'याद रखो मेरे शब्द!'
yaad rakho mere shabd!
कई क्षण ऐसे जो इतिहास बन जाते हैं
कई मौतें ऐसी जो अमर पद पा गईं।
शब्द भी ऐसे जो बजते हैं गीतों से अधिक मधुर
आदमी भी ऐसे जो—कोई कभी सोचेगा—सत्य की कोख से पैदा हुए।
न्गुएन वान त्रॉय 1
मौत तुम्हें लील गई,
नहीं-नहीं, तुम हरदम जीवित रहोगे
जीते-जागते, या मृत्यु की गोद में सोते हुए
महान वीर तुम कहाओगे।
मौत ने तुम्हारे होंठ बेशक बंद कर दिए
किंतु वह तुम्हारी चीख़— 'याद रखो मेरे शब्द!'
अब भी घुमड़ती है। और तुम्हारी आँखों से
फूटती रोशनी पार्टी के मुखपत्र पर दमकती है।
अब से हज़ार साल आगे भी याद करेंगे लोग
शरद ऋतु का वह सवेरा, ची होआ के बाड़े में सीना ताने तुम्हें
जेल के दो संतरियों के बीच चलते हुए
और पीछे-पीछे एक पादरी।
तुम्हारी टाँगें दर्द से डगमगाती हुई
लेकिन सिर शान से ऊँचा
तुम्हारे सफ़ेद कपड़े पाकीज़गी में रँगे हुए
और तुम्हारा दुबला-पतला जिस्म; मौत से ज़्यादा मज़बूत।
भाड़े के जल्लाद, तनख़्वाहदार अख़बारनवीस
दो मनहूस क़तारें। संगीन चढ़ी राइफ़लें।
तुम उनके साथ चलते हुए, तुम्हारी दृष्टि में निर्मलता
मानो फ़ैसला तुम्हें ही सुनाना हो।
तुम्हारे पैरों के नीचे की घास ने ताज़गी महसूस की
पत्तियों के हरेपन में ज़िंदगी ताज़ादम हो उठी
तुम्हारा वतन आज़ादी का दावा पेश करता हुआ
तुम्हारा जिस्म ज़िंदगी की ललक से भरपूर।
'मेरा ज़ुर्म क्या है?' तुम्हारी कड़क-भरी आवाज़,
उन्होंने तुम्हें खंभे से बाँध दिया, कस गईं रस्सियाँ।
दस बंदूक़ें मुँह पर तनी हुई, आँखों पर पट्टी,
तब भी सुनी गई तुम्हारी सिंहगर्जना : 'यांकी हत्यारे हैं!’
फाड़कर फेंक दिया तुमने काले कपड़े का लत्ता
आँखों से तुम्हारी फूटती लपटों ने झुलसा डाला मक्कार गुंडों को,
आँख से आँख मिलाते हुए तुमने मौत से मुलाक़ात की
तुम्हारा समूचा वजूद एक कभी न बुझने वाली आग बन गया।
ख़ौफ़ से काँपते हुए; कस दीं और ज़्यादा उन्होंने रस्सियाँ
नफ़रत से सुलग उठे तुम्हारे होंठ :
आदमी को एक कम्युनिस्ट की ही तरह जूझना चाहिए!
क्या बिगाड़ लेंगी बंदूक़ें किसी दिलजले का?
'पहली क़तार घुटने टेके!' —पल-भर भी नहीं गुज़रा
कि फिर गूँजी तुम्हारी चीख़ : 'याद रखो मेरे शब्द!'
अमरीकी साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!
न्गुएन कान्ह मुर्दाबाद!
हो ची मिन्ह ज़िंदाबाद!
ज़िंदाबाद हो ची मिन्ह!
हो ची मिन्ह ज़िंदाबाद!
उस पाक लम्हे में तुमने 'चचा' को तीन बार पुकारा।
फ़ायरों की बौछार। दस अमरीकी गोलियाँ
गिर पड़े तुम, लेकिन फिर खड़े हुए सँभलकर
बज उठी तुम्हारी आवाज़ : 'वियेतनाम ज़िंदाबाद!
ज़िंदाबाद वियेतनाम!
तेरा नाम मेरा नाम
वियेतनाम वियेतनाम!'
तुम्हारा ज़मीनी बिस्तर ख़ून से रँग गया।
और तुम मरकर भी अमर हो गए। एक आह तक
नहीं उभरी तुम्हारे सीने से। फ़ना हो गए किसी पैग़म्बर की तरह।
क्या ज़रूरत भला उस दिखावटी क्रूस की
पादरी जो तुम्हारी बग़ल में डाल गया?
साथी त्रॉय, तुम मरकर भी अमर हो। याद करो वह
ख़ून के बदले ख़ून वाला धारदार नारा!
तुम्हारे लिए अपनी मुहब्बत का इज़हार करते हुए
काराकास*2 के गेर्रिला दस्तों ने धर दबोचा
एक अमरीकी लुटेरे को अपने सद्रमुक़ाम में।
तुम अब नहीं हो, नहीं देख सकते अब
धधकते दक्खिन में गोलियों के बदले गोलियों का आह्वान
लेकिन कोई गोली तुम्हारे दिल की बराबरी नहीं कर सकती
चमक रही है तुम्हारी आख़िरी साँस से वह उल्का।
'याद रखो मेरे शब्द!'
न्गुएन वान त्रॉय, साथी,
हम याद रखेंगे तुम्हारे शब्द;
आदमी को शान से जीना और मरना चाहिए,
दुश्मन के मुक़ाबिल दबकना नहीं
बल्कि अपनी पितृभूमि के लिए सब कुछ निछावर कर देना,
जैसा तुमने किया; एक कामगार के बतौर।
- पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 278)
- रचनाकार : तो हू
- प्रकाशन : मेधा बुक्स
- संस्करण : 2003
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