सोरठा

अर्द्धसम मात्रिक छंद। विषम चरणों में तुक और ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ और सम चरणों में तेरह-तेरह मात्राएँ। दोहे के चरण उलट देने से सोरठा बन जाता है।

रीतिकाल के नीतिकवि। हिंदी के पहले संबोधन काव्य के रचयिता। 'राजिया' को संबोधित सोरठों के लिए समादृत।

रीतिग्रंथ रचना और प्रबंध रचना, दोनों में समान रूप से कुशल कवि और अनुवादक। प्रांजल और सुव्यवस्थित भाषा के लिए स्मरणीय।

'चरनदासी संप्रदाय' से संबंधित संत चरणदास की शिष्या। कविता में सर्वस्व समर्पण और वैराग्य को महत्त्व देने के लिए स्मरणीय।

1693 -1773

सतसई परंपरा नीति कवि।

1833 -1909

हिंदूवादी कवि। महाराणा प्रताप की शौर्यगाथा ‘विरुद छहतरी’ के लिए स्मरणीय।

1535 -1655

अयोध्या नरेश। रीतिकाल की स्वच्छंद काव्य-धारा के अंतिम कवि। ऋतु वर्णन के लिए प्रसिद्ध।

1820 -1870

कृष्ण-भक्त कवि। गोस्वामी हितहरिवंश के शिष्य। सरस माधुर्य और प्रेम के आदर्श निरूपण के लिए स्मरणीय।

रीतिकालीन नीतिकाव्य के अलक्षित कवि।

बीकानेर नरेश के भाई और अकबर के दरबारी कवि। वीररस की कविताओं के लिए प्रसिद्ध।

1549 -1600

भक्तिकाल के प्रमुख कवि। व्यावहारिक और सरल ब्रजभाषा के प्रयोग के ज़रिए काव्य में भक्ति, नीति, प्रेम और शृंगार के संगम के लिए स्मरणीय।

1556 -1627