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जप तप का बंधु बेड़ला

jap tap ka ba.ndhu beDa़la

गुरु नानक

गुरु नानक

जप तप का बंधु बेड़ला

गुरु नानक

जप तप का बंधु बेड़ला जितु लंघहि वहेला।

ना सरवरु ना ऊछलै ऐसा पंथु सुहेला॥

तेरा एको नामु मंजीठड़ा रता मेरा चोला सद रंग ढोला॥ रहाउ॥

साजन चले पिआरिआ किउ मेला होई।

जे गुण होवहि गंठड़ीऐ मेलेगा सोई॥

मिलिआ होइ वीछुड़ै जे मिलिआ होई।

आवागउणु निवारिआ है साचा सोई॥

हउमै मारि निवारिआ सीता है चोला॥

गुरबचनी फलु पाइआ सह के अंमृत बोला॥

नानकु कहै सहेली हो सहु खरा पिआरा।

हम सह केरीआ दासी साचा खसमु हमारा॥

(हे मनुष्य), जप-तप के बेडे को बाँधो, (जिससे संसार-सागर को) शीघ्रता से पार कर लो। (नाम के द्वारा) रास्ता ऐसा सुखदायी हो जाएगा (जैसा कि) समुद्र (का मार्ग होता) नहीं और यदि हो भी तो उछाल नहीं मारेगा।

(हे हरी), तेरा एक नाम भी मजीठी रंग है, हे प्रियतम, (उस मजीठी रंग में) मेरा चोला (वस्त्र, शरीर) पक्के रंगवाला हो गया है। (‘ढोला=दक्षिण पंजाब में ‘ढोला’ एक प्रसिद्ध प्रेमी हो गया है। ढोला ऐसा प्रसिद्ध प्रेमी हुआ कि उसका नाम ही ‘प्रियतम अथवा प्रेमी’ के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा]।

साजन (अपनी) प्यारियो की ओर चल पड़े है; किस प्रकार मिलाप होगा? (इस प्रश्न का उत्तर निम्नलिखित ढंग से गुरु नानक देव देते है)—(यदि उन स्त्रियों हों, तो वह (प्यारा आप ही उन्हें अपने मे) मिला लेगा’।

यदि (सच्चा) मिलाप हो, तभी के पश्चात विछोह नहीं होता। जो सच्चा (प्रभु) है, अपने आवगमन (जन्मन-मरना) निवारण कर दिया है। जिसने अहंकार को मारकर निवारण कर दिया है, उसका शरीर शीतल हो गया है, (तात्पर्य यह कि उसके त्रिविधि ताप शांत हो गए है। [इसका दूसरा अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है—“जिसने अहंकार को मारकर दूर कर दिया है, उसने पति—परमेश्वर के मिलने के लिए यह चोला सिया है।”]

नानक कहते हैं कि हे सहेलियों, पति (परमात्मा) बहुत प्यारा है। हम सभी पति (परमात्मा) की दासियों है, वही हमारा सच्चा पति है।

स्रोत :
  • पुस्तक : गुरु नानकदेव वाणी और विचार (पृष्ठ 241)
  • संपादक : रमेशचंद्र मिश्र
  • रचनाकार : गुरु नानक
  • प्रकाशन : संत साहित्य संस्थान
  • संस्करण : 2003

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