युगलान्यशरण की संपूर्ण रचनाएँ
दोहा 33
जानकीवल्लभ नाम अति, मधुर रसिक उर ऐन।
बसे हमेशे तोम तम, शमन करन चित्त चैन॥
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महा मधुर रस धाम श्री, सीता नाम ललाम।
झलक सुमन भासत कबहुँ, होत जोत अभिराम॥
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जो भीजै रसराज रस, अरस अनेक बिहाय।
तिनको केवल जानकी, वल्लभ नाम सहाय॥
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यथा विषय परिनाम में, बिसर जात सुधि देह।
सुमिरत श्री सिय नाम गुन, कब इमि होय सनेह॥
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दरस पिआस निरास सब, स्वांस-स्वांस प्रतिनाम।
रटे घटे पल पाव नहिं, कबहूँ बिरह ललाम॥
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