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उषा प्रियंवदा

1930 | कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश

नई कहानी के दौर की चर्चित कहानीकार।

नई कहानी के दौर की चर्चित कहानीकार।

उषा प्रियंवदा का परिचय

नई कहानी के दौर की चर्चित महिला कहानीकारों की त्रयी में से एक; अन्य दो, मन्नू भंडारी और कृष्णा सोबती हैं।

उषा प्रियम्वदा का जन्म 24 दिसंबर सन् 1931 को इलाहाबाद में हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अँग्रेज़ी में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की और अँग्रेज़ी में ही पीएचडी हुई। मिरांडा हाउस, दिल्ली और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। तत्पश्चात, फ़ुलब्राइट स्कालरशिप पर पोस्टडॉक करने अमेरिका के ब्लूमिंगटन, इंडियाना गईं। वहीं विस्कांसिन विश्वविद्यालय, मैडीसन के दक्षिण एशियाई विभाग में प्रोफ़ेसर के पद से सेवानिवृत्त हुईं और वहीं रहती हैं।

कहानी संग्रह :- वनवास, कितना बड़ा झूठ, शून्य, जिंदग़ी और गुलाब के फूल(1961), एक कोई दूसरा(1966), फिर वसंत आया (1961), कितना बड़ा झूठ (1972)।

उपन्यास :- पचपन खंभे लाल दीवारे (1961), रुकोगी नहीं राधिका (1967), शेषयात्रा (1984), अंतर्वंशी (2000), भया कबीर उदास (2007), नदी (2013)।

उषा प्रियम्वदा की रचनाओं में संयुक्त परिवार का विघटन दिखता है तो आधुनिक जीवन की ऊब और अकेलेपन की स्थिति को भी चिह्नित किया जाता है। उनके कथा साहित्य में शहरी परिवारों के बड़े ही अनुभूति प्रवण चित्र हैं, और आधुनिक जीवन की उदासी, अकेलेपन, ऊब आदि का अंकन करने में उन्होंने अत्यंत गहरे यथार्थबोध का परिचय दिया है।

2007 में केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार से सम्मानित।

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