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अमरनाथ झा

amarnath jha

हरिवंशराय बच्चन

और अधिकहरिवंशराय बच्चन

    इस शताब्दी के पहले दो दशकों में प्रयाग के शिक्षित-दीक्षित नागरिकों में जिनकी चर्चा बड़े आदर मान से हुआ करती थी वे थे पंडित मदनमोहन मालवीय, पंडित मोतीलाल नेहरू, सर तेजबहादुर सप्रू और महामहोपाव्याय पंडित गंगानाथ झा—मालवीय जी और नेहरू साहब का नाम देश-सेवा के क्षेत्र में, सप्रू साहब का न्याय के क्षेत्र में और झा महोदय का शिक्षा के क्षेत्र में। गंगानाथ जी म्योर सेंट्रल कॉलेज में संस्कृत-आचार्य के पद से उन्नति करके प्रयाग विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर पहुँचे थे और उन्होंने प्रायः 9 वर्षों तक विश्वविद्यालय की बागडोर सँभालकर 1932 में अवकाश ग्रहण किया था।

    अमरनाथ झा, पंडित गंगानाथ झा के द्वितीय पुत्र थे। उनका जन्म 1597 में हुआ और बचपन में ही अपने पिता के साथ दरभंगा से प्रयाग चले आए थे। उनकी शिक्षा कर्नलगंज स्कूल, गवर्नमेंट हाई स्कूल, म्योर सेंट्रल कॉलेज में हुई। उनके स्वाध्याय और उनकी बुद्धि को प्रखरता से अधिकारी वर्ग इतने प्रभावित थे कि जब वे स्वयं एम. ए. में पढ़ते थे, तभी उन्होंने बी. ए. को पढ़ाने का काम उन्हें दे रखा था। आगे चलकर वे प्रयाग विश्वविद्यालय के अँग्रेज़ी विभाग के अध्यक्ष हुए और 1938 में उपकुलपति के पद के लिए चुने गए। अपने पूज्य पिता के समान 9 वर्षों तक वे उस पद पर रहे, पश्चात् एक वर्ष के लिए काशी विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे, 6 वर्ष उत्तर प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन के अध्यक्ष, और 2 वर्ष बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन के अध्यक्ष। उनका देहावसान 1955 में पटना में हुआ।

    प्रयाग से उनको बड़ा प्रेम था। काशी जाने के पूर्व वे अकसर कहते थे कि मैं जब से प्रयाग आया तब से अब तक कभी भी एक साथ 6 महीने से अधिक प्रयाग के बाहर नहीं रहा। और यह 6 मास की अवधि भी केवल एक बार पहुँची थी, जब वे इंग्लैंड गए थे। उन्होंने प्रयाग नगर और प्रयाग विश्वविद्यालय की परंपरा को पूरी तरह ग्रहण किया था और उसके ऊपर अपनी पूरी छाप भी छोड़ी थी।

    झा साहब से मेरा संपर्क उस समय हुआ जब मैं एम. ए. में पहुँचा। उनकी विद्वत्ता और बुद्धि की प्रखरता की चर्चा इतनी सुन चुका था कि बहुत डरते-डरते उनके पास पहुँचा। वे एम. ए. का सेमिनार लिया करते थे जिसमें वे हर विद्यार्थी को अलग-अलग विषय पर लेख लिखने को दिया करते थे। यूनिवर्सिटी में उनका एक अलग कमरा था, दीवारें क़द्देआदम अलमारियों से ढकी, ठसाठस किताबों से भरी, मेज़ पर भी नई-से-नई पुस्तकें, पत्रिकाएँ, सामने कुर्सी पर गुरु गंभीर मुद्रा में झा साहब, बड़ा भारी सिर, ज्ञान के भंडार का प्रतीक, बड़ी-बड़ी आँखें, जिनसे किसी का भी अज्ञान छिपा नहीं रह सकता। क्लास में 6 लड़के, उन्हें सोचना नहीं पड़ा; खट-खट हर एक को निबंध का एक-एक विषय दे दिया और फिर हर एक को सहायक पुस्तकों की सूची बता दी—पुस्तक का नाम, लेखक का नाम, प्रकाशक का नाम, पत्रिका का लेख है तो उसका मास-वर्ष। विषयों पर जो कुछ कहना था, उन्होंने ही कहा, किसी को कुछ बोलने-पूछने की हिम्मत नहीं हुई। क्लास से निकले हैं तो जैसे किसी ने कानों में कहा है कि इज़्ज़त के साथ क्लास में बैठना है तो मेहनत करनी पड़ेगी।

    उन दिनों उनके एक्स्ट्रा मूरल लेक्चर भी कभी-कभी होते थे। वे सैकेंड की सुई से ठीक वक़्त पर पहुँचते, उनके आते ही सन्नाटा छा जाता, उनके व्याख्यान के पीछे गंभीर अध्ययन होता; विचारों की स्पष्टता होती, क्रम होता, संतुलन होता। उनके व्याख्यान में किसी के किसी तरह की गड़बड़ी मचाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। उनकी आँखें सबको देखती रहती थीं और सबको अपनी शक्ति से प्रभावित करती थीं। वे अपने व्यक्तित्व और अपने ज्ञान दोनों से दबंग थे।

    उनसे विशेष मिलने-जुलने का अवसर मुझे उन दिनों मिला जब वे विश्वविद्यालन के उपकुलपति हो गए थे और मैं अँग्रेज़ी विभाग में लेक्चरर था। अब तक मैंने केवल उन्हें विद्यार्थी की दृष्टि से देखा था, दर्जे में, या लेक्चर हाल में। अव यदा-कदा घर पर भी उनके दर्शन करने का सुयोग मिला। एक बार मैं लगभग एक मास उनके मंसूरी के लिनवुड कॉटेज में उनके साथ ठहरा था। और इस प्रकार उनकी दिनचर्या और उनकी कार्यविधि से भी परिचय प्राप्त कर सका था।

    यूँ तो उनका विशेष विषय अँग्रेज़ी साहित्य था, पर उनकी रुचि में विविधता थी—ज्ञान-विज्ञान के हर क्षेत्र में उनका थोड़ा-बहुत दख़ल था।अँग्रेज़ी के माध्यम से वे विभिन्न योरोपीय साहित्य से भी परिचित थे। भाषाएँ वे कई जानते थे। संस्कृत, बँगला, मैथिली, हिंदी और उर्दू। इनमें भी जो उच्चकोटि का साहित्य है, वह उन्होंने पढ़ रखा था। संस्कृत के कितने ही श्लोक उनकी ज़बान पर थे, जो प्रसंगानुसार वे सुना देते थे। रवींद्रनाथ ठाकुर की संपूर्ण बँगला रचनावली उनकी मेज़ पर रखी रहती थी। मैथिली उनकी मातृभाषा ही थी। उनके हिंदी लेखों का एक संग्रह भी छप चुका है। उर्दू कवियों पर उनके लेख प्रायः पत्रों में निकला करते थे। अब उनके ऐसे लेखों का संग्रह 'उर्दू पोएट्स ऐंड पोएट्री' के नाम से प्रकाशित हो चुका है। अँग्रेज़ी में 'शेक्सपीरियन कामिडी' के नाम से उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी। वे बिहारी के दोहों का अँग्रेज़ी अनुवाद भी कर रहे थे, मुझे पता नहीं कि उनके देहावसान के पश्चात् उनकी पांडुलिपियों का क्या हुआ।

    अपने घर पर उनका अधिक समय अपने रामकाशी पुस्तकालय में बीतता। उस पुस्तकालय में केवल पुस्तकें ही नहीं थीं; अनेक चित्रकारों के चित्रों और कलाकारों की कला-कृतियों से वह सुसज्जित था। शायद ही कोई प्रसिद्ध पत्र-पत्रिका ऐसी हो जो उनके यहाँ आती हो। पुस्तकें तो वे बराबर पढ़ते ही रहते थे, पत्र-पत्रिकाओं में भी कुछ अच्छा उनकी नज़र से छूटता था। यह सारी सामग्री उनके मित्रों और विद्यार्थियों के लिए खुली थी। लोग बराबर उनके पुस्तकालय से किताबें ले जाते थे। मैंने जब 'खैयाम की मधुशाला' की भूमिका लिखनी चाही तो प्रयाग के सब पुस्तकालयों से अधिक सामग्री उस विषय पर मुझे झा साहब के पुस्तकालय में मिली।

    इस प्रकार झा साहब एक सुसंस्कृत व्यक्तित्व के प्रतीक बन गए थे। यूनिवर्सिटी या नगर में किसी भी सांस्कृतिक अवसर या पर्व पर उनके व्याख्यान सारगर्भित और आनंददायक होते थे।

    कला और संस्कृति के सब प्रकार के आयोजनों में वे रुचि लेते थे। चित्र-प्रदर्शनी, संगीत-सम्मेलन, कवि सम्मेलन, नाट्य-प्रदर्शन सभी को उनका सहयोग मिलता था। कवि सम्मेलन और मुशायरे उनके घर पर बराबर हुआ करते थे। अपने समकालीन उर्दू और हिंदी के प्रायः सभी कवियों से उनका व्यक्तिगत संपर्क था।

    उनके कार्य के क्षेत्र बहुत विस्तृत और विविध थे। छोटी-सी वार्ता में सब पर प्रकाश डालना संभव नहीं। प्रमुख रूप में वे प्रयाग विश्वविद्यालय के उप-कुलपति के रूप में स्मरण किए जाएँगे। उनका द्वार उनके प्रत्येक विद्यार्थी के लिए खुला रहता था। वे जहाँ तक संभव हो सकता था सबकी बात सुनते थे, सबको उचित सलाह देते थे। जाने कितने विद्यार्थियों के जीवन को उन्होंने बनाया था। एक बार यूनिवर्सिटी छोड़कर जो मैं फिर यूनिवर्सिटी में आया, यह उन्हीं की प्रेरणा का प्रभाव था। विद्याथियों से संपर्क रखना उनको इतना प्रिय था कि वाइस चैसेलर हो जाने के बाद भी वे इतना समय निकाल लेते थे कि बी. ए. के विद्यार्थियों का एक सेमिनार लिया करते थे। यूनिवर्सिटी छोड़ने के बाद भी वे अपने विद्यार्थियों की खोज ख़बर रखते थे। जब कभी यात्रा पर जाते, विभिन्न स्टेशनों पर अपने विद्याथियों को सूचना देकर बुलाते और उनसे मिलते।

    उनकी पत्नी का देहावसान उनके यौवन-काल में ही हो गया था। उनका अपना कोई पारिवारिक जीवन नहीं था। उनका परिवार था उनके प्रेमियों का, विद्यार्थियों का। सुबह और शाम के कई घंटे लोगों से मिलने-मिलाने के लिए होते थे। यूनिवर्सिटी से अलग होने पर भी उनके दरबार में लोग बराबर जमा रहते थे।

    आवश्यकता है कि उनकी एक विस्तृत जीवनी लिखी जाए। अभी बहुत-से लोग और बहुत-सी सामग्री मिल सकती है जो इस दिशा में सहायक हो सके।

    जब-जब उत्तर भारत के विद्या और शिक्षा-विशारदों की चर्चा होगी, अमरनाथ झा को आदर से स्मरण किया जाएगा।

    जनवरी, 59

    स्रोत :
    • पुस्तक : नए पुराने झरोखे (पृष्ठ 248)
    • रचनाकार : हरिवंशराय बच्चन
    • प्रकाशन : राजपाल एंड संस

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