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कौन आया है जी?

सहारनपुर जेल के 7 नं० वार्ड में किसी नए कांग्रेसी के आने की ख़बर पाते ही उत्कंठा से मैंने अपने एक साथी से पूछा।

आपका चेला गया है पंडित जी!

कौन चेला?

यशपाल, जिसे आप याद कर रहे थे!

मैं बान बटना बंदकर चौक में पहुँचा, यशपाल खड़ा जेल के कपड़े बदल रहा था। उसे क़ैदी के रूप में देखकर मेरा रोम-रोम खिल उठा। उसने मुझे प्रणाम किया और मैं उसे लिपट गया। आज मेरा 'अध्यापकत्व' कृतार्थ हो गया था। यह 1930 की बात है। तब मैं संस्कृत विद्यालय में अध्यापक था।

मैंने सदा ही यह अनुभव किया था कि उसके दुबले-पतले शरीर में एक बलिष्ठ आत्मा निवास करती है। वास्तव में वह एक फूल था। सरलता के सौंदर्य से उत्फुल्ल और त्याग के सौरभ से सुगंधित। अभी वह खिलने ही लगा था, पर निश्चय ही किसी दिन वह अपना सौंदर्य बखेर कर राष्ट्र के उपवन को खिला देगा और उसकी सौरभ से महक उठेगा राष्ट्रमाता का मंदिर। उसकी प्रथम झाँकी के दर्शकों ने ऐसी ही भविष्यवाणी की थी, पर हाय, उनमें कोई भी जानता था कि यह फूल खिलने नहीं आया, यों ही दो दिन को यहाँ अटक गया है।

जिस हृदय-पात्र को उसके सौरभ की परागमाला से भरने का स्वप्न देखा था, उसके अभाव में आज वह कसक से भर रहा है! कभी-कभी जीवन-मरण का यह खेल कितना दारुण हो उठता है!

वह अपने स्वभाव की मिठास के कारण इतना आकर्षक था कि शीघ्र ही अपने जेल के साथियों के मन चढ़ गया। जेल में मनुष्यता क्षीण हो जाती है। लंबी सजा और सी क्लास; पर वह वहाँ भी सदा सर्वप्रिय रहा। किसी के हिस्से के वह बान बाँट देता, किसी के कपड़े धो देता, बीमारों के पैर दबा देता और किसी को पुस्तक पढ़कर सुना देता। सभी उसे अपने अनुज की तरह प्यार करते थे।

वी क्लास में आने पर मैंने अपना भोजन उसके लिए रिज़र्ब कर दिया था, पर उसने मेरे नाराज़ होने पर भी शायद ही अपने लिए उपयोग किया हो। कभी किसी को दलिया दे देता, कभी चावल और कभी शाक। उसके इस त्याग का महत्त्व केवल वे ही अनुभव कर सकते हैं, जिन्हें उन दिनों कभी भारतीय जेलों की सी क्लास में रहने का अवसर मिला हो।

मैं जब बाहर के चौक से अपना प्रभात का काम पूरा करके लौटता, तो उसे अँगोछे पर चने रखे, बान बटते पाता। उसके चने सदा दो भागों में बटे होते थे। खिले हुए मेरे लिए और रोड़े अपने लिए। मैं उसे इसके लिए डाँटता, तो मुस्कुरा पड़ता। कितनी सात्विक थी उसकी यह मुस्कान!

लेखन-कला पर एक दिन रात में बातें होने लगीं। संस्मरण पर बात छिड़ते ही मैंने कहा—यशपाल! किसी दिन तुम मेरे संस्मरण लिखोगे, तो इस जेलख़ाने की चर्चा ज़रूर करोगे। साधारण भाव से उसने कहा—कौन जानता है आप ही मेरे संस्मरण लिखें। उसकी यह भविष्य वाणी सत्य निकली। अपने इस अभाग्य पर मैं क्या टीका करूँ?

राष्ट्र की दासता, मैंने अनुभव किया, उसके हृदय में सदा काँटे की तरह चुभती थी और उसे मिटाने के लिए जाने वह क्या-क्या सोचा करता था। एक दिन विवाह के आदर्श पर बात चल रही थी। मैंने कहा—यशपाल! तुम्हारा विवाह जाति-पाति, दहेज़ और पर्दे आदि के आडंबरों को छोड़कर करेंगे।

सरलता से उसने कहा—एक तऱफ तो आप मुझे अपनी तहसील के एक परगने में ग्राम-सेवा-आश्रम बसाने का आदेश देते हैं और दूसरी ओर आदर्श विवाह का। क्या राष्ट्र-सेवा और दांपत्य का एक साथ समन्वय हो सकेगा पंडित जी?

मैंने कहा—हाँ हाँ, अच्छी तरह। तुम भी क्या स्त्री को बंधन मानते हो जी?

नहीं बंधन तो नहीं मानता पंडित जी, पर मेरे लिए यह बहुत कठिन भी हो तो भी देश को परिस्थिति में मैं तो विवाह और राष्ट्र-सेवा के समन्वय को ऐसा ही समझता हूँ, जैसे वकालत और सत्याग्रह का समन्वय!

मैंने चौंककर उसकी दृढ़-मुख-मुद्रा की ओर देखा। मेरे मन में आया, ओह! कितना गहरा है यह भोलासा ग्रामीण युवक!

वह श्री देवीकुंड संस्कृत विद्यालय देवबंद का एक विद्यार्थी था, मनस्वी, प्रतिभाशाली और श्रमशील। इतिहास और गणित उसके अध्ययन के मुख्य विषय थे। एक दिन मैं उसे पढ़ा रहा था। देवीकुंड उन्हीं दिनों फिर से खुदाकर नहर के जल से भरा गया था। मैंने कहा—हज़ारों मन जल होगा इसमें यशपाल?

बस, फिर क्या था, एक डोर लेकर वह जुट पड़ा, अठारह बीघे के उस महातालाब का जल तोलने! मैंने उसे मना किया, साथियों ने उसे पागल कहा, पर वह अपनी धुन का बड़ा पक्का था। उसने चालीस जगह से पानी की गहराई नापकर उसका औसत निकाला और गड्ढा खोदकर उसमें पानी भरा, उसे निकाल कर तोला, इस प्रकार पानी के भी वज़न का औसत लिया और पंद्रह-सोलह घंटे की मेहनत के बाद उसने विस्तार पूर्वक एक काग़ज़ पर आँकड़ों से यह सिद्ध किया कि इस तालाब में साढ़े पैंतीस लाख मन (शायद टन) पानी है। हम सबने इस निष्कर्ष को भी उसकी एक गप्प ही कहा, पर बाद में गणित के कई अध्यापकों ने उसके मत का समर्थन कर उसकी इस 'सनक' को महत्व दे दिया था।

उसने देवबंद तहसील के एक ग्राम कुकावी में एक ज़मींदार क्षत्रिय के घर में जन्म लिया था, पर उसके स्वभाव में 'क्षात्र और ब्राह्म' का समन्वय था। साधारणतया वह बहुत नम्र था, पर अत्याचार और अन्याय का ज़ोरदार प्रतिवाद, उसके स्वभाव की विशेषता थी। वह पराधीन भारत की शांति से बहुत कुढ़ता था। अशांति, तूफ़ान और प्रलय के सुख-स्वप्न उसकी आँखों में समाए हुए थे, पर उसमें ज़रा भी उच्छृंखलता थी। उसकी प्रवृत्ति में यौवन का अल्हड़पन और वृद्धत्व की मिली हुई थी। वह गाँव को 'मुक्ति का द्वार' कहा करता था और उसकी इच्छा अपने जीवन को गाँवों के पुनरुत्थान में ही खपा देने की थी।

भाषण में वह धीरे-धीरे, पर ख़ूब गंभीरता से बोलता था और उसके लिखने में ख़ूब प्रवाह होता था। लेखन कला की दृष्टि से भी उसका भविष्य उज्ज्वल था और एक राष्ट्रीय कार्यकर्ता के रूप में भी।

फ़रवरी 1935 के दूसरे सप्ताह में देवबंद तहसील की राजनैतिक कॉन्फ्रेंस में बासंती कुर्ता पहने वह मेरे साथ रात-दिन काम करता रहा। काम के रहते विश्राम उसे याद आता था और अपनी ओर ध्यान देने की कभी उसे फ़ुर्सत ही होती थी। वहीं उसे ठंड लग गई, ज़ुकाम हुआ और बुख़ार भी। तीन दिन के लिए वह घर चला गया, पर वहाँ उसे नमूनिया हो गया। गाँव में यथासंभव उसकी चिकित्सा की गई, पर काल ने उसे छोड़ा और इस प्रकार राष्ट्र के उपवन की यह कली बिना खिले ही मुरझा गई। वह बिना सौरभ बिखराए, बिना इतराए, राष्ट्र के चरणों की धूल में अपने को मिलाकर अपना जन्म सफल कर गया।

मैं अपनी दृष्टि से देखता हूँ, सोचता हूँ—मेरे यशपाल के भाग्य में राष्ट्र की पताका का दंड बनना नहीं था, वह राष्ट्र के नव-निर्माण-मंदिर की नींव में एक ईंट बनकर सदा के लिए जुड़ गया।

यशपाल सिर्फ़ यशपाल था, पर अपनी कर्मनिष्ठ मृत्यु से वह राष्ट्र के उन शत-शत कार्यकर्ताओं का मेरे लिए तो प्रतीक ही हो गया, जिन्होंने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपने जीवन का सर्वोत्तम ही नहीं, अपना सर्वोत्तम जीवन ही अर्पण कर दिया; और यों मूक-निष्काम रहकर कि जैसे उनका जीवन उपयोग या उपभोग की कोई वस्तु होकर, पूजा का एक अक्षत ही था!

स्रोत :
  • पुस्तक : दीप जले, शंख बजे (पृष्ठ 191)
  • रचनाकार : कन्हैलाल मिश्र 'प्रभाकर'
  • प्रकाशन : भारतीय ज्ञानपीठ
  • संस्करण : 1951

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