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आपकी छोटी लड़की

apaki chhoti laDki

ममता कालिया

ममता कालिया

आपकी छोटी लड़की

ममता कालिया

और अधिकममता कालिया

    'टुनिया, ज़रा भागकर चिट्ठी डाल आ।'

    'टुनिया, ठंडा पानी पिला।'

    'मैंने गैस पर दूध चढ़ाया है। तू पास खड़ी रह टुन्नो! कुछ करना नहीं है। जब दूध उफनने लगे तब तू गैस बंद कर देना।'

    दिन-भर दौड़ती है टुनिया। स्कूल से आकर होमवर्क करती है, थोड़ा-बहुत खाना खाती है और इसके साथ ही शुरू हो जाता है काम-पर-काम। घर के टेढ़े-से-टेढ़े और सीधे-से-सीधे काम सब टुनिया के ज़िम्मे। टुनिया बाज़ार से लकड़ी लाएगी, टुनिया पौधों में पानी देगी, टुनिया मम्मी को दवाई देगी, टुनिया बाहर सूख रहे कपड़े उठाएगी, टुनिया दस बार दरवाज़ा खोलेगी, दस बार दरवाज़ा बंद करेगी। अगर पड़ोसिन आंटी से पंद्रह दिन पहले दी गई कटोरी मँगानी है तो टुनिया ही जाएगी। वह इतनी बहादुर है जो जाकर सीधे-सीधे कह दे, 'आंटी, वह कटोरी दे दीजिए, वही जिसमें हम सरसों का साग दे गए थे आपको।'

    अचानक मेहमान जाएँ तो बर्फ़ माँगने केरावाला मेमसाहब के पास टुनिया ही जाएगी। और किसकी मज़ाल जो उस बदमिज़ाज औरत को पटाकर उसके फ्रिज से बर्फ़ निकलवा सके।

    टुनिया है तो तेरह साल की, पर लगती है ग्यारह की। उसे दूध पीना अच्छा लगता है, अंडा खाना। हलका-फुलका बदन है उसका। कमर इतनी छोटी कि स्कूल यूनिफॉर्म का स्कर्ट खिसका पड़ता है। ज़रा भागे तो ब्लाउज़ स्कर्ट से बाहर। इसलिए टुनिया को बेल्ट लगानी पड़ती है या फिर स्कर्ट में तीन-तीन जगह हुक फँसाने के लिए लूप। स्कूल जाने के लिए बाक़ायदा होना ही पड़ता है, टाई भी लगानी पड़ती है, जूते भी चमाचम चाहिए। पर वैसे टुनिया को ढंग से कपड़े पहनने का धीरज कहाँ। जो हाथ आया, गले में डाल लिया। घर में सभी के बाल कटे हुए हैं—मम्मी के, दीदी के। यहाँ तक कि कोलीन के भी। कोलीन सुबह-शाम आती है, डस्टिंग करती है, कपड़े इस्तरी करती है और रसोई में खाना बनाने के पूर्व की तैयारी। खाना उससे नहीं बनवाया जाता। मम्मी कहती हैं, वह पकाएगी तो छूत लग जाएगी। टुनिया को यह ज़रा भी समझ नहीं आता कि यह छूत कैसे लगती है। जैसे कोलीन आटा गूँथे, सब्ज़ी काट दे तो ठीक, लेकिन वही सब्ज़ी यदि छौंक दे तो छूत, वही आटा अगर सेंक दे तो छूत। कोलीन है बड़ी फ़ैशनेबल। नाक-भौं सिकोड़ते हुए बता चुकी है कि अगर उसके बाप को दारू का इतना लालच होता तो वह कभी काम करने निकलती, वह भी घर-घर।

    कोलीन तीन घरों में जाती। कोलीन इतना पाउडर लगाती है कि पड़ोस के देवराज ने उसका नाम 'पाउडर एंड कंपनी' रख छोड़ा हैं। कोलीन ऊँची-सी फ़्रॉक पहनती है और ऊँची सैंडिल। उसका शरीर भी कई कोण से ऊँचा-ऊँचा लगता है। हर इतवार वह चर्च जाती है और हर शनिवार पिक्चर। कभी उसके बालों में नया क्लिप होता है, कभी स्कर्ट की जेब में नया रूमाल। बग़ल वालों की आया मेरी जब पूछती है,

    'कहाँ से लिया?' तो कोलीन आँख मटकाकर कहती है, 'हमारा बॉयफ़्रेंड दिया।' टुनिया को कोलीन पसंद नहीं है। उसे लगता कि कोलीन अच्छी लड़की नहीं है। जिन बातों पर टुनिया को ग़ुस्सा आता है, उन पर कोलीन खिलखिलाकर हँस उठती है। हर समय मस्ती-सी चढ़ी रहती है उस पर। फ़ैशन और पिक्चर के सिवा उसे कुछ नहीं सूझता। वह बाक़ायदा एक्टिंग करके पिक्चर की कहानी सुनाती है, भले ही कोई सुने, चाहे सुने। उसका इस तरह मटकना टुनिया को नापसंद है। वह कई बार मम्मी से कह चुकी है, 'इसकी छुट्टी क्यों नहीं कर देतीं?' पर मम्मी हर बार एक ही सुर पर बात ख़त्म करतीं, 'टुन्नो, तू तो सुबह तैयार होकर चल देती हैं स्कूल। बेबी को टाइम नहीं मिलता। रह गई मैं। तो भई, साफ़ बात है, मुझसे इतना 'काम होता नहीं। कोलीन भी मदद करे तो मैं मर जाऊँ।'

    मम्मी मरने-जीने के सवाल जाने कहाँ से ले आती हैं बात-बात पर अभी जब जबलपुर से माधुरी आंटी आई थीं और छुट्टियों में टुनिया को साथ ले जाना चाहती थीं, मम्मी ने कहा, 'न, बाबा न! टुनिया को मैं नहीं भेज सकती। एक तो कोलीन छुट्टी पर गई हुई है, ऊपर से तू इसे ले जाएगी। मुझसे नहीं होता सारा काम। मैं जीते-जी मर जाऊँगी।'

    माधुरी आंटी अकेली वापस चली गई थीं, हालाँकि टुनिया मन ही मन बहुत तरसी थी साथ जाने के लिए। कैसा होगा जबलपुर, उसने मन ही मन सोचा था। अपनी किताब में उसने भेड़ाघाट के बारे में पढ़ा था। वहाँ जाकर मिलान करना चाहती थी कि किताबें कितना सच बोलती हैं। पर मम्मी को वह कैसे मर जाने दे!

    मम्मी की ख़ातिर तो वह सारा दिन भागती है। कई ऐसे भी काम करती है जो उसे क़तई पसंद नहीं, मसलन पाल साहब के यहाँ जाकर पापा को फ़ोन करना, नल बंद होने पर निचली मंज़िल पर डॉ. जगतियानी के घर से पानी लाना, बाज़ार से कांदा-बटाटा ख़रीदना और सामान मम्मी को पसंद आने पर उसे वापस करने दुकान पर जाना। मम्मी उससे टुनिया-भर का सामान मँगाएँगी, फिर उसमें मीन-मेख निकालेंगी, 'साबुन में तू दस पैसा ज़्यादा दे आई है, बट्टी लेकर वापस बोहरा के पास जा और कह, हमें नहीं लेना साबुन। लूट मची है क्या, जो दाम मन में आया, ले लिया। टुन्नो, इतनी बड़ी हो गई तू, अभी तक अदरक ख़रीदने की अक़्ल नहीं आई। यह एकदम दो कौड़ी की अदरक है, गट्ठे वाली। अदरक तो एकदम बादाम जैसी रही है आजकल।'

    अब टुनिया क्या जाने, अदरक बादाम जैसी होती है। उसे तो अदरक एकदम नीरस चीज़ लगती है, खाने में भी और देखने में भी। एक बार ख़रीदकर वापस करना क्या इतना आसान होता है। पसीना जाता है। कार्टून अलग बनता है।

    छुट्टी वाले दिन एक दुपहर घर में पानी एकदम ख़त्म था। मम्मी ने झट कह दिया, 'टुनिया, एक छोटी बाल्टी पानी नीचे से ले आ, कम-से-कम चाय तो बने।'

    डॉ. जगतियानी के यहाँ नल के साथ-साथ हैंडपंप भी लगा है। निचली मंज़िल होने की वजह से उनके यहाँ पानी हर वक़्त आता है। डॉ. और मिसेज जगतियानी दोनों सुबह अपने क्लीनिक पर जाते हैं। दुपहर ढाई-तीन तक लौटते हैं। लौटकर खाने के बाद वे सो जाते हैं—एयरकंडीशनर चलाकर। उनके घर की पूरी देखभाल उनका नौकर रामजी करता है। वही फ़ोन सुनता है, कॉलबेल बजने पर दरवाज़ा खोलता है, कार साफ़ करता है और खाना बनाता है। सारी शाम जब डॉक्टर साहब और मिसेज जगतियानी क्लीनिक पर होते हैं, रामजी टी.वी. देखता है। यह उसका रोज़ का काम है। टी.वी. को वह टी.बी. कहता है। एक-एक एनाउंसर को वह पहचानता है। उसने सबको नाम दे रखे हैं, 'फर्स्ट क्लास', 'सेकंड क्लास', 'चलेगा' और 'खटारा'।

    उस दिन टुनिया पीतल की छोटी बाल्टी लेकर नीचे पहुँची तो डॉक्टर साहब का पिछला दरवाज़ा खुला था। टुनिया सीधे अंदर पहुँच गई। नल खोलकर देखा, पानी नहीं था। फिर उसने हैंडपंप चलाया। वह भी सूखा पड़ा था। तभी रामजी रसोई में से निकलकर आया, 'आज पानी नहीं है, सब खलास।'

    टुनिया ने एक बार और नल खोलने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि रामजी ने अपने पजामे की ओर इशारा किया और अश्लील ढंग से मुस्कुराकर कहा, 'लो, इससे भर लो।'

    टुनिया कुछ समझ नहीं पाई, पर जो कुछ उसने देखा, घबराकर वह दहशत से चीख़ती भाग खड़ी हुई। बाल्टी वापस उठाने का किसे होश था।

    बेतहाशा भागती टुनिया तीसरी मंज़िल पर घर में घुसी कि मम्मी की घुड़की पड़ी, 'पानी नहीं लाई न, अब पीना शाम की चाय। काम तो कोई करना ही नहीं चाहता आजकल। एक कोलीन है, उसे कुछ कहो तो वह मुँह बनाती है। एक तू है, तेरे अलग नखरे। जो करूँ, मैं करूँ, जहाँ मरूँ, मैं मरूँ।'

    टुनिया का मन इस वक़्त इतना घिना और घबरा रहा था कि वह क्या कर दें, पर माँ की भुन-भुन सुनकर भन्ना गई। ये मम्मी हैं, इन्हें क्या फ़िक्र, टुनिया पानी क्यों नहीं लाई। इनका तो बस काम होना चाहिए, नहीं तो ये मरने को तैयार बैठी हैं।

    'और बाल्टी कहाँ फेंक आई, बोल तो सही मुँह से? हद हो गई ढीठपने की। ख़ाली बाल्टी उठाकर लाने में इतनी कलाई मुड़ती है। एक हम थे। हमारी माँ ज़रा इशारा कर दे, हम सिर के बल उलटे खडे रहते थे।'

    बस, शुरू हो गया ये और इनका ज़माना। अब यह रिकार्ड जल्दी नहीं रुकने का। लकड़ी काटने से लेकर सिर काटने तक के अपने तजुर्बे सुनाए जाएँगे। नानी के सिरहाने लहराता साँप मम्मी ने कुचला था, लोहे वाली की सोने की तगड़ी का पता मम्मी ने लगाया था, चोर को सेंध लगाते सबसे पहले मम्मी ने देखा था। नानी की बीमारी में उन्हें कैसे सँभाला था कैसे बताए टुनिया, यह सब करना आसान है, बनिस्बत वापस नीचे जाने के, अपनी आँखों वह गंदी चीज़ देखने के, महज़ एक बाल्टी की ख़ातिर।

    दीदी के साथ तो ऐसा नहीं करती मम्मी। दीदी उनका एक भी काम नहीं करती, फिर भी उसके सामने मम्मी कभी शिकायत नहीं करतीं। वह तो कांदा-बटाटा लेने बाज़ार नहीं जाती, उसे पानी लेने डॉ. जगतियानी के यहाँ नहीं भेजा जाता, बिजली का बिल जमा करने की कतार में दीदी तो कभी नहीं लगी। दीदी सुबह आठ बजे सोकर उठती है। उठते ही हुक्म चलाने लगती है, 'कोलीन, मेरे नहाने का पानी गर्म करो। मम्मी, आलू का टोस्ट बना दो। टुनिया, इस कुर्ते के साथ का दुपट्टा ढूँढ़ दो।'

    दीदी नहाने चली जाती है और घर-भर उसके कॉलेज जाने के काम में इस क़दर व्यस्त हो जाता है जैसे दीदी लाम पर जा रही हो। मम्मी गेट तक उसे घड़ी और रूमाल पकड़ाने भागती हैं। दीदी थैंक्यू भी नहीं कहती। बस, एक महारानी नज़र सब पर डाल शान से चल देती है। अकेली कॉलेज जाती है, पर यों लगता है मानो चार अर्दली आगे, चार पीछे चल रहे हैं। किस शान से दीदी सड़क क्रॉस करती है, आती-जाती टैक्सियों, कारों को चुनौती देती है। किसी की मजाल जो दीदी से पूछे, 'क्यों जी, यह सड़क क्या आपके पापा ने बनवाई है? वह पैदल पारपथ क्या बेटेरों के लिए छोड़ रखा है?'

    टुनिया को पता है, जब दीदी कॉलेज के लिए निकलती है, कॉलोनी के आधा दर्जन लड़के भी तभी अपने-अपने घर से निकलते हैं। वे इधर-उधर छा जाते हैं, कोई पुलिया के पास, कोई चौराहे पर कोई बस-स्टॉप पर दीदी इन सबकी हीरोइन है। किसी ने दीदी को कॉलेज के स्टेज पर नृत्य करते देख लिया है, बस गुड़प। किसी ने दीदी को डिबेट में बोलते सुना है, धराशायी। कोई दीदी की चाल का दीवाना है, कोई दीदी के बालों का। बच्चू सीने पर हाथ रखकर गाता है, 'उड़-उड़के कहेगी खाक सनम...।' आबू दो साल से एल-एल.बी. में फेल हो रहा है। दीदी किसी की ओर नहीं देखती। गर्दन को एक गुमान-भरा झटका दे वह बस-स्टॉप पर ऐसे खड़ी हो जाती है, जैसे बकिंघम पैलेस की बग्घी उसके लिए आने वाली हो।

    एक दिन तो भी गई थी—प्रिंस राजगढ़ की गाड़ी। दीदी बस-स्टॉप पर खड़ी थी कि चॉकलेट रंग की कार झटके से आकर सामने खड़ी हो गई। प्रिंस ख़ुद ड्राइव कर रहे थे। निहायत शालीनता से बोले, 'मिस सहाय, मैं भी कॉलेज जा रहा हूँ, मे आय हैव प्लेजर टु ड्रॉप यू!'

    दीदी ने एक नज़र उसे देखा और कहा, 'सॉरी, मैं नहीं जानती आप कौन हैं?'

    प्रिंस सिर झुकाकर चला गया। वह कॉलेज नहीं गया। वह इतना तिलमिला गया, उसने उसी दिन सिर्फ़ कॉलेज, वरन् शहर भी छोड़ दिया।

    बहुत नाज है टुनिया को अपनी बहन पर। दीदी टुनिया से चाहे जो काम ले ले, टुनिया कर देगी। टुनिया दीदी के नाख़ून काटती है। रूमाल धोती है, बाल कंघी करती है, कमरा ठीक करती है। उस दिन टुनिया बहुत थकी हुई थी। बाज़ार के पाँच चक्कर लगाने पड़े थे। दीदी को भी बाज़ार का ही एक काम था। उसे दर्जी से मैक्सी मँगवानी थी। दीदी ने अपने बालों से मोतियों के फूलों का छोटा गुच्छा निकालकर टुनिया को पकड़ा दिया। ख़ुशी के मारे टुनिया सारी थकान भूल गई। फूलों को निहारते-निहारते वह दर्जी की दुकान तक चली गई और मैक्सी ले आई। पैर बहुत दुखे, पर फूल कितने सुंदर थे।

    कई बार दीदी टुनिया के हाथ में अपनी फ़िलॉसफ़ी की किताब थमाकर लेट जाती है। पढ़ाई करने का दीदी का यह प्रिय तरीक़ा है। टुनिया कांट, हीगल से लेकर अद्वैतवाद तक सब पढ़कर सुनाती है। बहुत कुशाग्रबुद्धि है दीदी। एक बार का सुना ज्यों-का-त्यों याद हो जाता है उसे। इसी तरह दीदी ड्रामे का पार्ट याद करती है। दीदी के साथ-साथ टुनिया को भी याद हो जाते हैं संवाद। माँ ने कहा, 'चले गए, सबके सब चले गए। छह-छह बेटे पैदा किए, छहों चले गए। अब जाकर मैं सोऊँगी, चैन से सोऊँगी। जिस दिन से ब्याही आई, एक दिन भी नहीं सोईं। कभी किसी के लिए, कभी किसी के लिए, जीवन प्रार्थना में बीता। आज इसकी पूजा, कल उसका उपवास। अब सब चले गए। लाख तूफान आएँ, अब मेरा क्या बिगाड़ लेंगे। सागर से मुझे क्या लेना और क्या देना? भले ही घर में अब भोजन के नाम पर सिर्फ़ एक सूखी मछली हो, मुझे क्या चिंता, किसकी फ़िक्र! मैं पैर फैलाकर सोऊँगी, भर नींद सोऊँगी।'

    जे.एम. सिंज के इस नाटक में दीदी ग़ज़ब अभिनय करती है। हॉल में बैठे एक-एक दर्शक की आँखें डबडबाई होती हैं। टुनिया ने ख़ुद देखा है। दीदी की ख़ासियत यही है। चाहे इसे दिलबहार बेगम बना दो, चाहे बूढ़ी अम्मा, पात्र को जीता-जागता खड़ा कर देती है सामने। तभी तो अपने आगे निर्देशक को कुछ समझती नहीं। 'इंग्लिश एसोसिएशन' के नाटक 'एंटनी एंड क्लियोपेट्रा' का निर्देशक वह कुर्गी लड़का है जिमी। दीदी उसका कोई कहना नहीं मानती। दीदी कहती है—वह अपनी मर्ज़ी के अनुसार क्लियोपेट्रा के संवाद बोलेगी। प्रोफ़ेसर चौकसी ने हारकर कह दिया, 'शी इज बॉर्न क्लियोपेट्रा। लेट हर हैंडिल कैरेक्टर।'

    कॉलेज के वार्षिकोत्सव में दीदी का जय-जयकार होता रहता है। मुख्य अतिथि एक के बाद एक दस पुरस्कार दीदी को देते हैं। अधिकतम अंक पाने पर अँग्रेज़ी, हिंदी, फ़िलॉसफ़ी और लैंग्वेज का प्रमाण-पत्र तो मिलता ही है। साथ ही गायन, नृत्य और अभिनय का भी। एक पुरस्कार व्यक्तित्व के लिए, एक वक्तृता के लिए।

    टेबल टेनिस शील्ड दीदी की वजह से जीती गई, उसका भी विशेष पुरस्कार मिलता है। बार-बार अपनी सीट से मंच तक जाना दीदी की शान के ख़िलाफ़ है। दीदी वहीं खड़ी है विंग्स में, एक भक्त छात्र को अपने पुरस्कार पकड़ाती हुई। वहीं से निकलकर वह मुख्य अतिथि से पुरस्कार ग्रहण करती और वहीं खड़ी हो जाती! हाल में सब बड़े रश्क़ से उसका नाम सुन रहे हैं, उसके दीदार का इंतज़ार कर रहे हैं, पर दीदी को कोई जल्दी नहीं। मंच पर जाते समय वह घबराती भी नहीं।

    पुरस्कार टुनिया को भी मिलते हैं अपने स्कूल में। पर वह तो इस क़दर हड़बड़ा जाती है कि प्राचार्या तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है। घबराहट में मुँह से कभी 'थैंक्यू' पहले निकल जाता है और पुरस्कार बाद में पकड़ती है, कभी 'थैंक्यू' मुँह से निकल ही नहीं पाता, ज़ुबान तालू से चिपककर सूख जाती है, हाथ थर-थर काँपते हैं। वही रोज़ के चेहरे होते हैं, फिर भी टुनिया कितना घबरा जाती है। दीदी बिल्कुल नहीं घबराती। एकदम बाहरी आदमी है मुख्य अतिथि। पर दीदी कुछ इस अंदाज़ में उसके हाथों से पुरस्कार लेती है मानो ले नहीं, दे रही है।

    टुनिया भी बैठी है ताली बजाने वालों में। जितनी बार दीदी का नाम बुलाया जाता है, टुनिया को लगता है, उसका क़द ऊँचा होता जा रहा है। उसकी इच्छा होती है, अपनी सीट पर खड़ी हो जाए और ज़ोर-ज़ोर से ताली पीटे। उसका दिमाग़ उसे तसल्ली और तमीज़ सिखाता है।

    जलसे के बाद टुनिया दीदी के साथ घर लौट रही थी। कॉलेज से बस स्टॉप कुछ दूरी पर था। कुछ इनाम दीदी ने पकड़े थे, कुछ टुनिया ने। टुनिया को लग रहा था, ये उसी ने जीते हैं। आख़िर वही तो दीदी को संवाद याद कराती है नाटकों के, वही दीदी को फ़िलॉसफ़ी, हिंदी और अँग्रेज़ी के लेसन सुनाती है।

    बार-बार रास्ते में कभी कोई, कभी कोई दीदी को मुबारकबाद दे रहा था। तभी तीन लड़कों के झुंड ने आकर दीदी को बधाई दी। फिर उनमें से एक नाटे-से लड़के ने कहा मिस सहाय, हम लोगों में एक शर्त लगी है। राज कक्कड़ का कहना है, यह लड़की जो आपके साथ है, आपकी बहन है। मेरा कहना है, ऐसा हो ही नहीं सकता। बकवास करना राज की पुरानी आदत है। लेकिन मैं आपकी शान के ख़िलाफ़ इसे बोलने थोड़े ही दूँगा। आप असलियत बता दीजिए। हम लोगों में आइसक्रीम की शर्त लगी है।

    दीदी ने निहायत लापरवाही से कहा, मेरी बहन है यह, तूर्णा सहाय।

    लड़कों के मुँह अवाक् रह गए। उन्होंने टकटकी लगाकर टुनिया को जाँचा, जैसे चिड़ियाघर में बच्चे जेब्रा देख रहे हों।

    राज कक्कड़ ने विजेता अंदाज़ में बाँहें चढ़ा लीं, देखा न, मेरी ख़बर ग़लत नहीं हो सकती। है धमाका?

    नाटे लड़के ने हताश स्वर में कहा, ये आपकी सगी बहन है, मिस सहाय?

    हाँ बाबा, हाँ। दीदी ने हँसते-हँसते कहा।

    एक ही माँ की?

    “हाँ, और एक ही पिता की भी। दीदी ने अपनी तरफ़ से मज़ाक़ मारा, जिस पर सब हो-हो कर हँस पड़े।

    टुनिया को पहली बार रोना रोना-सा आया। कितने बेहूदा लड़के हैं! कैसे भद्दे मज़ाक़ करते हैं। यह क्या शर्त लगाने की बात है? कितनी बार वह दीदी के साथ कॉलेज चुकी है। बहन नहीं तो क्या चपरासिन है?

    घर जाकर टुनिया ने किसी से कुछ कहा पर रुलाई एक अंधड़ की तरह मन में घुमड़ रही थी। किसी को उसकी ओर देखने का अवकाश ही कहाँ था। कोई दीदी की पीठ ठोंक रहा था, कोई उसका मुँह चूम रहा था। पापा ने दीदी से सगर्व कहा, यू आर माय ब्रेनी डॉटर, शाबाश।

    टुनिया को मम्मी ने तत्काल भेज दिया बाज़ार, लड्डू लाने। पड़ोस के घरों में लड्डू बँटेंगे, दीदी इतने इनाम जो लाई है। सबके बच्चे उसी कॉलेज में पढ़ते हैं, पर है कोई जो इतने इनाम पाए!

    टुनिया घंटों घर-घर घूमती फिरी, सात नंबर, आठ नंबर, नौ नंबर। कैरावाला, जगतियानी, द्विवेदी, आलम खान। कॉल बेल बजाई, दरवाज़ा खुला। टुनिया ने हाथ जोड़े, “नमस्ते आंटी, हमारी दीदी इस साल फिर हर चीज़ में फर्स्ट आई है। मम्मी ने मिठाई भेजी है...नमस्ते।

    पापा ने रेडियो पर से टुनिया के स्कूली कप उठाकर ताक पर रख दिए और दीदी के बड़े कप सजा दिए। कमरा जगमगा उठा। नए कप चमकते कितने ग़ज़ब के हैं। अब कल फ़ोटोग्राफ़र आएगा। दीदी की फ़ोटो खिंचेगी।

    रात जब टुनिया अपने बिस्तर पर लेटी, उसे जाने कहाँ से अवश रुलाई गई। उसे स्पष्ट नहीं था, वह क्यों रो रही थी, पर आँसू थे कि बहे जा रहे थे। लगातार रोने से नींद भी उड़ गई।

    टुनिया दबे पाँव उठकर ग़ुसलख़ाने में गई। वहाँ लगे शीशे में उसने अपना चेहरा देखा।

    नहीं, इतना बुरा तो नहीं कि बर्दाश्त हो। बाल उसके दीदी से लंबे और मुलायम हैं। त्वचा भी उसकी चमक रही है। फिर उन लड़कों ने क्यों कहा कि वह दीदी की कोई नहीं। और फिर अगर लड़कों ने बदतमीजी की भी, तो क्या दीदी उन्हें डपट नहीं सकती थी। क्या उसका हाथ अपने हाथ में ले, गर्व से नहीं कह सकती, देखो, यह है मेरी बहन, मेरी अपनी छोटी बहन, तुम्हें दिखाई नहीं देता?

    टुनिया क्या करे कि अपनी दीदी की बहन लगे! क्या गले में पट्टा लटका ले या आटे के बोरे में मुँह घुसा दे या छील डाले अपनी चमड़ी छिलके की तरह।

    टुनिया को इसी तिलमिलाहट में याद आई उस लाल लहँगे की, जिसके कारण उसे कितनी मार पड़ी थी। दीदी को टाउनहॉल में एकल नृत्य प्रतियोगिता में नाचना था। उसके लिए नया लाल लहँगा, ब्लाउज़ और चूनर बनवाई गई थी। प्रतियोगिता के पूर्व दीदी दुपहर बाज़ार गई थी— लाल चुटीला और झूमर ख़रीदने। पीछे से दर्ज़ी ने आकर दीदी की पोशाक दी। नई लाल पोशाक टुनिया को इस क़दर भाई, उससे रहा गया। उसने चाव-ही-चाव में अपनी फ़्रॉक उतार लहँगा-ओढ़नी पहन ली। बाक़ायदा सिर ढँककर वह माथे पर टिकुली लगा ही रही थी कि दीदी वापस।

    टुनिया को काटो तो ख़ून नहीं। हे भगवान, दीदी ने देख लिया! अब क्या होगा?

    दीदी का पारा गर्म हो गया। तूने मेरी पोशाक क्यों ख़राब की, बता, बता! दीदी ने उसे झँझोड़ डाला।

    दीदी, ख़राब नहीं की, लो, मैं उतार देती हूँ।

    दीदी रोने बैठ गई, ऊँ-ऊँ-ऊँ, मैं अब यह पोशाक नहीं पहनूँगी। यह गंदी हो गई।

    मम्मी ने दीदी से कुछ नहीं कहा। बस, टुनिया की धुनाई कर डाली, जिसके कारण दीदी की पोशाक गंदी हो गई।

    टुनिया हफ़्तों सोचती रह गई, क्या पोशाक इतनी जल्द इतनी गंदी हो गई कि दीदी का डांस बिगड़ गया, उसे पुरस्कार नहीं मिला और घर लौटते समय उसकी एक पायल भी खो गई?

    तब से टुनिया ने गाँठ बाँधी, दीदी का कोई कपड़ा नहीं छूना है। रूमाल भी नहीं।

    दीदी को दुखी नहीं करना है।

    रात-भर की छटपटाहट के बाद टुनिया ने तय किया, वह लड़कों की ख़ुराफ़ात पर क़तई ध्यान नहीं देगी। वह अपना पूरा ध्यान पढ़ने में लगाएगी। दीदी के कॉलेज अब कभी नहीं जाएगी। मम्मी कहेंगी, तब भी नहीं।

    स्कूल में टुनिया का दिन बहुत अच्छा बीता। इंग्लिश में 'वेरी गुड' मिला, ड्राइंग में 'गुड'। ख़ुशी के मारे बाक़ी पीरियड भी खटाखट बीत गए। अब आया गणित का पीरियड, होडीवाला सर की क्लास। लड़के-लड़कियों को सबसे ज़्यादा सज़ा इसी क्लास में मिलती है। लड़कों को भी ज़बरदस्त केनिंग होती है। लंबी लचीली टहनी होडीवाला सर के क्लास का दौरा कर डालती है। सनाक-सनाक हथेलियों पर केन लेते लड़के रोते नहीं, पर उनके होंठ भिच जाते हैं। टुनिया के बदन में फुरफुरी आती है जितनी बार यह आवाज़ सुनती है वह—'सनाक-सनाक।'

    लड़कियों को मार नहीं पड़ती। उन्हें स्कूल के बाद रुकने और पाठ लिखने की सज़ा मिलती है—'डिटेंशन'। क्या तुक है इसमें, सवाल ग़लत हुआ गणित का और सज़ा में मिल गया 'आर ह्यूमन स्ट्रक्चर' को नौ बार लिखना। टुनिया को कभी यह सज़ा नहीं मिली, लेकिन जिन्हें मिलती है वे भी तो उसकी सहेलियाँ हैं, उसे पता है, लिखते-लिखते उनकी बिचली उँगली नीली पड़ जाती है।

    टुनिया के सवाल कभी ग़लत नहीं होते पर उसे सर का रवैया पसंद नहीं, जिस समय छात्र सवाल कर रहे होते हैं, होडीवाला सर खिड़की पर पीठ टिका गिद्ध-दृष्टि से सबको देखते हैं—'नो चीटिंग'। लड़कों से निपटकर वे लड़कियों के पास आते हैं। 'लेट मी सी मिसी बाबा, वॉट हैव यू डन।' कहते हुए वे प्रत्येक मिसी बाबा का सवाल जाँचते हैं। जितनी देर वे सवाल देखते हैं, उनका एक हाथ लड़की की पीठ पर बराबर चलता रहता है, कंधे से लेकर कमर तक के हिस्से पर। हृष्ट-पुष्ट, गुलगुली लड़कियों पर वे विशेष मेहरबान रहते हैं। पर लड़कियाँ उनसे कतराती हैं। बड़ी लड़कियाँ आपस में इस बात पर भुनभुनाती हैं, पर डर के मारे कोई ज़ुबान नहीं खोलती।

    टुनिया के प्रायः सभी सवाल ठीक होते हैं। शायद इसीलिए सर उसके पास कभी नहीं फटकते, जल्दी से 'राइट' लगाकर आगे बढ़ जाते हैं। दो-चार बार टुनिया ने वे सवाल भी कर दिखाए हैं जो सर नहीं कर पा रहे थे। होडीवाला सर सिर्फ़ एस.टी.सी. तक पढ़े हैं। छात्र उनकी डिग्री को कहते हैं—संडास टिकट कलेक्टर। संडास जाने का टिकट कहाँ लगता है, उन्हीं से पूछने की बात है।

    शनिवार को पापा ने सुबह बैठक साफ़ करवाई। उनकी बैठक बस टुनिया साफ़ कर सकती है। कोलीन को तो ज़रा भी तमीज़ नहीं। ज़रूरी से ज़रूरी काग़ज़, रद्दी समझ कूड़े में बटोरकर फेंक देगी। टुनिया जानती है, काग़ज़ पापा की जान हैं। एक-एक चिट्ठी, एक-एक अख़बार क्यों रखा हुआ है, उसे पता है। मम्मी तो उकता जाती हैं इस सफ़ाई अभियान से। उनका कहना है, जितनी देर में पूरे घर की सफ़ाई हो, उतनी देर में केवल यह बैठक साफ़ होती है। एक-एक पेपरवेट को चमकाना, पोंछना, पिनकुशन में पिन खोंसना, किताबें क़रीने से रैक में सजाना, इन सबकी उन्हें फ़ुर्सत कहाँ। पर टूनिया बोर नहीं होती। वह इस काम को झाड़ू और झाड़न की जुगलबंदी कहती है।

    फ़र्श पर बिछे बिस्तर की चादर बदली गई। किताबें ठीक से लगाई गई। रेडियो का कवर और मेजपोश भी धुले हुए बिछाए गए। एक बहुत बड़े साहित्यकार आने वाले थे। टुनिया ने पूछा, पापा, क्या इनका पैर उनसे भी बड़ा होगा जो पिछली बार आए थे?

    फ़िज़ूल बात मत करो। पापा ने घुड़क दिया। पिछली बार भी उनके घर एक बड़े साहित्यकार आए थे। उनके पैर की छाप चादर पर पड़ गई थी। सफ़ेद चादर के बीच वह मटमैली छाप बड़ी अजीब लग रही थी। बाप रे बाप—टुनिया ने सोचा था—इतना बड़ा पैर! उसके तो दो-तीन पंजे निकल आएँ इसमें से। उसने तभी सोचा था कि इतने बड़े साहित्यकार का केवल दिमाग़ वरन् पैर भी बड़ा होता है।

    पर पापा को कोई ख़ुराफ़ात बरदाश्त नहीं। घर में सब स्वच्छ होना चाहिए। क़ायदे से कमरे में आओ, नमस्ते करो, चाय रखो और चले जाओ। अगर कमरे में कविता-पाठ चल रहा हो या गंभीर बातचीत, कभी टोको नहीं। सुनना चाहती हो तो चुपचाप बैठ जाओ।

    टुनिया किताबों की दुनिया से अनजान नहीं। किताबें उसे बेहद प्रिय हैं। वह कुछ भी और सब कुछ पढ़ डालती है, जो सामने जाए। यह जो साहित्यकार आने वाले हैं, श्री मुक्तिदूत, इनका उपन्यास भी उसने पढ़ा है। उसके मन में उन्हें देखने की उत्कट अभिलाषा है। टुनिया जानना चाहती है, वे दूसरे के मन की बात इतनी आसानी से और इतनी अच्छी तरह से कैसे समझ लेते हैं। क्या उनके पास डॉक्टर की तरह कोई स्टेथेस्कोप होता है?

    एक और बात, जो टुनिया की समझ में नहीं आती, वह यह है कि कोई साहित्यकार तो पचास पुस्तकें लिखने के बाद भी बड़ा साहित्यकार नहीं माना जाता और कोई सहज एक पुस्तक लिखकर महान हो जाता है। पापा थोड़ा-बहुत समझाते हैं, फिर अपना शाश्वत वाक्य बोल देते हैं, 'अभी तू बहुत छोटी है।'

    इतनी छोटी नहीं है टुनिया। दिल-दिमाग़ हज़ार-हज़ार सवालों से भरा पड़ा है—क्यों, क्यों-क्यों? उनके घर अधिकतर कलाकार और साहित्यकार आते हैं। यहाँ आने वाले तरह-तरह के लोग हैं, एक बार एक कलाकार आए थे। जेब में तीन सौ रुपए और बेशुमार उम्मीदें लिए। वे फ़िल्मों में संघर्ष करना चाहते थे। शक्ल से कितने भोले लगते थे। उनके घर महीनों रहे थे, इसी बैठक में। रोज़ सुबह झोला कंधे पर डाल निकल जाते, स्टूडियो-दर-स्टूडियो, दरबानों से गिड़गिड़ाते। रात को थकान से लस्त और हौसले से पस्त लौटते। पापा उन्हें अपने साथ खाना खिलाते और देर तक उनकी हिम्मत बँधाते।

    अगली सुबह वे फिर निकल पड़ते। साढ़े तीन महीने की दौड़-धूप के बाद उन्हें एक फ़िल्म में भूमिका मिली, बस-स्टॉप पर खड़े एक गुंडे की, जो चाकू दिखाकर लोगों की जेब ख़ाली कराता है और फिर चाकू चूमकर विचित्र अट्टहास करता है, 'हा हा हा हा!' घर में वे चाकू चूमने और अट्टहास करने की रिहर्सल करते तो टुनिया कमरे से हट जाती। जाने क्यों उसे लगता, यह भूमिका उस कलाकार की तौहीन थी। उसके बाद सभी फ़िल्मों में वे गुंडे बने। दो ही साल में वे फ़िल्म उद्योग के नामी विलेन हो गए, उन्होंने जुहू में फ्लैट ख़रीद लिया, कार ख़रीद ली, शादी कर ली, और पापा को पहचानने से इंकार कर दिया।

    पापा को कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा। वे आहत हुए, अपमानित। उन्होंने कुछ और साथी ढूँढ़ लिए। पर मम्मी किचकिचाती रहीं, जब तक दो रोटी का ठिकाना नहीं था, फलानेजी गले से बँधे रहे। आज रोटी-बोटी दोनों का इंतज़ाम हो गया तो कैसे आँखें फेर लीं। जाने इन्हें अकल कब आएगी। अरे, अब तो यह सदाव्रत बंद करो। आज की दुनिया में कोई किसी का नहीं। क्या मिला तुम्हें मर-मरकर?

    पापा ने एक बार भी शिकायत नहीं की। जाने कितने लोगों को पाँच रुपए से लेकर पचास रुपए तक उधार दिए जो डूब गए। वर्षों मम्मी ने घर-ख़र्च के रजिस्टर में इसे उचंत में डाले रखा, फिर हारकर लिखना छोड़ दिया। पापा ने कहा, इसमें क्या झींकना, सारा जीवन ही एक लेन-देन है।

    मम्मी बोलीं, “तुम्हारा तो सारा जीवन बस देन-देन है।

    मम्मी को ग़ुस्सा बहुत जल्द आता है! अच्छी बातों में भी वे जाने कहाँ से आपत्ति ढूँढ़ निकालती हैं। इक्कीस नंबर में नए किराएदार आए थे, मिस्टर पै। उस दिन उनकी लड़की विनया सामने के लॉन में दो-तीन लड़कियों के साथ खेल रही थी। टुनिया भी पहुँच गई। सबने मिलकर रस्सी कूदी, आइ स्पाइ खेला। वापस जैसे ही टुनिया घर आई, माँ ने जवाब तलब किया, किससे पूछकर गई थी?

    कपड़े क्यों नहीं बदले? बाक़ी लड़कियों के कपड़े देखे थे। एकदम परी जैसी लग रही थीं!

    हमारी नाक कटाएगी...

    लो, हो गई सारी शाम गुड़-गोबर। माँ की डाँट बरदाश्त नहीं होती और माँ ही सबसे ज़्यादा डाँटती हैं। डाँटने के बाद रोने या सुस्त पड़ने का भी अवकाश नहीं देतीं। ख़ुद अपनी तबीयत ख़राब कर बैठ जाती हैं।

    फिर शुरू हो जाता है पापा की नसीहतों का सिलसिला, कितनी बार कहा है, टुन्नो, मम्मी को ग़ुस्सा करने दिया करो, इनका ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है।

    तुम्हें ज़रा ख़याल नहीं है मम्मी का टुनिया! चलो, इन्हें पानी में ग्लूकोज पिलाओ।

    शाम को डॉ. गांगुली के ले जाना मम्मी को।

    डॉक्टर मम्मी का ब्लडप्रेशर देखता है, दवा देता है। टुनिया ज़बरदस्त पश्चात्ताप से भर जाती है। डाँट भी उसे ही पड़ती है, अफ़सोस भी उसे ही होता है, डॉक्टर के भी वही जाती है, 'सॉरी' भी वही कहती है। किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

    कोई टुनिया को इस सवाल का जवाब नहीं देता कि ब्लडप्रेशर किसका जाँचा जाना चाहिए, जिसने डाँटा, उसका या जिसे डाँट पड़ी, उसका?

    इन झमेलों से बिल्कुल अलग-थलग दीदी एक अलग दिशा में दौड़ रही थी। लगभग रोज़ शाम कोई-न-कोई शो चलता रहता है। शो के बाद दीदी घर आती है, मेकअप उतार, कपड़े बदल वह आँख बंद कर लेट जाती है बिस्तर पर। थोड़ी-थोड़ी देर में पापा या मम्मी आकर उसे देख जाते हैं। जब उसकी आँख लग जाती है तो हौले से बत्ती बंद करते हुए पापा कहते हैं, बहुत स्ट्रेन पड़ रहा है बेबी पर। इसे रोजाना एक सेब दिया करो।

    हर बात दीदी से बाँटना चाहती है टुनिया। कल टुनिया ने उसे बताया, कितने बड़े साहित्यकार आने वाले हैं आज। दीदी ने कहा था, 'हाय, मैं भी सुनती उनकी बातें, पर क्या करूँ, कल से तो नई रिहर्सल शुरू है। मेन रोल मेरा ही है।'

    पापा सुबह से बड़े जोश में हैं। मुक्तिदूतजी के उपन्यास और काव्य-संग्रह का फिर से पारायण हो रहा है। जगह-जगह लाल पेंसिल से निशान लगाया जा रहा है, मुक्तिदूतजी से जमकर बहस करनी है। टुनिया भी साथ-साथ पढ़ रही है। इस कमरे का आलम अनोखा है। यहाँ बैठकर मन किताबों में रम जाता है। समय का ध्यान रहता है, काम का। तभी मम्मी ने आकर कहा, टुनिया, चलो सनीचरी से सामान लाने।

    टुनिया का जोश जाम हो गया।

    सनीचरी का मतलब है सूखी मछली के गंधाते ढेर, बाज़ार की कचर पचर, धूप, पसीना, धूल, बौड़म झोले, काँदा-बटाटा, गेहूँ, चावल, मसाले, पातड़भाजी, खट्टा चूका और खटारा रिक्शा। पूरी बंबई में कहीं रिक्शा नहीं चलता सिवाय इस सनीवरी के। इस रिक्शे से रूह काँपती है टुनिया की।

    पहले तो बाज़ार की एक-एक दुकान पर मम्मी को मोल-भाव करते देखो, बोलो कुछ नहीं। बस, झोले पकड़े खड़े रहो। फिर जब मम्मी की तसल्ली हो जाए तो सौदा ले लो। बराबर टकटकी लगाकर तराज़ू देखती रहो, तरकारी वाली कहीं डंडी तो नहीं मार रही। इसी चतुराई से मम्मी महीने का पूरा सौदा सनीचरी से लेंगी। फिर बड़े कौशल से वे सस्ता रिक्शा करेंगी। रिक्शा करने में उनकी दो शर्तें अनिवार्य हैं—रिक्शा सस्ता हो और रिक्शेवाला विनम्र। झिकझिक करने वालों से मम्मी को बहुत चिढ़ है। रिक्शे में चढ़ते ही मम्मी टमाटर का झोला या तेल की पीपी बग़ल की सीट पर रख लेंगी और कहेंगी, 'टुनिया, तू यहाँ नीचे बैठ ले। टमाटर कहीं पिच जाएँ, तेल कहीं बह जाए, पीपी में झाल तो लगी नहीं है। थोड़ी ही दूर की बात है।'

    अगर टमाटर या तेल कुछ हुआ तो कॉलोनी की ही कोई और पड़ोसन मम्मी को ज़रूर दिख पड़ेगी। मम्मी उसे भी रिक्शे में अपने साथ लाद लेंगी और कहेंगी, 'टुन्नो, तू ज़रा किनारे पर टिक जा, यहाँ मेरे पैरों के पास। नहीं-नहीं बहनजी, आप परेशान मत होइए। हमारी बेटी तो बडी सीधी है, जहाँ कहो बैठ जाए, जहाँ कहो खड़ी हो जाए। बच्चों का क्या है, जैसे रखो, रह जाते हैं।'

    नहीं बैठना चाहती टुनिया इस तरह कितनी शर्म आती है उसे। स्कूल की कोई सहेली देख ले या टीचर तो कितनी खिल्ली उड़ेगी उसकी। आठवीं में पढ़ती है। कोई बच्ची तो नहीं। वह क्या घर की नौकरानी है जो पैरों के पास बैठ! इतना ही शौक़ है मम्मी को पड़ोसिनें ढोने का तो दो रिक्शे क्यों नहीं ले लेतीं?

    टुनिया जब इस तरह बैठती है तो सामने से उसका कच्छा दिखने लगता है। कम-से-कम टुनिया को तो यही लगता है, उसका कच्छा दिख रहा है, बल्कि सारी टुनिया को ख़बर है कि दिख रहा है। 'शेम, शेम!' क्या करे टुनिया। फ़्रॉक इतनी लंबी नहीं कि आगे खींच ले। पीछे से मम्मी की चप्पल चुभ रही है, आगे से यह मुसीबत!

    बहुत बोर होती है टुनिया इस सनीचरी की क़वायद से। ऊपर से ग़ज़ब यह कि मम्मी इसे तफ़रीह का नाम देती हैं। अब अगर घर पहुँच, झोले रख टुनिया यह कहे कि वह सत्रह नंबर वाली पिन्हाज दाजी के यहाँ जा रही है, तो मम्मी डपटकर कहेंगी, 'बैठ चुपचाप। अभी घूमकर नहीं तो क्या पापड़ बेलकर रही है। घर में तो किसी का टिकुआ लगता ही नहीं है। जो करूँ, मैं करूँ, जहाँ मरूँ, मैं मरूँ।'

    मम्मी एक बार बोलना शुरू कर दें तो देर तक चुप नहीं होतीं। रुक-रुककर उसी विषय पर बोलती हैं। लिफ़ाफ़े ख़ाली कर दाल डिब्बों में डाली जा रही है, भाषण चालू। गेहूँ कनस्तर में पलटा जा रहा है, भाषण चालू। काँदा-बटाटा अलग-अलग टोकरियों में रखा जा रहा है, भाषण चल रहा है। धीरे-धीरे यह स्वगत कथन में बदल जाएगा। टुनिया मम्मी के पीछे-पीछे कुछ इस तरह घूमेगी मानो दोनों के बीच कोई तार जुड़ा है। मम्मी मुड़ेंगी तो वह भी मुड़ेगी, मम्मी झुकेंगी तो वह भी झुकेगी।

    मम्मी ने चिड़चिड़ाकर एक बार फिर कहा, सुनती नहीं है, फिर और धूप चढ़ जाएगी! जल्दी उठ।

    पापा ने किताब पर से नज़र उठाई और बोल पड़े बमककर, क्या तुम सुबह से कुड़कुड़ शुरू कर देती हो। आटे-दाल के सिवा और कुछ पता भी है। नहीं जाएगी टुनिया। इतने बड़े साहित्यकार रहे हैं। किसी भी समय सकते हैं। यहाँ कौन बनाएगा चाय? जाना है तो कोलीन को लेकर जाओ।

    एक कटखनी नज़र पापा और टुनिया पर डाल मम्मी चली गईं।

    पापा ग्रेट ! टुनिया को मज़ा गया। कैसी बाल-बाल बची वह सनीचरी से और कोलीन क्या ख़ूब फँसी। अभी-अभी काम निपटा वह जाने की तैयारी कर रही थी। तभी तो उसने सबकी नज़र बचाकर फूलदान से एक फूल चोरी किया था बालो में लगाने के लिए। टुनिया को सब पता है। रिक्शे में जब पटरे पर बैठना पड़ेगा, सारी शान झड़ जाएगी आज।

    वह तो छूटी किसी तरह। अब जब पापा कहेंगे, वह ऐसी फर्स्ट क्लास चाय बनाएगी कि मुक्तिदूतजी भी हैरान रह जाएँगे। दाल पहले से पिसी रखी है, पकौड़े तल देगी।

    नहीं, दीदी क्यों करेगी मदद। अभी तो वह सोकर ही नहीं उठी। उठेगी फिर तैयार होगी और तत-थई, तत-थई में लग जाएगी। कल ही तो उसके ड्रामे का पच्चीसवाँ शो ख़त्म हुआ है। आज नई रिहर्सल शुरू है।

    वक़्त से एक घंटे बाद मुक्तिदूतजी आए—चमत्कार की तरह। एकदम झकझक सफ़ेद खादी का कुर्ता-पाजामा पहने। आते ही 'हा-हा' हँसना शुरू। पापा बड़े प्रसन्न। मुक्तिदूतजी ने पहले उन्हें अफ़सरों को दृष्टिहीनता पर एक छोटा-सा दिलचस्प भाषण दिया, फिर उदाहरण—एक-से-एक अजीबोग़रीब। ग़नीमत है, पापा ने बिना बिदके सुन लिया। नहीं, कोई भरोसा नहीं, पापा कब सहसा अफ़सर बन जाएँ, कब साहित्यप्रेमी। एक बार ऐसे ही किसी कवि के बेतकल्लुफ़ी से बोलने पर पापा ऐंठ गए थे और उन्होंने त्योरियों से बोलना शुरू कर दिया। कवि महोदय पापा को एक असफल मनुष्य बता रहे थे जबकि पापा अपने को निहायत सफल मानते थे।

    पर मुक्तिदूतजी एक तो पापा के हमउम्र हैं, दूसरे बात करने का तरीक़ा भी अलग है। चकित है टुनिया। पापा ने बताया था, मुक्तिदूतजी नौकरी करते हैं, व्यवसाय। पर कितने अलमस्त। किसी बात की फ़िक्र ही नहीं। शहंशाह सा अंदाज़, गूँज-भरी आवाज़, सिगरेट पीने का दिलकश अंदाज़ और किस क़दर आत्मीय। खाया उन्होंने कुछ नहीं, लेकिन चाय ख़ूब तारीफ़ करके पी। पूछा, किसने बनाई, आपकी पत्नी ने?

    नहीं, टुनिया ने, यह है मेरी छोटी लड़की तूर्णा, पढ़ने में बहुत तेज़ है और चाय बनाने में भी।

    'हा, हा, हा,' मुक्तिदूतजी हँस पड़े, यह लड़की बहुत तरक्की करेगी। मैं तो कहता हूँ, जो अच्छी चाय बना सकता है, वह दुनिया में मुश्किल से मुश्किल काम कर सकता है।

    तभी दीदी तैयार होकर कमरे में आई। सफ़ेद साड़ी ब्लाउज़ में कितनी ताज़ा लग रही थी वह, फूल की तरह। रोहिणी भाटे सभी छात्राओं को सफ़ेद वस्त्र में आने को कहती हैं। उनका कहना है कि नृत्य एक सात्विक क्रिया है। वह स्वयं भी सफ़ेद रंग ही पहनती हैं।

    मुक्तिदूतजी को नमस्कार कर दीदी ने पापा से कहा, पापा, हमें ठीक ग्यारह बजे पहुँचना है रोहिणी भाटे की क्लास में। आज से 'वसंतसेना' का रिहर्सल शुरू है।

    ठीक है, चली जाना। पापा ने कहा।

    तभी मिसेज रहेजा गईं, चार नंबर से। टुनिया के यह कहने पर भी कि मम्मी बाहर गई हैं, वह अंदर रसोई तक उन्हें देख आईं, फिर आकर बैठक में बैठ गईं।

    उस समय पापा और मुक्तिदूतजी में बहस चल रही थी कि उत्कृष्ट साहित्य के लिए लोकप्रियता कोई शर्त हो सकती है या नहीं। मुक्तिदूतजी लोकप्रियता को व्यावसायिकता से जोड़ रहे थे, जबकि पापा उसे जनमानस से। वह बार-बार रामचरितमानस के लोकप्रिय अंश उद्धृत कर रहे थे।

    मुक्तिदूतजी ने कहा, रामचरितमानस अपनी साहित्यिकता के कारण नहीं, धार्मिक आग्रहों के कारण लोकप्रिय है।

    मिसेज रहेजा बैठी रहीं कुछ देर, अपनी एक एड़ी से दूसरी एड़ी खुजाती। फिर बोलीं, “टुनिया, हमने इडली का घोल बना रखा है। साँचा दे दो तो जल्दी से इडली पक जाए।

    अब आईं असल बात पर। यह रहेजा आंटी इतने बहाने क्यों बनाती हैं? आते ही सीधे कह देतीं कि साँचे के लिए आई हैं। इन्हें क्या पता बैठक में कौन बैठा है इस वक़्त। सच, टुनिया को हैरानी होती है। कॉलोनी की सभी स्त्रियाँ एक-सी हैं—सबकी आदतें एक-सी-सुबह उठकर मेकअप कर लेना, हर वक़्त खाने-पीने के बारे में सोचना, दुपहर को सोना, शाम को टी.वी. देखना और रात को घोषित करना, 'आज तो मैं बहुत थक गई।' टुनिया ऐसी क़तई नहीं बनना चाहती। वह तो ऐसी बनना चाहती है, जैसे मुक्तिदूतजी। उसे लगता है, ज़िंदगी के ज़रूरी सवालों का जवाब साहित्यकार ही ढूँढ़ सकता है।

    मुक्तिदूतजी जानना चाहते थे कि क्या माधव मिश्र अभी भी इस कॉलोनी में रहते हैं?

    रहते हैं। पापा ने बताया, आजकल बहुत उदास हैं, कहीं आते-जाते नहीं। हाल ही उनकी पत्नी का देहांत हो गया।

    अकस्मात्

    नहीं, कैंसर था।

    मैं तो उनका घर भूल गया हूँ, कोई आठ बरस पहले आया था एक बार। किस नंबर में हैं?

    एक सौ आठ। इस ब्लॉक से हटकर उधर तीसरी सड़क के मोड़ पर जो क्वार्टर बने हैं, उनमें।

    कहाँ भई?

    टुनिया बता देगी, जानती है। टुनिया बेटी, ज़रा मुक्तिदूतजी को माधव मिश्रजी के घर पहुँचा दो। पापा बोले।

    भई, लेकिन लौटकर हम एक चाय और पिएँगे।

    ज़रूर ज़रूर। पापा की मुस्कान खिल गई। पापा को और क्या चाहिए। उनका मन तो बस स्वागत-सत्कार के लिए बना है। वश चले तो सारा दिन, सारी रात दरवाज़ा खोले बैठे रहें, आगंतुकों के इंतज़ार में। उनकी भूख-प्यास मित्रों के साथ बँधी है। साथ में कोई खाने वाला हो तो तीन बजे तक खाने की सुध लेंगे। कोई जाए तो बारह बजे से ही भूख लग जाएगी।

    टुनिया ने ज़रा भी देर नहीं लगाई। फौरन स्लिपर्स पहने और चल दी मुक्तिदूतजी के साथ। बाप रे, कितने लंबे हैं, ताड़ की तरह। बात करते समय अगर इनकी तरफ़ देखना हो तो गर्दन में बाँयटा पड़ जाए।

    मुक्तिदूतजी ने देखा—टुनिया उनके साथ लगभग भागते हुए चल रही है। उन्होंने रफ़्तार धीमी कर दी। पूछा, यह तुम्हारी बहन थी न?

    “आपको कैसे पता?

    “वाह, तुमसे इतनी मिलती जो है।

    टुनिया ने शायद ग़लत सुना है या मुक्तिदूतजी ने ही ग़लत कहा है!

    “सब तो कहते हैं, मुझसे ज़रा भी नहीं मिलती।

    बहुत मिलती है। तुम्हें पता है तूर्णा, भगवान के पास सबसे बेहतरीन प्रिंटिंग प्रेस है। इंसान लाख कोशिश करे, वह बात पैदा नहीं कर सकता जो भगवान कर सकता है। जैसे किताबें छपती हैं, सब एक-सी, इसी तरह भगवान हर ख़ानदान के नाक-नक़्श के ब्लॉक प्रिंट करते हैं। तभी जानकर लोग कहते हैं, 'अरे बबुआ, तेरी नाक तो बिल्कुल दादी पर गई है, तेरी हँसी में तो बुआ की छवि है।' ईश्वर एक बढ़िया मुद्रक है।

    अपनी बात पर मुक्तिदूतजी हा-हा कर हँस दिए। टुनिया के मुँह से फ़ौरन निकला, आप भगवान को मानते हैं?

    क्यों, ऐसा तुम्हें क्यों लगा कि भगवान को मानने वाले कम होते जा रहे हैं।

    पता नहीं, एक बार पापा ने कहा था, लोग ज्यों-ज्यों पढ़े-लिखे बन रहे हैं उनको भगवान पर से आस्था हिल रही है।

    यह तो पापा ने कहा था, तुम क्या कहती हो?

    मुझे भी ऐसा ही लगता है।

    नहीं, पापा को ऐसा लगता है, इसलिए तुम्हें ऐसा लगता है। टुनिया रानी, अलग से सोचो, क्या हमारे देश में कभी ईश्वर में विश्वास ख़त्म हो सकता है? अभी में चौराहे के बीचोबीच एक बौड़म-सा पत्थर रख दूँ सिंदूर में रँगकर और ख़ुद उस पर जाकर दो फूल चढ़ाऊँ। फिर देखना तुम, अपने लोगों की कितनी आस्था है। दस में से नौ आदमी यहाँ रुकेंगे, मत्था टेकेंगे, फूल-फल चढ़ाएँगे। इसे कहते हैं आस्था।

    या अंधविश्वास?

    नहीं, विश्वास। वैसे विश्वास और अंधविश्वास में बड़ा महीन-सा फ़र्क़ होता है। तुम अभी बहुत छोटी हो, वरना तुम्हें समझाता।

    गई वही बात। यह छोटी होना तो बवालेजान हो गया है। अच्छी-ख़ासी बात समझ रही थी कि ब्रेक लग गया, 'अभी तुम बहुत छोटी हो।' इस वक़्त मुक्तिदूतजी मेहमान हैं, वरना टुनिया पूछती, 'छोटों को बड़ा बनने के लिए क्या करना पड़ता है? क्या सिर के बल खड़ा होना पड़ता है?

    मुक्तिदूतजी ने ग़ौर से उसकी ओर देखा, थक गईं?

    नहीं। टुनिया ने गर्दन हिलाई।

    किस क्लास में पढ़ती हो?

    क्या नाम है स्कूल का?

    कैसे जाती हो इतनी दूर?

    लीजिए गया माधव मिश्रा का घर।

    मिश्राजी घर पर हैं।

    टुनिया का काम ख़त्म।

    जाएगी।

    मुक्तिदूतजी अब मिश्राजी से बातों में मशग़ूल हो जाएँगे। दोनों साहित्यकार, दोनों बातूनी। जानती है टुनिया, मुक्तिदूतजी को कौन-सा याद रहेगा, वह किस क्लास में पढ़ती है, कैसे स्कूल जाती है, स्कूल का नाम क्या है। बच्चों से ऐसी बातें सभी पूछते हैं और सभी भूल जाते हैं। पापा के एक दोस्त हर बार उससे उसका नाम पूछते हैं और हर बार भूल जाते हैं।

    पापा का ख़याल है, चाय के बाद मुक्तिदूतजी को खाना भी खिलाया जाए। और क्या? बारह बजे हैं, चाय पिलाते एक-डेढ़ बजे जाएँगे।

    मम्मी सनीचरी से अभी लौटी नहीं हैं। लौटकर भन्नाएँगी, 'बस, शुरू हो गई इनकी दावतें। इतना ही शौक़ था खिलाने का तो किसी हलवाइन से शादी कर लेते। सारा दिन बैठी रहती भट्ठी पर। बाज़ार में धूप में तपते आओ और मरो चूल्हे पर!

    टुनिया उनके आने से पहले कुछ बना लेगी। पर क्या? उसे आलू की तरकारी के सिवा कुछ बनाना आता ही नहीं। दीदी होती तो उसकी ख़ुशामद कर ट्रेनिया पनीर निकलवा लेती। पनीर-आलू की सब्ज़ी बन जाती। पर दीदी तो रिहर्सल के लिए जा चुकी।

    चलो, जैसा बुरा-बावरा आता है, बनाएगी टुनिया। पापा को 'ना' कहेगी। ख़राब बनेगा तो सॉरी कह देगी। ढेर-सा सलाद काट देगी। चटनी अचार सब रखा है, दे देगी। मिठाई पापा मँगा ही लेंगे।

    मम्मी के लिए नहीं छोड़ेगी कोई काम। एक तो मम्मी थकी हुई लौटेंगी, दूसरे उन्हें ग़ुस्सा आएगा। अगर मम्मी पसंद करें तो छुट्टी वाले दिन टुनिया सारे घर का खाना बना दे। पर पसंद ही तो असली बात है। मम्मी को किसी के हाथ का बना खाना अच्छा नहीं लगता। कई नौकरों की मम्मी छुट्टी कर चुकी हैं। कोई चपाती मोटी बनाता था, तो कोई सब्ज़ी पतली बनाता। किसी की उन्हें सफ़ाई नापसंद थी तो किसी की हाथ की सफ़ाई। मम्मी बहुत स्वादिष्ट भोजन बनाती हैं, पर किसी को सिखाना उनके बस की बात नहीं। झींकने लगती हैं।

    मुक्तिदूतजी आए। पहले चाय पी। पापा ने खाने के लिए आग्रह किया। सहज भाव से वह रुक गए।

    टुनिया ने अकेले हाथ सारा इंतज़ाम किया। वह दौड़-दौड़कर गर्म फुलका खिला रही थी। उसे बिल्कुल कष्ट नहीं हो रहा था। मुक्तिदूतजी कब-कब आते हैं!

    आपकी लड़की की आवाज़ बहुत अच्छी है, इसका रेडियो ऑडिशन क्यों नहीं करवाते? मुक्तिदूतजी ने कहा।

    पापा उत्साह और गर्व से बताने लगे, उसे समय ही कहाँ है रेडियो के लिए। फिर रेडियो में वे कलाकार जाते हैं जो मंच अथवा टी.वी. पर अयोग्य सिद्ध होते हैं। रेडियो तीसरी श्रेणी की प्रतिभाओं के लिए है। यह तो स्टेज की नामी कलाकार है। आए दिन इसके शो होते रहते हैं। बल्कि एक बार फ़िल्म के लिए भी प्रस्ताव मिला। काफ़ी नामी प्रोड्यूसर का था। लेकिन आप जानते ही हैं, बच्ची को वहाँ फँसाना तो बिल्कुल ग़लत है। दो साल से कत्थक सीख रही है। कॉलेज भी जाना रहता है। पढ़ाई में हरदम अव्वल आती है।

    कौन? यह टुनिया?

    यह तो अभी बिल्कुल मूर्ख है, कुछ नहीं आता, वह—मेरी बड़ी बेटी पपीहा।'

    नहीं सहाय साहब, मैं इसकी बात कर रहा हूँ, आपकी छोटी लड़की की। इसकी आवाज़ में एक संस्कार है। आजकल बहुत कम दिखाई देती है।

    फुलका लाते हुए टुनिया ने सुना, “आपकी छोटी लड़की...

    सहसा विश्वास नहीं हुआ टुनिया को। इस घर में हमेशा दीदी की जय-जयकार हुई है। दीदी के गाने पर तालियाँ बजी हैं; दीदी के नृत्य पर बधाई मिली है। दीदी के प्रमाणपत्र मढ़ाए गए हैं। दीदी महान है। टुनिया से कोई पूछे, दीदी क्या है...

    पानी का जग लाते-लाते टुनिया के कानों में मुक्तिदूतजी की आवाज़ पड़ी है, सहाय साहब, आवाज़ से आप किसी की पूरी शख़्सियत जान सकते हैं। सच्चे, खरे इंसान की आवाज़ नाभि से उत्पन्न होती है और उदर से टकराती हुई, एक समूची संस्कृति का दस्तावेज़ बन कंठ से निकलती है। आपकी छोटी लड़की की आवाज़ में यह सब है। उसकी आवाज़ एक समूची संभावना है।

    टुनिया का अंग-अंग सितार-सा झनझना उठा। क्या यह सच है? क्या यह सब उसी के लिए कह रहे हैं। बहुत मज़ाक़ करते हैं न। लेकिन हँस तो नहीं रहे। मज़ाक़ के मूड में तो नहीं दिखते। गंभीर होकर बोल रहे हैं। इतने बड़े साहित्यकार झूठ क्यों बोलेंगे? शायद झूठ ही होगा। यों ही उसे ख़ुश कर रहे हैं या पापा की ख़ुशामद कर रहे हैं। ख़ुशामदी तो नहीं लगते।

    वह उनके सामने बोली ही कहाँ। वे ही बोलते रहे। क्या उन छोटे-छोटे अस्फुट जवाबों में से ही उन्होंने यह मणि ढूँढ़ निकाली? टुनिया ने सोचा था, उन्होंने उसे मूर्ख मानकर ही ज़्यादा बात नहीं की।

    पापा गर्दन हिलाते हुए उनके आगे मिठाई की प्लेट बढ़ाने लगे। पापा ने अपनी परिवार-प्रशस्ति शुरू कर दी, “हमारे घर में सभी की आवाज़ बहुत अच्छी है। मेरे पिताजी की आवाज़ भी बहुत अच्छी थी। जब वे सस्वर रामायण-पाठ करते थे तो सारा मुहल्ला जाता था सुनने। भीड़ सँभालना मुश्किल हो जाता था। पपीहा की आवाज़ तो सबसे अच्छी है। क्या बताएँ, आज होती तो आपको उसका गाना सुनाते!

    कुछ नहीं लेना-देना टुनिया को इस परिवार-पुराण से। अब लाख बार घरवाले उससे चाय बनवाएँ, पानी मँगवाएँ, सब्ज़ी कटवाएँ, कुछ नहीं व्यापेगा उसे। उसे आज यह कैसी सम्पदा मिल गई है! उसके कानों में ठुमरी-सी छोटी यह बात किस क़दर ठुमक रही है—'आपकी छोटी लड़की आपकी छोटी लड़की...'

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 220)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : ममता कालिया
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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