निर्गुन नाम निधान

संत केशवदास

निर्गुन नाम निधान

संत केशवदास

और अधिकसंत केशवदास

    निर्गुन नाम निधान, करो मन आरति हो।

    गंगा-जमुना-सरसुती, सुखमन घर बिसराम।

    निझर झरत अमृत रस निरमल, पीवहिं संत सुजान॥

    द्वादस पदुम पदारथ, मुक्ता नाम की खान।

    चंदन-चौक सरद उँजियारो, सकल बिस्व को पान॥

    अगम-अगोचर गुंजत निसु-दिन, तन-मन प्रान समान।

    अमर बिदेह भयो पद परसत, तिमिर मिटायो भान॥

    कारज-करम करै सो करता, अबिनासी निसु जान।

    औरन को अदृष्ट है कैसो, सोई पुरुष पुरान॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : केशवदासजी की अमीघूँट (पृष्ठ 5)
    • रचनाकार : केशवदास
    • प्रकाशन : बेलविडियर प्रिंटिग प्रेस, इलाहाबाद
    • संस्करण : 1979

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