लालनाथ की संपूर्ण रचनाएँ
दोहा 30
होफाँ ल्यो हरनांव की, अमी अमल का दौर।
साफी कर गुरुग्यान की, पियोज आठूँ प्होर॥
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क्यूँ पकड़ो हो डालियाँ, नहचै पकड़ो पेड़।
गउवाँ सेती निसतिरो, के तारैली भेड़॥
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टोपी धर्म दया, शील की सुरंगा चोला।
जत का जोग लंगोट, भजन का भसमी गोला॥
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खेलौ नौखंड माँय, ध्यान की तापो धूणी।
सोखौ सरब सुवाद, जोग की सिला अलूणी॥
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प्रेम कटारी तन बहै, ग्यान सेल का घाव।
सनमुख जूझैं सूरवाँ, से लोपैं दरियाव॥
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