संस्कृति चिंतक के साथ

प्रभात त्रिपाठी

संस्कृति चिंतक के साथ

प्रभात त्रिपाठी

और अधिकप्रभात त्रिपाठी

    एक संस्कृति चिंतक के साथ

    महानदी के पानी को छूने की कोशिश में

    एक नुकीला कंकड़ चुभ गया था पाँव में

    क्या पता वह कोई काँटा हो,

    या सैलानियों के काँच के गिलास का

    कोई टुकड़ा,

    अचानक याद आने वाले दृश्यों में

    सैकड़ों बिंब ऐसे होते हैं,

    जो पानी की रचना के बावजूद

    मरुथल से कम सूखे नहीं होते,

    जैसे कंकड़ या काँटा या काँच का टुकड़ा

    वह भी संस्कृति चिंता के समय में।

    मुझे दुख इस बात का नहीं

    कि महानदी के चक्कर में काँटा गड़ गया,

    या इस बात का भी नहीं,

    कि किनारों की, या शायद कगारों की

    फिसलन भरी चीकट माटी की वजह से

    मैं छू नहीं सका महानदी के पानी को

    फ़ुर्सत का दुख सिर्फ़ इतना है

    कि महानदी में बेख़ौफ़ तैरने के दिनों को,

    मैं फिर से नहीं पा सकता,

    मैं फिर से नहीं गा सकता,

    किशोर साहस का वह अंगरचा गीत

    जब चंद्रहासिनी के मंदिर को,

    एक बेनाम देवी चंद्रसेनी के रूप में

    उसके लाल रंग से पहचानता

    मैं बेख़ौफ़ कूद जाता था महानदी में

    अब अगर कूद नहीं सकता,

    तो कम से कम,

    उन्हें तो डराऊँ

    जो महानदी और चंद्रसेनी को,

    एक साथ अपनी आत्मा में भरते हुए,

    मगन तैर रहे हैं

    गहरे पानी के शांत प्रवाह में

    स्रोत :
    • रचनाकार : प्रभात त्रिपाठी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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