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मंगल गाई

mangal gai

कृष्णानन्द कृष्ण

और अधिककृष्णानन्द कृष्ण

    लोही लागल आसमान में लोग चिहाइल

    लागत बाटे अब दुरदिन के बदरी भागी

    अबतक रहे अभागा ओकर किस्मत जागी

    देख उजाला लोगिन के बा आखें मुदाइल।

    ढहल रीति-रेवाज, कहीं कइसन दिन आइल

    लोग छिपावत मुँह ऊहे, जे बडुए दागी

    जर के छार भइल बा दुसमन अपने आगी

    शीतल छाँह मिलल तब जाके मन अगराइल।

    आई बढ़ के अगुआनी में नया भोर के

    जात-जमात के तुरीं पगहा, गले लगाई

    पहचानीं कउवा के टँकलस पाँख मोर के

    जे गरीब बा, असली में बा ऊहे भाई

    अब मत पड़ीं फेर में भइया झूठ शोर के

    स्वागत में मिल एक दूजे के मंगल गाई।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आपन गाँव भेंटाते नइखे (पृष्ठ 19)
    • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
    • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2012

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