काव्य व्यक्तित्व के अतिरिक्त महादेवीजी के दर्शन भी पहले मुझे ‘चाँद’ ही के माध्यम से हुए थे। एक चित्र की स्मृति अब तक सजीव है, महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान और चंद्रावती लखनपाल का चित्र छपा था। यह त्रिपुटी उन दिनों बहुत प्रसिद्ध थी। चंद्रावती जी आज विस्मृति के गर्भ में विलीन हो चुकी है।
हिंदी, बंगला, गुजराती और मराठी की कविताएँ अब भी बड़े चाव से पढ़ता हूँ। देवनागरी लिपि में प्रकाशित उर्दू काव्य पढ़ने का चस्का भी 'चाँद' ही की कृपा से लगा था और अब तक है। पहले हिंदी भाषा के अनेक नए पुराने कवियों की बहुत-सी कविताएँ मैंने याद भी की थी। महादेवी जी की 'मैं नीर भरी दुख की बदली', 'अश्रुमय कोमल, कहाँ तू आ गई परदेशिनी री' मैंने बहुत दिनों तक गुनगुनाई।
यह सब होते हुए भी उनके साक्षात् दर्शन पाने का सौभाग्य मुझे सन् '42-'43 से पहले न मिल सका। अगस्त-आंदोलन वे कुछ महीनों बाद बबई से घर गया था और वहाँ से निराला जी के दर्शन करने प्रयाग। उन दिनों वे गैरिकवस्त्रधारी थे।
महादेवी ते मिले हो? उन्होंने पूछा। मेरे नकारने पर बोले चलो।
इस प्रकार वर्षों की साघ पूरी हुई। स्मृतिपट पर अब सब कुछ अंकित नहीं रह गया। तीन बातें याद हैं। एक महादेवी जी की हँसी। ऐसा लगता था कि जैसे उनके साथ-साथ उनके भीतर वाली कोई शक्ति उनसे हँसने में होड़ ले रही हो। हम लोग आमतौर पर फुहारे की ऊपरी खिलखिलाहट को देखकर ही प्रसन्न होते है, उसके स्रोत का उल्लासमय वेग नहीं देखते। गीत में शब्द और राग दोनों ही की अपनी-अपनी महिमा भी है, भले ही गायक के मधुरकंठ रूपी व्यक्तित्व के प्रभाव से वे एक रूप होकर झलके और उस प्रभाव की महिमा अनन्य हो।
दूसरी बात फ़िल्मों से संबंधित थी। आदरणीय भाई वाचस्पति जी पाठक उन्हें शायद कुछ ही दिन पहले यह बतला गए थे कि मैंने 'संगम' नामक एक तत्कालीन फ़िल्म में प्रसाद जी का एक गीत ('अरे वही देखा है तुमने मुझे प्यार करने वाले को') प्रयुक्त किया है। बहने लगी निराला जी और पंत जी के गीतों को भी फ़िल्मों में लेना चाहिए।
तीसरी बात अगस्त सन् '42 वे' आंदोलन से संबंधित थी। अँग्रेज़ सरकार ने 'भारत छोड़ो' आंदोलन को बड़ी बेरहमी से कुचला था। महादेवी जी उन दिनों ग्राम-सेवा-व्रत-धारिणी थी। अपने अनुभव, दमनचक्र से भयभीत दीन-हीन किसानों की दशा का वर्णन करते-करते एकाएक चुप हो गईं फिर कहने लगी हमारा आंदोलन अब शायद अनेक वर्षों तक अपनी शक्ति न पा सकेगा।
इसके बाद प्रयाग जाने पर उनसे कई बार मिला। उसी दौर में कब से मैंने उन्हें जीजी कहना शुरू कर दिया यह अब याद नहीं जाता।
जीजी फिर एम० एल० सी० हो गईं। उनके लखनऊ आने-जाने में बानक स्वाभाविक रूप से बनने लगे। जब आती, विधायक-निवास से उनका टेलीफ़ोन-संदेश मुझे मिलता, मैं दर्शन करने जाता।
स्व० पंडित गोविंद वल्लभ पंत उत्तर प्रदेश की राजगद्दी छोड़कर दिल्ली की गद्दी सम्हालने जा रहे थे। विधायक-निवास के 'कामन रूम' मे लेखकों, पत्रकारों और कलाकारों की ओर से उनका विदाई समारोह मनाया गया था। कत्थक नटवरी नृत्य सम्राट थी शंभू महाराज ने अपने नृत्य-प्रदर्शन से सभी को मुग्ध किया। जीजी भी उस समारोह में थी। मुझ पर जीजी का रौब ग़ालिब देखकर समारोह में बाद महाराज उनके पास गए और कहने लगे देखिए, आप नागर जी को डाँटिए। ये मेरा काम नहीं करवा देते। जीजी ने महाराज की तसल्ली के लिए मुझे तुरंत ही डाँटा। यह बात अभी कुछ ही महीनों पहले लखनऊ रेडियो केंद्र के एक 'स्टॉफ़ आर्टिस्ट' संगीतकार ने प्रसंगवश सुना कर मेरी याद ताज़ा की थी। इसके बाद—
सन्-संवत् ठीक-ठीक याद नहीं, शायद '54 या '55 की बात है, मगर यह याद है कि जून का अंतिम सप्ताह था। धर्मवीर भारती साहित्यकार संसद द्वारा ताकुला-नैनीताल में आयोजित ग्रीष्म शिविर के कार्यक्रमों में भाग लेकर सीधे लखनऊ, मेरे यहाँ आए थे। मैंने वहाँ वे हाल-हवाल पूछे। भारती बोले वह सब भी सुनाऊँगा पर पहले जीजी का एक आदेश सुन लीजिए। आपको पंद्ररह दिनों के अंदर भारतेंदु जी की जीवनी पर आवारित एक नाटक लिखना है। नाटक लिखकर तुरंत इलाहाबाद आजाइए। भारतेंदु जी की जंयती के दिन 'रंगवाणी' का उद्घाटन समारोह होगा। समय कम है। नाटक का दिग्दर्शन भी आप ही को करना है।
जुलाई मध्य तक नाटक लिखकर में इलाहाबाद पहुँच गया और टैगोर-टाउन में भारतभूषण अग्रवाल ने यहाँ डेरा डाल दिया। उन दिनों पंत जी भी टैगोर-टाउन ही में रहते थे। उनका तथा बालकृष्ण राव जी का घर भारत के घर के पास ही था। शाम को पंत जी के घर पर हम सब इकट्ठा हुए, जीजी भी वहीं आ गई। नाटक सुना गया, सबको पसंद भी आया। जीजी बोली नाटक अच्छा है पर इसे रंगमच पर भी अच्छा सिद्ध होना चाहिए। मामा (वरेरकर) बतलाते थे मराठी का रंगमच बहुत विकसित है। मैं उन्हें तो बुला ही रही हूँ पर और भी अन्य भाषाभाषी नाटककारी को बुलवाना चाहती हूँ।
मैंने कहा, मैं अपनी भरसक कोई कसर न रखूँगा, आगे भगवान् नटराज मालिक है।
रात में घर आकर इलाहाबाद में रंग कलाकारों के संबंध में भारतभूषण से मिस्कोट की। वे उन दिनों आकाशवाणी में काम करते थे। इलाहाबाद से पहले लखनऊ केंद्र में थे। रेडियो का ड्रामा-प्रोड्यूसर होने से पहले भी अपने रेडियो नाटकों में रिहर्सल मैं स्वयं ही कराने जाता था। भारत मेरी रुचि और आवश्यकताओं को भलीभाँति समझते थे। पात्रों के चुनाव में उनकी सलाह आमतौर से बेचूक हुआ करती थी। सब पात्रों का चुनाव हो गया। अब बचे स्वयं भारतेंदु। वे समस्या बन गए। मैंने कहा बाह्य रूप से मेकअप में तो उसे भारतेंदु लगना ही चाहिए पर उनके अतः व्यक्तित्व का निरुपण भी उसे ख़ूबी से करना चाहिए। यह पहली शर्त है। तभी मेरी जीत होगी। मैं 'लगभग सच्चे' तक समझौता करने को राज़ी था पर इसके बाद नहीं। मैंने कहा, मन का कलाकार न मिलने पर मैं नया नाटक लिख दूँगा और वह भी इस तरह से कि मंच पर भारतेंदु की अनुपस्थिति ही नाटक ने इंच-इंच में उनकी उपस्थिति का आभास करा दे। भारत बोले आप मेरी बात मानिए, विजय बोस को 'ट्राई' कर लीजिए। वह लगभग सच्चे वाली आपकी शर्त पूरी कर देंगे। यदि आपको रिहर्सल में संतोष न हो तो फिर दूसरा नाटक लिख लीजिएगा।
उस चिंता भरी रात के बाद का सवेरा भी याद रखने लायक बन गया। लगभग साढ़े आठ नौ बजे पंतजी पधारे। पहले तो वे नाटक और उसके लिए मेरी जालीदार पर्दे वाली तरकीब की प्रशंसा करते रहे फिर हँसकर कहा वधु बुरा न मानिएगा, महादेवी जी को आपके भाँग के गोलों की बड़ी चिंता है। कहने लगी कि भाँग-वाँग पीके सो गए और नाटक भी तैयारी में कसर रह गई तो बड़ी बदनामी होगी। मैंने उनसे कह दिया है वधु कि आप वधु की तरफ़ से बिल्कुल चिंता न करे। मैं उन्हें बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ। पर आपसे भी कहता हूँ वधु, आजकल ज़रा गोले-वोले कम चटाइएगा। और कुछ नहीं तो नही तबियत ही ख़राब हो जाए।
मुझे बड़ी ज़ोर से हँसी आगई। पंतजी से, मर्यादाबद्ध रहते हुए भी मैं मुक्त रूप से हँसी-मज़ाक कर लेता हूँ, पर जीजी होने के बावजूद महादेवी जी से मेरा तब परिचित मात्र होने ही का नाता था। पंतजी की इस बात के पीछे मुझे जीजी का मनोचित्र उभरता दिखलाई दिया। स्वप्नवादिनी तो वे है ही साथ ही अपने सपनों को साकार करने के प्रति वे बढ़ी लगन हठीली भी हैं। प्रयाग महिला विद्यापीठ इसका प्रमाण है। मूल रूप में निराला जी को महल देने में लिए ही उन्होंने साहित्यकार संसद की योजना बना डाली और उसे साकार करके ही दम लिया। हिंदी रंगमच की पुनर्स्थापना या स्वप्न उन दिनों उनके मनोलोक पर छाया हुआ था। लखनऊ में भारती से होने वाली बातें उस समय मेरे मन में फिर गूँज उठी। मैंने उसी दिन जाकर जीजी को अपनी ओर से दानामुक्त कर दिया। वहाँ भी ख़ूब हँसी रही। ख़ैर, दो-तीन रोज़ के भीतर ही जीजी यह जान गई कि उनका रंगवाणी का सपना मेरा अपना सपना भी है।
मैं इस नाटक में नटराज उदयशंकर जी से सीखी हुई जालीदार पर्दे की, उस समय के हिसाब से नई, एक तरकीब का प्रयोग करना चाहता था। अपने बड़े बेटे चि० कुमुद से दो छोटे-छोटे नमूने में पर्दे रंगवाकर मैं साथ लाया था और पंतजी के घर पर जीजी, राव साहब (श्री बालकृष्ण राव) और उमाजी को उसका करिश्मा दिखला चुका था। जीजी को पर्दे की तैयारी के संंबंध में शंका थी, कहने लगी देखो। जैसा तुम चाहते हो वैसा बन जाए। इलाहाबाद तो बंबईं नहीं है।
पेंटर की तलाश हो रही थी पर राय साहब का मन भर नहीं रहा था। एक दिन उमाजी कहने लगी महादेवी जी कह रही थी कि ट्रिक वाले पर्दे का मोह छोड़ ही दिया जाए तो अच्छा होगा। अगर ख़राब बना तो नाटक पर उसका दुष्प्रभाव भी निश्चित रूप स पड़ेगा। लेकिन यहाँ मैं आसानी से समझौता करने को राज़ी न हुआ। राव साहब की शरण गही कि यह तो नाक का सवाल है, हमारी भी और आपकी भी। इलाहाबाद भले ही बंबई न हो पर रेगिस्तान भी नही है। राव साहब की लगन भी जाग उठी। दो-तीन दिनों तक पेंटर की खोज में वे इलाहाबाद का आकाश-पाताल एक करते रहे और अंत में बंबई के एक फ़िल्म स्टूडियो में नाम कर चुकने वाले एक रंगसाज़ को ही उन्होंने इलाहाबाद की गलियों से खोज निकाला।
शौकिया रंगमच के कलाकारों को आमतौर से नाटक के 'टका' आयोजकों से यह शिकायत बनी ही रहती है कि रिहर्सल के दिनों में वे लोग कलाकारों के चाय-नाश्ते का प्रबंध उनके मनोनुकूल नहीं कराते। लेकिन यहाँ तो स्वयं महादेवी जी ही 'मालिक्-कंपनी' थी। नाश्ता कराने में लिए वे स्वयं आती थी। अपने-अपने दफ़्तरों से सीधे रिहर्सल-स्थल पर आने वाले कला के भूतों को ऐसा संतोष कभी और कहीं नहीं मिला था। पर मेरे लिए जीजी के कारण एक परेशानी भी पैदा हो गई। जलपान कराने के बाद वे रिहर्सल देखने के लिए बैठ जाती थी। उनके रौब के मारे मेरे कलाकार काठ हो जाते थे। यह तमाशा दो दिनों तक चला। मैं घबराया, पर यह घबराहट ऊपरी थी, मन को यह विश्वास था कि यदि जीजी से कहूँगा तो वे बुरा नही मानेंगी। और अपनी विपदा मैंने उनसे निवेदित भी कर दी। कहने लगी अच्छा भाई, कल से नहीं बैठूँगी। पर नाटक के दिन तो बड़े-बड़े साहित्यिक आएँगे। तुम्हारे कलाकार जब मुझी से इतना घबराते हैं तो उस दिन क्या होगा?
मैंने कहा मुँह पर रंग पोतते ही अभिनेता शेर हो जाता है। उस दिन की च़िंता आप न करें।
दूसरे दिन हम लोगों को जलपान कराने के बाद जीजी तुरंत उठ खड़ी हुई। किसी ने कहा भी कि थोड़ी देर विराजें, परंतु आप मेरी ओर देखकर हँसते हुए बोली ना भाई, ये मुझे मना कर चुका है। कहता है कि कलाकार मेरी उपस्थिति के रौब से घबरा जाते हैं। 'रोब' शब्द उच्चरित करते न करते उनकी हँसी का झरना झर पड़ा।
मैंने अभिनेताओ को ललकारा। हमारी टोली वे कलाकार सचमुच ही इलाहाबाद के नौरतन थे। जीजी की हँसी मेरे हाथ में चुनौती भी तलवार बनकर खेली। और फिर तो ऐसा रिहर्सल जमा है कि मज़ा आ गया। एक दृश्य देखकर जीजी मगन मन गई। उस दिन के बाद से जलपान लेकर आना भी छोड़ दिया। जलपान-व्यवस्था के लिए कभी उमा जी, कभी दो लड़कियाँ और गंगाप्रसाद जी पांडेय तथा कभी-कभी राव साहब तब उनकी आर से बराबर उपस्थित होते रहे। वे स्वयं 'ग्राड रिहर्सल' के दिन ही हाल में पधारी। हम शौक़िया रंगमच के गुनाह बेलज़्ज़त ठोकरें खाने वाले प्रेमी जना की क़ौम को ऐसा 'मालिक कंपनी हाज़ा' बड़े नसीबों, वही मुश्किल से मिलता है।
ग्राड रिहर्सल के दिन वही हुआ जिसका कि जीजी को भय था, अर्थात पर्दा अपना पूरा जादू न दिया सका। अनिवार्य गड़बड़िया का देखने में निमित्त ही से मैं अपने द्वारा प्रदर्शित नाटकों के ग्राड रिहर्सल भी भीतर नहीं बैठा करता था। मैं दर्शकों में सबके पीछे अपनी काग़ज़ पेंसिल संभाले बैठा था। नाटक पूरा होते ही अगली पंक्ति में मराठी के मूर्धन्य नाटककार स्व० मामा वरेरयर जी के साथ बैठी हुई जीजी के पास आया। उनका चेहरा उतरा हुआ। मैंने कहा 'चिंता न करें, जो आज देखा है वह पल न देखें इसीलिए आज ही देख लिया। मेरा तो यही अभीष्ट था पर आप लोगा जैसी कला-मर्मज्ञ महान विभूतियाँ भी भीड़ के साथ बेटिकट का तमाशा देखने घुस आई तो भला बतलाइए मैं क्या करूँ?'
मेरी विदूषकता से वातावरण कुछ बदल गया। मामा से मेरा घनिष्ट परिचय था। उनकी उपस्थिति में प्रदक्षित कमज़ोरियाँ के कारण जीजी में मन पर एक प्रकार की झेप सी चढ़ी हुई थी। मैं उनके मन को पहचान गया। मैंने कहा कलाकारों की छोटी-मोटी चूकें बस आपको न दिखाई देगी।
'यह तो मैं भी समझती हूँ। अभिनेताओं से विशेष शिकायत आज नहीं है। सब ने अच्छा काम किया। कल शायद और भी अच्छा करेगे। पर तुम्हारा पर्दा अंतिम दृश्य में तो सचमुच बड़ा बुरा लगता है। दृश्य की करुणा को ही आघात पहुँचाता है। यह तो बहुत ही बुरा लगता है। एक प्रयोग किया, नहीं सफल हुआ, यह भाई लज्जा या दुःख की बात नहीं पर उसका प्रदर्शन करके नाटक का रंग बिगाड़ना तो ठीक नहीं है। इससे तुम लोग के कठिन परिश्रम के प्रति भी अन्याय होता है और दर्शकों के प्रति भी। तुम सादे नीले पर्दे का प्रयोग करो।
जीजी का भय मेरे लिए निर्मूल था, उस दोष को दूर कर देना तनिक भी कठिन न था। पर जीजी अब कुछ-कुछ हठ पकड़ गई थी। मैं चुप ही रहा, न हाँ कहीं न ना।
दूसरे दिन नाट्य प्रदर्शन में बाद जीजी की संतोष भरी, गवभरी, आनंदमग्न श्रीमुख छवि जो उस समय देखी थी वह मेरे मन में इस समय भी वैसी ही सजीव होकर उभर रही है।
kavya vyaktitv ke atirikt mahadeviji ke darshan bhi pahle mujhe ‘chaand’ hi ke madhyam se hue the. ek chitr ki smriti ab tak sajiv hai, mahadevi varma, subhadrakumari chauhan aur chandravti lakhanpal ka chitr chhapa tha. ye triputi un dinon bahut prasiddh thi. chandravti ji aaj vismriti ke garbh mein vilin ho chuki hai.
hindi, bangla, gujarati aur marathi ki kavitayen ab bhi baDe chaav se paDhta hoon. devanagari lipi mein prakashit urdu kavya paDhne ka chaska bhi chaand hi ki kripa se laga tha aur ab tak hai. pahle hindi bhasha ke anek ne purane kaviyon ki bahut si kavitayen mainne yaad bhi ki thi. mahadevi ji ki main neer bhari dus ni badli, ashrumay komal, kahan tu aa gai pardeshini ree mainne bahut dinon tak gungunai.
ye sab hote hue bhi unke sakshat darshan pane ka saubhagya mujhe san 42 43 se pahle na mil saka. agast andolan ve kuch mahinon baad babii se ghar gaya tha aur vahan se nirala ji ke darshan karne prayag. un dinon ve gairikvastrdhari the.
mahadevi te mile ho? unhone puchha. mere nakarne par bole chalo.
is prakar varshon ki saagh puri hui. smritipat par ab sab kuch ankit nahin rah gaya. teen baten yaad hain. ek mahadevi ji ki hansi. aisa lagta tha ki jaise unke saath saath unke bhitar vali koi shakti unse hansne mein hoDh le rahi ho. hum log amtaur par phuhare ki uupri khilkhilahat ko dekhkar hi prasann hote hai, uske srot ka ullasmay veg nahin dekhte. geet mein shabd aur raag dono hi ki apni apni mahima bhi hai, bhale hi gayak ke madhurkanth rupi vyaktitv ke prabhav se ve ek roop hokar jhalke aur us prabhav ki mahima ananya ho.
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san samvat theek theek yaad nahin, shayad 54 ya 55 ki baat hai, magar ye yaad hai ki joon ka antim saptah tha. dharmavir bharti sahityakar sansad dvara takula nainital mein ayojit greeshm shivir ke karyakrmo mein bhaag lekar sidhe lakhanuu, mere yahan aaye the. mainne vahan ve haal haval puchhe. bharti bole wo sab bhi sunaunga par pahle jiji ka ek adesh sun lijiye. aapko pandrrah dinon ne andar bhartendu ji ki jivani par avarit ek naatk likhna hai. naatk likhpar turant ilahabad ajaiye. bhartendu ji ki janyti ke din rangvani ka udghatan samaroh hoga. samay kam hai. naatk ka digdarshan bhi aap hi ko karna hai.
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main is naatk mein natraj udayshankar ji se sikhi hui jalidar parde ki, us samay ke hisab se nai, ek tarkib ka prayog karna chahta tha. apne baDe bete chi० kumud se do chhote chhote namune mein parde rangvakar mein saath laya tha aur pantji ke ghar par jiji, raav sahab (shri balkrishn raav) aur umaji ko uska karishma dikhla chuka tha. jiji ko parde ki taiyari ke savadh mein shanka thi, kahne lagi dekho. jaisa tum chahte ho vaisa ban jaye. ilahabad to bambii nahin hai.
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graaD riharsal ke din vahi hua jiska ki jiji ko bhay tha, arthat parda apna pura jadu na diya saka. anivarya gaDabaDiya ya dekhne mein nimitt hi se mein apne dvara pradarshit nataka ke graaD riharsal bhi bhitar nahin baitha karta tha. main darshka mein sabke pichhe apni kaghaz pensil samhale baitha tha. naatk pura hote hi agli pankti mein marathi ke murdhanya natakkar sva० mama vareryar ji ke saath baithi hui jiji ke paas aaya. unka chehra utra hua. mainne kaha chinta na karen, jo aaj dekha hai wo pal na dekhen isiliye aaj hi dekh liya. mera to yahi abhisht tha par aap loga jaisi kala marmagya mahan vibhutiyan bhi bheeD ke saath betikat ka tamasha dekhne ghus aai to bhala batlaiye mein kya karun?
meri vidushakta se vatavran kuch badal gaya. mama se mera ghanisht parichay tha. unki upasthiti mein prdakshit kamzoriyan ke karan jiji mein man par ek prakar ki jhep si chaDhi hui thi. main unke man ko pahchan gaya. mainne kaha kalakaron ki chhoti moti chuken bas aapko na dikhai degi.
ye ta main bhi samajhti hoon. abhinetaon se vishesh shikayat aaj nahin hai. sab ne achchha kaam kiya. bal shayad aur bhi achchha karne. par tumhara parda antim drishya mein to sachmuch baDa bura lagta hai. drishya ki karan ko hi aghat pahunchata hai. ye to bahut hi bura lagta hai. ek prayog kiya, nahin saphal hua, ye bhai lajja ya duःkha ki baat nahin par uska pradarshan karke naatk ka rang bigaDna to theek nahin hai. isse tum log ke kathin parishram ke prati bhi anyay hota hai aur darshkon ke prati bhi. tum sade nile parde ka prayog karo.
jiji ka bhay mere liye nirmul tha, us dosh ko door kar dena tanik bhi kathin na tha. par jiji ab kuch kuch hath pakaD gai thi. main chup hi raha, na hi kahin na na.
dusre din natya pradarshan mein baad jiji ki santosh bhari, gavabhri, anandmagn shrimukh chhavi jo us samay dekhi thi wo mere man mein is samay bhi vaisi hi sajiv hokar ubhar rahi hai.
kavya vyaktitv ke atirikt mahadeviji ke darshan bhi pahle mujhe ‘chaand’ hi ke madhyam se hue the. ek chitr ki smriti ab tak sajiv hai, mahadevi varma, subhadrakumari chauhan aur chandravti lakhanpal ka chitr chhapa tha. ye triputi un dinon bahut prasiddh thi. chandravti ji aaj vismriti ke garbh mein vilin ho chuki hai.
hindi, bangla, gujarati aur marathi ki kavitayen ab bhi baDe chaav se paDhta hoon. devanagari lipi mein prakashit urdu kavya paDhne ka chaska bhi chaand hi ki kripa se laga tha aur ab tak hai. pahle hindi bhasha ke anek ne purane kaviyon ki bahut si kavitayen mainne yaad bhi ki thi. mahadevi ji ki main neer bhari dus ni badli, ashrumay komal, kahan tu aa gai pardeshini ree mainne bahut dinon tak gungunai.
ye sab hote hue bhi unke sakshat darshan pane ka saubhagya mujhe san 42 43 se pahle na mil saka. agast andolan ve kuch mahinon baad babii se ghar gaya tha aur vahan se nirala ji ke darshan karne prayag. un dinon ve gairikvastrdhari the.
mahadevi te mile ho? unhone puchha. mere nakarne par bole chalo.
is prakar varshon ki saagh puri hui. smritipat par ab sab kuch ankit nahin rah gaya. teen baten yaad hain. ek mahadevi ji ki hansi. aisa lagta tha ki jaise unke saath saath unke bhitar vali koi shakti unse hansne mein hoDh le rahi ho. hum log amtaur par phuhare ki uupri khilkhilahat ko dekhkar hi prasann hote hai, uske srot ka ullasmay veg nahin dekhte. geet mein shabd aur raag dono hi ki apni apni mahima bhi hai, bhale hi gayak ke madhurkanth rupi vyaktitv ke prabhav se ve ek roop hokar jhalke aur us prabhav ki mahima ananya ho.
dusri baat filmon se sambandhit thi. adarniy bhai vachaspati ji pathak unhen shayad kuch hi din pahle ye batala ge the ki mainne sangam namak ek tatkalin film mein parsad ji ka ek geet (are vahi dekha hai tumne mujhe pyaar karne vale ko prayukt kiya hai. bahne lagi nirala ji aur pant ji ke giton ko bhi filmon mein lena chahiye.
tisri baat agast san 42 ve andolan se sambandhit thi. angrez sarkar ne bharat chhoDo andolan ko baDi berahmi se kuchla tha. mahadevi ji un dinon gram seva vart dharini thi. apne anubhav, damanchakr se bhaybhit deen heen kisanon ki dasha ka varnan marte karte ekayek chup ho gain phir kahne lagi hamara andolan ab shayad anek varshon tak apni shakti na pa sakega.
iske baad prayag jane par unse kai baar mila. usi daur mein kab se mainne unhe jiji kahna shuru kar diya ye ab yaad nahin jata.
jiji phir em० el० see० ho gain. unke lakhanuu aane jane mein banak svabhavik roop se banne lage. jab aati, vidhayak nivas se unka telifon sandesh mujhe milta, main darshan karne jata.
sva० panDit govind vallabh pant uttar pardesh ki rajagaddi chhoDkar dilli ki gaddi samhalne ja rahe the. vidhayak nivas ke kaman room mae lekhkon, patrkaron aur kalakaron ki or se unka vidai samaroh manaya gaya tha. katthak natavri nritya samrat thi shambhu maharaj ne apne nritya pradarshan se sabhi ko mugdhakiya. jiji bhi us samaroh mein thi. mujh par jiji ka raub ghalib dekhkar samaroh mein baad maharaj unke paas ge aur rahne lage dekhiye, aap nagar ji ko Dantiye. ye mera naam nahin karva dete. jiji ne maharaj mi tasalli ke liye mujhe turant ho Danta. ye baat abhi kuch ho mahinon pahle lakhanuu reDiyo kendr ke ek stauf artist sangitkar ne prsangvash suna kar meri yaad taza ki thi. iske baad—
san samvat theek theek yaad nahin, shayad 54 ya 55 ki baat hai, magar ye yaad hai ki joon ka antim saptah tha. dharmavir bharti sahityakar sansad dvara takula nainital mein ayojit greeshm shivir ke karyakrmo mein bhaag lekar sidhe lakhanuu, mere yahan aaye the. mainne vahan ve haal haval puchhe. bharti bole wo sab bhi sunaunga par pahle jiji ka ek adesh sun lijiye. aapko pandrrah dinon ne andar bhartendu ji ki jivani par avarit ek naatk likhna hai. naatk likhpar turant ilahabad ajaiye. bhartendu ji ki janyti ke din rangvani ka udghatan samaroh hoga. samay kam hai. naatk ka digdarshan bhi aap hi ko karna hai.
julai madhya tan natan likhkar mein ilahabad pahunch gaya aur taigor taun mein bharatbhushan agarval ne yahan Dera Daal diya. un dinon pant ji bhi taigor taun hi mein rahte the. unka tatha balkrishn raav ji na ghar bharat ke ghar ke paas hi tha. shaam ko pant ji ke ghar par hum sab ikattha hue, jiji bhi vahin aa gai. naatk suna gaya, sabko pasand bhi aaya. jiji boli naatk nachchha hai par ise rangmach par bhi achchha siddh hona chahiye. mama (varerkar) batlate the marathi ka rangmach bahut viksit hai. mein unhen to bula hi rahi hoon par aur bhi anya bhashabhashi natakkari ko bulvana chahti hain.
mainne kaha, main apni bharsak koi kamar na rakhunga, aage bhagvan natraj malik hai.
raat mein ghar aakar ilahabad mein raganklakaron ke sambandh mein bharatbhushan se miskot ki. ve un dinon akashvani mein kaam karte the. ilahabad se pahle lakhanuu kendr mein the. reDiyo ka Drama proDyusar hone se pahle bhi apne reDiyo natko mein riharsal main svayan hi karane jata ya. bharat meri ruchi aur avashyaktaon ko bhalibhanti samajhte the. patron ke chunav mein unki salah amtaur se bechuk hua karti thi. sab patron ka chunav ho gaya. ab bache svayan bhartendu. ve samasya ban ge. mainne kaha bahya roop se mekap mein to use bhartendu lagna hi chahiye par unke atः vyaktitv ka nirupan bhi use khubi se karna chahiye. ye pahli shart hai. tabhi meri jeet hogi. main lagbhag sachche tak samjhauta karne ko raji tha par iske baad nahin. mainne kaha, man ka kalakar na milne par main naya naatk likh dunga aur wo bhi is tarah se ki manch par bhartendu ki anupasthiti hi naatk ne ich ich mein unki upasthiti ka abhas kara de. bharat bole aap meri baat maniye, vijay bos ko trai kar lijiye. wo lagbhag sachche vali apaki shart puri kar denge. yadi aapko riharsal mein santosh na ho to phir dusra naatk likh lijiyega.
us chinta bhari raat ke baad ka savera bhi yaad rakhne layak ban gaya. lagbhag saDhe aath nau baje pantji padhare. pahle to ve naatk aur uske liye meri jalidar parde vali tarkib ki prshansa karte rahe phir hansakar kaha vadhu bura na maniyega, mahadevi ji ko aapke bhaang ke goli ki baDi chinta hai. kahne lagi ki bhaang vaang pike so ge aur naatk bhi taiyari mein kasar rah gai to baDi badnami hogi. mainne unse wo diya hai vadhu ki aap vadhu ki taraf se bilkul chinta na kare. main unhen bahut achchhi tarah se janta hoon. par aapse bhi kahta hoon vadhu, ajkal zara gole vole kam ghataiyega. aur kuch nahin to nahi tabiyat hi kharab ho jaye.
mujhe baDi zor se hansi agii. pantji se, maryadabaddh rahte hue bhi main mukt rup se hansi mazak kar leta hoon, par jiji hone ke bavjud mahadevi ji se mera tab parichit maatr hone hi ka nata tha. pantji ki is baat ke pichhe mujhe jiji ka manochitr ubharta dikhlai diya. svapnvadini to ve hai hi saath hi apne sapnon ko sakar karne ke prati ve baDhi lagan hathili bhi hain. prayag mahila vidyapith iska prmaan hai. mool roop mein nirala ji ko mahl dene mein liye hi unhonne sahityakar sansand ki yojna bana Dali aur use sakar karke hi dam liya. hindi rangmach ki punarsthapna ya svapn un dinon unke manolok par chhaya hua tha. lakhanuu mein bharti se hone vali baten us samay mere man mein phir goonj uthi. mainne usi din jakar jiji ko apni or se danamukt kar diya. vahan bhi khoob hansi rahi. khair, do teen roz ke bhitar hi jiji ye jaan gai ki unka rangdani ka sapna mera apna sapna bhi hai.
main is naatk mein natraj udayshankar ji se sikhi hui jalidar parde ki, us samay ke hisab se nai, ek tarkib ka prayog karna chahta tha. apne baDe bete chi० kumud se do chhote chhote namune mein parde rangvakar mein saath laya tha aur pantji ke ghar par jiji, raav sahab (shri balkrishn raav) aur umaji ko uska karishma dikhla chuka tha. jiji ko parde ki taiyari ke savadh mein shanka thi, kahne lagi dekho. jaisa tum chahte ho vaisa ban jaye. ilahabad to bambii nahin hai.
pentar ki talash ho rahi thi par raay sahab ka man bhar nahin raha tha. ek din umaji kahne lagi mahadevi ji kah rahi thi ki trik vale parde ka moh chhoD hi diya jaye to achchha hoga. agar kharab bana to naatk par uska dushprabhav bhi nishchit roop sa paDega. lekin yahan main asani se samjhauta karne ko raji na hua. raav sahab ki sharan gahi ki ye to naak ka saval hai, hamari bhi aur apaki bhi. ilahabad bhale hi bambii na ho par registan bhi nahi hai. raav sahab ki lagan bhi jaag uthi. do teen dinon tak pentar ki khoj mein ve ilahavad ka akas patal ek karte rahe aur ant mein bambii ke ek film stuDiyo mein naam kar chukne vale ek rangsaj ko hi unhonne ilahabad ki galiyo se khoj nikala.
shaukiya rangmach ke kalakaron ko amtaur se naatk men taka ayojko se ye shikayat bani hi rahti hai ki riharsal ke dinon mein ve log kalakaron ke chaay nashte va prbandh unke manonukul nahin karate. lekin yahan to svayan mahadevi ji hi malik kampni thi. nashta karane mein liye ve svayan aati thi. apne apne daftron se sidhe riharsal sthal par aane vale kala ke bhuton ko aisa santosh kabhi aur vahi nahin mila tha. par mere liye jiji ke karan ek pareshani bhi paida ho gai. jalpan karane ke baad ve riharsal dekhne ke liye baith jati thi. unke raub ke mare mere kalakar kaath ho jate the. ye tamasha do dinon tak chala. main ghabraya, par ye ghabrahat uupri thi, man ko ye vishvas tha ki yadi jiji se kahunga to ve bura nahi manengi. aur apni vipda mainne unse nivedit bhi kar di. kahne lagi achchha bhai, kal se nahin baithungi. par naatk the din to baDe baDe sahityik ayenge. tumhare kalakar jab mujhi se itna ghabrate hain to us din kya hoga?
mainne kaha munh par rang potte ho abhineta sher ho jata hai. us din ki chita aap na karen.
dusre din hum logo ko jalpan karane ke baad jiji turant uth khaDi hui. kisi ne kaha bhi ki thoDi der virajen, parantu aap meri or dekhkar hanste hue boli na bhai, ye mujhe mana kar chuna hai. kahta hai ni kalakar meri upasthiti ke rob se ghabra jate hain. rob shabd uchcharit karte na karte unki hansi ka jharna jhar paDa.
mainne abhinetao ko lalkara. hamari toli ve kalakar sachmuch hi ilahabad ke nauratan the. jiji ki hansi mere haath mein chunauti bhi talvar bankar kheli. aur phir to aisa riharsal jama hai ki maza aa gaya. ek drishya dekhkar jiji magan man gai. us din ke baad se jalpan levar aana bhi chhoD diya. jalpan vyavastha ke liye nabhi uma ji, kabhi do laDkiyan aur gangaprsad ji panDey tatha nabhi abhi raav sahab tav unki aar se barabar upasthit hote rahe. ve svayan graaD riharsal ke din hi haal mein padhari. hum shaukiya rangmach ke gunah belajjat thokren jane vale premi jana ki qaum ko aisa malik kampni haja baDe nasibon, vahi mushkil se milta hai.
graaD riharsal ke din vahi hua jiska ki jiji ko bhay tha, arthat parda apna pura jadu na diya saka. anivarya gaDabaDiya ya dekhne mein nimitt hi se mein apne dvara pradarshit nataka ke graaD riharsal bhi bhitar nahin baitha karta tha. main darshka mein sabke pichhe apni kaghaz pensil samhale baitha tha. naatk pura hote hi agli pankti mein marathi ke murdhanya natakkar sva० mama vareryar ji ke saath baithi hui jiji ke paas aaya. unka chehra utra hua. mainne kaha chinta na karen, jo aaj dekha hai wo pal na dekhen isiliye aaj hi dekh liya. mera to yahi abhisht tha par aap loga jaisi kala marmagya mahan vibhutiyan bhi bheeD ke saath betikat ka tamasha dekhne ghus aai to bhala batlaiye mein kya karun?
meri vidushakta se vatavran kuch badal gaya. mama se mera ghanisht parichay tha. unki upasthiti mein prdakshit kamzoriyan ke karan jiji mein man par ek prakar ki jhep si chaDhi hui thi. main unke man ko pahchan gaya. mainne kaha kalakaron ki chhoti moti chuken bas aapko na dikhai degi.
ye ta main bhi samajhti hoon. abhinetaon se vishesh shikayat aaj nahin hai. sab ne achchha kaam kiya. bal shayad aur bhi achchha karne. par tumhara parda antim drishya mein to sachmuch baDa bura lagta hai. drishya ki karan ko hi aghat pahunchata hai. ye to bahut hi bura lagta hai. ek prayog kiya, nahin saphal hua, ye bhai lajja ya duःkha ki baat nahin par uska pradarshan karke naatk ka rang bigaDna to theek nahin hai. isse tum log ke kathin parishram ke prati bhi anyay hota hai aur darshkon ke prati bhi. tum sade nile parde ka prayog karo.
jiji ka bhay mere liye nirmul tha, us dosh ko door kar dena tanik bhi kathin na tha. par jiji ab kuch kuch hath pakaD gai thi. main chup hi raha, na hi kahin na na.
dusre din natya pradarshan mein baad jiji ki santosh bhari, gavabhri, anandmagn shrimukh chhavi jo us samay dekhi thi wo mere man mein is samay bhi vaisi hi sajiv hokar ubhar rahi hai.
हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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