संत पीपा की संपूर्ण रचनाएँ
दोहा 98
उठ भाग्यो वाराणसी, न्हायो गंग हजार।
पीपा वे जन उत्तम घणा, जिण राम कयो इकबार॥
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सगुण मीठौ खांड सौ, निरगुण कड़वौ नीम।
पीपा गुरु जो परसदे, निरभ्रम होकर जीम॥
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जीव मारि जीमण कर, खाताँ करै बखाण।
पीपा परतखि देखि ले, थांली माँहि मसाण॥
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पीपा पाप न कीजिये, अलगौ रहिये आप।
करणी जासी आपणी, कुण बैटौ कुण बाप॥
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हाथाँ सो उधम करै, मुख सों उचरे नाम।
पीपा साधां रो धरम, रोम रमारे राम॥
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