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एयर हॉस्टेस

air haustes

अनुवाद : इबोहल सिंह काड़्जम

लाइश्रम समरेन्द्र सिंह

नीले आकाश के पथ पर

सफ़ेद बादलों के बीच

स्वर्ग की सुंदर रमणी

जाती है मेरे साथ छह घंटे

खुले आकाश में।

विशाल आकाश-सागर में

पर्वत, नदी, जंगल, शहर पार करके

उड़ते हैं साथ हम दोनों छह घंटे

खुले आकाश में।

शहर का कोलाहल

अमीरों का अभिमान

ग़रीबों की दरिद्रता

खाने-पीने की समस्या याद नहीं

सर्दी-गर्मी, दुख-दुविधा

गाँवों का मृत्यु-दुख, आँधी-तूफ़ान

सोचा नहीं था।

जंगल का भय, शीत

भयंकर रोमांचित

मांसाहारी जानवरों से हम डरते नहीं

पृथ्वी को देखा कठपुतली के खेल-सा

अचल पृथ्वी,

शाहजहाँ का ताजमहल

दिल्ली शहर, बंबई, कलकत्ता

उतरने की इच्छा नहीं होती पृथ्वी!

अचानक

दिखाई दिया ऊँचे टावर पेड़ों और बाँसों की फुनगियों के बीच

दिखाई दिया खुला मैदान अचानक

घूमते-घूमते देखा हवाई अड्डा

फैला हुआ देखा

एक के बाद एक पंक्तियों में लोगों का समूह

दोस्त, भीड़, बाप-बेटे, बहन—

भाई, माँ-बेटी

मेरी कमला, कमज़ोर, कई बच्चों की माँ

मेरी कमला

दुबली-पतली मेरे लिए दुखित!

कमला।

स्रोत :
  • पुस्तक : आधुनिक मणिपुरी कविताएँ (पृष्ठ 23)
  • संपादक : देवराज
  • रचनाकार : लाइश्रम समरेन्द्र सिंह
  • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
  • संस्करण : 1989

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