इलाचंद्र जोशी के निबंध
कला और नीति
कला का मूल उत्सव आनंद है। आनंद प्रयोजनातीत है। सुंदर फूल देखने से इमे आनंद प्राप्त होता है; पर उससे हमारा कोई स्वार्थ या प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। प्रभात की उज्ज्वलता और संध्या की स्निग्धता देखकर चित्त को एक अपूर्व शांति प्राप्त होती है; पर उससे हमें
साहित्य में वैयक्तिक कुंठा
व्यक्तिगत कुंठा मनुष्य की आधुनिक सभ्यता की देन है। आज के सभ्य जीवन में जो ऊपरी दिखावा, जो बनावटीपन आ गया है, उसने जीवन के सहज, सरल और स्वस्थ प्रवाह को चारों ओर से रूँध दिया है। इस अवरोध का फल यह देखने में आता है कि मनुष्य को पग-पग पर अपने भीतर के वास्तविक
भावी साहित्य और संस्कृति
इधर कुछ वर्षों से देश में एक नई जाग्रति की लहर उठी है, संदेह नहीं। एक नूतन स्फूति, देश के स्नायु-तंतुओं में संचारित हुई है। पर इस उन्मीलन का स्वरूप मुख्यत: राजनीतिक है। यह आवश्यक अवश्य है, पर निगूढ़ शिक्षा और विशुद्ध संस्कृति से उसका तनिक भी संबंध नहीं
भिन्नरूचिहिं लोक
रुचि की विभिन्नता भोजन से लेकर साहित्य-रसास्वादन तक सभी क्षेत्रों में पाई जाती है। इस रुचि के पीछे कोई वस्तुगत कारण नहीं होता, बल्कि मनोवैज्ञानिक कारण होता है। पर यह मनोवैज्ञानिक: कारण ऐसा प्रबल होता है कि दूसरों की किसी भी शिक्षा, निर्देशन या सुझाव