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मेरे पिताजी

mere pitaji

अपनी तीन वर्ष की होश को ज़रा सँभालकर उन्होंने अपने आस-पास झाँका, तो वे सहम गए। माँ-बाप मर चुके थे और उनका पालन-पोषण उनके चाचा-चाची की देख-रेख में हो रहा था। उनके बचपन के संस्मरणों का सार है, बच्चे खिलाना, मार खाना, कुछ कहना और सब कुछ सहना। यह कितना अद्भुत है कि इसी दमघोंटू वातावरण में उन्होंने अपने स्नेही बाबा से ग्यारहवें वर्ष में पैर रखते-न-रखते कर्मकांड की कामचलाऊ शिक्षा पा ली और इससे भी अद्भुत है यह कि इस नरक-कुंड में पलकर जो बालक निकला, उसके रोम-रोम में व्याप्त मिला मानव का प्रेम, सभी तरह के भेद-भावों से ऊपर जीवन के कण-कण में छाई ममता और ईश्वर-विश्वास। ओह, ऐसा कि संतों को भी ईर्ष्या हो! यह थे मेरे स्वर्गीय पिताजी श्री पंडित रमादत्त मिश्र।

प्लेग में बड़े भाई की मृत्यु हुई, तो शहर रो पड़ा, पर वे चार बजे श्मशान से लौटे, पाँच बजे गाय की सानी की, सात बजे उसे दुहा, 7 बजे ठाकुरजी की आरती की और नौ बजे गर्म दूध के दो गिलास लेकर माँ के पास पहुँचे 'ले दूध पीले और बहू को भी पिलादे!'

वे दूध-मिसरी तो माँ लाल मिर्च। चिल्लाकर बोली—'मेरा तो घर जल गया और तुम्हें दूध-मलाई सूझ रही है!'

स्वर में कहीं उद्वेग नहीं। बोले—'बिना खाए कौन जिया है बावली! मैं आज कह रहा हूँ, तू परसों खाएगी। बस तीन दिन का आगा-पीछा है।' अपने कमरे में लौट आए और दूध पीकर सो गए। रात भर उनका गुर्राटा सबने सुना और ठीक साढ़े चार बजे उनकी मधुर, तल्लीन स्वर-लहरी सदा की भाँति कानों में पड़ी—'पवन मंद सुगंध शीतल, हेम मंदिर शोभितम्; श्री निकट गंगा बहत निर्मल, बद्रीनाथ विश्वग्भरम्!'

***

छोटे भाई को एक संबंधी ने बहकाकर नहर में डुबा दिया। वे सब कुछ जानते थे, पर पुलिस से कहा—'नहाने घुसा, पैर रपट गया, मेरा भाग्य दारोगाजी, शक किस पर करूँ?'

माँ बहुत झल्लाई—'उस संडे को फाँसी चढ़ता देखकर मेरी छाती में ठंडक पड़ जाती, तुम्हें यह भी अच्छा लगा।'

वही शांत स्वर 'अब आग एक घर में है, फिर दो में लग जाती; इससे क्या फ़ायदा?'

***

एक कोठा उन्होंने ख़रीद लिया। ख़रीद क्या लिया, मालिक ने उन्हें थोड़े-से रुपयों में दे दिया। कुटुंब के दूसरे धनी सदस्य उसे अधिक रुपयों में भी ख़रीदना चाहते थे, पर उन्हें वह मिला।

पिताजी भोजन के लिए आसन पर बैठे कि अपने आदमियों के साथ, लाठियाँ लिए वे धमके और मारने की धमकियों के साथ, गालियों का एक दौंगड़ा-सा बरसा दिया उन्होंने।

वही उद्वेगहीन स्वर—'आओ भाई, पहले भोजन कर लो फिर मार लेना।'

गालियों की एक और बौछार उन पर पड़ी, तो बोले—'तुम बहुत हो, मैं इकला हूँ। भागा मैं कहीं जा नहीं रहा। आओ पहले खाना खालें!' जवाब में कुछ हुँकारें, कुछ फुँकारें और गालियों की कुछ तगड़ी बौछारें उन पर पड़ीं। अब उन्होंने गले से माला निकाल ली, आँखें बंद; नमः शिवाय, नमः शिवाय!

दस-पाँच मिनट बक-झक कर वे चले गए। माँ बोली—'वे बकते रहे, तुमने उन्हें जवाब तक नहीं दिया। मैं तुम्हारा लिहाज़ कर गईं, नहीं तो सिंडासी से गला पकड़कर जलती लकड़ी से चुनती नाशगयों को!'

वाक़ई वह ऐसी थी। पिताजी ने माला गले में डाली। बोले—मैं बोलता, वे और खड़े रहते। खाने का स्वाद आधा तो गया ही, वह बिल्कुल ही ठंडा हो जाता। ला परोस जल्दी!'

***

बहन का विवाह सिर पर था और पास में पैसा नहीं। सगाई के दिन ही 6 उधार मँगाकर काम चलाया। सबने कहा—जब पास पैसा नहीं, तो ठहर जाओ-अगले साल शादी हो जाएगी।

बोले—'अगले साल और इस साल का फर्क तो वे जानें, जिनके घर कहीं से धन आने की संभावना हो। मेरी लड़की की शादी तो इस साल भी ठाकुरजी करेंगे और अगले साल भी। उनके भंडारे में सब कुछ है, तुम फिकर मत करो!'

उसी दिन शाम को अचानक उन्होंने माँ से बड़ी थैली माँगी। वह समझी, कहीं से रुपए ले आए हैं। चुपके से तीन रुपए रखकर थैली माँ को लौटा दी। यह जल उठो 'इन्हीं तीन रुपल्लियों पर शादी करोगे लड़की की?'

बोले—'बावली, तेरी लड़की का कारन हो जाएगा और ये तीन रुपए बच्चे रह जाएँगे। तू नहीं जानती, ठाकुरजी की भुजा बड़ी लंबी है।'

समय जा रहा है, घड़ी रही है, पर ठाकुरजी की लंबी भुजा का कोई प्रमाण मिल नहीं रहा। माँ के प्राण सूख रहे हैं, पर पिताजी के चेहरे पर वही हँसी, वही चार बार रोज़ चाय, वही आरती और वही नींद! माँ जब-जब उन्हें कोंचती है, कह देते हैं—'मैंने अपना काम कर दिया, ठाकुरजी अपना काम करेंगे।' ठाकुरजी ने अपना काम नहीं किया और विवाह के 13 दिन रह गए। माँ का चेहरा पीला पड़ गया। अचानक तार आया—पिताजी के एक यजमान शिव पुराण की कथा सुनने को उन्हें बुला रहे हैं। यजमान डिप्टी कलक्टर थे। कथा पर पंद्रह सौ रुपए चढ़े। पिताजी दस दिन बाद घर लौटे, माँ झक रह गई।

धूमधाम से शादी की। लड़की अपनी सुसराल से लौटी, तो अन्नपूर्णा का भोज भी हुआ। शाम को पिताजी ने फिर थैली देखी। समय की बात उसमें 9 रुपए थे। 6 का ऋण उतार दिया; आगे बचे तीन! माँ से बोले—'तेरी लड़की के सब काम हो गए कि नहीं? फिर भी बचे रहे वे ही तीन! तुम लोग झट विश्वास छोड़ बैठते हो। मैं कहता था कि ठाकुरजी की भुजा बड़ी लंबी है।'

***

वे पंडित भी थे और चिकित्सक भी। एक दिन सात रुपए उनके पास आए और सातों उन्होंने ख़र्च कर दिए। माँ बहुत नाराज़ हुई कि 'कल त्योहार है, सवेरे-ही-सवेरे पूजा के लिए एक रुपया चाहिए, कहाँ से आएगा?' वही पेटेंट जवाब 'सब ठाकुरजी देंगे!' जवाब से माँ को संतोष हुआ—'देखूँगी, दिन निकलते ही ठाकुरजी कैसे देते हैं?'

बात यह थी कि पिताजी सवेरे बहुत जल्दी भोजन करके घर से निकलते थे, पर कल भोजन हो सकता था पूजा के बाद और पूजा की कुंजी थी एक रुपया। पिताजी भी यह जानते थे, पर बोले—'खैर देख लेना, ठाकुरजी की भुजा बड़ी लंबी है।'

तड़क में चार बजे एक रोगी का बुलावा आया और दो रुपए लेकर वे लौटे। आते ही बोले—'यह लो एक रुपया पूजा का और एक ऊपर के ख़र्च का। यों ही हाय-हाय मचा देते हो तुम लोग!'

अपने ठाकुरजी में उनका अखंड विश्वास था और वाक़ई उनकी भुजा बड़ी लंबी थी। मैंने उन्हें कभी भय से विह्वल, निराशा से अस्तव्यस्त और क्रोध से क्षुब्ध नहीं देखा!

***

मानव के प्रति निष्काम ममता उनकी अपनी चीज़ थी। जो घासवाला उनकी गाय के लिए घास लाता, उसे चाय पिलाई जाती और यजमानों के यहाँ से आई-गई सुहाली-मिठाई अवश्य दी जाती। अगर वह बूढ़ा होता, तो उसे ज़रा-सी अफ़ीम की गोली भी वे दे देते। यह सब उन्हें अपनी शीतल पाटी पर बैठाकर किया जाता और इसके लिए वे अपना ही गिलास काम में लाते। इसके बाद बर्तन में आग डाली जाती, घर में गंगा जल छिड़का जाता। शहर के पंडित कहा करते—'रामा भिस्सर का तो भभेक भिरस्ट हो गया है!'

एक बूढ़े घासवाले ने कहा—'पंडितजी, हमें एक रजाई दे दो।' तब भादवे की भयंकर गर्मी पड़ रही थी। आश्चर्य से वे बोले—'अरे, आजकल रजाई क्या करेगा? बात यह थी कि बूढ़े ने पिछली सर्दियाँ मुश्किल से काटीं थीं, अगली सर्दियों के लिए यह अभी से चिंतित था। पिताजी ने सर्दियों में उसे एक रजाई देने का आश्वासन दे, विदा किया।

दीवाली पर जब उन्होंने अपने लिए रज़ाई निकाली, तो उस बूढ़े के लिए भी एक रज़ाई ठीक कराकर रख दी; पर वह बूढ़ा आया। मैंने देखा कि वे बेचैन थे और बार-बार सबसे उस बूढ़े को पूछते थे! हमें उनकी बेचैनी पर हँसी आती थी और कभी-कभी झुँझलाहट भी 'उसे सौ बार गरज होगी तो आएगा, नहीं तो आप क्यों परेशान हैं!' वे कहते—'अरे भाई, वह बेचारा मालूम होता है, घर भूल गया है। नहीं तो वह ज़रूर आता!'

एक दिन वे घासमंडी जा पहुँचे और दो घंटे तक वहाँ खड़े रहे, पर वह बूढ़ा उन्हें मिला। तब दूसरे घासवालों से उन्होंने उनके गाँव पूछे।

अंत में उस बूढ़े के गाँव का एक दूसरा घासवाला उन्हें मिल गया। उसके हाथ उन्होंने बूढ़े को ख़बर भिजवाई। ख़बर ले जाने के लिए भी उसे दो आने दिए। दूसरे दिन बुख़ार में हिलहिलाता वह बूढ़ा आया। सचमुच वह घर भूल गया था। पिताजी ने उसे अपने हाथों रज़ाई उड़ाई, चाय पिलाई और दवा दी। शाम को जब मैं बाहर से आया, तो बहुत ख़ुश होकर बोले—'ले भाई, आज हमारा वो काम हो गया।'

'क्या काम जी ?'

'वो बूढ़ा आया था, रजाई ले गया।' वे ऐसे ख़ुश थे कि जैसे आज उनका खोया हुआ लड़का पा गया हो!

***

एक दिन एक तरुण घासवाला आया। वह भी एक रज़ाई चाहता था, पर रज़ाई घर में थी नहीं। उसकी कहानी इस प्रकार थी—घर में यह और उसकी माँ है। पिछले साल उनके पास एक रज़ाई का रूअड़ था, उसे माँ-बेटे ओढ़ लिया करते थे। वह टूट गया है। ठंड खाकर माँ बीमार हो गई है। बेहद तेज़ बुख़ार है। उसे इकली छोड़कर मजबूरी में वह घास बेचने आया है।

वे चिंता में पड़ गए, पर कहीं गुंजाइश थी। सोचकर बोले—'अच्छा भाई, तू शाम को आना। हमारे पास तो कोई कपड़ा है नहीं, पर देखो, ठाकुरजी की भुजा बड़ी लंबी है।' वह चला गया। तीसरे पहर तक कोई प्रबंध नहीं हुआ। अचानक कुछ सूझा। उठकर कहीं गए और लौटे, तो एक पुरानी रज़ाई उनकी बग़ल में थी—किसी से माँगकर लाए थे! मेरे आत्माभिमान को बड़ी ठेस लगी। मैं नाराज़ हुआ, तो लाड़ में बोले—'बेटा! उनके यहाँ यह फ़ालतू पड़ी थी, इसके काम जाएगी; इसमें बेइज्जती की बात क्या है?' मुझे नरम करते हुए, बोले—'बस एक माँ है इसके। वह शीत में मर जाती, तो इसकी दुनिया अंधी हो जाती।' और यह कहकर जैसे क़िला जीत लिया उन्होंने—'अब दोनों आराम से पैर पसारकर सोएँगे।' रज़ाई के साथ माँ के लिए दवाई भी उसे मिली और पीने को चाय का गिलास भी।

***

घर के सब लोग प्लेग में मर गए। बच गया सिर्फ़ जीजू! दस बारह साल का मुसलमान बालक। हमारे धोबी के साथ वह पिताजी से मिला और बस उनका पुत्र हो गया। उनके पास खाता, कपड़े पहनता और रात में घर जा सोता। भोला-सा सरल बालक; एक दिन पिताजी की तरह सूरज को हाथ जोड़ रहा था कि मुसलमानों में हल्ला मच गया। तार देकर उसका बहनोई बुलाया गया। मुश्किल से पिताजी ने उसे बहन के यहाँ जाने के लिए तैयार किया।

नए कपड़े पहनाकर उसे स्टेशन छोड़ने गए। जब तक गाड़ी दीखती रही, खड़े देखते रहे और इसके बाद भी मनिआर्डर—से उसे कभी-कभी रुपए भेजना जारी रहा।

***

बर्फ़ बाला गली में आता, तो पास-पड़ोस के बच्चे उन्हें या घेरते! एक दिन चौदह बच्चों को उन्होंने बर्फ़ दिलाया और बर्फ़ वाले को पैसे देने के बाद एक पैसा ऊपर की ताक में रख दिया। मैं भी वहीं उनके पास खड़ा था। पूछा—यह पैसा वहाँ क्यों रख दिया आपने?

बात टालने को बाले—'यों ही रख दिया है, फिर उठा लूँगा? पर मुझे संतोष हुआ, तो खुले—'यह पैसा भंगन की लड़की का है। जब आएगी, उठाकर दे दूँगा, बरफ खालेगी। आखिर उसमें भी तो जान है बेटा!'

***

उनके लिए अपने बच्चे, पास-पड़ोस के बच्चे और भंगन के बच्चे में कोई भेद था। बच्चे असल में उनकी जान थे। जब वे खाना खाते, तो इधर-उधर से कई बच्चे जुटते। उनका भोजन एक हंगामा ही होता। एक कहता मैं दाल से लूँगा, दूसरा आलू से। तीसरे का नाक पूँछते, चौथे को पानी देते। एक इस बात पर ऐंठता कि में गोदी में बैठूँगा, दूसरा रूठ जाता कि उसे गोद में क्यों लिया? सबको सँभालते और इस सँभाल में पूरा रस लेते। उनका भोजन सचमुच एक दृश्य होता!

उनकी चाय-गोष्ठी भी इसी तरह काफ़ी दिलचस्प होती। एक और गोष्ठी के भी वे संयोजक होते। वह सिर्फ़ सर्दियों में जमती। वे बीच में ज़मीन पर, अपने आसन पर उकडूँ बैठते और दोनों तरफ़ पलंगों पर बैठते बाल-गोपाल। वे गन्ना छीलते और पोरी बच्चों को देते रहते। पहले-पीछे का हँगामा यहाँ भी मच जाता, पर वे उसे सँभालते और गन्ना गोष्ठी जारी रहती।

इस गोष्ठी में उस समय मज़ा जाता, जब अचानक हम में से कोई तरुण पहुँचता। वे एक पोरी उसकी ओर भी बढ़ाते। इधर से हाथ बढ़ाने में ज़रा भी ढाल हुई कि वे कहते—'ओहो, अब तो आप बहुत ही बड़े हो गए हैं।' और तभी वे अपने को तीन अक्षरों में उंडेल-सा देते—'ले बेटे!' और पोरी हमें चूसनी पड़ती—हँसते-हँसते!

***

वे थके-थकाए, पसीने से तर बाहर से लौटते—फल, सब्ज़ी, मिठाई और जाने क्या-क्या लिए। बच्चे दौड़ पड़ते—'बाबा आए, बाबा आए।' कोई ख़रबूज़ा माँगता, कोई मिठाई, कोई कमर पर चढ़ता, कोई पैरों को लिपट जाता। वे परेशान हो जाते, पर कभी चिल्लाते। लाड़ में ही कहते—'अरे, ताला तो खोल लेने दिया करो। आते ही दुंद मचा देते हो। जो कुछ है तुम्हारे ही लिए तो है।'

एक दिन बच्चों का यह आक्रमण आरंभ हुआ ही था कि मैं गया। मैंने उन्हें डाँटा, तो मुझ पर ही एक डाँट पड़ी—'अरे तुझे तो ये कुछ नहीं कहते। तू क्यों हर वक़्त इनके पीछे पड़ा रहता है!' और जल्दी-जल्दी ताला खोलकर सबको कमरे में ले घुसे और मिठाई, फल बाँटने लगे।

***

अजीब-अजीब सवाल बच्चे उनसे पूछते और वे इस ढंग पर उनका जवाब देते कि बच्चों को आनंद भी मिलता और ज्ञान भी। एक दिन छोटी-सी गायत्री ने पूछा—'बाबा, तुम्हारे बाल सफेद क्यों हैं?'

बोले—'बेटी, जब मैं छोय था, अपना सिर नहीं बुलाया करता था। मैल भर जाने से बाल सफ़ेद हो गए हैं।'

उत्तर की प्रतिक्रिया कितनी स्पष्ट थी 'बाबा, मैं तो रोज़ अम्मा से अपना सिर धुला लेती हूँ।'

प्रतिक्रिया पर कितनी बढ़िया पॉलिश उन्होंने की—'तभी तो तेरे बाल काले हैं बेटी!'

***

'पिताजी, आप बुढ़ापे में भी इतने स्वस्थ हैं, इसका रहस्य क्या है?' एक दिन मैंने पूछा, तो बोले—'तीन मुख्य कारण है इसके।'

1—मैं सदा नियमित रूपसे ब्रह्म-बेला में जागता हूँ और नहाने, खाने, घूमने आदि में भी नियमित रहता हूँ।

2—मैं सदा आदमी रहता हूँ, भगवान् कभी नहीं बनता। तुम्हें 100 मिल गए, तो ख़ुश और खो गए, तो गुम। मैं मानता हूँ, सब काम ठाकुर जी की इच्छा से हो रहा है। आया भी उनका, गया भी उनका। सुख भी उनका, दुख भी उनका।

3—मैं हमेशा बच्चों में खेलता हूँ। ये मुझे नया जीवन और फ़ुर्ती देते हैं। हँसकर बोले—मेरे बाल-मित्रों में और बुढ़ापे में युद्ध हो रहा है।

वह मुझे जितना थकाता है, ये उतनी ही शक्ति मुझे दे देते हैं। किसी दिन तो बुढ़ापा जीतेगा ही, पर ख़ैर, अभी तो बेचारा पिट रहा है!

***

एक बार मुझे पतंगबाज़ी की धुन सवार हुई। उन्हें पता चला कि मैं दूसरे मुहल्ले में जाकर पतंग उड़ाता हूँ। बस दूसरे ही दिन बाज़ार से आप कई बढ़िया पतंगें, हुचका और माँझा ले आए और ज्योंही शाम को लौटा कि वे सब चीज़ें मुझे दीं।

बोले—'भाई, आजकल शाम को जी नहीं लगता, इसलिए यह लाया हूँ। तू छत पर शाम को पतंग उड़ाया कर, मैं भी देखा करूँगा।' भाई साहब बहुत नाराज़ हुए—'और तो सब कुछ पढ़ा दिया। अब यह नई शिक्षा आप इन्हें देंगे!'

उनके उत्तर में उनकी स्पष्टता थी। बोले—'पतंग तो लड़के उड़ाएँगे ही। तुम उन्हें डाटोगे, तो वे चोरी से बुरे लड़कों के साथ उड़ाएँगे और पैसों के लिए घर की चीज़ें बेचना सीखेंगे!'

दूसरे दिन शाम को अपनी ही छत पर हमारी पतंग उड़ी। अपना हुक्का लेकर वे भी वहीं बैठे। पतंग सीधी हुई कि ये बोले—'दे ढील। अरे ढील दे भाई, हुचका सीधा छोड़ दे।' ढील ज़्यादा दे दो और पतंग पेटा खा गई, तो तुरंत हिदायत मिली—'सँभाल पेटा, अरे पेटा सँभाल। मार लंबी खींच!' कोई पतंग बराबरी में आई और वे बोले—दे गोत। यों नहीं, यों नहीं, तिरछा। दे बायाँ गोत, दे बायाँ!' हमने गोत दिया और पेंच लड़ गए। पेंच लड़े कि वे बोले—'दे ढील, अरे अब क्या है, दे ढील-छोड़ दे नाँव ख़ुदा के हाथ!' ढील चल दी, पर पतंग कमज़ोर थी। तुरंत बोले—'मार ठुमकी। हल्की, एकदम हल्की, नहीं तो झर्र हो जाएगी पतंग। देखता नहीं, हवा सो रही है।' पतंग ज़रा उठी, इठलाई और सरकी कि वे बोले—'अब दे ढील। हुचका ऊँचा कर ले। ऊँचा करले हुचका!' अब उन्होंने पतंग की ओर देखा। बोले—'घस्सा ठीक बैठ रहा है—कैंची ख़ूब चल रही है!' तभी दूसरी पतंग कट गई। हम अपने पहले मोर्चे पर क़ामयाब रहे। वे बोले—'कटती कैसे नहीं, अंडे की सूँत का माँझा लाया था मैं!'

मुझे आश्चर्य हुआ कि वे पूरे पतंगशास्त्री हैं। कभी पतंग उड़ाई है पिताजी?' बोले—'हाँ बेटा, उड़ाते हैं? खेल-भटक कर ही आदमी बड़ा होता है।' पूछा—'आपने भी अपने समय पर सभी उड़ाते हैं। खेल-भटक कर ही आदमी बड़ा होता है।'

***

वे सूझ के धनी थे। इस सूझ की तीन धाराएँ थीं। पहली यह कि आप उनसे कहीं मज़ाक़ करें, अपनी वाक्चातुरी से उन्हें मात देना चाहें, वे अपनी तुझसे फ़ौरन आपको छका देंगे।

एक धनी यजमान की लड़की का विवाह था। लग्न था नौ बजे का, पर भड़े आदमियों के बड़े प्रबंध; संस्कार आरंभ हुआ रात में एक बजे। वर-पक्ष के तरुण पंडित ने पूछा—'पंडितजी किस लग्न में कार्यारंभ हो रहा है यह?' वे उसके शास्त्रार्थी निशाने को ताड़ गए। बोले—भैया, यह 'फुरसत-लग्न' है। दोनों पक्षों को जब प्रबंध आदि से फुरसत मिल जाती है, यह आरंभ होता है।' पंडितजी झेंपे और लोग हँसे! मुझसे बोले—'पहली ही टंकोर में चित हो गया बेटा।'

दूसरी धारा थी चिकित्सा में। आयुर्वेद के वे कोई विशेष पंडित थे, पर कभी-कभी ऐसा निशाना लेते थे कि डिग्रियाँ और चोगे बगलें झाँकते रह जाते थे।

एक धनी सज्जन का बहलवान गाँव से गेहूँ भर कर लाया। गाड़ी हाँके चला रहा था कि उसकी जबाड़ी बंद हो गई। कहीं दर्द, बेहोशी, पर मुँह बंद। डॉक्टर आए। कानी आँखों पर थर्मामीटर थिरके, स्टेथिसकोपों ने दिल की ख़बर ली; नो टैंपरेचर, नो हार्टट्रबल! जम्बूड़ से मुँह फाड़कर अंदाजन कुछ दवाएँ उसमें डाली गईं, पर कुछ हुआ।

वैद्य लोग पधारे। अत्यंत गंभीर मुद्रा में नाड़ी थामी गई, उँगलियों ने बात, पित्त, कफ की सरगम नापी, परस्पर कुछ चोंचें लड़ीं, माधव निदान के श्लोकों का शुद्ध-अशुद्ध उच्चारण हुआ और बड़ी सावधानी के साथ कुछ रस-भस्में उतारी गईं, पर बिल्कुल उसी तरह जैसे अँग्रेज़ी राज़ के बागी उस ज़माने में खैबर दर्रा पार कर जाते थे।

तब हकीम जी तशरीफ़ लाए; अपना चोगा कंधों पर और पान मुँह में सँभाले हुए। अपनी ख़ानदानी हिकमत पर योंही एक-आध उड़ता-सा इशारा डालकर, आपने नब्ज़ देखी, दिल टटोला और चेहरे पर ग़ौर फ़रमाई। कुछ समझ में नहीं आया, फिर भो बहुत गंभीरता के साथ माजूने दिलकुशा को शर्बते दीनार में मिलाकर चटाने और ऊपर से एक छटाँक अर्क पोदीना और ग़ुलाब मिलाकर पिलाने का मशवरा दे गए। चिमटे से मुँह खोलकर यह भी गले की भट्टी में झोंक दिया गया, पर फूँस की ही तरह!

तब बुलाया गया कुंदन सयाना। उसने इसे सैयद का असर बतलाया और 'कालो कलकत्ते वाली, भर ले खप्पर नाच बजना ताली' का मंगलाचरण करके जाने कितने मंतर-तंतर पढ़े-किए, पर सैयद उतरा। मुफ़्त का तमाशा कौन देखे। लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई।

तभी उधर निकले पिताजी। उन्होंने उसे देखा और पाँच मिनट उसके साथियों से बातें कीं। वे घर से अपनी सूँघनी उठा लाए और दाबदी एक तकड़ी-सी चुटकी। तड़-तड़ छींः, एक-दो-तीन। आई पाँच-सात छींकें और खुल गई जबाड़ी! रात में मैंने कहा—'आज तो आपने चमत्कार कर दिया।' बोले—'चमत्कार क्या था उसमें। गेहूँ इकट्ठे करने में दो रात जागा। बस थक गया बेचारे का पट्टा-पठ्ठा। आई जो जम्भाई तो ख़ून रुक गया जबा ड़े का—बस जबाड़ी बंद! छींकों ने नस-नस हिलादी, ख़ून में हरकत आई, जबाड़ा खुल गया।' इस तरह के उनके कई संस्मरण हैं।

तीसरी धारा थी अपने मित्रों और यजमानों के आपसी झगड़े निमटाने में। वे दो विरोधियों के बीच में शक्कर की ऐसी डली बन जाते, जो धीरे-धीरे घुलकर दोनों को मीठा कर देती। इस दिशा में तो असल में सच्ची सद्भावना ही उनकी सूझ थी।

पति-पत्नी के झगड़ों में उनकी सहानुभूति हमेशा मैंने पत्नी की ओर देखी—'अरे भाई, स्त्री तो गाय है, उसका सताना, राम-राम। वह कभी सींग भी मार दे, तो क्या? हमेशा दूध और बछड़े देती है!' यह उनकी 'दलील' थी।

उनकी यह सहानुभूति इसलिए और भी अधिक महत्वपूर्ण है कि माँ का स्वभाव काफ़ी कड़वा था, पर सच तो यह है कि वे इतने मीठे थे कि संसार को कोई भी कड़वाहट, उन तक पहुँचते-न-पहुँचते स्वयं मीठी हो जाती थी!

***

सामाजिक परंपराओं में मैं घोर क्रांतिकारी और भारत के बूढ़े हैं घोर दकियानूस, पर हम दोनों में कभी टक्कर नहीं हुई। जब मैंने सार्वजनिक रूप से अपनी पत्नी को पर्दे से बाहर ला खड़ा किया, तो मेरे क़स्बे पर बिजली-सी गिर पड़ी—इस चर्चा के सिवाय लोगों को और जैसे कुछ काम ही था। चौधरी लोगों ने तो इसे पंचायत बुलाने का विषय समझा। पिताजी ने मुझे समझाया तो मैंने केवल एक बात उनसे कही—'पिताजी, यदि मैं आपके युग के वातावरण में रहूँगा, तो मेरे व्यक्तित्व का विकास रुक जाएगा। आप इसे सोच लें और यदि आपकी प्रसन्नता इसी में है, तो मैं इधर नहीं रहूँगा।' आधे घंटे तक चुप बैठे रहे और तब अचानक बोले—'हाँ बेटा, तू अपने ही रास्ते पर चल। गर्मियों में रजाई ओढ़ना ठीक नहीं है!' मैं उनकी तरफ़ देखता रह गया।श्ओह, वे कितने अच्छे थे!

स्रोत :
  • पुस्तक : दीप जले, शंख बजे (पृष्ठ 9)
  • रचनाकार : कन्हैलाल मिश्र 'प्रभाकर'
  • प्रकाशन : भारतीय ज्ञानपीठ
  • संस्करण : 1951
हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी

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