इस शताब्दी के पहले दो दशकों में प्रयाग के शिक्षित-दीक्षित नागरिकों में जिनकी चर्चा बड़े आदर मान से हुआ करती थी वे थे पंडित मदनमोहन मालवीय, पंडित मोतीलाल नेहरू, सर तेजबहादुर सप्रू और महामहोपाव्याय पंडित गंगानाथ झा—मालवीय जी और नेहरू साहब का नाम देश-सेवा के क्षेत्र में, सप्रू साहब का न्याय के क्षेत्र में और झा महोदय का शिक्षा के क्षेत्र में। गंगानाथ जी म्योर सेंट्रल कॉलेज में संस्कृत-आचार्य के पद से उन्नति करके प्रयाग विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर पहुँचे थे और उन्होंने प्रायः 9 वर्षों तक विश्वविद्यालय की बागडोर सँभालकर 1932 में अवकाश ग्रहण किया था।
अमरनाथ झा, पंडित गंगानाथ झा के द्वितीय पुत्र थे। उनका जन्म 1597 में हुआ और बचपन में ही अपने पिता के साथ दरभंगा से प्रयाग चले आए थे। उनकी शिक्षा कर्नलगंज स्कूल, गवर्नमेंट हाई स्कूल, म्योर सेंट्रल कॉलेज में हुई। उनके स्वाध्याय और उनकी बुद्धि को प्रखरता से अधिकारी वर्ग इतने प्रभावित थे कि जब वे स्वयं एम. ए. में पढ़ते थे, तभी उन्होंने बी. ए. को पढ़ाने का काम उन्हें दे रखा था। आगे चलकर वे प्रयाग विश्वविद्यालय के अँग्रेज़ी विभाग के अध्यक्ष हुए और 1938 में उपकुलपति के पद के लिए चुने गए। अपने पूज्य पिता के समान 9 वर्षों तक वे उस पद पर रहे, पश्चात् एक वर्ष के लिए काशी विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे, 6 वर्ष उत्तर प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन के अध्यक्ष, और 2 वर्ष बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन के अध्यक्ष। उनका देहावसान 1955 में पटना में हुआ।
प्रयाग से उनको बड़ा प्रेम था। काशी जाने के पूर्व वे अकसर कहते थे कि मैं जब से प्रयाग आया तब से अब तक कभी भी एक साथ 6 महीने से अधिक प्रयाग के बाहर नहीं रहा। और यह 6 मास की अवधि भी केवल एक बार पहुँची थी, जब वे इंग्लैंड गए थे। उन्होंने प्रयाग नगर और प्रयाग विश्वविद्यालय की परंपरा को पूरी तरह ग्रहण किया था और उसके ऊपर अपनी पूरी छाप भी छोड़ी थी।
झा साहब से मेरा संपर्क उस समय हुआ जब मैं एम. ए. में पहुँचा। उनकी विद्वत्ता और बुद्धि की प्रखरता की चर्चा इतनी सुन चुका था कि बहुत डरते-डरते उनके पास पहुँचा। वे एम. ए. का सेमिनार लिया करते थे जिसमें वे हर विद्यार्थी को अलग-अलग विषय पर लेख लिखने को दिया करते थे। यूनिवर्सिटी में उनका एक अलग कमरा था, दीवारें क़द्देआदम अलमारियों से ढकी, ठसाठस किताबों से भरी, मेज़ पर भी नई-से-नई पुस्तकें, पत्रिकाएँ, सामने कुर्सी पर गुरु गंभीर मुद्रा में झा साहब, बड़ा भारी सिर, ज्ञान के भंडार का प्रतीक, बड़ी-बड़ी आँखें, जिनसे किसी का भी अज्ञान छिपा नहीं रह सकता। क्लास में 6 लड़के, उन्हें सोचना नहीं पड़ा; खट-खट हर एक को निबंध का एक-एक विषय दे दिया और फिर हर एक को सहायक पुस्तकों की सूची बता दी—पुस्तक का नाम, लेखक का नाम, प्रकाशक का नाम, पत्रिका का लेख है तो उसका मास-वर्ष। विषयों पर जो कुछ कहना था, उन्होंने ही कहा, किसी को कुछ बोलने-पूछने की हिम्मत नहीं हुई। क्लास से निकले हैं तो जैसे किसी ने कानों में कहा है कि इज़्ज़त के साथ क्लास में बैठना है तो मेहनत करनी पड़ेगी।
उन दिनों उनके एक्स्ट्रा मूरल लेक्चर भी कभी-कभी होते थे। वे सैकेंड की सुई से ठीक वक़्त पर पहुँचते, उनके आते ही सन्नाटा छा जाता, उनके व्याख्यान के पीछे गंभीर अध्ययन होता; विचारों की स्पष्टता होती, क्रम होता, संतुलन होता। उनके व्याख्यान में किसी के किसी तरह की गड़बड़ी मचाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। उनकी आँखें सबको देखती रहती थीं और सबको अपनी शक्ति से प्रभावित करती थीं। वे अपने व्यक्तित्व और अपने ज्ञान दोनों से दबंग थे।
उनसे विशेष मिलने-जुलने का अवसर मुझे उन दिनों मिला जब वे विश्वविद्यालन के उपकुलपति हो गए थे और मैं अँग्रेज़ी विभाग में लेक्चरर था। अब तक मैंने केवल उन्हें विद्यार्थी की दृष्टि से देखा था, दर्जे में, या लेक्चर हाल में। अव यदा-कदा घर पर भी उनके दर्शन करने का सुयोग मिला। एक बार मैं लगभग एक मास उनके मंसूरी के लिनवुड कॉटेज में उनके साथ ठहरा था। और इस प्रकार उनकी दिनचर्या और उनकी कार्यविधि से भी परिचय प्राप्त कर सका था।
यूँ तो उनका विशेष विषय अँग्रेज़ी साहित्य था, पर उनकी रुचि में विविधता थी—ज्ञान-विज्ञान के हर क्षेत्र में उनका थोड़ा-बहुत दख़ल था।अँग्रेज़ी के माध्यम से वे विभिन्न योरोपीय साहित्य से भी परिचित थे। भाषाएँ वे कई जानते थे। संस्कृत, बँगला, मैथिली, हिंदी और उर्दू। इनमें भी जो उच्चकोटि का साहित्य है, वह उन्होंने पढ़ रखा था। संस्कृत के कितने ही श्लोक उनकी ज़बान पर थे, जो प्रसंगानुसार वे सुना देते थे। रवींद्रनाथ ठाकुर की संपूर्ण बँगला रचनावली उनकी मेज़ पर रखी रहती थी। मैथिली उनकी मातृभाषा ही थी। उनके हिंदी लेखों का एक संग्रह भी छप चुका है। उर्दू कवियों पर उनके लेख प्रायः पत्रों में निकला करते थे। अब उनके ऐसे लेखों का संग्रह 'उर्दू पोएट्स ऐंड पोएट्री' के नाम से प्रकाशित हो चुका है। अँग्रेज़ी में 'शेक्सपीरियन कामिडी' के नाम से उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी। वे बिहारी के दोहों का अँग्रेज़ी अनुवाद भी कर रहे थे, मुझे पता नहीं कि उनके देहावसान के पश्चात् उनकी पांडुलिपियों का क्या हुआ।
अपने घर पर उनका अधिक समय अपने रामकाशी पुस्तकालय में बीतता। उस पुस्तकालय में केवल पुस्तकें ही नहीं थीं; अनेक चित्रकारों के चित्रों और कलाकारों की कला-कृतियों से वह सुसज्जित था। शायद ही कोई प्रसिद्ध पत्र-पत्रिका ऐसी हो जो उनके यहाँ न आती हो। पुस्तकें तो वे बराबर पढ़ते ही रहते थे, पत्र-पत्रिकाओं में भी कुछ अच्छा उनकी नज़र से न छूटता था। यह सारी सामग्री उनके मित्रों और विद्यार्थियों के लिए खुली थी। लोग बराबर उनके पुस्तकालय से किताबें ले जाते थे। मैंने जब 'खैयाम की मधुशाला' की भूमिका लिखनी चाही तो प्रयाग के सब पुस्तकालयों से अधिक सामग्री उस विषय पर मुझे झा साहब के पुस्तकालय में मिली।
इस प्रकार झा साहब एक सुसंस्कृत व्यक्तित्व के प्रतीक बन गए थे। यूनिवर्सिटी या नगर में किसी भी सांस्कृतिक अवसर या पर्व पर उनके व्याख्यान सारगर्भित और आनंददायक होते थे।
कला और संस्कृति के सब प्रकार के आयोजनों में वे रुचि लेते थे। चित्र-प्रदर्शनी, संगीत-सम्मेलन, कवि सम्मेलन, नाट्य-प्रदर्शन सभी को उनका सहयोग मिलता था। कवि सम्मेलन और मुशायरे उनके घर पर बराबर हुआ करते थे। अपने समकालीन उर्दू और हिंदी के प्रायः सभी कवियों से उनका व्यक्तिगत संपर्क था।
उनके कार्य के क्षेत्र बहुत विस्तृत और विविध थे। छोटी-सी वार्ता में सब पर प्रकाश डालना संभव नहीं। प्रमुख रूप में वे प्रयाग विश्वविद्यालय के उप-कुलपति के रूप में स्मरण किए जाएँगे। उनका द्वार उनके प्रत्येक विद्यार्थी के लिए खुला रहता था। वे जहाँ तक संभव हो सकता था सबकी बात सुनते थे, सबको उचित सलाह देते थे। न जाने कितने विद्यार्थियों के जीवन को उन्होंने बनाया था। एक बार यूनिवर्सिटी छोड़कर जो मैं फिर यूनिवर्सिटी में आया, यह उन्हीं की प्रेरणा का प्रभाव था। विद्याथियों से संपर्क रखना उनको इतना प्रिय था कि वाइस चैसेलर हो जाने के बाद भी वे इतना समय निकाल लेते थे कि बी. ए. के विद्यार्थियों का एक सेमिनार लिया करते थे। यूनिवर्सिटी छोड़ने के बाद भी वे अपने विद्यार्थियों की खोज ख़बर रखते थे। जब कभी यात्रा पर जाते, विभिन्न स्टेशनों पर अपने विद्याथियों को सूचना देकर बुलाते और उनसे मिलते।
उनकी पत्नी का देहावसान उनके यौवन-काल में ही हो गया था। उनका अपना कोई पारिवारिक जीवन नहीं था। उनका परिवार था उनके प्रेमियों का, विद्यार्थियों का। सुबह और शाम के कई घंटे लोगों से मिलने-मिलाने के लिए होते थे। यूनिवर्सिटी से अलग होने पर भी उनके दरबार में लोग बराबर जमा रहते थे।
आवश्यकता है कि उनकी एक विस्तृत जीवनी लिखी जाए। अभी बहुत-से लोग और बहुत-सी सामग्री मिल सकती है जो इस दिशा में सहायक हो सके।
जब-जब उत्तर भारत के विद्या और शिक्षा-विशारदों की चर्चा होगी, अमरनाथ झा को आदर से स्मरण किया जाएगा।
जनवरी, 59
is shatabdi ke pahle do dashkon mein prayag ke shikshit dikshit nagarikon mein jinki charcha baDe aadar maan se hua karti thi ve the panDit madanmohan malaviy, panDit motilal nehru, sar tejabhadur sapru aur mahamhopavyay panDit ganganath jha—malaviy ji aur nehru sahab ka naam desh seva ke kshetr mein, sapru sahab ka nyaay ke kshetr mein aur jha mahoday ka shiksha ke kshetr mein. ganganath ji myor sentral kalej mein sanskrit acharya ke pad se unnati karke prayag vishvavidyalay ke upkulapti ke pad par pahunche the aur unhonne praayः 9 varshon tak vishvavidyalay ki bagaDor sanbhalakar 1932 mein avkash grhan kiya tha.
amarnath jha panDit ganganath jha ke dvitiy putr the. unka janm 1597 mein hua aur bachpan mein hi apne pita ke saath darbhanga se prayag chale aaye the. unki shiksha karnalganj skool, gavarnment hai skool, myor sentral kaulej mein hui. unke svadhyay aur unki buddhi ko prakharta se adhikari varg itne prabhavit the ki jab ve svayan em० e० mein paDhte the, tabhi unhonne bee० e० ko paDhane ka kaam unhen de rakkha tha. aage chalkar ve prayag vishvavidyalay ke angrezi vibhag ke adhyaksh hue aur 1938 mein upkulapti ke pad ke liye chune ge. apne pujya pita ke saman 9 varshon tak ve us pad par rahe, pashchat ek varsh ke liye kashi vishvavidyalay ke upkulapti rahe, 6 varsh uttar pardesh pablik sarvis kamishan ke adhyaksh, aur 2 varsh bihar pablik sarvis kamishan ke adhyaksh. unka dehavasan 1955 mein patna mein hua.
prayag se unko baDa prem tha. kashi jane ke poorv ve aksar kahte the ki main jab se prayag aaya tab se ab tak kabhi bhi ek saath 6 mahine se adhik prayag ke bahar nahin raha. aur ye 6 maas ki avadhi bhi keval ek baar pahunchi thi, jab ve inglainD ge the. unhonne prayag nagar aur prayag vishvavidyalay ki parampara ko puri tarah grhan kiya tha aur uske uupar apni puri chhaap bhi chhoDi thi.
jha sahab se mera sampark us samay hua jab main em० e० mein pahuncha. unki vidvatta aur buddhi ki prakharta ki charcha itni sun chuka tha ki bahut Darte Darte unke paas pahuncha. ve em० e० ka seminar liya karte the jismen ve har vidyarthi ko alag alag vishay par lekh likhne ko diya karte the. yunivarsiti mein unka ek alag kamra tha, divaren qaddeadam almariyon se Dhaki, thasathas kitabon se bhari, mej par bhi nai se nai pustken, patrikayen, samne kursi par guru gambhir mudra mein jha sahab, baDa bhari sir, gyaan ke bhanDar ka pratik, baDi baDi ankhen, jinse kisi ka bhi agyan chhipa nahin rah sakta. klaas mein 6 laDke, unhen sochna nahin paDa; khat khat har ek ko nibandh ka ek ek vishay de diya aur phir har ek ko sahayak pustkon ki suchi bata di—pustak ka naam, lekhak ka naam, prakashak ka naam, patrika ka lekh hai to uska maas varsh. vishyon par jo kuch kahna tha, unhonne hi kaha, kisi ko kuch bolne puchhne ki himmat nahin hui. klaas se nikle hain to jaise kisi ne kanon mein kaha hai ki izzat ke saath klaas mein baithna hai to mihnat karni paDegi.
un dinon unke ekstra mural lekchar bhi kabhi kabhi hote the. ve saikenD ki sui se theek vakt par pahunchte, unke aate hi sannata chha jata, unke vyakhyan ke pichhe gambhir adhyayan hota; vicharon ki spashtata hoti, kram hota, santulan hota. unke vyakhyan mein kisi ke kisi tarah ki gaDbaDi machane ki kalpana bhi nahin ki ja sakti thi. unki ankhen sabko dekhti rahti theen aur sabko apni shakti se prabhavit karti theen. ve apne vyaktitv aur apne gyaan donon se dabang the.
unse vishesh milne julne ka avsar mujhe un dinon mila jab ve vishvvidyalan ke upkulapti ho ge the aur main angrezi vibhag mein lekchrar tha. ab tak mainne keval unhen vidyarthi ki drishti se dekha tha, darje mein, ya lekchar haal mein. av yada kada ghar par bhi unke darshan karne ka suyog mila. ek baar main lagbhag ek maas unke mansuri ke linvuD kautej mein unke saath thahra tha. aur is prakar unki dincharya aur unki karyavidhi se bhi parichay praapt kar saka tha.
yon to unka vishesh vishay angrezi sahitya tha, par unki ruchi mein vivighta thi—gyan vigyan ke har kshetr mein unka thoDa bahut dakhal tha. angrezi ke madhyam se ve vibhinn yoropiy sahitya se bhi parichit the. bhashayen ve kai jante the. sanskrit, bangla, maithili, hindi aur urdu. inmen bhi jo uchchkoti ka sahitya hai, wo unhonne paDh rakha tha. sanskrit ke kitne hi shlok unki zaban par the, jo prsanganusar ve suna dete the. ravindrnath thakur ki sampurn bangla rachnavali unki mez par rakhi rahti thi. maithili unki matribhasha hi thi. unke hindi lekhon ka ek sangrah bhi chhap chuka hai. urdu kaviyon par unke lekh praayः patron mein nikla karte the. ab unke aise lekhon ka sangrah urdu poets ainD poetri ke naam se prakashit ho chuka hai. angrezi mein shekspiriyan kamiDi ke naam se unhonne ek pustak likhi thi. ve bihari ke dohon ka angrezi anuvad bhi kar rahe the, mujhe pata nahin ki unke dehavasan ke pashchat unki panDulipiyon ka kya hua.
apne ghar par unka adhik samay apne ramkashi pustakalaya mein bitta. us pustakalaya mein keval pustken hi nahin theen; anek chitrkaron ke chitron aur kalakaron ki kala kritiyon se wo susajjit tha. shayad hi koi prasiddh patr patrika aisi ho jo unke yahan na aati ho. pustken to ve barabar paDhte hi rahte the, patr patrikaon mein bhi kuch achchha unki nazar se na chhutta tha. ye sari samagri unke mitron aur vidyarthiyon ke liye khuli thi. log barabar unke pustakalaya se kitaben le jate the. mainne jab khaiyam ki madhushala ki bhumika likhni chahi to prayag ke sab pustkalyon se adhik samagri us vishay par mujhe jha sahab ke pustakalaya mein mili.
is prakar jha sahab ek susanskrit vyaktitv ke pratik ban ge the. yunivarsiti ya nagar mein kisi bhi sanskritik avsar ya parv par unke vyakhyan saragarbhit aur ananddayak hote the.
kala aur sanskriti ke sab prakar ke ayojnon mein ve ruchi lete the. chitr pradarshani, sangit sammelan, kavi sammelan, natya pradarshan sabhi ko unka sahyog milta tha. kavi sammelan aur mushayre unke ghar par barabar hua karte the. apne samkalin urdu aur hindi ke praayः sabhi kaviyon se unka vyaktigat sampark tha.
unke karya ke kshetr bahut tritttrit aur vividh the. chhoti si varta mein sab par parkash Dalna sambhav nahin. pramukh roop mein ve prayag vishvavidyalay ke up kulapti ke roop mein smran kiye jayenge. unka dvaar unke pratyek vidyarthi ke liye khula rahta tha. ve jahan tak sambhav ho sakta tha sabki baat sunte the, savko uchit salah dete the. na jane kitne vidyarthiyon ke jivan ko unhonne banaya tha. ek baar yunivarsiti chhoDkar jo main phir yunivarsiti mein aaya, ye unhin ki prerna ka prabhav tha. vidyathiyon se sampark rakhna unko itna priy tha ki vais chaiselar ho jane ke baad bhi ve itna samay nikal lete the ki bee० e० ke vidyarthiyon ka ek seminar liya karte the. yunivarsiti chhoDne ke baad bhi ve apne vidyarthiyon ki khoj khabar rakhte the. jab kabhi yatra par jate, vibhinn steshnon par apne vidyathiyon ko suchana dekar bulate aur unse milte.
unki patni ka dehavasan unke yauvan kaal mein hi ho gaya tha. unka apna koi parivarik jivan nahin tha. unka parivar tha unke premiyon ka, vidyarthiyon ka. subah aur shaam ke kai ghante logon se milne milane ke liye hote the. yunivarsiti se alag hone par bhi unke darbar mein log barabar jama rahte the.
avashyakta hai ki unki ek vistrit jivani likhi jaye. abhi bahut se log aur bahut si samagri mil sakti hai jo is disha mein sahayak ho sake.
jab jab uttar bharat ke vidya aur shiksha vishardon ki charcha hogi, amarnath jha ko aadar se smran kiya jayega.
janavri’ 59]
is shatabdi ke pahle do dashkon mein prayag ke shikshit dikshit nagarikon mein jinki charcha baDe aadar maan se hua karti thi ve the panDit madanmohan malaviy, panDit motilal nehru, sar tejabhadur sapru aur mahamhopavyay panDit ganganath jha—malaviy ji aur nehru sahab ka naam desh seva ke kshetr mein, sapru sahab ka nyaay ke kshetr mein aur jha mahoday ka shiksha ke kshetr mein. ganganath ji myor sentral kalej mein sanskrit acharya ke pad se unnati karke prayag vishvavidyalay ke upkulapti ke pad par pahunche the aur unhonne praayः 9 varshon tak vishvavidyalay ki bagaDor sanbhalakar 1932 mein avkash grhan kiya tha.
amarnath jha panDit ganganath jha ke dvitiy putr the. unka janm 1597 mein hua aur bachpan mein hi apne pita ke saath darbhanga se prayag chale aaye the. unki shiksha karnalganj skool, gavarnment hai skool, myor sentral kaulej mein hui. unke svadhyay aur unki buddhi ko prakharta se adhikari varg itne prabhavit the ki jab ve svayan em० e० mein paDhte the, tabhi unhonne bee० e० ko paDhane ka kaam unhen de rakkha tha. aage chalkar ve prayag vishvavidyalay ke angrezi vibhag ke adhyaksh hue aur 1938 mein upkulapti ke pad ke liye chune ge. apne pujya pita ke saman 9 varshon tak ve us pad par rahe, pashchat ek varsh ke liye kashi vishvavidyalay ke upkulapti rahe, 6 varsh uttar pardesh pablik sarvis kamishan ke adhyaksh, aur 2 varsh bihar pablik sarvis kamishan ke adhyaksh. unka dehavasan 1955 mein patna mein hua.
prayag se unko baDa prem tha. kashi jane ke poorv ve aksar kahte the ki main jab se prayag aaya tab se ab tak kabhi bhi ek saath 6 mahine se adhik prayag ke bahar nahin raha. aur ye 6 maas ki avadhi bhi keval ek baar pahunchi thi, jab ve inglainD ge the. unhonne prayag nagar aur prayag vishvavidyalay ki parampara ko puri tarah grhan kiya tha aur uske uupar apni puri chhaap bhi chhoDi thi.
jha sahab se mera sampark us samay hua jab main em० e० mein pahuncha. unki vidvatta aur buddhi ki prakharta ki charcha itni sun chuka tha ki bahut Darte Darte unke paas pahuncha. ve em० e० ka seminar liya karte the jismen ve har vidyarthi ko alag alag vishay par lekh likhne ko diya karte the. yunivarsiti mein unka ek alag kamra tha, divaren qaddeadam almariyon se Dhaki, thasathas kitabon se bhari, mej par bhi nai se nai pustken, patrikayen, samne kursi par guru gambhir mudra mein jha sahab, baDa bhari sir, gyaan ke bhanDar ka pratik, baDi baDi ankhen, jinse kisi ka bhi agyan chhipa nahin rah sakta. klaas mein 6 laDke, unhen sochna nahin paDa; khat khat har ek ko nibandh ka ek ek vishay de diya aur phir har ek ko sahayak pustkon ki suchi bata di—pustak ka naam, lekhak ka naam, prakashak ka naam, patrika ka lekh hai to uska maas varsh. vishyon par jo kuch kahna tha, unhonne hi kaha, kisi ko kuch bolne puchhne ki himmat nahin hui. klaas se nikle hain to jaise kisi ne kanon mein kaha hai ki izzat ke saath klaas mein baithna hai to mihnat karni paDegi.
un dinon unke ekstra mural lekchar bhi kabhi kabhi hote the. ve saikenD ki sui se theek vakt par pahunchte, unke aate hi sannata chha jata, unke vyakhyan ke pichhe gambhir adhyayan hota; vicharon ki spashtata hoti, kram hota, santulan hota. unke vyakhyan mein kisi ke kisi tarah ki gaDbaDi machane ki kalpana bhi nahin ki ja sakti thi. unki ankhen sabko dekhti rahti theen aur sabko apni shakti se prabhavit karti theen. ve apne vyaktitv aur apne gyaan donon se dabang the.
unse vishesh milne julne ka avsar mujhe un dinon mila jab ve vishvvidyalan ke upkulapti ho ge the aur main angrezi vibhag mein lekchrar tha. ab tak mainne keval unhen vidyarthi ki drishti se dekha tha, darje mein, ya lekchar haal mein. av yada kada ghar par bhi unke darshan karne ka suyog mila. ek baar main lagbhag ek maas unke mansuri ke linvuD kautej mein unke saath thahra tha. aur is prakar unki dincharya aur unki karyavidhi se bhi parichay praapt kar saka tha.
yon to unka vishesh vishay angrezi sahitya tha, par unki ruchi mein vivighta thi—gyan vigyan ke har kshetr mein unka thoDa bahut dakhal tha. angrezi ke madhyam se ve vibhinn yoropiy sahitya se bhi parichit the. bhashayen ve kai jante the. sanskrit, bangla, maithili, hindi aur urdu. inmen bhi jo uchchkoti ka sahitya hai, wo unhonne paDh rakha tha. sanskrit ke kitne hi shlok unki zaban par the, jo prsanganusar ve suna dete the. ravindrnath thakur ki sampurn bangla rachnavali unki mez par rakhi rahti thi. maithili unki matribhasha hi thi. unke hindi lekhon ka ek sangrah bhi chhap chuka hai. urdu kaviyon par unke lekh praayः patron mein nikla karte the. ab unke aise lekhon ka sangrah urdu poets ainD poetri ke naam se prakashit ho chuka hai. angrezi mein shekspiriyan kamiDi ke naam se unhonne ek pustak likhi thi. ve bihari ke dohon ka angrezi anuvad bhi kar rahe the, mujhe pata nahin ki unke dehavasan ke pashchat unki panDulipiyon ka kya hua.
apne ghar par unka adhik samay apne ramkashi pustakalaya mein bitta. us pustakalaya mein keval pustken hi nahin theen; anek chitrkaron ke chitron aur kalakaron ki kala kritiyon se wo susajjit tha. shayad hi koi prasiddh patr patrika aisi ho jo unke yahan na aati ho. pustken to ve barabar paDhte hi rahte the, patr patrikaon mein bhi kuch achchha unki nazar se na chhutta tha. ye sari samagri unke mitron aur vidyarthiyon ke liye khuli thi. log barabar unke pustakalaya se kitaben le jate the. mainne jab khaiyam ki madhushala ki bhumika likhni chahi to prayag ke sab pustkalyon se adhik samagri us vishay par mujhe jha sahab ke pustakalaya mein mili.
is prakar jha sahab ek susanskrit vyaktitv ke pratik ban ge the. yunivarsiti ya nagar mein kisi bhi sanskritik avsar ya parv par unke vyakhyan saragarbhit aur ananddayak hote the.
kala aur sanskriti ke sab prakar ke ayojnon mein ve ruchi lete the. chitr pradarshani, sangit sammelan, kavi sammelan, natya pradarshan sabhi ko unka sahyog milta tha. kavi sammelan aur mushayre unke ghar par barabar hua karte the. apne samkalin urdu aur hindi ke praayः sabhi kaviyon se unka vyaktigat sampark tha.
unke karya ke kshetr bahut tritttrit aur vividh the. chhoti si varta mein sab par parkash Dalna sambhav nahin. pramukh roop mein ve prayag vishvavidyalay ke up kulapti ke roop mein smran kiye jayenge. unka dvaar unke pratyek vidyarthi ke liye khula rahta tha. ve jahan tak sambhav ho sakta tha sabki baat sunte the, savko uchit salah dete the. na jane kitne vidyarthiyon ke jivan ko unhonne banaya tha. ek baar yunivarsiti chhoDkar jo main phir yunivarsiti mein aaya, ye unhin ki prerna ka prabhav tha. vidyathiyon se sampark rakhna unko itna priy tha ki vais chaiselar ho jane ke baad bhi ve itna samay nikal lete the ki bee० e० ke vidyarthiyon ka ek seminar liya karte the. yunivarsiti chhoDne ke baad bhi ve apne vidyarthiyon ki khoj khabar rakhte the. jab kabhi yatra par jate, vibhinn steshnon par apne vidyathiyon ko suchana dekar bulate aur unse milte.
unki patni ka dehavasan unke yauvan kaal mein hi ho gaya tha. unka apna koi parivarik jivan nahin tha. unka parivar tha unke premiyon ka, vidyarthiyon ka. subah aur shaam ke kai ghante logon se milne milane ke liye hote the. yunivarsiti se alag hone par bhi unke darbar mein log barabar jama rahte the.
avashyakta hai ki unki ek vistrit jivani likhi jaye. abhi bahut se log aur bahut si samagri mil sakti hai jo is disha mein sahayak ho sake.
jab jab uttar bharat ke vidya aur shiksha vishardon ki charcha hogi, amarnath jha ko aadar se smran kiya jayega.
हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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