नहीं होता? या अपने समय के भी पार निकल जाना? लेकिन समय तो रेतघड़ी में क़ैद होता है। इच्छाएँ, लालसाएँ और सपने कैसे भाग निकलते हैं उस क़ैद से? कोई चारदीवारी, कोई भी सच या यथार्थ क्यों नहीं रोक पाता उन्हें—भाग जाने या ख़ुदकुशी कर लेने से? और क्या उसे मालूम नहीं?...कि मैं झूठ क्यों बोलती हूँ? क्या इतना भी नहीं समझ सकता वह कि जिसकी नियति सिर्फ़ बहना हो...भटकना हो इस ब्रह्मांड के एक ख़ाली कोने से दूसरे तक, उसके लिए क्या अर्थ है किसी भी सच का?

    आसमान सो नहीं पा रहा था। वह जानता था कि उसका ख़ालीपन उतना ख़ाली नहीं था कि वह सो सके। कोई आहट थी, किसी की साँसों की, कोई गंध थी जिसने उस ख़ालीपन को घेर लिया था। एक आशंका भी थी—किसी बारिश की। वे सबकी सब उसी तरह मौजूद थीं उसके ख़ालीपन में, जिस तरह समय नहीं बल्कि काल सब इच्छाओं, उनके यथार्थ और उनकी परिणतियों को किसी बच्चे की तरह सँभाले रहता है—खिलौनों की तरह।

    एकबारगी तो वह सहम सा गया। फिर करवट लेकर उसने सोचा—हवा आकारहीन भले ही हो, ख़ाली नहीं थी—उसकी तरह। जो ख़ाली नहीं होता, वह नहीं जानता कि ख़ालीपन को बसाना लगभग असंभव है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 265)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : सत्येन कुमार
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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