मोहन की संपूर्ण रचनाएँ
दोहा 107
एक-रदन विद्या-सदन, उमा-नँदन गुन-कोष।
नाग-बदन मोदक-अदन, बिघन-कदन हर दोष॥
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प्रियतम को पोख्यो चहैं, प्रेम-पियासे नैन।
आँसु निगोरे चहत हैं, औसर पै दुख दैन॥
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रति-मदहर-वृषभानुजा, मूठि गुलालहि संग।
भेंट कियो ब्रजराज को, चंचल चित्त मतंग॥
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सरद-रैनि स्यामा सुभग, सोवति माधौ-संग।
उर उछाह लिपटति सुघर, राजत अंग अनंग॥
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फूलत कहा सरोज! तू, निज छबि अतुलित जान।
मम प्यारी मुख-कंज लखि, मिटि जैहै अभिमान॥
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