जे जन विपति कसौटी पावें
je jan vipati kasuTi paven
जे जन विपति कसौटी पावें।
सत्रु मित्र सम स्वजन विराने, सबै परख में आवें॥
संपति में अनजाने जनहुँ, नाते खोजि निकारें।
नाते गाम कहत बहनोऊ, विविध भाँति सतकारें॥
विपति ग्रसित स्यालहि नहिं मानत, देखि दूरितें भाजें।
नातो सगो तदपि जनि पगटत, ढिंग बैठारत लाजें॥
विपदा में निज होंय बिराने, नाते सगे बिसारें।
जो आवत घर बार अनेकन, ते न भूलि पगु धारें॥
संपति मीत रहे सोइ विपदा, निदरहिं दोष बखानें।
संपति नाते भरम रूप सब, बिरथा जाइ न जानें॥
रतन विपति में होई सहाई, सोइ आपनो जानौ।
सोई मीत बंधु निज घर को, अनि विडंबना मानौ॥
- पुस्तक : रत्नावली (पृष्ठ 53)
- संपादक : वेदव्रत शास्त्री
- रचनाकार : रत्नावली
- प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान
- संस्करण : 1990
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