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पंडितजी

panDitji

विष्णु प्रभाकर

और अधिकविष्णु प्रभाकर

    पंडितजी को गाँधीजी से जितनी घृणा थी, खद्दर, हरिजन और रामनाम से उतना ही प्रेम था। प्रतिदिन सवेरे वह रामचरितमानस का हारमोनियम पर सस्वर पाठ करते थे और सप्ताह में एक दिन हरिजन-निवास जाकर साबुन बाँटते थे। मोटे खद्दर की क़मीज़ और चुन्नटदार धोती, यह उनकी पोशाक थी। और उनकी बड़ी-बड़ी आँखें सदा निराशा, क्रोध और अभिमान से उबलती रहती थीं। उनकी त्वचा का रंग अब तप गया था और कर्जन-कट मूँछें खिचड़ी हो चली थीं।

    1920 में ही उन्होंने सरकारी नौकरी को लात मार दी थी और जब भरी जवानी में उनकी पत्नी चल बसी तो फिर उन्होंने विवाह भी नहीं किया। उन्हें विश्वास था कि ऐसा करके उन्होंने देश के लिए अपूर्व त्याग किया है, परंतु एहसान-फ़रामोश कांग्रेस ने उनके इस दावे को स्वीकार नहीं किया। उसने उनकी महत्त्वाकांक्षाओं की हत्या कर दी और उनका अंतर्मन तिक्त कटुता से भर उठा।

    मेरे एक दीवार के पड़ोसी थे। वास्तव में मैं उन्हीं के मकान में रहता था। जैसे ही मैं सवेरे लिखना शुरू करता, वह हारमोनियम पर 'सियावर रामचंद्र पद जय शरणम्' का राग अलापना आरंभ कर देते। स्वर सुरीला होता तो संगीत का लोभी मेरा मन उस अत्याचार को सह जाता, परंतु उनका विश्वास था कि भगवान केवल भाव के भूखे हैं, स्वर की चिंता नहीं करते। भगवान भगवान हैं, मैं उनके समकक्ष होने की स्पर्धा नहीं कर सकता, इसलिए मुझे कई बार उन्हें युद्ध की चुनौती देनी पड़ी। वह फिर भी नहीं माने और एक दिन नियमित वाग्युद्ध के बाद मैंने तीव्र होकर उनसे कहा, मैं आपसे बोलना तक नहीं चाहता।

    वह बोले, तो मैं ही कब चाहता हूँ। अब कभी नहीं बोलूँगा, कभी भी नहीं।

    लेकिन तीसरे ही दिन पाता हूँ कि छत पर से झाँककर वह मुझे पुकार रहे है, वायू विष्णु, इधर सुनो।

    मैं तुरंत भाँप गया कि यह किसी विस्फ़ोट की भूमिका है। एकाएक निर्णय कर सका कि बोलूँ या बोलूँ कि वह फिर बोल उठे, भगवान मेरा जाने, गांधी और नेहरू दोनों गद्दार हैं।

    उनके स्वर में असीम कड़वाहट थी। वह क्रोध से काँप रहे थे। मैं जान बूझकर मुस्कुराया। पूछा, क्या बात हुई?

    बात क्या होती, जब देखो च्यांगकाई शेक की तारीफ़ करते हैं। वह अव्वल नंबर का शैतान और अँग्रेज़ों का आदमी है। मैं कहता हूँ, भगवान मेरा जाने, यह गाँधी और नेहरू, ये दोनों ही अँग्रेज़ों के जासूस है। असल में अँग्रेज़ चाणक्य हैं। पहले इन्होंने धर्म को बिगाड़ा। दयानंद इन्हीं का दूत था। हिंदू धर्म का वह नाश किया कि पुनरुद्धार की कोई आशा नहीं। अब राजनीति को भ्रष्ट करने के लिए गांधी को भेजा है। भगवान मेरा जाने, मैं सच कहता हूँ, लंदन में बैठा चर्चिल मेरे बारे में जानता है। यहाँ तक जानता है कि इस समय पंडितजी बाबू विष्णु को हमारी असलियत समझा रहे हैं।

    और फिर सदा की भाँति वह आध घंटा तक धारा प्रवाह बोलते रहे। यह मानते थे कि मैं उनका किराएदार हूँ। मुझे उनकी बातें सुननी ही चाहिए। जब थक गए तो पूछा, हाँ, तुम्हारी क्या राय है? गांधी को तुम अब भी महात्मा मानते हो।

    उनके प्रलाप को मैंने कभी गंभीरता से नहीं लिया। इसलिए उनसे प्रश्न का उत्तर दे सका। वह क्रोध से पागल हो उठे। उनकी बड़ी-बड़ी आँखें फिर दहक आईं। बोले, तुम्हें बातें करने की तमीज़ नहीं है। एक शरीफ़ आदमी तुम्हारे पास आकर तुमसे प्रश्न करता है और तुम उत्तर भी नहीं देना चाहते। मैं नहीं समझता था कि तुम इतने असंस्कृत हो, नहीं तो।

    नहीं तो? मैंने एकाएक क्रुद्ध होकर पूछा।

    लेकिन तब तक वह जीना उतर चुके थे। केवल पृथ्वी पर जो पदा घात हुआ था, वही वायुमंडल में गूँज रहा था। मैंने क्रुद्ध कंपित स्वर में, मानों उन्हें सुनाकर कहा, नहीं तो मकान में नहीं रहने देता, यही न? रहना ही कौन चाहता है! मैं कल ही यह मकान छोड़ दूँगा।

    मन अत्यंत बोझिल हो आया। लेकिन कल तो काल का प्रतीक है। और काल हैं निरवधि। वह कल आने के पूर्व ही एक दिन एक ऐसी घटना हो गई कि जिसके कारण सारी परिस्थिति बदल गई। उस दिन मेरे एक संबंधी के घर पर मित्र-भोज था। जब वहाँ से लौटा तो रात का एक बज चुका था। तुरंत सोने के लिए लेट गया, मानों आँखों में युग-युग की नींद भरी हो। लेकिन पलक झपकी ही थी कि सुना कोई पुकार रहा है, बाबू विष्णुदत्त, बाबू विष्णुदत्त!

    अवश्य ही पंडितजी हैं। इनका सर्वनाश हो, सोने भी नहीं देते। पुकारे जाओ, मैं नहीं आऊँगा, नहीं आऊँगा।

    स्वर फिर गूँजा, सुनते नहीं, बाबू साहब नीचे आइए। यह तो पंडितजी नहीं हैं।... निमिष मात्र में आँखें मलकर उठ बैठता हूँ। देखता हूँ, काफ़ी अँधेरा है। आसमान में तारे जगमगा रहे हैं और नीचे ठीक मेरे घर के सामने दो दर्जन पुलिस वाले खड़े हैं।...

    सबकुछ समझ गया। परसों ही स्थानीय सी. आई. डी. वाला कह गया था, तलाशी आने वाली है, बाबूसाहब। सो वह गई है। सौभाग्य से घर में छोटे भाई के अतिरिक्त उस समय और कोई नहीं था। दोनों को बाहर निकालकर पुलिस इंस्पेक्टर ने द्वार पर ताला लगा दिया। कहीं और जाना था, इसलिए छः सिपाही और एक हवलदार को छोड़कर वे चले गए। ये लोग मुझे घेर कर बैठ गए। तभी मैंने देखा कि मौहल्ले में हलचल पैदा हो गई है। सभी अचरज, भय और आशंका से जैसे हत्प्रभ रह गए हों। धड़कते हृदय से किवाड़ों के बीच से झाँकते हैं और फिर एक झटके के साथ पीछे हट जाते हैं। शायद वे सोच रहे हैं कि बाबू विष्णु ने गबन किया है या डाका डाला है या शायद क्रांतिकारी है। तरह-तरह के लोग इसके पास आते हैं...।

    कई क्षण इसी उलझन में बीत गए। फिर गली में आवागमन होने लगा। मैं उन सबको जानता था। उनमें कई मित्र थे। पर उस क्षण जैसे मैं उन सबकी दृष्टि में अपराधी हो उठा। कुछ ने मेरे पास आते-आते अपनी आँखों पर अपरिचय का आवरण डाल लिया। कुछ हवलदार साहब की ओर मुड़े और झुक कर बोले, आदाबअर्ज है हवलदार साहब, बंदगी हुज़ूर।

    पुलिस की जिस पर कृपा हो वह सभ्य नागरिकों की घृणा का पात्र ही हो सकता है। परंतु उसी समय मेरे कानों में एक चिर-परिचित स्वर गूँज उठा। कौतूहल से आँखें उठाकर देखता हूँ कि छड़ी घुमाते और पदाधात से वातावरण को कंपित करते हुए पंडितजी सैर से लौट आए हैं। वहीं मोटे खद्दर की क़मीज़, वही मोटी चुन्नटदार धोती और बही आँखों से झरती अभिमान भरी शाश्वत चुनौती। इस बार मैंने चाहा कि आँखें बंद कर लूँ। पर वह पुकार उठे, अरे विष्णु-बाबू, यह क्या?

    मैंने बरबस मुस्कुराकर कहा, मेरी तलाशी होगी। तुम्हारी तलाशी! क्या कहते हो?

    बस अब अग्नि प्रज्वलित हो उठी। हवलदार की ओर मुड़कर बोले, क्या बात है? क्यों तलाशी लेते हो? ये तो सरकारी नौकर है, तुम्हारे भाई।...

    फिर सहसा रुके। पूछा, कोई महकमे का झगड़ा है या राजनीति का है?

    हवलदार ने सहजभाव से कहा, कोई सयासी मामला है।

    तो फिर मेरी तलाशी लो। मैं पच्चीस साल से विद्रोही हूँ। मेरी ओर कोई उँगली भी नहीं उठाता। भगवान मेरा जाने, सरकार कैसी विचित्र है, जो उसका सिर फोड़ते हैं, उनसे वह काँपती है और जो उसकी ग़ुलामी करते हैं उनको वह सताती है!

    हवलदार अब भी क्रुद्ध नहीं हुआ। धीरे-से बोला, लाला साहब, हम तो हुक्म के बंदे हैं। सरकार ने कहा, चले आए। हमें कुछ नहीं मालूम।

    भगवान मेरा जाने, तुम्हारा कोई अपराध नहीं है। तुम तो ग़ुलाम हो।

    जैसे सहसा धक्का लगा हो। तीव्र होकर बोले, लेकिन तुम ग़ुलाम क्यों बने? क्या तुम नहीं जानते कि ग़ुलामी सबसे बड़ा पाप है?

    और मुड़कर मुझसे कहा, खड़े हो जाओ। क्या तुमने किसी की हत्या की है, डाका डाला है? उठो, शौचादि जाओ। मैं तब तक दूध गर्म करता हूँ।

    मैंने नम्रता से कहा, पंडितजी, मैं यहीं ठीक हूँ। आप चिंता करें।

    पंडितजी तिलमिला उठे, तुम बुज़दिल हो।

    मुझे क्रोध नहीं आया, हँसी आई। पूर्वतः कहा, नियम-विधान जो हैं, उनकी अवहेलना करना ठीक नहीं।

    वह बोले, जो नियम का दास है, वही क़ायर है। भगवान मेरा जाने, नियम के नाम पर ये चालीस करोड़ इंसान कैसे कुत्तों की तरह अँग्रेज़ों के तलुवे चाटते हैं।

    और फिर एकबार हवलदार की ओर मुड़े, देखो जी, तुमने जो लाल पगड़ी बाँधी है, वह क्रांति का रंग है और तुम हो कि सफ़ेद चमड़ी देखते ही ठंडे पड़ जाते हो।...

    तभी शेष लोग लौट आए। जब तलाशी का काम शुरू हो गया तो पंडितजी चुपचाप ऊपर चले गए और तन्मय होकर रामायण का पाठ करने लगे। उधर थानेदार ने मेरी चूरन की शीशियों में बम बनाने का मसाला ढूँढ़ना आरंभ कर दिया। जब उन्होंने मंजन को चख़ कर देखा तो मैं अपनी हँसी रोक सका। वह बोले हँसिए नहीं, क्रांतिकारी लोग पोटास का मंजन किया करते हैं।

    उन्होंने आटा, दाल, घी, तेल, सभी की परीक्षा की। लकड़ियों के ढेर में पूरे एक घंटे तक उलझे रहे। लाइब्रेरी में पहुँचे तो एक के बाद एक अलमारी और दराज़ खोल डाली और पुराने टिकटों तथा पत्रों में क्रांति का घोषणा-पत्र ढूँढ़ने लगे। वहीं सहसा मेरी डायरी हाथ लग गई। उसे खोलते खोलते वह लगभग चिल्लाकर अपने साथी से बोले, आख़िर पकड़े गए। देखो, यह क्या लिखा है।

    साथी ज़ोर से पढ़ने लगे, भगतसिंह को आज फाँसी पर लटका दिया गया, इत्यादि। पढ़ चुके तो एक क्षण कुछ सोचा। फिर कहा, केवल समाचार है, कुछ नहीं बन सकता।

    थानेदार हताश नहीं हुए। पूछा, तुम्हारे पास चाँद का फाँसी अंक है?

    जी नहीं।

    पंडितजी के पास होगा? वे क्रांतिकारी हैं और तुम्हारे मित्र भी।

    मेरा चेहरा तमतमा आया। कहा, सुन नहीं रहे, रामायण का पाठ कर रहे हैं। क्रांतिकारी क्या ऐसे होते हैं?

    बिल्कुल ऐसे ही। थानेदार मुस्कुराकर बोले, मेरे कई क्रांतिकारी मित्र मंदिर में पूजा किया करते हैं। आप भी तो आर्यसमाजी हैं।

    फिर एकाएक पूछा, यशपाल को जानते हो? क्रांतिकारी यशपाल, जो लेखक भी हैं। आप तो ऐसे देख रहे हैं जैसे नाम भी सुना हो और यह पैड उनका यहाँ पड़ा है। इस बार शायद भूल गए।

    उनके हाथ में सचमुच एक लैटरपैड था। मुझे उन पर दया आई। मुस्कुराकर कहा, यह तो यशपाल जैन का पैड है। यह मेरे मित्र हैं और दिल्ली में रहते हैं।

    क्षण भर के लिए उनका मुख जैसे धूमिल हो उठा। लेकिन पराजित होना उन्होंने नहीं सीखा था। छत पर जा पहुँचे। झाँककर पंडितजी को देखा। पाठ बंद हो चुका था और वह रसोईघर में थे। बोले, बिल्कुल अकेले हैं। क्रांति करने की पूरी तैयारी है।

    मैंने कहा, इनके पिता ज़िलेदार थे और चाचा थानेदार। थानेदार हँस पड़े, इसी कारण तो बचे हुए हैं और अब आप भी बच गए। सोचता हूँ कि जब आप क़ानून की पकड़ में नहीं आते तो व्यर्थ ही क्यों कष्ट दिया जाए।

    फिर मुस्कुराकर धीरे से बोले, मैं भी तो आर्यसमाजी हूँ। लीजिए हस्ताक्षर कर दीजिए। लेकिन पंडितजी का ध्यान रखिए।

    मैं बोला, आप क्या कह रहे हैं? मैं तो उन्हें पागल समझता हूँ। वह हँस पड़े, पागल ही तो क्रांति किया करते हैं। उन्हें डर नहीं होता।

    और वे चले गए। मैं अस्त-व्यस्त घर में बैठ कर सोचने लगा कि पंडितजी मेरी दृष्टि में पागल हैं, पुलिस की दृष्टि में क्रांतिकारी। लेकिन क्या प्रलाप करना ही क्रांति है? कभी धर्म, कभी राजनीति, कभी साहित्य। अभी उस दिन रामचरितमानस में 'ण' के स्थान पर 'न' और 'श' के स्थान पर 'स' के प्रयोग को लेकर कितने उत्तेजित हो उठे थे। भगवान मेरा जाने, हिंदी भाषा की यही दो विशेषताएँ हैं और इन्हीं को हिंदी वाले मिटाने पर तुले हुए हैं। अँग्रेज़ों के ग़ुलाम अपनी भाषा और संस्कृति, सबको भ्रष्ट कर रहे हैं।

    तभी देखता हूँ कि पंडितजी स्वयं वहाँ खड़े हुए हैं। उनकी आँखों में दीप्ति है और मुख पर गर्वीली मुस्कान। बोले, भई, ऐसे क्यों बैठे हो? उठो, मैंने खीर बनाई है। भगवान मेरा जाने, आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ। अब यहाँ दो क्रांतिकारी रहते हैं।

    कहते-कहते वह हँसे, दो क्रांतिकारी! साले जानते नहीं, अब भारत का बच्चा-बच्चा क्रांतिकारी बनेगा। उन्हें खुद क्रांतिकारी बनना होगा। भगवान मेरा जाने, बाबू विष्णु, ये पुलिसवाले साले बम्ब बनाने और डाका डालने वालों को ही क्रांतिकारी समझते हैं। सच्चा क्रांतिकारी वह है, जिसने डर को जीत लिया है, जो अन्याय के सामने झुकने से इंकार कर देता है। मुझे ख़ुशी है कि तुम नहीं डरे।

    फिर सदा की भाँति पंडितजी क्रांतिकारी की समाप्त होने वाली व्याख्या करने में प्रवृत्त हो गए। परंतु उस दिन मैं उनका तनिक भी विरोध कर सका। तब भी नहीं कर सका जब उन्होंने कहा, अरे भाई, तुमने देखा, इस बार तो जवाहरलाल ने कुछ समझ की बात कही है।

    मैं हँसकर बोला, सच?

    हाँ, भगवान मेरा जाने, मैंने इस बार बहुत लंबा पत्र लिखा था और उसने अपना नया वक्तव्य उसी के आधार पर दिया है। वाक्य-के-वाक्य मेरे हैं।

    विस्मित-विमूढ़, मैंने दृष्टि उठाई। पाया कि उनकी आँखें विजय-गर्व से चमकने लगी हैं। उस गर्व को खंडित करने का साहस में कैसे कर सकता था?

    मेरी दृष्टि झुक गई।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कुछ शब्द : कुछ रेखाएं (पृष्ठ 98)
    • रचनाकार : विष्णु प्रभाकर

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