पंडितजी को गाँधीजी से जितनी घृणा थी, खद्दर, हरिजन और रामनाम से उतना ही प्रेम था। प्रतिदिन सवेरे वह रामचरितमानस का हारमोनियम पर सस्वर पाठ करते थे और सप्ताह में एक दिन हरिजन-निवास जाकर साबुन बाँटते थे। मोटे खद्दर की क़मीज़ और चुन्नटदार धोती, यह उनकी पोशाक थी। और उनकी बड़ी-बड़ी आँखें सदा निराशा, क्रोध और अभिमान से उबलती रहती थीं। उनकी त्वचा का रंग अब तप गया था और कर्जन-कट मूँछें खिचड़ी हो चली थीं।
1920 में ही उन्होंने सरकारी नौकरी को लात मार दी थी और जब भरी जवानी में उनकी पत्नी चल बसी तो फिर उन्होंने विवाह भी नहीं किया। उन्हें विश्वास था कि ऐसा करके उन्होंने देश के लिए अपूर्व त्याग किया है, परंतु एहसान-फ़रामोश कांग्रेस ने उनके इस दावे को स्वीकार नहीं किया। उसने उनकी महत्त्वाकांक्षाओं की हत्या कर दी और उनका अंतर्मन तिक्त कटुता से भर उठा।
मेरे एक दीवार के पड़ोसी थे। वास्तव में मैं उन्हीं के मकान में रहता था। जैसे ही मैं सवेरे लिखना शुरू करता, वह हारमोनियम पर 'सियावर रामचंद्र पद जय शरणम्' का राग अलापना आरंभ कर देते। स्वर सुरीला होता तो संगीत का लोभी मेरा मन उस अत्याचार को सह जाता, परंतु उनका विश्वास था कि भगवान केवल भाव के भूखे हैं, स्वर की चिंता नहीं करते। भगवान भगवान हैं, मैं उनके समकक्ष होने की स्पर्धा नहीं कर सकता, इसलिए मुझे कई बार उन्हें युद्ध की चुनौती देनी पड़ी। वह फिर भी नहीं माने और एक दिन नियमित वाग्युद्ध के बाद मैंने तीव्र होकर उनसे कहा, मैं आपसे बोलना तक नहीं चाहता।
वह बोले, तो मैं ही कब चाहता हूँ। अब कभी नहीं बोलूँगा, कभी भी नहीं।
लेकिन तीसरे ही दिन पाता हूँ कि छत पर से झाँककर वह मुझे पुकार रहे है, वायू विष्णु, इधर सुनो।
मैं तुरंत भाँप गया कि यह किसी विस्फ़ोट की भूमिका है। एकाएक निर्णय न कर सका कि बोलूँ या न बोलूँ कि वह फिर बोल उठे, भगवान मेरा जाने, गांधी और नेहरू दोनों गद्दार हैं।
उनके स्वर में असीम कड़वाहट थी। वह क्रोध से काँप रहे थे। मैं जान बूझकर मुस्कुराया। पूछा, क्या बात हुई?
बात क्या होती, जब देखो च्यांगकाई शेक की तारीफ़ करते हैं। वह अव्वल नंबर का शैतान और अँग्रेज़ों का आदमी है। मैं कहता हूँ, भगवान मेरा जाने, यह गाँधी और नेहरू, ये दोनों ही अँग्रेज़ों के जासूस है। असल में अँग्रेज़ चाणक्य हैं। पहले इन्होंने धर्म को बिगाड़ा। दयानंद इन्हीं का दूत था। हिंदू धर्म का वह नाश किया कि पुनरुद्धार की कोई आशा नहीं। अब राजनीति को भ्रष्ट करने के लिए गांधी को भेजा है। भगवान मेरा जाने, मैं सच कहता हूँ, लंदन में बैठा चर्चिल मेरे बारे में जानता है। यहाँ तक जानता है कि इस समय पंडितजी बाबू विष्णु को हमारी असलियत समझा रहे हैं।
और फिर सदा की भाँति वह आध घंटा तक धारा प्रवाह बोलते रहे। यह मानते थे कि मैं उनका किराएदार हूँ। मुझे उनकी बातें सुननी ही चाहिए। जब थक गए तो पूछा, हाँ, तुम्हारी क्या राय है? गांधी को तुम अब भी महात्मा मानते हो।
उनके प्रलाप को मैंने कभी गंभीरता से नहीं लिया। इसलिए उनसे प्रश्न का उत्तर न दे सका। वह क्रोध से पागल हो उठे। उनकी बड़ी-बड़ी आँखें फिर दहक आईं। बोले, तुम्हें बातें करने की तमीज़ नहीं है। एक शरीफ़ आदमी तुम्हारे पास आकर तुमसे प्रश्न करता है और तुम उत्तर भी नहीं देना चाहते। मैं नहीं समझता था कि तुम इतने असंस्कृत हो, नहीं तो।
नहीं तो? मैंने एकाएक क्रुद्ध होकर पूछा।
लेकिन तब तक वह जीना उतर चुके थे। केवल पृथ्वी पर जो पदा घात हुआ था, वही वायुमंडल में गूँज रहा था। मैंने क्रुद्ध कंपित स्वर में, मानों उन्हें सुनाकर कहा, नहीं तो मकान में नहीं रहने देता, यही न? रहना ही कौन चाहता है! मैं कल ही यह मकान छोड़ दूँगा।
मन अत्यंत बोझिल हो आया। लेकिन कल तो काल का प्रतीक है। और काल हैं निरवधि। वह कल आने के पूर्व ही एक दिन एक ऐसी घटना हो गई कि जिसके कारण सारी परिस्थिति बदल गई। उस दिन मेरे एक संबंधी के घर पर मित्र-भोज था। जब वहाँ से लौटा तो रात का एक बज चुका था। तुरंत सोने के लिए लेट गया, मानों आँखों में युग-युग की नींद भरी हो। लेकिन पलक झपकी ही थी कि सुना कोई पुकार रहा है, बाबू विष्णुदत्त, बाबू विष्णुदत्त!
अवश्य ही पंडितजी हैं। इनका सर्वनाश हो, सोने भी नहीं देते। पुकारे जाओ, मैं नहीं आऊँगा, नहीं आऊँगा।
स्वर फिर गूँजा, सुनते नहीं, बाबू साहब नीचे आइए। यह तो पंडितजी नहीं हैं।... निमिष मात्र में आँखें मलकर उठ बैठता हूँ। देखता हूँ, काफ़ी अँधेरा है। आसमान में तारे जगमगा रहे हैं और नीचे ठीक मेरे घर के सामने दो दर्जन पुलिस वाले खड़े हैं।...
सबकुछ समझ गया। परसों ही स्थानीय सी. आई. डी. वाला कह गया था, तलाशी आने वाली है, बाबूसाहब। सो वह आ गई है। सौभाग्य से घर में छोटे भाई के अतिरिक्त उस समय और कोई नहीं था। दोनों को बाहर निकालकर पुलिस इंस्पेक्टर ने द्वार पर ताला लगा दिया। कहीं और जाना था, इसलिए छः सिपाही और एक हवलदार को छोड़कर वे चले गए। ये लोग मुझे घेर कर बैठ गए। तभी मैंने देखा कि मौहल्ले में हलचल पैदा हो गई है। सभी अचरज, भय और आशंका से जैसे हत्प्रभ रह गए हों। धड़कते हृदय से किवाड़ों के बीच से झाँकते हैं और फिर एक झटके के साथ पीछे हट जाते हैं। शायद वे सोच रहे हैं कि बाबू विष्णु ने गबन किया है या डाका डाला है या शायद क्रांतिकारी है। तरह-तरह के लोग इसके पास आते हैं...।
कई क्षण इसी उलझन में बीत गए। फिर गली में आवागमन होने लगा। मैं उन सबको जानता था। उनमें कई मित्र थे। पर उस क्षण जैसे मैं उन सबकी दृष्टि में अपराधी हो उठा। कुछ ने मेरे पास आते-आते अपनी आँखों पर अपरिचय का आवरण डाल लिया। कुछ हवलदार साहब की ओर मुड़े और झुक कर बोले, आदाबअर्ज है हवलदार साहब, बंदगी हुज़ूर।
पुलिस की जिस पर कृपा हो वह सभ्य नागरिकों की घृणा का पात्र ही हो सकता है। परंतु उसी समय मेरे कानों में एक चिर-परिचित स्वर गूँज उठा। कौतूहल से आँखें उठाकर देखता हूँ कि छड़ी घुमाते और पदाधात से वातावरण को कंपित करते हुए पंडितजी सैर से लौट आए हैं। वहीं मोटे खद्दर की क़मीज़, वही मोटी चुन्नटदार धोती और बही आँखों से झरती अभिमान भरी शाश्वत चुनौती। इस बार मैंने चाहा कि आँखें बंद कर लूँ। पर वह पुकार उठे, अरे विष्णु-बाबू, यह क्या?
बस अब अग्नि प्रज्वलित हो उठी। हवलदार की ओर मुड़कर बोले, क्या बात है? क्यों तलाशी लेते हो? ये तो सरकारी नौकर है, तुम्हारे भाई।...
फिर सहसा रुके। पूछा, कोई महकमे का झगड़ा है या राजनीति का है?
हवलदार ने सहजभाव से कहा, कोई सयासी मामला है।
तो फिर मेरी तलाशी लो। मैं पच्चीस साल से विद्रोही हूँ। मेरी ओर कोई उँगली भी नहीं उठाता। भगवान मेरा जाने, सरकार कैसी विचित्र है, जो उसका सिर फोड़ते हैं, उनसे वह काँपती है और जो उसकी ग़ुलामी करते हैं उनको वह सताती है!
हवलदार अब भी क्रुद्ध नहीं हुआ। धीरे-से बोला, लाला साहब, हम तो हुक्म के बंदे हैं। सरकार ने कहा, चले आए। हमें कुछ नहीं मालूम।
भगवान मेरा जाने, तुम्हारा कोई अपराध नहीं है। तुम तो ग़ुलाम हो।
जैसे सहसा धक्का लगा हो। तीव्र होकर बोले, लेकिन तुम ग़ुलाम क्यों बने? क्या तुम नहीं जानते कि ग़ुलामी सबसे बड़ा पाप है?
और मुड़कर मुझसे कहा, खड़े हो जाओ। क्या तुमने किसी की हत्या की है, डाका डाला है? उठो, शौचादि जाओ। मैं तब तक दूध गर्म करता हूँ।
मैंने नम्रता से कहा, पंडितजी, मैं यहीं ठीक हूँ। आप चिंता न करें।
पंडितजी तिलमिला उठे, तुम बुज़दिल हो।
मुझे क्रोध नहीं आया, हँसी आई। पूर्वतः कहा, नियम-विधान जो हैं, उनकी अवहेलना करना ठीक नहीं।
वह बोले, जो नियम का दास है, वही क़ायर है। भगवान मेरा जाने, नियम के नाम पर ये चालीस करोड़ इंसान कैसे कुत्तों की तरह अँग्रेज़ों के तलुवे चाटते हैं।
और फिर एकबार हवलदार की ओर मुड़े, देखो जी, तुमने जो लाल पगड़ी बाँधी है, वह क्रांति का रंग है और तुम हो कि सफ़ेद चमड़ी देखते ही ठंडे पड़ जाते हो।...
तभी शेष लोग लौट आए। जब तलाशी का काम शुरू हो गया तो पंडितजी चुपचाप ऊपर चले गए और तन्मय होकर रामायण का पाठ करने लगे। उधर थानेदार ने मेरी चूरन की शीशियों में बम बनाने का मसाला ढूँढ़ना आरंभ कर दिया। जब उन्होंने मंजन को चख़ कर देखा तो मैं अपनी हँसी न रोक सका। वह बोले हँसिए नहीं, क्रांतिकारी लोग पोटास का मंजन किया करते हैं।
उन्होंने आटा, दाल, घी, तेल, सभी की परीक्षा की। लकड़ियों के ढेर में पूरे एक घंटे तक उलझे रहे। लाइब्रेरी में पहुँचे तो एक के बाद एक अलमारी और दराज़ खोल डाली और पुराने टिकटों तथा पत्रों में क्रांति का घोषणा-पत्र ढूँढ़ने लगे। वहीं सहसा मेरी डायरी हाथ लग गई। उसे खोलते न खोलते वह लगभग चिल्लाकर अपने साथी से बोले, आख़िर पकड़े गए। देखो, यह क्या लिखा है।
साथी ज़ोर से पढ़ने लगे, भगतसिंह को आज फाँसी पर लटका दिया गया, इत्यादि। पढ़ चुके तो एक क्षण कुछ सोचा। फिर कहा, केवल समाचार है, कुछ नहीं बन सकता।
थानेदार हताश नहीं हुए। पूछा, तुम्हारे पास चाँद का फाँसी अंक है?
जी नहीं।
पंडितजी के पास होगा? वे क्रांतिकारी हैं और तुम्हारे मित्र भी।
मेरा चेहरा तमतमा आया। कहा, सुन नहीं रहे, रामायण का पाठ कर रहे हैं। क्रांतिकारी क्या ऐसे होते हैं?
बिल्कुल ऐसे ही। थानेदार मुस्कुराकर बोले, मेरे कई क्रांतिकारी मित्र मंदिर में पूजा किया करते हैं। आप भी तो आर्यसमाजी हैं।
फिर एकाएक पूछा, यशपाल को जानते हो? क्रांतिकारी यशपाल, जो लेखक भी हैं। आप तो ऐसे देख रहे हैं जैसे नाम भी न सुना हो और यह पैड उनका यहाँ पड़ा है। इस बार शायद भूल गए।
उनके हाथ में सचमुच एक लैटरपैड था। मुझे उन पर दया आई। मुस्कुराकर कहा, यह तो यशपाल जैन का पैड है। यह मेरे मित्र हैं और दिल्ली में रहते हैं।
क्षण भर के लिए उनका मुख जैसे धूमिल हो उठा। लेकिन पराजित होना उन्होंने नहीं सीखा था। छत पर जा पहुँचे। झाँककर पंडितजी को देखा। पाठ बंद हो चुका था और वह रसोईघर में थे। बोले, बिल्कुल अकेले हैं। क्रांति करने की पूरी तैयारी है।
मैंने कहा, इनके पिता ज़िलेदार थे और चाचा थानेदार। थानेदार हँस पड़े, इसी कारण तो बचे हुए हैं और अब आप भी बच गए। सोचता हूँ कि जब आप क़ानून की पकड़ में नहीं आते तो व्यर्थ ही क्यों कष्ट दिया जाए।
फिर मुस्कुराकर धीरे से बोले, मैं भी तो आर्यसमाजी हूँ। लीजिए हस्ताक्षर कर दीजिए। लेकिन पंडितजी का ध्यान रखिए।
मैं बोला, आप क्या कह रहे हैं? मैं तो उन्हें पागल समझता हूँ। वह हँस पड़े, पागल ही तो क्रांति किया करते हैं। उन्हें डर नहीं होता।
और वे चले गए। मैं अस्त-व्यस्त घर में बैठ कर सोचने लगा कि पंडितजी मेरी दृष्टि में पागल हैं, पुलिस की दृष्टि में क्रांतिकारी। लेकिन क्या प्रलाप करना ही क्रांति है? कभी धर्म, कभी राजनीति, कभी साहित्य। अभी उस दिन रामचरितमानस में 'ण' के स्थान पर 'न' और 'श' के स्थान पर 'स' के प्रयोग को लेकर कितने उत्तेजित हो उठे थे। भगवान मेरा जाने, हिंदी भाषा की यही दो विशेषताएँ हैं और इन्हीं को हिंदी वाले मिटाने पर तुले हुए हैं। अँग्रेज़ों के ग़ुलाम अपनी भाषा और संस्कृति, सबको भ्रष्ट कर रहे हैं।
तभी देखता हूँ कि पंडितजी स्वयं वहाँ आ खड़े हुए हैं। उनकी आँखों में दीप्ति है और मुख पर गर्वीली मुस्कान। बोले, भई, ऐसे क्यों बैठे हो? उठो, मैंने खीर बनाई है। भगवान मेरा जाने, आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ। अब यहाँ दो क्रांतिकारी रहते हैं।
कहते-कहते वह हँसे, दो क्रांतिकारी! साले जानते नहीं, अब भारत का बच्चा-बच्चा क्रांतिकारी बनेगा। उन्हें खुद क्रांतिकारी बनना होगा। भगवान मेरा जाने, बाबू विष्णु, ये पुलिसवाले साले बम्ब बनाने और डाका डालने वालों को ही क्रांतिकारी समझते हैं। सच्चा क्रांतिकारी वह है, जिसने डर को जीत लिया है, जो अन्याय के सामने झुकने से इंकार कर देता है। मुझे ख़ुशी है कि तुम नहीं डरे।
फिर सदा की भाँति पंडितजी क्रांतिकारी की न समाप्त होने वाली व्याख्या करने में प्रवृत्त हो गए। परंतु उस दिन मैं उनका तनिक भी विरोध न कर सका। तब भी नहीं कर सका जब उन्होंने कहा, अरे भाई, तुमने देखा, इस बार तो जवाहरलाल ने कुछ समझ की बात कही है।
मैं हँसकर बोला, सच?
हाँ, भगवान मेरा जाने, मैंने इस बार बहुत लंबा पत्र लिखा था और उसने अपना नया वक्तव्य उसी के आधार पर दिया है। वाक्य-के-वाक्य मेरे हैं।
विस्मित-विमूढ़, मैंने दृष्टि उठाई। पाया कि उनकी आँखें विजय-गर्व से चमकने लगी हैं। उस गर्व को खंडित करने का साहस में कैसे कर सकता था?
मेरी दृष्टि झुक गई।
panDitji ko gandhiji se jitni ghrina thi, khaddar, harijan aur ramnam se utna hi prem tha. pratidin savere wo ramachrit manas ka harmoniyam par sasvar paath karte the aur saptah mein ek din harijan nivas jakar sabun bantte the. mote khaddar ki qamiz aur chunnatdar dhoti, ye unki poshak thi. aur unki baDi baDi ankhen sada nirasha, krodh aur abhiman se ubalti rahti theen. unki tvacha ka rang ab tap gaya tha aur karjan kat munchhen khichDi ho chali theen.
1920 mein hi unhonne sarkari naukari ko laat maar di thi aur jab bhari javani mein unki patni chal basi to phir unhonne vivah bhi nahin kiya. unhen vishvas tha ki aisa karke unhonne desh ke liye apurv tyaag kiya hai, parantu ehsaan faramosh kangres ne unke is dave ko svikar nahin kiya. usne unki mahattvakankshayon ki hatya kar di aur unka antarman tikt katuta se bhar utha.
mere ek divar ke paDosi the. vastav mein main unhinke makan mein rahta tha. jaise hi main savere likhna shuru karta, wo harmoniyam par siyavar ramchandr pad jay sharnam ka raag alapna arambh kar dete. svar surila hota to sangit ka lobhi mera man us atyachar ko sah jata, parantu unka vishvas tha ki bhagvan keval bhaav ke bhukhe hain, svar ki chinta nahin karte. bhagvan bhagvan hain, main unke samkaksh hone ki spardha nahin kar sakta, isliye mujhe kai baar unhen yuddh ki chunauti deni paDi. wo phir bhi nahin mane aur ek din niymit vagyuddh ke baad mainne teevr hokar unse kaha, main aapse bolna tak nahin chahta.
wo bole, to mein hi kab chahta hoon. ab kabhi nahin bolunga, kabhi bhi nahin.
lekin tisre hi din pata hoon ki chhat par se jhankakar wo mujhe pukar rahe hai, vayu vishnu, idhar suno.
main turant bhaanp gaya ki ye kisi visfot ki bhumika hai. eka ek nirnay na kar saka ki bolu ya na bolu ki wo phir bol uthe, bhagvan mera jane, gandhi aur nehru donon gaddar hain.
unke svar mein ghasaum kaDvahat thi. wo krodh se kaanp rahe the. main baan bujhkar muskuraya. puchha, kya baat hui?
baat kya hoti, jab dekho chyangkai shek ki tariph karte hain. wo avval nambar ka shaitan aur angrezon ka adami hai. main kahta hoon, bhagvan mera jane, ye gandhi aur nehru, ye donon hi angrezon ke jasus hai. asal mein angrez chanakya hain. pahle inhonne dharm ko bigaDa. dayanand inhin ka doot tha. hindu dharm ka wo naash kiya ki punruddhar ki koi aasha nahin. ab rajaniti ko bhrasht karne ke liye gandhi ko bheja hai. bhagvan mera jane, main sach kahta hoon, landan mein baitha chachil mere bare mein janta hai. yahan tak janta hai ki is samay panDitji babu vishnu ko hamari asliyat samjha rahe hain.
aur phir sada ki bhanti wo aadh ghanta tak dhara pravah bolte rahe. ye mante the ki main unka kirayedar hoon. mujhe unki baten sunni hi chahiye. jab thak ge to puchha, haan, tumhari kya raay hai? gandhi ko tum ab bhi mahatma mante ho.
unke pralap ko mainne kabhi gambhirta se nahin liya. isliye unse parashn ka uttar na de saka. wo krodh se pagal ho uthe. unki baDi baDi ankhen phir dahak ain. bole, tumhen baten karne ki tamiz nahin hai. ek sharif adami tumhare paas aakar tumse parashn karta hai aur tum uttar bhi nahin dena chahte. main nahin samajhta tha ki tum itne asanskrit ho, nahin to.
nahin to? mainne ekayek kruddh hokar puchha.
lekin tabtak wo jina utar chuke the. keval prithvi par jo pada ghaat hua tha, vahi vayumanDal mein goonj raha tha. mainne kruddh kampit svar mein, manon unhen sunakar kaha, nahin to makan mein nahin rahne deta, yahi na? rahna hi kaun chahta hai! main kal hi ye makan chhoD dunga.
man atyant bojhil ho aaya. lekin kal to kaal ka pratik hai. aur kaal hain niravdhi. wo kal aane ke poorv hi ek din ek aisi ghatna ho gai ki jiske karan sari paristhiti badal gai. us din mere ek sambandhi ke ghar par mitr bhoj tha. jab vahan se lauta to raat ka ek baj chuka tha. turant sone ke liye let gaya, manon ankhon mein yug yug ki neend bhari ho. lekin palak jhapki hi thi ki suna koi pukar raha hai, babu vishnudatt, babu vishnudatt!
avashya hi panDitji hain. inka sarvanash ho, sone bhi nahin dete. pukare jao, main nahin auunga, nahin auunga.
svar phir gunja, sunte nahin, babu sahab niche aaie. ye to panDitji nahin hain. . . . nimish maatr mein ankhen malkar uth baithta hoon. dekhta hoon, kafi andhera hai. asman mein tare jagmaga rahe hain aur niche theek mere ghar ke samne do darjan pulis vale khaDe hain. . . . . .
sabkuchh samajh gaya. parson hi sthaniy see० ai० Dee० vala kah gaya tha, talashi aane vali hai, babusahab. so bah aa gai hai. saubhagya se ghar mein chhote bhai ke atirikt us samay aur koi nahin tha. donon ko bahar nikalkar pulis inspektar ne dvaar par tala laga diya. kahin aur jana tha, isliye chhः sipahi aur ek havaldar ko chhoDkar ve chale ge. ye log mujhe gher kar baith ge. tabhi mainne dekha ki mauhalle mein halchal paida ho gai hai. sabhi achraj, bhay aur ashanka se jaise hasprabh rah ge hon. ghaDakte hriday se kivaDon ke beech se jhankte hain aur phir ek jhatke ke saath pichhe hat jate hain. shayad ve soch rahe hain ki babu vishnu ne gaban kiya hai ya Daka Dala hai ya shayad krantikari hai. tarah tarah ke log iske paas aate hain.
kai kshan isi uljhan mein beet ge. phir gali mein avagaman hone laga. main un sabko janta tha. unmen kai mitr the. par us kshan jaise main un sabki drishti mein apradhi ho utha. kuch ne mere paas aate aate apni ankhon par aprichay ka avran Daal liya. kuch havaldar sahab ki or muDe aur jhuk kar bole, adabarj hai havaldar sahab, bandagi huzur. .
pulis ki jis par kripa ho wo sabhya nagarikon ki ghrina ka paatr hi ho sakta hai. parantu usi samay mere kanon mein ek chir parichit svar goonj utha. kautuhal se ankhen uthakar dekhta hoon ki chhaDi ghumate aur padadhat se vatavran ko kanpit karte hue panDitji sair se laut jaye hain. vahin mote khaddar ki qamiz, vahi moti chunnatdar ghoti aur bahi ankhon se jharti abhiman bhari shashvat chunauti. is vaar mainne chaha ki ankhen band karlun. par wo pukar uthe, are vishnu babu, ye kyaa?
mainne barbas muskrakar kaha, meri talashi hogi. tumhari talashi! kya kahte ho?
bas ab agni prajvalit ho uthi. havaldar ki or muDkar bole, baya baat hai? kyon talashi lete ho? ye to sarkari naukar hai, tumhare bhai. . . .
phir sahsa ruke. puchha, koi mahkame ka jhagDa hai ya rajaniti ka hai?
havaldar ne sahajbhav se kaha, koi sayasi mamla hai.
to phir meri talashi lo. main pachchis saal se vidrohi hoon. meri or koi ungli bhi nahin uthata. bhagvan mera jane, sarkar kaisi vichitr hai, jo uska sir phoDte hain, unse wo kanpti hai aur jo uski ghulami karte hain unko wo satati hai!
havaldar ab bhi kruddh nahin hua. dhire se bola, lala sahab, hum to hukm ke bande hain. sarkar ne kaha, chale aaye. hamein kuch nahin malum.
bhagvan mera jane, tumhara koi apradh nahin hai. tum to ghulam ho.
jaise sahsa dhakka laga ho. teevr hokar bole, lekin tum ghulam kyon bane? kya tum nahin jante ki ghulami sabse baDa paap hai?
aur muDkar mujhse kaha, khaDe ho jao. kya tumne kisi ki hatya ki hai, Daka Dala hai? utho, shauchadi jao. main tab tak doodh garm karta hoon.
mainne namrata se kaha, panDitji, main yahin theek hoon. aap chinta na karen.
wo bole, jo niyam ka daas hai, vahi qayar hai. bhagvan mera jane, niyam ke naam par ye chalis karoD insaan kaise kutton ki tarah angrezon ke taluve chatte hain.
aur phir ekbaar havaldar ki or muDe, dekho ji, tumne jo laal pagDi bandhi hai, wo kranti ka rang hai aur tum ho ki safed chamDi dekhte hi thanDe paD jate ho. . . .
tabhi shesh log laut aaye. jab talashi ka kaam shuru ho gaya to panDitji chupchap uupar chale ge aur tanmay hokar ramayan ka paath karne lage. udhar thanedar ne meri churan ki shishiyon mein banm banane ka masala DhunDhana arambh kar diya. jab unhonne manjan ko chakh kar dekha to main apni hansi na rok saka. wo bole hansiye nahin, krantikari log potas ka manjan kiya karte hain.
unhonne aata, daal, ghi, tel, sabhi ki pariksha ki. lakaDiyon ke Dher mein pure ek ghante tak uljhe rahe. laibreri mein pahunche to ek ke baad ek almari aur daraz khol Dali aur purane tikton tatha patron mein kranti ka ghoshna patr DhunDhane lage. vahin sahsa meri Dayri haath lag gai. use kholte na kholte wo lagbhag chillakar apne sathi se bole, akhir pakDe ge. dekho, ye kya likha hai.
sathi zor se paDhne lage, bhagatsinh ko aaj phansi par latka diya gaya, ityadi. paDh chuke to ek kshan kuch socha. phir kaha, keval samachar hai, kuch nahin ban sakta.
panDitji ke paas hoga? ve krantikari hain aur tumhare mitr bhi.
mera chehra tamtama aaya. kaha, sun nahin rahe, ramayan ka paath kar rahe hain. krantikari kya aise hote hain ?
bilkul aise hi. thanedar muskurakar bole, mere kai krantikari mitr mandir mein puja kiya karte hain. aap bhi to aryasmaji hain.
phir ekayek puchha, yashpal ko jante ho? krantikari yashpal, jo lekhak bhi hain. aap to aise dekh rahe hain jaise naam bhi na suna ho aur ye paiD unka yahan paDa hai. is baar shayad bhool ge.
unke haath mein sachmuch ek laitarpaiD tha. mujhe un par vaya aai. muskurakar kaha, yah to yashpal jain ka paiD hai. ye mere mitr hain aur dilli mein rahte hain.
kshan bhar ke liye unka mukh jaise dhumil ho utha. lekin parajit hona unhonne nahin sikha tha. chhant par ja pahunche. jhankakar panDitji ko dekha. paath band ho chuka tha aur wo rasoighar mein the. bole, bilkul akele hain. kranti karne ki puri taiyari hai.
mainne kaha, inke pita ziledar the aur chacha thanedar. thanedar hans paDe, isi karan to bache hue hain aur ab aap bhi bach ge. sochta hoon ki jab aap qanun ki pakaD mein nahin aate to vyarth hi kyon kasht diya jaye.
phir muskurakar dhire se bole, main bhi to aryasmaji hoon. lijiye hastakshar kar dijiye. lekin panDitji ka dhyaan rakhiye.
main bola, aap kya kah rahe hain? main to unhen pagal samajhta hoon. wo hans paDe, pagal hi to kranti kiya karte hain. unhen Dar nahin hota.
aur ve chale ge. main ast vyast ghar mein baith kar sochne laga ki panDitji meri drishti mein pagal hain, pulis ki drishti mein krantikari. lekin kya pralap karna hi kranti hai? kabhi dharm, kabhi rajaniti, kabhi sahitya. abhi us din ramacharitmanas mein na ke sthaan par na aur sha ke sthaan par sa ke prayog ko lekar kitne uttejit ho uthe the. bhagvan mera jane, hindi bhasha ki yahi do visheshtayen hain aur inhin ko hindi vale mitane par tule hue hain. angrezon ke ghulam apni bhasha aur sanskriti, sabko bhrasht kar rahe hain.
tabhi dekhta hoon ki panDitji svayan vahan aa khaDe hue hain. unki ankhon mein dipti hai aur mukh par garvili muskan. bole, bhai, aise kyon baithe ho? utho, mainne kheer banai hai. bhagvan mera jane, aaj main bahut prasann hoon. ab yahan do krantikari rahte hain.
kahte kahte wo hanse, do krantikari! sale jante nahin, ab bharat ka bachcha bachcha krantikari banega. unhen khud krantikari banna hoga. bhagvan mera jane, babu vishnu, ye pulis vale sale vamb banane aur Daka Dalne valon ko hi krantikari samajhte hain.
sachcha krantikari wo hai, jisne Dar ko jeet liya hai, jo anyay ke samne jhukne se inkaar kar deta hai. mujhe khushi hai ki tum nahin Dare.
phir sada ki bhanti panDitji krantikari ki na samapt hone vali vyakhya karne mein prvritt ho ge. parantu us din mein unka tanik bhi virodh na kar saka. tab bhi nahin kar saka jab unhonne kaha, are bhai, tumne dekha, is baar to javaharlal ne kuch samajh ki baat kahi hai.
main hans kar bola, sach?
haan, bhagvan mera jane, mainne is baar bahut lamba patr likha tha aur usne apna naya vaqtavya usi ke adhar par diya hai. vakya ke vakya mere hain.
vismit vimuDh, mainne drishti uthai. paya ki unki ankhen vijay garv se chamakne lagi hain. us garv ko khanDit karne ka sahas mein kaise kar sakta tha?
meri drishti jhuk gai.
panDitji ko gandhiji se jitni ghrina thi, khaddar, harijan aur ramnam se utna hi prem tha. pratidin savere wo ramachrit manas ka harmoniyam par sasvar paath karte the aur saptah mein ek din harijan nivas jakar sabun bantte the. mote khaddar ki qamiz aur chunnatdar dhoti, ye unki poshak thi. aur unki baDi baDi ankhen sada nirasha, krodh aur abhiman se ubalti rahti theen. unki tvacha ka rang ab tap gaya tha aur karjan kat munchhen khichDi ho chali theen.
1920 mein hi unhonne sarkari naukari ko laat maar di thi aur jab bhari javani mein unki patni chal basi to phir unhonne vivah bhi nahin kiya. unhen vishvas tha ki aisa karke unhonne desh ke liye apurv tyaag kiya hai, parantu ehsaan faramosh kangres ne unke is dave ko svikar nahin kiya. usne unki mahattvakankshayon ki hatya kar di aur unka antarman tikt katuta se bhar utha.
mere ek divar ke paDosi the. vastav mein main unhinke makan mein rahta tha. jaise hi main savere likhna shuru karta, wo harmoniyam par siyavar ramchandr pad jay sharnam ka raag alapna arambh kar dete. svar surila hota to sangit ka lobhi mera man us atyachar ko sah jata, parantu unka vishvas tha ki bhagvan keval bhaav ke bhukhe hain, svar ki chinta nahin karte. bhagvan bhagvan hain, main unke samkaksh hone ki spardha nahin kar sakta, isliye mujhe kai baar unhen yuddh ki chunauti deni paDi. wo phir bhi nahin mane aur ek din niymit vagyuddh ke baad mainne teevr hokar unse kaha, main aapse bolna tak nahin chahta.
wo bole, to mein hi kab chahta hoon. ab kabhi nahin bolunga, kabhi bhi nahin.
lekin tisre hi din pata hoon ki chhat par se jhankakar wo mujhe pukar rahe hai, vayu vishnu, idhar suno.
main turant bhaanp gaya ki ye kisi visfot ki bhumika hai. eka ek nirnay na kar saka ki bolu ya na bolu ki wo phir bol uthe, bhagvan mera jane, gandhi aur nehru donon gaddar hain.
unke svar mein ghasaum kaDvahat thi. wo krodh se kaanp rahe the. main baan bujhkar muskuraya. puchha, kya baat hui?
baat kya hoti, jab dekho chyangkai shek ki tariph karte hain. wo avval nambar ka shaitan aur angrezon ka adami hai. main kahta hoon, bhagvan mera jane, ye gandhi aur nehru, ye donon hi angrezon ke jasus hai. asal mein angrez chanakya hain. pahle inhonne dharm ko bigaDa. dayanand inhin ka doot tha. hindu dharm ka wo naash kiya ki punruddhar ki koi aasha nahin. ab rajaniti ko bhrasht karne ke liye gandhi ko bheja hai. bhagvan mera jane, main sach kahta hoon, landan mein baitha chachil mere bare mein janta hai. yahan tak janta hai ki is samay panDitji babu vishnu ko hamari asliyat samjha rahe hain.
aur phir sada ki bhanti wo aadh ghanta tak dhara pravah bolte rahe. ye mante the ki main unka kirayedar hoon. mujhe unki baten sunni hi chahiye. jab thak ge to puchha, haan, tumhari kya raay hai? gandhi ko tum ab bhi mahatma mante ho.
unke pralap ko mainne kabhi gambhirta se nahin liya. isliye unse parashn ka uttar na de saka. wo krodh se pagal ho uthe. unki baDi baDi ankhen phir dahak ain. bole, tumhen baten karne ki tamiz nahin hai. ek sharif adami tumhare paas aakar tumse parashn karta hai aur tum uttar bhi nahin dena chahte. main nahin samajhta tha ki tum itne asanskrit ho, nahin to.
nahin to? mainne ekayek kruddh hokar puchha.
lekin tabtak wo jina utar chuke the. keval prithvi par jo pada ghaat hua tha, vahi vayumanDal mein goonj raha tha. mainne kruddh kampit svar mein, manon unhen sunakar kaha, nahin to makan mein nahin rahne deta, yahi na? rahna hi kaun chahta hai! main kal hi ye makan chhoD dunga.
man atyant bojhil ho aaya. lekin kal to kaal ka pratik hai. aur kaal hain niravdhi. wo kal aane ke poorv hi ek din ek aisi ghatna ho gai ki jiske karan sari paristhiti badal gai. us din mere ek sambandhi ke ghar par mitr bhoj tha. jab vahan se lauta to raat ka ek baj chuka tha. turant sone ke liye let gaya, manon ankhon mein yug yug ki neend bhari ho. lekin palak jhapki hi thi ki suna koi pukar raha hai, babu vishnudatt, babu vishnudatt!
avashya hi panDitji hain. inka sarvanash ho, sone bhi nahin dete. pukare jao, main nahin auunga, nahin auunga.
svar phir gunja, sunte nahin, babu sahab niche aaie. ye to panDitji nahin hain. . . . nimish maatr mein ankhen malkar uth baithta hoon. dekhta hoon, kafi andhera hai. asman mein tare jagmaga rahe hain aur niche theek mere ghar ke samne do darjan pulis vale khaDe hain. . . . . .
sabkuchh samajh gaya. parson hi sthaniy see० ai० Dee० vala kah gaya tha, talashi aane vali hai, babusahab. so bah aa gai hai. saubhagya se ghar mein chhote bhai ke atirikt us samay aur koi nahin tha. donon ko bahar nikalkar pulis inspektar ne dvaar par tala laga diya. kahin aur jana tha, isliye chhः sipahi aur ek havaldar ko chhoDkar ve chale ge. ye log mujhe gher kar baith ge. tabhi mainne dekha ki mauhalle mein halchal paida ho gai hai. sabhi achraj, bhay aur ashanka se jaise hasprabh rah ge hon. ghaDakte hriday se kivaDon ke beech se jhankte hain aur phir ek jhatke ke saath pichhe hat jate hain. shayad ve soch rahe hain ki babu vishnu ne gaban kiya hai ya Daka Dala hai ya shayad krantikari hai. tarah tarah ke log iske paas aate hain.
kai kshan isi uljhan mein beet ge. phir gali mein avagaman hone laga. main un sabko janta tha. unmen kai mitr the. par us kshan jaise main un sabki drishti mein apradhi ho utha. kuch ne mere paas aate aate apni ankhon par aprichay ka avran Daal liya. kuch havaldar sahab ki or muDe aur jhuk kar bole, adabarj hai havaldar sahab, bandagi huzur. .
pulis ki jis par kripa ho wo sabhya nagarikon ki ghrina ka paatr hi ho sakta hai. parantu usi samay mere kanon mein ek chir parichit svar goonj utha. kautuhal se ankhen uthakar dekhta hoon ki chhaDi ghumate aur padadhat se vatavran ko kanpit karte hue panDitji sair se laut jaye hain. vahin mote khaddar ki qamiz, vahi moti chunnatdar ghoti aur bahi ankhon se jharti abhiman bhari shashvat chunauti. is vaar mainne chaha ki ankhen band karlun. par wo pukar uthe, are vishnu babu, ye kyaa?
mainne barbas muskrakar kaha, meri talashi hogi. tumhari talashi! kya kahte ho?
bas ab agni prajvalit ho uthi. havaldar ki or muDkar bole, baya baat hai? kyon talashi lete ho? ye to sarkari naukar hai, tumhare bhai. . . .
phir sahsa ruke. puchha, koi mahkame ka jhagDa hai ya rajaniti ka hai?
havaldar ne sahajbhav se kaha, koi sayasi mamla hai.
to phir meri talashi lo. main pachchis saal se vidrohi hoon. meri or koi ungli bhi nahin uthata. bhagvan mera jane, sarkar kaisi vichitr hai, jo uska sir phoDte hain, unse wo kanpti hai aur jo uski ghulami karte hain unko wo satati hai!
havaldar ab bhi kruddh nahin hua. dhire se bola, lala sahab, hum to hukm ke bande hain. sarkar ne kaha, chale aaye. hamein kuch nahin malum.
bhagvan mera jane, tumhara koi apradh nahin hai. tum to ghulam ho.
jaise sahsa dhakka laga ho. teevr hokar bole, lekin tum ghulam kyon bane? kya tum nahin jante ki ghulami sabse baDa paap hai?
aur muDkar mujhse kaha, khaDe ho jao. kya tumne kisi ki hatya ki hai, Daka Dala hai? utho, shauchadi jao. main tab tak doodh garm karta hoon.
mainne namrata se kaha, panDitji, main yahin theek hoon. aap chinta na karen.
wo bole, jo niyam ka daas hai, vahi qayar hai. bhagvan mera jane, niyam ke naam par ye chalis karoD insaan kaise kutton ki tarah angrezon ke taluve chatte hain.
aur phir ekbaar havaldar ki or muDe, dekho ji, tumne jo laal pagDi bandhi hai, wo kranti ka rang hai aur tum ho ki safed chamDi dekhte hi thanDe paD jate ho. . . .
tabhi shesh log laut aaye. jab talashi ka kaam shuru ho gaya to panDitji chupchap uupar chale ge aur tanmay hokar ramayan ka paath karne lage. udhar thanedar ne meri churan ki shishiyon mein banm banane ka masala DhunDhana arambh kar diya. jab unhonne manjan ko chakh kar dekha to main apni hansi na rok saka. wo bole hansiye nahin, krantikari log potas ka manjan kiya karte hain.
unhonne aata, daal, ghi, tel, sabhi ki pariksha ki. lakaDiyon ke Dher mein pure ek ghante tak uljhe rahe. laibreri mein pahunche to ek ke baad ek almari aur daraz khol Dali aur purane tikton tatha patron mein kranti ka ghoshna patr DhunDhane lage. vahin sahsa meri Dayri haath lag gai. use kholte na kholte wo lagbhag chillakar apne sathi se bole, akhir pakDe ge. dekho, ye kya likha hai.
sathi zor se paDhne lage, bhagatsinh ko aaj phansi par latka diya gaya, ityadi. paDh chuke to ek kshan kuch socha. phir kaha, keval samachar hai, kuch nahin ban sakta.
panDitji ke paas hoga? ve krantikari hain aur tumhare mitr bhi.
mera chehra tamtama aaya. kaha, sun nahin rahe, ramayan ka paath kar rahe hain. krantikari kya aise hote hain ?
bilkul aise hi. thanedar muskurakar bole, mere kai krantikari mitr mandir mein puja kiya karte hain. aap bhi to aryasmaji hain.
phir ekayek puchha, yashpal ko jante ho? krantikari yashpal, jo lekhak bhi hain. aap to aise dekh rahe hain jaise naam bhi na suna ho aur ye paiD unka yahan paDa hai. is baar shayad bhool ge.
unke haath mein sachmuch ek laitarpaiD tha. mujhe un par vaya aai. muskurakar kaha, yah to yashpal jain ka paiD hai. ye mere mitr hain aur dilli mein rahte hain.
kshan bhar ke liye unka mukh jaise dhumil ho utha. lekin parajit hona unhonne nahin sikha tha. chhant par ja pahunche. jhankakar panDitji ko dekha. paath band ho chuka tha aur wo rasoighar mein the. bole, bilkul akele hain. kranti karne ki puri taiyari hai.
mainne kaha, inke pita ziledar the aur chacha thanedar. thanedar hans paDe, isi karan to bache hue hain aur ab aap bhi bach ge. sochta hoon ki jab aap qanun ki pakaD mein nahin aate to vyarth hi kyon kasht diya jaye.
phir muskurakar dhire se bole, main bhi to aryasmaji hoon. lijiye hastakshar kar dijiye. lekin panDitji ka dhyaan rakhiye.
main bola, aap kya kah rahe hain? main to unhen pagal samajhta hoon. wo hans paDe, pagal hi to kranti kiya karte hain. unhen Dar nahin hota.
aur ve chale ge. main ast vyast ghar mein baith kar sochne laga ki panDitji meri drishti mein pagal hain, pulis ki drishti mein krantikari. lekin kya pralap karna hi kranti hai? kabhi dharm, kabhi rajaniti, kabhi sahitya. abhi us din ramacharitmanas mein na ke sthaan par na aur sha ke sthaan par sa ke prayog ko lekar kitne uttejit ho uthe the. bhagvan mera jane, hindi bhasha ki yahi do visheshtayen hain aur inhin ko hindi vale mitane par tule hue hain. angrezon ke ghulam apni bhasha aur sanskriti, sabko bhrasht kar rahe hain.
tabhi dekhta hoon ki panDitji svayan vahan aa khaDe hue hain. unki ankhon mein dipti hai aur mukh par garvili muskan. bole, bhai, aise kyon baithe ho? utho, mainne kheer banai hai. bhagvan mera jane, aaj main bahut prasann hoon. ab yahan do krantikari rahte hain.
kahte kahte wo hanse, do krantikari! sale jante nahin, ab bharat ka bachcha bachcha krantikari banega. unhen khud krantikari banna hoga. bhagvan mera jane, babu vishnu, ye pulis vale sale vamb banane aur Daka Dalne valon ko hi krantikari samajhte hain.
sachcha krantikari wo hai, jisne Dar ko jeet liya hai, jo anyay ke samne jhukne se inkaar kar deta hai. mujhe khushi hai ki tum nahin Dare.
phir sada ki bhanti panDitji krantikari ki na samapt hone vali vyakhya karne mein prvritt ho ge. parantu us din mein unka tanik bhi virodh na kar saka. tab bhi nahin kar saka jab unhonne kaha, are bhai, tumne dekha, is baar to javaharlal ne kuch samajh ki baat kahi hai.
main hans kar bola, sach?
haan, bhagvan mera jane, mainne is baar bahut lamba patr likha tha aur usne apna naya vaqtavya usi ke adhar par diya hai. vakya ke vakya mere hain.
vismit vimuDh, mainne drishti uthai. paya ki unki ankhen vijay garv se chamakne lagi hain. us garv ko khanDit karne ka sahas mein kaise kar sakta tha?
हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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